देश में कट्टरपंथी सोच लादने की कोशिश, मोदी कुछ सोचें

8 अक्टूबर 2014
संपादकीय
दिल्ली विश्वविद्यालय में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने एक अभियान शुरू किया है और साथ रहने वाले जोड़ों के खिलाफ प्रदर्शन किया। भाजपा के इस छात्र संगठन का कहना है कि नौजवान जोड़ों का साथ रहना एक सामाजिक बुराई है। विद्यार्थी परिषद के नेताओं ने कहा है कि लिव इन रिलेशनशिप भारतीय संस्कृति के खिलाफ है और परिवार नाम की संस्था के भी। उनका कहना है कि ऐसे संबंध शायद ही कभी कामयाब होते हैं और विद्यार्थी परिषद ऐसे मामलों का अध्ययन करके छात्राओं को यह जानकारी देगा ऐसे संबंध किस तरह बुरा असर डालते हैं। 
यहां पर बात को आगे बढ़ाने के पहले यह याद कर लेना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी लिव इन रिलेशनशिप को कई अलग-अलग मामलों में संवैधानिक मान्यता दी है। उसने लोगों का शादी के बिना भी साथ रहना जायज माना है, और एक मामले में तो सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि शादी से परे भी जोड़ों के जो बच्चे होते हैं, उनका भी कानूनी अधिकार संतानों जितना ही है। इस बात से जाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ जोड़ों का बिना शादी साथ रहना कानूनी माना है, बल्कि ऐसे संबंधों में होने वाली संतान के हक भी शादी की संतानों जितने ही माने हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि लिव इन रिलेशनशिप में रहना ना तो अपराध है ना ही पाप। कोई किसी के साथ शादी करके रहे या बिना शादी के... ये उसका निजी फैसला है।
ऐसे में देश में सत्तारूढ़ भाजपा का छात्र संगठन अगर लोगों के मर्जी के रिश्तों के खिलाफ इस तरह का अभियान छेड़ता है, तो इससे एक सामाजिक तनाव तो बढ़ता ही है, भारत की एक पाखंडी और दकियानूसी तस्वीर पूरी दुनिया के सामने जाती है। हमने कई प्रदेशों में भाजपा के समविचारक संगठनों के हिंसक हमले नौजवान जोड़ों पर देखे हैं, और कहीं पर पहनावे को लेकर, तो कहीं लड़के-लड़कियों के साथ रहने को लेकर भारतीय संस्कृति का नाम लेकर हिंसा की गई। हालत यह है कि भाजपा के राज में कर्नाटक में जिस श्रीराम सेना ने भयानक कट्टरपंथी हमले किए थे, उसी श्रीराम सेना को भाजपा के ही एक दूसरे राज्य गोवा में सरकार ने दुकान भी नहीं खोलने दी। 
आज न सिर्फ दिल्ली में शुरू इस अभियान में, बल्कि देश में जगह-जगह हिन्दू संगठन, और मुस्लिम संगठन भी, देश की संस्कृति का नाम लेकर, या धार्मिक तौर-तरीकों का नाम लेकर तरह-तरह का कट्टरपंथ बढ़ाते चल रहे हैं। कहीं लड़कियों के जींस पहनने पर रोक लगाने की बात हो रही है, तो कहीं पर लड़कियों के मोबाइल फोन के इस्तेमाल के खिलाफ फतवे जारी हो रहे हैं। देश में एक उदार और वैज्ञानिक नजरिया लाने की जरूरत है, क्योंकि खाप पंचायतों के अंदाज में जब पत्थर युग की सोच को कोई एक समाज बढ़ावा देता है, तो दूसरे धर्मों और दूसरी जातियों के संगठनों को ऐसा लगता है कि वे अपना अस्तित्व खो बैठेंगे। और ऐसे में वे बढ़-चढ़कर कट्टरता के मुकाबले में उतर जाते हैं, और नौजवान पीढ़ी जगह-जगह पटरियों पर जान देते दिखती है। 
भारत को अगर दुनिया के मुकाबले आगे बढऩा है, या कम से कम साथ चलना है, तो अपनी पूरी नौजवान पीढ़ी पर भड़ास को लादते हुए, उसे कुंठा में जीने पर मजबूर करते हुए यह देश कुछ हासिल नहीं कर सकता। जिस नौजवान पीढ़ी को नरेन्द्र मोदी दुनिया की सबसे बड़ी ताकत कह रहे हैं, उसी नौजवान पीढ़ी के बुनियादी हक के खिलाफ एक कट्टरपंथी सोच देश में बढ़ाई जा रही है, और प्रधानमंत्री इसे देखकर अनदेखा करते चलें, तो वे अपनी तय की हुई मंजिल पर शायद ही पहुंच पाएं।

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