कैलाश सत्यार्थी और मलाला को नोबेल शांति पुरस्कार मिलने के आगे-पीछे कुछ बातें, कुछ सोच

11 अक्टूबर 2014
संपादकीय

भारत में बाल मजदूरी के खिलाफ लंबे समय से सामाजिक आंदोलन चला रहे कैलाश सत्यार्थी, और पाकिस्तान में लड़कियों के पढऩे के हक की वकालत करते हुए तालिबानी गोलियां खाने वाली छोटी सी लड़की मलाला यूसुफजई को नोबेल शांति पुरस्कार मिलने पर सभी आम लोग खुशियां मना रहे हैं, लेकिन कुछ बड़बोले लोग ऐसे भी हैं जो इसे पश्चिमी साजिश कह रहे हैं कि हिन्दुस्तान को बंधुआ बाल मजदूरों का देश करार दिया जा सके, और पाकिस्तान-अफगानिस्तान के तालिबानों को एक बार फिर उनके जुर्म के लिए बुरा दिखाया जा सके। पाकिस्तान में मलाला को मिलने इस सम्मान को लेकर मतभेद चल रहे हैं, और इसे पश्चिमी साजिश भी बताया जा रहा है। साथ ही भारत में हो सकता है कि अंग्रेजीभाषी, शहरी, शिक्षित, संपन्न मीडिया इस बात पर कुछ उदास हो कि कैलाश सत्यार्थी के नाम को पिछले बरसों में भारतीय अंग्रेजी मीडिया ने अधिक छापा-दिखाया भी नहीं था, उन्हें नोबेल मिलने की भविष्यवाणी भी नहीं की थी, और नोबेल कमेटी ने इसके बिना ही यह पुरस्कार दे दिया। अंग्रेजी तो अंग्रेजी, भारत का हिन्दी मीडिया भी इस बात को लेकर  अभी तक झटके से उबर नहीं पाया है, और आज बहुत से अखबारों के पहले पन्ने इस बात के गवाह हैं कि मानो कैलाश सत्यार्थी को नोबेल शांति पुरस्कार न मिला हो, पद्मश्री मिली हो। 
एक देश के रूप में भारत को तबसे देखें जबसे नोबेल पुरस्कार शुरू हुए हैं, तो अब तक भारत में जन्मे हुए, यहीं पर काम करने वाले, यहीं पर किए गए काम के लिए जिन लोगों को नोबेल पुरस्कार मिला है, उनमें रविन्द्रनाथ टैगोर को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था। बाकी जिन लोगों को किसी भी तरह का नोबेल पुरस्कार मिला, वे या तो दूसरे देशों में जन्मे थे, और भारत में उन्होंने काम किया था, या भारत में जन्मे थे और दूसरे देशों में काम किया था। ऐसे में कैलाश सत्यार्थी के साथ इस बात का जिक्र जरूरी है कि वे भारतवंशी, भारत में काम करने वाले, भारत में किए गए काम के लिए नोबल शांति पुरस्कार पाने वाले दूसरे भारतीय हैं। अभी कुछ बरस पहले भारत के एक पर्यावरण वैज्ञानिक आर.के. पचौरी को भी संयुक्त राष्ट्र की एक जलवायु कमेटी के साथ संयुक्त रूप से नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया था, और उनका काम वैज्ञानिक अधिक था, इसलिए खबरों में कुछ कम था। लेकिन उस वक्त भी लोगों को यह याद आई थी कि  यह पुरस्कार भारत के किसी व्यक्ति को आधी सदी से भी अधिक देर से दिया गया था, और गांधी को नोबेल शांति पुरस्कार मिलते-मिलते कई बार रह गया, और नोबेल पुरस्कार को यह सम्मान नहीं मिल पाया। इस बार इस पुरस्कार की कमेटी ने, उसके लोगों ने इतिहास की अपनी इस चूक या गलती को माना है, लेकिन यह मान लेना कि कैलाश सत्यार्थी को गांधी के मुआवजे की शक्ल में यह पुरस्कार दिया गया है, उनके काम और उनके मकसद के साथ बेइंसाफी होगी। 
नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा के साथ ही यह खुलासा किया गया कि एक हिन्दू और एक मुस्लिम को, एक हिन्दुस्तानी और एक पाकिस्तानी को यह पुरस्कार दिया जा रहा है क्योंकि ये दोनों ही बच्चों के हक के लिए और कट्टरपंथ के खिलाफ काम कर रहे हैं। यह बात बहुत से लोगों को कुछ अटपटी लग रही है कि कमेटी ने  पुरस्कार के लिए छांटने के तर्कों के पीछे धर्म का भी पैमाने की तरह जिक्र किया है, और राष्ट्रीयता का भी। लेकिन हम इसमें कुछ अधिक अटपटा नहीं देखते और कमेटी की सोच के पीछे के मुद्दों के इस खुलासे को ईमानदार मानते हैं। यह बात जाहिर है कि भारत और पाकिस्तान के बीच आज जिस तरह का तनाव चल रहा है, वह दुनिया में परमाणु हथियारों वाले दो देशों के बीच का सबसे बुरा तनाव है। दूसरी तरफ इन दो देशों के बीच, और अपने-अपने देशों में भी हिन्दू और मुस्लिम मुद्दा हैं, और इस बात को नकारना हकीकत को नकारना होगा। और आखिर की बात तो बहुत जाहिर है कि कट्टरपंथ के खिलाफ, और बच्चों के हक के लिए काम करना एक सम्मान के लायक बात तो है ही। 
नोबेल शांति पुरस्कार दुनिया के लिए एक संदेश भी रहते हैं कि इसके लिए नाम तय करने वाले लोग दुनिया में पिछले कुछ बरसों में किन मुद्दों को विश्व शांति के लिए सबसे अधिक अहमियत वाले पाते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि इस मोर्चे पर जिन लोगों का योगदान सबसे अधिक होता है, उनको छोड़कर मुजरिमों सरीखे दिखते कुछ राष्ट्रप्रमुखों को भी ये पुरस्कार दिए गए, और बिना किसी काम के बराक ओबामा को भी यह पुरस्कार दिया गया। 
हम पुरस्कार के लिए छांटे गए इन दो नामों से पूरी तरह सहमत हैं। जब कभी दुनिया के किसी एक हिस्से में कट्टरपंथ के खिलाफ काम करने के लिए किसी को सम्मान दिया जाएगा, तो कट्टरपंथ के हिमायती उसे किसी दूसरे देश की साजिश जरूर बताएंगे। और आज पाकिस्तान में एक तबका मलाला के सम्मान को पश्चिमी साजिश बता रहा है, और भारत में एक तबका इसे भारत को बाल मजदूरों के लिए बदनाम करने की पश्चिमी साजिश कह रहा है। दुनिया का कोई भी काम अगर कोई अहमियत रखता है, तो उसे बदनाम करने का काम तो होगा ही। इसके बीच आज जब फौजी टकराव झेल रही सरहद के दोनों तरफ के दो मजहबों के, दो पीढिय़ों के, दो देशों के लोगों को यह पुरस्कार दिया गया है, तो यह उनके काम, उनके सामाजिक योगदान के साथ-साथ उनके मुद्दों की अहमियत, और आज की दुनिया की जरूरत, इन सबको देखकर ही दिया गया लगता है। दुनिया की शांति को खतरे के मुद्दे, उन मुद्दों को टालने के तरीके, उन मुद्दों पर काम करने वाले लोग, और उनकी कोशिशों का सम्मान, इसे हम किसी पुरस्कार को तय करने के लिए सही पैमाना मानते हैं, और हम इन दोनों देशों को बधाई देते हैं कि उनके यहां की इन अच्छी कोशिशों का सम्मान हुआ है, और इस पुरस्कार को इन देशों की खामियों को बदनाम करने की कोशिश नहीं समझना चाहिए। 
भारत के बारे में लिखने को एक हल्की-फुल्की लेकिन दिलचस्प बात यह भी है कि चाय बेचने वाला एक बच्चा आज इस देश का प्रधानमंत्री है, और बाल मजदूरी के खिलाफ संघर्ष करने वाले को नोबेल शांति पुरस्कार मिला है। कैलाश सत्यार्थी ने बनारस में अपने आंदोलन का खासा काम किया था, और उसी बनारस से आज नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री हैं। इसलिए माना जाना चाहिए कि इन दोनों की कोशिशों से भारत में अब बाल मजदूरी के खिलाफ एक बड़ी जागरूकता पैदा हो सकती है, और बच्चों की पीढ़ी को एक बेहतर कल मिल सकता है। दुनिया को अगर शांति की जरूरत है, तो वह पाकिस्तान की बच्चियों की पढ़ाई के बाद ही आ पाएगी, और भारत के बच्चों को मजदूरी से आजाद कराने के बाद ही आएगी। 
दुनिया में आज इस पुरस्कार के साथ ही भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में बच्चों की हालत पर एक बार सबका ध्यान जा रहा है, और इसे आगे बढ़ाने की जरूरत है। भारत और पाकिस्तान के दो गैरसरकारी, आम लोगों एक साथ नोबेल शांति पुरस्कार मिलने से इन दो पड़ोसी देशों को सिर टकराने से रोकने का एक संदेश भी मिला है, और एक छोटी बच्ची मलाला की इस बात का सम्मान दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों को करना चाहिए कि वे इस पुरस्कार समारोह के मौके पर पहुंचे, मिलें, और अमन की कोशिश करें। दुनिया में कूटनीति के जानकार और ठेकेदार इस बात को एक फिजूल का जज्बात कह सकते हैं, लेकिन दुनिया के महान फैसले कूटनीति के पहलवानों की तंग सोच से परे ही हो सकते हैं, और दोनों देशों को दरियादिली दिखाने का एक मौका हाथ लगा है, इसे इस्तेमाल करके नरेन्द्र मोदी और नवाज शरीफ को अपने-अपने देशों के भूखे बच्चों को खाना और पढ़ाना चाहिए, न कि सरहद पर फौजी बददिमागी दिखानी चाहिए। कूटनीति से अनजान एक छोटी बच्ची ही इतनी बड़ी बात कर सकती थी, और इसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी दोनों देशों को चला रहे नेताओं की है। 

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