गडकरी ने जाकर सड़क किनारे बैठे सांड को कोंचा कि मुझे मार

7 अक्टूबर 14
संपादकीय
दुनिया में हर सच कहने लायक नहीं होता, और कहने लायक हर बात लोगों की बर्दाश्त के बाहर कहना ठीक नहीं होता, बिना मौके के कोई बात करना भी गलत होता है, और नियम-कानून के खिलाफ कुछ कहना तकलीफदेह हो सकता है। ये तमाम बातें भाजपा के केन्द्रीय मंत्री, कल तक के उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष, और एक वक्त महाराष्ट्र भाजपा के ताकतवर नेता नितिन गडकरी पर लागू होती हैं। उन्होंने कल कहा कि चुनाव का वक्त मीडिया मालिकों के लिए, संपादकों के लिए, और संवाददाताओं के लिए पार्टियों और उम्मीदवारों की तरफ से पैकेज लेकर आता है, और जिसे जो मिलता है, उसे जरूर ले लेना चाहिए। जिसे जो लेने की इच्छा हो, वह भी ले लेना चाहिए। जितना जो खाने की इच्छा हो, वह भी खा लेना चाहिए। मंच से माईक पर और कैमरे के सामने कही गई इन बातों को लेकर टीवी की खबरों के बाद चुनाव आयोग ने गडकरी को नोटिस दिया है, और उन्होंने इस नोटिस के बाद फिर अपनी बात पर कायम रहते हुए यह कहा है कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया। 
अब हम जिन बातों से आज की बात शुरू कर चुके हैं, उनमें से पहली बात पर जाएं, तो क्या गडकरी ने गलत कहा है? और गलत कहा है तो कितना गलत कहा है? यह बात जगजाहिर है कि चुनाव के वक्त मीडिया के मालिकों में से कुछ या अधिक, संपादकों में से कुछ या अधिक, और इन दो के बाद अगर जरूरत बच जाए, और चुनावी बजट भी, तो संवाददाताओं में से भी कुछ या अधिक के लिए पार्टियों और उम्मीदवारों की तरफ से पैकेज का रिवाज बन गया है। कुछ लोग मांग लेते हैं, कुछ लोग मना कर देते हैं, कुछ लोग इश्तहारों की शक्ल में फायदा ले लेते हैं। लेकिन अगर पैकेज हकीकत नहीं होते तो कुछ बरस पहले इसी महाराष्ट्र में तमाम बड़े-बड़े अखबार अशोक पर्व (उस वक्त के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण का चुनावी पर्व) के नाम पर एक सरीखी रिपोर्ट क्यों छापते? उस वक्त प्रेस कौंसिल से लेकर अदालत तक ने कई-कई पन्नों पर बिखरी, कई-कई अखबारों में छपीं इन रिपोर्ट्स को पेड न्यूज माना था, और भारत के इतिहास का पेड न्यूज का यह सबसे बड़ा मामला उसी महाराष्ट्र में हुआ था जहां पर कि कल गडकरी ने बिना जरूरत, बिना मौके, महज चटपटे भाषण के लिए मधुमक्खी के छत्ते में गैरकानूनी कट्टा डाल दिया, और चुनाव आयोग की नजरों में आ गए। 
सार्वजनिक जीवन, खासकर राजनीति में जहां पर कि एक नेता या पार्टी को लोगों से वोटों का भी तकाजा रहता है, वहां पर बेमौके, बेजरूरत, ऐसी बेदिमागी बयानबाजी कितनी नुकसानदेह हो सकती है, उसकी खास फिक्र गडकरी नहीं दिख रही है। कल ही उन्होंने एक इंटरव्यू में यह साफ कर दिया है कि केन्द्र को छोड़कर महाराष्ट्र की राजनीति में वापिसी का उनका कोई इरादा नहीं है। वैसे भी जब वे भाजपा अध्यक्ष थे, तब भी वे महाराष्ट्र का चुनाव बुरी तरह खो चुके थे। और आज तो महाराष्ट्र में जिस तरह चौकोन लड़ाई है, उसमें किसी भी हार का कोई बात रहने वाला नहीं है, जीत की मां बनने के लिए लोग जरूर सामने आ जाएंगे। ऐसे में गडकरी की ये बातें भाजपा के लिए असुविधा के साथ-साथ शर्मिंदगी वाली भी हैं, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मीडिया के साथ एक दशक से चले आ रहे अपने खराब संबंधों के बाद अब मीडिया में खासी जगह पा रहे हैं, और प्रधानमंत्री से मीडिया के संबंध अभी स्थिर हो नहीं पाए हैं। ऐसे में एक तबके के रूप में मीडिया को बेइज्जत करने वाला यह बयान समझदारी नहीं है, और उस पर अड़े रहकर, उसे सही बताकर गडकरी बात को जरूरत से अधिक दूर तक ले जा रहे हैं, जरूरत से अधिक बिगाड़ रहे हैं। 
लोकतंत्र में लोगों की भावनाओं को देखते हुए, मौके की अपनी जरूरत को देखते हुए लोगों को शातिर न सही समझदार तो रहना ही चाहिए। गडकरी की समझदारी में वैसे कोई कमी नहीं है, लेकिन वे वक्त-वक्त पर बेतुकी और बेगैरत बातें बोलने के आदी रहे हैं। कल तक जो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, उनकी जुबान को भाजपा आज कितना काबू कर पाती है, यह अमित शाह और नरेन्द्र मोदी की परेशानी है, गडकरी ने कुल मिलाकर एक यह नौबत खड़ी कर दी है कि कोई सड़क किनारे बैठे सांड को जाकर कोंचे कि उठ और मुझे मार। 

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