भारत-पाक के बीच सिर के बदले सिर का मुकाबला बंद हो

संपादकीय 
9 अक्टूबर 2014
भारत-पाकिस्तान की सरहद पर चल रहा तनाव एक बड़ी फिक्र पैदा करता है। सरहद पर तनाव हर उस वक्त अधिक खतरनाक हो जाता है जब कोई एक देश अस्थिरता से गुजर रहा हो। इस सरहद के एक तरफ अस्थिरता है, और दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी नाम की एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक स्थिरता है। पाकिस्तान की फौज की जो खुफिया एजेंसी, आईएसआई, वहां सरकार में भी दखल रखती बताई जाती है, उसका एक नया मुखिया अभी-अभी आया है। हो सकता है कि उसके सामने अपनी हैसियत को साबित करने की एक घरेलू चुनौती हो। दूसरी तरफ पाकिस्तान की सरकार वहां के विपक्ष का बड़ा कड़ा विरोध झेल रही है, और उसके सामने अपने अस्तित्व को साबित करने का एक मोर्चा है। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कुछ महीने पहले के आम चुनाव में पाकिस्तान के खिलाफ खासी कड़ी बातें कहते आए हैं, और उनकी अपनी पार्टी पाकिस्तान के खिलाफ लंबे समय से एक हमलावर रूख रखते आई है। आज मोदी को हिन्दुस्तानी जनता के बीच अपनी ही कल तक कही गई बातों पर भी खरा उतरना है, और अपनी पार्टी की उम्मीदों को भी पूरा करना है। इस तरह सरहद के दोनों तरफ अपने-अपने घरेलू दबाव भी काम कर रहे हैं। 
और इसके साथ-साथ इसी सांस में हम यह भी कहना चाहेंगे कि हम किसी भी जगह फौजी मोर्चों को सिर्फ लीडरों और फौजी अफसरों का खड़ा किया हुआ नहीं मानते, हमारा यह मानना रहता है कि फौजी सामान और हथियार बनाने वाले कारखानेदारों और कारोबारियों का पापी पेट जंग से जुड़ा होता है, और किसी भी सरहद का कोई भी तनाव इनके लिए खुशियां लेकर आता है, और मुल्कों की राजधानियों में अगर इन कारोबारियों के पैसों से तनाव खड़ा किया जाता हो, तो भी हमको हैरानी नहीं होगी। इसके साथ-साथ यह तो हमारा देखा हुआ है ही कि किस तरह कुछ कागजी संगठनों के लोग जंग की बातों के बिना जी नहीं पाते, मीडिया के कुछ बड़े-बड़े मुंह किस तरह जंग के लिए भड़काते और उकसाते रहते हैं। जंग की इनकी चाह यह शक पैदा करती है कि ये लोग फौजी कारखानेदारों के भाड़े के भोंपू की तरह काम करते हैं। 
भारत में आज एक दिक्कत और है। एक तरफ उस महाराष्ट्र में विधानसभा के चुनाव होने हैं जहां पर पाकिस्तान से आए हुए आतंकियों ने बड़ी तबाही की थी, और आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वहां चुनाव अभियान के दौरान दो दूसरी हिन्दूवादी पार्टियों  की तेजाबी जुबान झेल रहे हैं कि जब सरहद पर हिन्दुस्तानी मारे जा रहे हैं, तो प्रधानमंत्री गाल बजा रहे हैं। आज वहां प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी की सबसे कटु आलोचक कल तक की उनकी दशकों की भागीदार शिवसेना है, और पाकिस्तान विरोधी रहती आई इस पार्टी के जुबानी हमले भाजपा को वहां भारी भी पड़ रहे हैं। इससे दूर हरियाणा में भी विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, और हरियाणा के लोग पड़ोसी पंजाब के साथ फौज में जाने का इतिहास भी रखते हैं, और सरहद पर कमजोर प्रधानमंत्री चुनाव में परेशानी झेल सकता है। ऐसे में यह भी सोचने लायक एक बात है कि कुछ ही हफ्ते पहले नरेन्द्र मोदी उत्तरप्रदेश सहित उपचुनावों में नाकामयाब साबित हो चुके हैं, और ऐसे में इन दो राज्यों के चुनावों में उनसे आम चुनावों की कामयाबी दुहराने की उम्मीद की जा रही है। ऐसे मोदी-मैजिक के वक्त पर इन दोनों ही राज्यों में भाजपा के भागीदार अलग हो चुके हैं, और भाजपा के लिए दिक्कत भी बने हुए हैं। ऐसे में घरेलू प्रादेशिक चुनाव के मोर्चे भी देश के प्रधानमंत्री से सरहद पर बहादुरी की उम्मीद कर सकते हैं, और राष्ट्रवाद के सैलाब के बीच फौजी बहादुरी दिखाने का मोह रोक पाना मुश्किल होता है। 
भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत के सिलसिले का थमना, और गोलीबारी का शुरू होना, दोनों देशों के लिए बहुत बुरा है। एक तरफ सरकार, नेताओं, पार्टियों, और फौजों से परे आम लोग लगातार दोनों देशों के बीच बेहतर रिश्तों की कोशिश कर रहे हैं, ऐसे में गोलियों का थमना जरूरी है। जंग की बातें सरहद से परे की राजधानियों में लोगों को अच्छी लग सकती हैं, लेकिन जो लोग सरहद के गांवों में धमाकों के बीच जीते और मरते हैं, उनसे कोई पूछे कि क्या जंग से कभी कोई रास्ता निकला है? दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों को, और इनसे दोस्ती रखने वाले बाकी देशों को भी अमन की पहल करनी चाहिए। सिर के बदले सिर के जंगी नारे कामयाब हुए, तो ऐसे सिर बेकसूर जनता के ही होंगे। इसलिए जिन सिरों पर ताज है, उनको अपनी दीवानगी पर नाज करने के बजाय, दोनों देशों की गरीबी को दूर करने वाला राज करना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें