हजार करोड़ के अफसर वाला बहुत गरीब देश...

29 नवंबर 2014
संपादकीय
दिल्ली के आसपास उत्तरप्रदेश में कई सरकारी विभागों और संस्थानों का काम देखने वाले एक बड़े इंजीनियर पर आयकर विभाग का छापा पड़ा, और पहली खबरों के मुताबिक उसकी दौलत हजार करोड़ की हो सकती है। सैकड़ों करोड़ के गहने, जिनमें हीरों के गहने ही दो किलो बताए जा रहे हैं, कार में दस करोड़ नगदी, ऐसी आंखें फाड़ देने वाली जानकारियां हैं। हम अभी इस बात पर नहीं जा रहे कि अदालत में आखिर तक यह काली कमाई हजार करोड़ साबित हो पाएगी या सौ दो सौ करोड़ पर टिकेगी, लेकिन जितनी भी है, वह पूरे देश को यह सोचने पर मजबूर करती है कि बदनाम राजनीति से परे सरकारी अफसरों की कमाई का क्या हाल है। और केन्द्र सरकार या राज्य सरकारों के तहत इस तरह की कमाई करने का मौका लोगों को कैसे मिलता है, और यह जाहिर है कि जब कोई अफसर कारोबारियों को दस-बीस हजार करोड़ का फायदा देने की हालत में होगा, तो ही जाकर उसके पास हजार करोड़ की दौलत जुट पाएगी।
हम छत्तीसगढ़ के बारे में सोचते हैं तो इस राज्य में भ्रष्ट अफसरों के सैकड़ों मामले राज्य बनने के बाद से पकड़ में आए हैं, और शायद ही किसी को सजा मिलते लोगों ने देखा होगा। जांच में मामलों को कमजोर कर देना, सारी कोशिश के बाद भी अगर कोई मामला मजबूत बन गया है, तो उसे अदालत तक जाने की इजाजत नहीं देना, और अगर अदालत चले भी गया है तो उसे बरसों तक खींचते चले जाना, यह सब लोग देख-देखकर थक चुके हैं। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ का सरकारी इतिहास इस बात का गवाह है कि हर किस्म के भ्रष्ट व्यक्ति को निलंबन के बाद कुछ अरसा गुजरने पर फिर खासी कमाई और खासे भ्रष्टाचार की संभावना वाली कुर्सी पर तैनात कर दिया जाता है, और फिर ऐसे लोग चेहरे पर नकाब बांधे बिना ही लूटपाट में लग जाते हैं। जांच कभी पूरी नहीं होती, और पूरी हो भी जाती है, तो सरकार ऐसी फाईलों पर जमकर और टिककर बैठ जाती है, कि मानो भ्रष्ट की कमाई बंद न हो जाए। 
सरकार के कुछ जानकार लोगा के मुताबिक मध्यप्रदेश सरकार के तहत भ्रष्टाचार के ऐसे ही मामलों किसी के पकड़ाने पर सरकार उसे जेल से निकलने का मौका नहीं देती, और किसी भी हालत में उसे सरकारी कुर्सी पर दुबारा नहीं बैठने देती। छत्तीसगढ़ में अभी आर्थिक अपराध ब्यूरो ने कुछ अफसरों को गिरफ्तार करके जेल भेजा है जो कि लंबे समय से भ्रष्टाचार के मामलों में फंसे हुए थे, लेकिन अदालत और जेल से परे खुले घूम रहे थे। पूरे देश में सरकारी कामकाज में भ्रष्टाचार का जो बुरा हाल है, उसके चलते एक बात जरूरी लगती है कि जो लोग रिश्वत लेते पकड़ाएं, कोई घपला करते पकड़ाएं, या अनुपातहीन संपत्ति के साथ पकड़ाएं, उनको सरकार किसी कुर्सी पर न बैठने दे, काम न करने दे, वही सस्ता पड़ेगा। ऐसे तमाम मामलों में मध्यप्रदेश से जब लोग छत्तीसगढ़ की तुलना करते हैं, तो छत्तीसगढ़ भ्रष्ट लोगों के लिए बड़ा रहमदिल साबित होता है। परले दर्जे के भ्रष्ट लोग पुख्ता मामलों के बावजूद फिर अपने विभागों में, या दूसरे विभागों में फिर कमाऊ कुर्सियों पर पहुंच जाते हैं, और जनता की खजाने को दीमक की तरह खोखला कर देते हैं। 
जनता के बीच से सरकार पर एक दबाव पडऩा चाहिए कि भ्रष्ट लोगों को अदालत से बेकसूर साबित होने के पहले सरकारी कामकाज से अलग रखा जाए। ऐसा न होने पर यह देश-प्रदेश लुटना कभी भी बंद नहीं होगा। अब हजार करोड़ से अधिक का अफसर आने के बाद ही क्या देश-प्रदेश की सरकारों को होश आएगा?

एक तरफ रैनबसेरे का अदालती आदेश और दूसरी तरफ दिल्ली में गरीबों पर बुलडोजर

28 नवंबर 2014
संपादकीय
दिल्ली से एक खबर है कि पिछले दस-बारह बरसों से वहां पर एक पहाड़ी की जंगल-जमीन पर रह रहे करीब दो हजार गरीबों के झोपड़े गिरा दिए गए। जैसा कि आज दिल्ली का मौसम है, वहां पर दर्जनभर से अधिक रेलगाडिय़ां रद्द हो गई हैं, क्योंकि वहां ठंड बहुत है, और गहरी धुंध छाई हुई है। ऐसे में गरीबों के ऐसे झोपड़े, और कच्चे मकान, जो कि उनके बिजली बिल, आधार कार्ड, राशन कार्ड के पतों वाले थे, उनको बुलडोजर लाकर गिरा दिया गया। चूंकि दिल्ली में चुनाव सामने हैं, शायद इसलिए कांग्रेस के नेता राहुल गांधी वहां पहुंचे, और उन्होंने मलबे पर खड़े रहकर कहा कि बुलडोजर को उनके ऊपर से गुजरना होगा। हम इस बयान को कोई अहमियत नहीं देते, क्योंकि जहां कांग्रेस की सरकारें रहती हैं, वहां भी बुलडोजर गरीबों पर ही चलते हैं, और अमीरों की बारी शायद ही कभी आती है। लेकिन आज इस मुद्दे पर लिखने का हमारा दूसरा मकसद है। 
सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश की सरकारों को नोटिस भेजा है कि वे ठंड में बेघर लोगों को बचाने के लिए रैनबसेरे का इंतजाम करें, और अदालत को रिपोर्ट दें। आज जब दिल्ली में सड़क किनारे के फुटपाथों पर बड़े-बड़े शामियाने लगाकर बेघर लोगों के लिए रात में सिर छुपाने का इंतजाम किया जा रहा है, पिछले कई बरसों से अदालतों के कहे हुए ऐसा करना पड़ रहा है, तब नवंबर के महीने के आखिरी कड़कड़ाते दिनों में अगर सरकारी बुलडोजर गरीबों की पूरी की पूरी बस्ती को उजाड़ रहे हैं, तो हमारे हिसाब से यह सुप्रीम कोर्ट की सीधी-सीधी अवमानना है, जिसने कि पूरे देश में ठंड में बेघरों के रहने के लिए सरकारी खर्च पर इंतजाम की गारंटी मांगी है। अब सुप्रीम कोर्ट इसी दिल्ली में बैठा हुआ है, और दो दिनों से छप रही इन तस्वीरों को देखने के बाद अगर उसने अब तक दिल्ली सरकार को नोटिस नहीं भेजा है, तो हमारे हिसाब से जज शायद इतने अधिक व्यस्त हैं, कि इन दो हजार लोगों में से कुछ बच्चों के गुजर जाने पर ही उन्हें नोटिस भेजने का वक्त मिले। 
सरकार एक ऐसे ऑक्टोपस की तरह काम करती है जिसके कि आठ हाथ-पैर होते हैं, और समंदर में यह प्राणी अलग-अलग हाथ-पैर से अलग-अलग काम करता है। और ऐसा कहना भी ऑक्टोपस के साथ कुछ ज्यादती इसलिए भी होगी क्योंकि उसके सब हाथ-पैर यह जानते हैं कि बाकी हाथ-पैर क्या कर रहे हैं। दिल्ली में एक तरफ सरकार रात का इंतजाम कर रही है, और दूसरी तरफ गरीबों के सिर पर से उनका अपना इंतजाम हटा रही है। इस सिलसिले में सरकार के नेताओं या अफसरों, ठेकेदारों और सप्लायरों का भला जरूर हो जाएगा, क्योंकि इन दो हजार लोगों के लिए सरकारी खर्च पर रैनबसेरा बनाने और चलाने का मजेदार काम सरकार को शायद और मिल जाए। हम चारों तरफ देखते हैं कि सरकार बहुत से काम रात-दिन ऐसे करते चलती है कि जिससे जनता के खजाने का अधिक से अधिक नुकसान हो, क्योंकि जब तक खर्च नहीं होगा, तब तक नेता, अफसर, ठेकेदार को बचेगा क्या? सरकार की बेदिमागी का एक किस्सा है, जिसे इस गंभीर जगह पर भी लिखना जायजा होगा। जंगल विभाग के अफसरों ने एक बार एक जगह पेड़ लगाने के लिए तीन किस्म के लोगों को तैनात किया। एक टीम गड्ढे खोद रही थी, दूसरी टीम का काम था उन गड्ढों में पौधे रखना, और तीसरी टीम का काम था, इन पौधों के रखे जाने के बाद बची जगह पर खाद और मिट्टी भरना। किसी वजह से यह दूसरी टीम नहीं पहुंच सकी, तो पहली टीम गड्ढे खोदती चली गई, और तीसरी टीम उन गड्ढों में खाद और मिट्टी भरते चली गई। छत्तीसगढ़ में भी इस तरह के भ्रष्टाचार, और फिजूलखर्च की अनगिनत मिसालें हैं, और ऐसे तमाम भ्रष्ट अफसर बचे हुए हैं, और जनता के खजाने को लूटने के काम को बखूबी करते चल रहे हैं। 
लेकिन दिल्ली में गरीबों की बेदखली के मुद्दे को देश के आम भ्रष्टाचार की तरफ मोड़ देना ज्यादती होगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पूरे देश के लिए एक ऐसी नीति बनानी चाहिए, जब तक किसी गरीब को दूसरा इंतजाम करके न दिया जा सके, तब तक उसे बेदखल न किया जाए। एक तरफ मोदी सरकार यह मुनादी करते थकती नहीं है कि 2022 तक हर नागरिक को मकान मिल चुका रहेगा। तो आने वाले इन बरसों में बसे हुए लोगों को हटाकर, कुचलकर, उन्हें जीते जी मौत सरीखी जिंदगी देकर दिल्ली की सरकार क्या हासिल कर रही है? बुलडोजर का अपना कोई दिमाग नहीं होता है, और सरकार के पास दिल नहीं होता है, महज दिमाग होता है। लेकिन एक जनकल्याणकारी सरकार को अपने ही लगाए हुए नारे के बारे में भी सोचना चाहिए कि गरीबों को उजाड़कर किस तरह देश भर में हर किसी को मकान दिए जा सकेंगे? जो लोग आज बसे हुए हैं, उनको न उजाडऩा अपने आप में उनको मकान देने सरीखा है, और आने वाले बरसों में ऐसे लोगों को तभी हटाना चाहिए, जब उनके लिए सरकार दूसरा इंतजाम कर सके।

गरीब की ईमानदारी कोई अपवाद नहीं, आम बात

27 नवंबर 2014
संपादकीय
अच्छी खबरें भूले-भटके मिलती हैं, और बहुत अच्छी खबरें तो सफेद शेर के नस्ल जैसी दुर्लभ हो गई हैं। ऐसे में कुछ पुरानी एक खबर यह है कि केरल में एक लॉटरी वाले से एक ग्राहक ने फोन पर अपने लिए दस टिकटें अलग रखने को कहा, न भुगतान किया, न नंबर नोट किए। टिकटें लेने के पहले उनमें से एक पर एक करोड़ का ईनाम निकल गया, तो बहुत मामूली कमाई वाले इस लॉटरी वाले ने तुरंत फोन करके ग्राहक को बताया कि उसके लिए अलग रखी टिकटों में से एक पर एक करोड़ का ईनाम निकला है। एक करोड़ रूपया कम नहीं होता। खासकर उस दुकानदार के लिए जो महीने में दस हजार ही कमा पाता है। और ऐसी तकरीबन बेमिसाल ईमानदारी पर लोगों ने उसका सम्मान किया, सरकार ने भी सम्मान किया, और लोगों ने कहा कि इतना गरीब होते हुए भी वह इतना ईमानदार है। 
दरअसल गरीबी की बेबसी को ईमानदारी से हट जाने की खासी बड़ी वजह मान लिया जाता है, जबकि हकीकत इसके ठीक उल्टे होती है। आज की दुनिया को देखें तो जो सबसे अधिक संपन्न हैं, उनके बीच बेईमानों का अनुपात, गरीबों के बीच बेईमानों से बहुत अधिक, शायद कई गुना अधिक निकलेगा। और यह मान लेना कि गरीब महज बेबसी में ईमानदार रहता है, यह सही नहीं है। ईमानदारी एक पसंद की बात है, और अगर ऐसा नहीं होता, तो पैसों वालों के सामने तो बेईमानी की कोई बेबसी रहती नहीं है। जब राजनीति, सरकारी नौकरी, या किसी सार्वजनिक काम के लिए किसी पैसे वाले की चर्चा होती है, तो आमतौर पर कहा जाता है कि वह तो खानदानी रईस है, कम से कम वह तो पैसा नहीं खाएगा। और हकीकत में जब बात सामने आती है, तो विजय माल्या से लेकर सुब्रत राय सहारा तक, और राजा से लेकर कलमाड़ी तक, बड़े-बड़े पैसे वालों की बेईमानी के किस्से सामने आते हैं। 
अगर हर कोई अपनी बेबसी के चलते बेईमान हो जाते, तो यह देश पल भर में खत्म हो जाता। क्योंकि इसकी आधी आबादी तो गरीबी की रेखा के नीचे है, उसके पास देश का दिया, लोकतंत्र का दिया, सरकार और समाज का दिया हुआ ऐसा कोई अहसान नहीं है कि वह उसकी वजह से ईमानदार रहे। अगर गरीब ईमानदार हैं, तो वे अपनी पसंद से ईमानदार हैं। आज अगर नक्सल इलाकों में सारे शोषण, और सारी ज्यादतियों के बावजूद तकरीबन तमाम आदिवासी हथियारों से दूर हैं, कानून के तहत जी रहे हैं, तो यह उनकी पसंद है। उनकी जगह अगर पढ़े-लिखे, शहरी, और संपन्न तबके के लोग होते, तो वे कानून के खिलाफ सोचने के लिए सौ किस्म के तर्क ढूंढ चुके होते, अपनी आत्मा को गलत करने के लिए मना चुके होते, और ईश्वर को चढ़ावा चढ़ाकर अपने गलत कामों के लिए माफी पा चुके होते। लेकिन यह जंगलों के आदिवासियों से लेकर शहरों के गरीबों तक, आम लोग ही हैं, सबसे मेहनतकश और सबसे गरीब लोग ही हैं, जो कि मालिक से लेकर सरकार तक की तमाम ज्यादतियों को झेलते हुए भी न तो बेईमान होते, और न ही हिंसक होते। अगर देश की आधी आबादी अपने साथ होती बेइंसाफी के खिलाफ उठकर खड़ी हो जाती, तो लोकतंत्र बैठ चुका होता। 
इसलिए जब कोई गरीब ईमानदारी की कोई बड़ी मिसाल पेश करते हैं, तो उसे एक अपवाद मानकर नहीं चलना चाहिए, गरीबों के बीच ईमानदारों का प्रतिशत अधिक रहता है, और वे सहूलियतों के इतने गुलाम नहीं हो चुके रहते, कि उनकी ईमानदारी चल बसती। आज यहां इस मुद्दे पर हम इसलिए लिख रहे हैं कि संपन्न लोगों के बीच गरीबों को लेकर हिकारत का जो नजरिया रहता है, उस पर उनको फिर सोचना चाहिए। 

खुली सिगरेट बिक्री पर रोक का फैसला नासमझी का या सिगरेट कंपनियों की मर्जी का?

26 नवंबर 2014
संपादकीय
केन्द्र सरकार ने यह फैसला ले लिया है कि सिगरेट की खुली बिक्री बंद कर दी जाए। हो सकता है कि यह तुरंत लागू भी हो जाए, और इसकी खबर आते ही बाजार में हड़बड़ी में सिगरेट कंपनियों के शेयर गिर गए। हो सकता है कि यह दहशत सही हो, और सिगरेट की बिक्री कम हो जाए। लेकिन हमारा अंदाज इससे अलग है, और एक दूसरी बात इससे जुड़ी हुई ऐसी है जो यह सुझाती है कि इससे बिक्री कम होने के बजाय बढ़ भी सकती है। 
आज देश में सिगरेट की खुली बिक्री सिर्फ छोटी-छोटी फुटपाथी दुकानों, और पानठेलों पर होती है। ऐसी जगहों पर आज भी उन प्रदेशों में धड़ल्ले से तम्बाकू वाला गुटखा बिकता है, जहां पर इस पर कानूनी रोक लगी हुई है। भारत में सरकार का ऐसा कोई ढांचा नहीं है जो कि हर हजार-पांच सौ आबादी पर रहने वाली ऐसी एक-एक दुकान पर जाकर जांच कर सके। छत्तीसगढ़ में ही गुटखा पर रोक लगी हुई है, लेकिन हर सौ कदम पर यह मिल जाता है, इसमें कालाबाजारी की वजह से अधिक दाम जुड़ जाता है। सिगरेट का पैकेट बेचना जब कानूनी होगा, तो उस पैकेट से निकालकर सिगरेट बेचना कैसे रोका जा सकेगा? ऐसे कानून बनाने का कोई मतलब नहीं होता जिनको कि लागू नहीं किया जा सकता। आज हिन्दुस्तान के बहुत से प्रदेशों में दुपहिया पर लोगों के सिरों पर हेलमेट तो सरकार लागू नहीं कर पाई, जो कि एक अधिक आसान काम हो सकता था, बजाय सिगरेट की खुली बिक्री रोकने के। इसी तरह आज भी देश भर में स्कूल-कॉलेजों के आसपास सिगरेट और तम्बाकू की बिक्री पर रोक है, लेकिन उस पर कोई अमल नहीं हो पाता। सार्वजनिक जगहों पर सिगरेट पीने पर भी रोक है, लेकिन उसे भी कोई लागू नहीं कर पाता। ऐसे में एक और कानून महज अपनी नीयत को साबित करने के लिए तो ठीक है, उसका और कोई इस्तेमाल हमको नहीं दिखता। 
अब हम बहस के लिए पल भर को यह मान लेते हैं कि सरकार इसे कड़ाई से लागू कर ही लेगी। तो सिगरेट के सिर्फ पैकेट बिकने से उन लोगों का अधिक नुकसान हो सकता है जो आज अपनी आदत पर काबू पाने के लिए एक बार में सिर्फ एक सिगरेट खरीदते हैं, और फिर दुकान से हट जाते हैं। अब ऐसे लोगों के पास हमेशा उनका पैकेट रहेगा, और सिगरेट पीना बढ़ जाएगा। इसके साथ-साथ अब जो लोग सिर्फ बाहर सिगरेट पीते थे, उनके साथ उनके घर-दफ्तर भी यह पैकेट पहुंच जाएगा, और आसपास के लोग इस धुएं का नुकसान और अधिक झेलेंगे। 
आज भले सिगरेट कंपनियों के शेयरों के दाम गिर गए हों, हमको ऐसा भी लगता है कि इसके पीछे सिगरेट कंपनियों की एक साजिश भी हो सकती है, और उन्हीं के कहे हुए सरकार ने ऐसा फैसला लिया हो, और उन्होंने ही दिखावे के लिए कुछ दिनों के लिए अपने शेयरों के दाम गिरवा दिए हों। पूरा पैकेट बिकने से हो सकता है कि सिगरेट की बिक्री खासी बढ़ जाए, और उसकी खपत बढ़ जाए। सरकार के काम करने के तरीके से वाकिफ लोग यह जानते हैं कि तम्बाकू-लॉबी की मर्जी के खिलाफ इस देश में शायद ही कोई फैसला हो पाता है। देश के लोगों की संपन्नता पहले के मुकाबले कुछ अधिक, और लोग एक-दो सिगरेट के बजाय शायद पूरा पैकेट भी खरीद सकते हैं, और पैकेट पूरे समय साथ रहने से लोगों का मौत की तरफ तेजी से बढऩा जारी रहेगा। 
यह मामला कुछ उसी तरह का लगता है कि आज जो लोग शराब की एक छोटी बोतल, एक पौव्वा, खरीद सकते हैं, उन्हें कहा जाए कि अब उन्हें सिर्फ दो लीटर की बोतल मिल सकेगी, और छोटी बोतल में शराब बंद हो गई है। ऐसे में खपत कम होने के बजाय बढऩे का खतरा अधिक लगता है। और कुल मिलाकर आखिर में हम यही कहेंगे कि सरकार जब बड़े-बड़े कानून, बड़े-बड़े नियम लागू नहीं कर पा रही है, तो एक-एक पानठेले और फुटपाथी दुकान पर ऐसा एक और बेअसर कानून लादकर सरकार सिर्फ अपने कानूनों का सम्मान खत्म करेगी। 

मायावती से लेकर बस्तर तक भाजपा को सोचने की जरूरत

25 नवंबर 14
संपादकीय

देश की राजनीति में सबसे बड़ी दलित नेता मायावती का अपमान पहली बार नहीं  हो रहा है। बहुत से लोगों ने समय-समय पर उनके खिलाफ भद्दी, अश्लील, और हिंसक बातें कही हैं। इस बार भाजपा की एक महिला प्रवक्ता शायना एनसी ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मंच पर से कहा- समझ नहीं आता कि मायावती मर्द हैं या औरत।
भाजपा की इस महिला नेता को मायावती के बारे में यह बात समझ आ रही हो या नहीं, यह तो हमको नहीं पता, लेकिन हमको ऐसा बयान देने वाली महिला की समझ जरूर समझ आ रही है। यह एक निहायत घटिया सोच है, और यह एक पुरूषप्रधान सोच है जो कि किसी महिला को उसकी कामयाबी पर, या उसके रूप-रंग पर, या उसके तौर-तरीकों पर खिल्ली उड़ाने के लायक समझ लेती है। इसके साथ-साथ यह एक हिन्दूवादी सवर्ण सोच भी है, जो कि एक दलित महिला को अपमान के लायक समझती है। यह एक अलोकतांत्रिक सोच भी है, जो कि एक विरोधी या विपक्षी नेता के बारे में ऐसी फूहड़ और गंदी बात कहने का हौसला देती है। हमको अफसोस यही है कि दलित मुद्दों को लेकर भारत के लोकतंत्र के भीतर की हालत पर दो दिनों के भीतर हमको दूसरी बार लिखना पड़ रहा है। कल ही इसी जगह हमने भारत की जेलों में बंद मुस्लिम, दलित, और आदिवासी लोगों के बारे में लिखा था कि किस तरह जेलों में उनका अनुपात आबादी में उनके अनुपात से अधिक है, और किन वजहों से अधिक है। कल शायद जिस वक्त हम उन बातों को लिख रहे थे, उसी वक्त भाजपा की यह महिला नेता राजस्थान के एक गैरचुनावी आम कार्यक्रम के मंच से, बिना किसी उकसावे और भड़कावे के ऐसा अश्लील बयान दे रही थी। 
आज जब हम यह लिख रहे हैं, तब अमरीका जल रहा है। कुछ महीने पहले वहां एक गोरे पुलिस वाले ने बिना किसी उकसावे और भड़कावे के सड़क पर एक अश्वेत किशोर को गोली मार दी थी, और उस पर भी अमरीका में जगह-जगह अश्वेत लोगों ने, और नस्लवाद के विरोधी लोगों ने प्रदर्शन किए थे। आज जब अदालत में जनता के बीच से चुने गए जूरी-सदस्यों का यह फैसला सामने आया कि इस गोरे अफसर पर मुकदमा चलाने की जरूरत नहीं है, तो अमरीका में जगह-जगह विचलित लोगों ने हिंसा शुरू कर दी, आगजनी और तोडफ़ोड़ शुरू हो गई, और हालत इतनी खराब हो गई है कि वहां के राष्ट्रपति को टीवी पर आकर देश के लोगों को दस मिनट तक समझाना पड़ा कि इस अदालती फैसले के खिलाफ हिंसा ठीक नहीं है, और नस्लवादी मुद्दे हिंसा से नहीं, शांति से ही निपट सकते हैं। 
लेकिन भारत में पिछले कुछ महीनों में लगातार कहीं अल्पसंख्यकों के खिलाफ, तो कहीं दलितों के खिलाफ लगातार अभियान चल रहा है। छत्तीसगढ़ के ही बस्तर में जिस तरह अल्पसंख्यक ईसाई समाज की स्कूलों में विश्व हिन्दू परिषद द्वारा दबाव डालकर एक समझौता कराया गया है, और जिस तरह वहां सरस्वती की तस्वीरों को बलपूर्वक लगाने का काम किया जा रहा है, जिस तरह उन स्कूलों में प्राचार्य के लिए संबोधन तक बदलवाया जा रहा है, उसके नतीजे आगे जाकर बहुत खराब निकलेंगे। छत्तीसगढ़ में अल्पसंख्यकों के लिए ऐसी नौबत इसके पहले कभी नहीं रही, और भाजपा की सरकार के पहले के दस बरसों में ऐसा नहीं हुआ था, जो कि आज देश में मोदी सरकार आने के बाद इस राज्य में साम्प्रदायिक संगठन कर रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को इस मामले की गंभीरता को तुरंत समझना चाहिए। यहां यह याद दिलाना जरूरी होगा कि नरेन्द्र मोदी गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए विश्व हिन्दू परिषद जैसे संगठनों के अस्तित्व, और उसकी हलचल को हाशिए पर कर रखा था। उनके खुद के फैसले चाहे जैसे रहे हों, गुजरात में विहिप को इस तरह के काम नहीं करने दिए गए थे, और जब मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में सड़क किनारे के हजारों मंदिरों को हटवाया था, तब भी विहिप को बोलने का कोई मौका नहीं दिया गया था। आज बस्तर में जो कुछ हो रहा है, उसे लेकर अगर मुख्यमंत्री यहां पर चुप रहते हैं, तो प्रदेश में यह साम्प्रदायिक तनाव को बढ़ाने की एक नौबत लाने वाली चुप्पी होगी। इस पर तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। और जिस बात से हमने आज की चर्चा यहां शुरू की है, भारतीय जनता पार्टी को भी मायावती के खिलाफ ऐसी गंदी जुबान बोलने वाली अपनी प्रवक्ता को तुरंत इस काम से हटाना चाहिए। आज जब देश महिलाओं के अधिकारों को लेकर अधिक बहस देख रहा है, तब एक दलित महिला के खिलाफ ऐसी गंदी बात करने वाली पार्टी पूरे देश में दलितों और महिलाओं का साथ खो बैठेगी। 

जो समाज में कमजोर है, वह इंसाफ पाने में भी कमजोर है

24 नवंबर 2014
संपादकीय
भारत की जेलों में बंद लोगों के धर्म और जाति पर आधारित जो आंकड़े सामने आए हैं, उन्होंने देश में कई लोगों को चौंकाया है। मुस्लिम, दलित, और आदिवासी कैदियों की आबादी 53 फीसदी है, जबकि देश की आबादी में उनका अनुपात 39 फीसदी ही है। अपनी आबादी से सवा गुना से अधिक कैदी अगर इन तबकों से है, तो यह बात कई सवाल खड़े करती है। 
लेकिन इन आंकड़ों को देखकर हम बिल्कुल भी नहीं चौंक रहे। और आंकड़ों के साथ अगर समझ का इस्तेमाल न किया जाए, तो आंकड़े अपने आपमें एक गलत तस्वीर भी पेश कर सकते हैं, जैसे कि आबादी और जेल की आबादी के अनुपात की तुलना। हमारा मानना है कि देश की आबादी के अलग-अलग तबकों के आंकड़ों के साथ जब तक उन तबकों की शिक्षा के आंकड़े, उन तबकों की आर्थिक स्थिति के आंकड़े, उन तबकों की सामाजिक ताकत या कमजोरी के स्तर, उन तबकों के प्रति बाकी समाज और बाकी तबकों के पूर्वाग्रह और नजरिए के साथ जोड़कर जब तक कैदियों के आकड़े नहीं तौले जाएंगे, तब तक सही तस्वीर सामने नहीं आएगी। किसी के जेल में बंद होने के पीछे उसके मुजरिम होने या न होने का जितना हाथ रहता है, उतना ही हाथ इस बात का भी रहता है कि उस व्यक्ति की शैक्षणिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, और जातिगत ताकत देश की न्याय व्यवस्था के भीतर लडऩे की कितनी है। हमारा अनुभव यह कहता है कि मुस्लिम और दलित-आदिवासी तबके समाज के ताकतवर ओहदों पर जमे हुए तबकों के पूर्वाग्रह, उनकी हिकारत, और उनकी साजिश के शिकार भी रहते हैं। इसके साथ-साथ जिन तबकों की पढ़ाई कम रहती है, उनके अपराध से जुडऩे के खतरे अधिक हो सकते हैं। जो तबके आर्थिक रूप से कमजोर रहते हैं, वे तबके अपराधों से अधिक जुड़ सकते हैं। और जो तबके किसी तरह की साम्प्रदायिक नफरत से या तो भरे रहते हैं, या तो वे ऐसी नफरत के शिकार रहते हैं, उनके भी अपराधों से जुडऩे के खतरे अधिक रहते हैं। इसलिए जिन तीन तबकों के आंकड़ों को लेकर आज फिक्र जाहिर हो रही है, उन तबकों के साथ इन बातों को जोड़कर देखना होगा। 
इसे समझने के लिए उत्तर भारत के अधिकतर थानों को देखना काफी होगा जहां पर थानों के अहातों में अगर बजरंग बली के मंदिर नहीं हैं, तो भी थाने के भीतर की दीवारों पर देवी-देवताओं की तस्वीरें दिख जाती हैं, पुलिस की टेबिलों पर कांच के नीचे देवी-देवताओं और बाबाओं की तस्वीरें सजाकर रखी दिखती हैं, अफसरों की या सिर्फ उडऩदस्ते की गाडिय़ों में भी हिन्दू देवी-देवताओं के प्रतीक ही अधिक दिखते हैं। और हिन्दू समाज का रूख आदिवासियों और दलितों के लिए सैकड़ों बरसों से कैसा रहते आया है, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। कमोबेश ऐसा ही रूख या इससे भी अधिक हमलावर रूख हिन्दू समाज से जुड़े हुए आक्रामक तेवरों वाले कई लोगों का मुस्लिमों के लिए या ईसाईयों और बौद्धों के लिए रहता है। इसलिए जब मामला दर्ज करने वाली पुलिस से लेकर, जांच करने वाली एजेंसियों तक, अदालत में खड़े होने वाले सरकारी वकील तक, जज और गवाह तक, इन तबकों के बीच सवर्ण हिन्दू समाज के भीतर के पूर्वाग्रह वाले लोगों की बहुतायत रहती है, तो फिर गरीब मुस्लिम या दलित-आदिवासी के इंसाफ पाने की संभावना कम हो जाती है। 
कुल मिलाकर जेलों में बंद कैदियों के धर्म और जाति का विश्लेषण जब किया जाए, तो यह भी देखा जाना चाहिए कि इन तबकों की ताकत वकील करने की, जांच को खरीदने की, गवाहों को फोडऩे की, सुबूतों को खत्म करवाने की, सरकारी वकील को रिश्वत देने की, या जज को खरीदने की कितनी रहती है? और अगर यह ताकत रहती है तो भारत की इस लंबी और जटिल, बेइंसाफ भरी न्याय प्रक्रिया के बीच किस-किस को खरीदा जा सकता है, यह देखने की ताकत अगर मुस्लिम, दलित, आदिवासी, या गरीब में रहे, तो जेल में उसकी आबादी भी उतनी अधिक न रहे। कुल मिलाकर इस बारे में हमारी सोच यही है कि जेलों में इन तबकों के कैदियों का अनुपात जो तस्वीर पेश करता है, वही तस्वीर जेल के बाहर भी इन तबकों की सामाजिक स्थिति की है। और यह हाल सिर्फ हिन्दुस्तान का हो, ऐसा भी नहीं है। भारत में मुस्लिमों और दलित आदिवासियों का जो हाल है, या बदहाल है, वैसा ही हाल अमरीका में अश्वेत आबादी का माना जाता है। वहां का एक सर्वे बतलाता है कि अश्वेतों को अनुपातहीन अधिक कैद नसीब होती है। और हाल के महीनों में अमरीका के अलग-अलग शहरों में बड़े-बड़े प्रदर्शन हुए, क्योंकि वहां की पुलिस के गोरे अफसरों ने निहत्थे अश्वेत लोगों को बिना किसी कुसूर सड़क पर सिर्फ शक के आधार पर गोलियों से भून डाला। अमरीका के सबसे बड़े शहरों में गोली खाकर मारे गए अश्वेतों की लाश सड़कों पर तो दिख जाती है, लेकिन यह पूर्वाग्रह जब लाश की शक्ल में नहीं होता, तो उसका दिखना आसान भी नहीं होता। और अमरीका में भी अश्वेतों की सामाजिक, आर्थिक, और शैक्षणिक स्थिति भारत के इन कमजोर तबकों जैसी ही है। कुल मिलाकर बात यह है कि जो समाज में कमजोर है, वह इंसाफ पाने में भी कमजोर है। 

घटिया, हिंसक, और बेशर्म परंपराओं वाला यह लोकतंत्र

23 नवंबर 2014
संपादकीय
अधिक सोचना और अधिक संवेदनशील होना जीने पर भारी पडऩे लगता है। पिछले चार दिनों से उत्तरप्रदेश के तथाकथित समाजवादी नेता और सरकार के मालिक मुलायम सिंह यादव के चापलूसों ने जिस तरह से उनके 75वें जन्मदिन का जश्न मनाया, उस हिंसक अश्लीलता को देखते हुए लगता है कि समाजवाद अब एक उतना ही गंदा शब्द बना दिया गया है, जितना कि भ्रष्ट कांग्रेसी मंत्रियों ने गांधीवाद को बना दिया था, और जितना कि धर्मान्ध कट्टरपंथियों ने, साम्प्रदायिकों ने भगत सिंह की तस्वीर को अपने मंचों पर टांगकर क्रांतिकारी सोच नाम के शब्द को गंदा बना दिया है। भारतीय लोकतंत्र इस कदर बेशर्म, हिंसक, और अश्लील हो चुका है कि जिस उत्तरप्रदेश में मुलायम के जन्मदिन पर गरीबों को बांटे जाते कंबल पाने के लिए एक गरीब औरत मर गई, उसी जन्मदिन के लिए मुलायम के चापलूस मंत्री ने लंदन से एक शाही बग्घी बुलवाई और मुलायम की शोभायात्रा निकाली। जिस उत्तरप्रदेश में इसी सरकार के दशकों के राज के बाद बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, वहां चार-पांच सौ किलो का केक बनवाया गया।
लेकिन यह अकेली हिंसक बेशर्मी नहीं है। भारतीय लोकतंत्र रोज सुबह ऐसी कई बेशर्मी पेश करना शुरू करता है, और दर्जनभर बेशर्मियां दर्ज हुए बिना सूरज नहीं ढलता। केन्द्र की भाजपा की अगुवाई वाली सरकार ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक ऐसा मंत्री शामिल किया है जिसके खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट हैं, और राजस्थान की पुलिस के रिकॉर्ड के मुताबिक यह लापता है। अब जिस पार्टी के पास लोकसभा में ही 380 सांसद हैं, और मनोहर पर्रिकर जैसे गैरसांसदों को भी सांसद बनाकर राज्यसभा में लाने की ताकत है, उस पार्टी को एक बलात्कार-आरोपी को मंत्री बनाने की क्या मजबूरी थी? और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संसद को साफ-सुथरा करने की बात करते हैं, देश की सर्वोच्च अदालत केन्द्र सरकार से कहती है कि वह तो दखल देना नहीं चाहती, लेकिन दागियों को मंत्री नहीं बनाना चाहिए, ऐसे में बलात्कार के आरोपी को संविधान की शपथ दिलाकर नरेन्द्र मोदी कौन सी साफ-सुथरी तस्वीर पेश कर रहे हैं?
और मानो राजनीतिक दल और नेता हिंसक बेशर्मी में अकेले न रह जाएं, इसलिए देश के सबसे बड़े अखबार होने का दावा करने वाले टाईम्स ऑफ इंडिया ने अपने साहित्य समारोह में एक पत्रकार तरूण तेजपाल को एक विषय पर बोलने के लिए आमंत्रित किया है। तरूण तेजपाल अपनी ही एक मातहत पत्रकार के साथ सेक्स-ज्यादती करते हुए कैमरों पर भी कैद हुए, और गिरफ्तार होने के बाद लंबी जेल से जमानत पर रिहा हैं। अब ऐसे व्यक्ति को ताकत के बेजा इस्तेमाल जैसे मुद्दे पर बोलने के लिए न्यौता देना, एक समारोह को खबरों और विवादों में लाकर कामयाब तो बना सकता है, लेकिन इसके पीछे कौन सी नैतिकता है? इसी मुद्दे पर टाईम्स ऑफ इंडिया आसाराम को भी बुला सकता था, और नित्यानंद को भी बुला सकता था, क्योंकि इन सबने भी अपने-अपने किस्म की ताकतों का बेजा इस्तेमाल किया था। अब अगर ऐसा अखबार जो कि अपने आपके समाज का नेता होने का दावा करता है, जिसका एक वक्त का संपादक अपने आपको भारत में प्रधानमंत्री के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति समझता था, उस मीडिया संस्थान को अगर बलात्कार के ऐसे जाहिर मामले से ऐसे जाहिर तरीके से जुड़े हुए, जमानत पर छूटे हुए आदमी से ताकत के बेजा इस्तेमाल पर भाषण करवाना ठीक लग रहा है, तो फिर ऐसे साहित्य समारोहों में हिस्सा लेने वाले बाकी लोगों को भी अपने बारे में सोचना चाहिए।
भारतीय लोकतंत्र संवेदना हो चुका है। हर ताकतवर भ्रष्ट और दुष्ट पहले अपने आपको जनता की अदालत में जीता हुआ बताते हैं, और फिर जब जनता के बीच वे उजागर हो जाते हैं, तो फिर कानून की अदालत चले जाते हैं। कानून की अदालत से सजा मिल जाने पर, वे एक बार फिर जनता की अदालत में जाने के हक का इस्तेमाल करने लगते हैं। और भारतीय लोकतंत्र के तमाम हिस्सेदार अपने मुकाबले के लोगों के बड़प्पन के मुकाबले अधिक बड़ा बड़प्पन पेश करने के बजाय उनकी नीचता के मुकाबले अधिक बड़ी नीचता पेश करने को अपना लोकतांत्रिक हक मानते हैं। इस देश में बच्चों के सामने इस कदर गंदी मिसालें सामने आती जा रही हैं, कि अगर वे खबरों को ध्यान से पढऩे लगें, तो यह पूरी पीढ़ी परले दर्जे की बेशर्म, हिंसक, और अश्लील होने लगेगी। आज के ही अखबार, टेलीग्राफ में कोलकाता से एक खबर छपी है जिसकी सुर्खी में ही एक वैधानिक चेतावनी लिखी गई है- मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी के भाषण के नीचे दिए जा रहे हिस्से बच्चों और सभ्य समाज पर बुरा असर डाल सकते हैं।
टाईम्स साहित्य समारोह के इस पैनल का विषय है- टायरेनी ऑफ पॉवर, मतलब यह कि पूरी तरह से केन्द्रित सत्ता का बेजा इस्तेमाल। अब इस मुद्दे पर बोलते हुए तरूण तेजपाल कैसे लगेंगे, जिन्होंने अपनी पत्रिका के संपादक होने के साथ-साथ, शायद उसके मालिकाना हक के साथ-साथ, अपनी पत्रिका के आयोजित किए हुए साहित्य समारोह में, अपनी बेटी की सहेली, और अपनी मातहत कर्मचारी से सेक्स-शोषण की शिकायत का मौका खड़ा किया। और अदालत में वह मुकदमा चल ही रहा है कि वे ताकत के बेजा इस्तेमाल विषय पर बोलने के लिए सार्वजनिक जीवन में लौट भी आए। और हो सकता है कि वे ताकत के अपने किस्म के बेजा इस्तेमाल से परे, किसी पार्टी या किसी नेता की सरकार के ताकत के बेजा इस्तेमाल के बारे में बोलें। हमारा ऐसा ख्याल है कि ऐसे आरोपों के चलते हुए तरूण तेजपाल या उनकी तरह के किसी भी और व्यक्ति को अपनी कानूनी लड़ाई लडऩे का पूरा हक तो है ही, वे अगर चाहें तो पत्रकारिता का अपना पेशा भी करते रहें, जो कि जिंदा रहने के लिए जरूरी हो सकता है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में आखिर समारोह में भाषण देना, और वह भी ऐसे विषय पर, आयोजकों और बोलने वालों के नैतिक दीवालियापन की एक बेशर्म मिसाल है।
लोकतंत्र के साथ दिक्कत यह है कि इससे उम्मीद की जाती है कि लिखे हुए कानूनों से परे बहुत सी बातों को लोकतंत्र परंपराओं के रूप में विकसित करेगा। भारत में ऐसी घटिया परंपराएं विकसित हो चुकी हैं, और वे ही आगे बढ़ती जा रही हैं।

बात की बात


23 November, 2014

नौजवान पीढ़ी ताकत तो है, लेकिन उसे कुचलना बंद हो

22 नवंबर 2014
संपादकीय
देश की राजधानी दिल्ली में शादी के तुरंत बाद लड़की के घरवालों ने उसका कत्ल करवा दिया, या कर दिया, क्योंकि उनको अपनी बेटी की दूसरी जाति के लड़के से शादी पसंद नहीं थी। दूसरी तरफ उत्तर भारत की कई जगहों पर खाप पंचायतें लोगों को मारने के लिए उकसाती हैं, कि लड़के-लड़कियों को मर्जी से शादी की आजादी नहीं देनी चाहिए। अभी-अभी एक खाप पंचायत का यह बयान भी आया कि लड़की अगर न समझे, तो उसे गंगा के हवाले कर दो। ऐसे माहौल में सरकार इस किस्म की हिंसा के खिलाफ एक कानून बनाने की तैयारी कर रही है। 
भारत में दूसरी जाति में, या अपने गोत्र में, या दूसरे धर्म में शादी के खिलाफ एक बड़ा सामाजिक तनाव खड़ा हो जाता है। शहरों में तो अब धीरे-धीरे तस्वीर कुछ बदलने लगी है, लेकिन भारत की तीन चौथाई से अधिक आबादी अब तक उसी पुराने दकियानूसी माहौल में जी रही है जिसके तहत सामाजिक रीति-रिवाजों को तोडऩे वालों को लिए कत्ल का सामान सामने खड़ा रहता है। एक तरफ तो पिछले कुछ दशकों से केन्द्र सरकार की एक ऐसी प्रोत्साहन योजना है कि दलित या आदिवासी से शादी करने वाले गैरदलित या गैरआदिवासी को कुछ प्रोत्साहन रकम दी जाती है, ताकि समाज में जातियों के बीच की गहरी खाई कुछ पट सके। लेकिन दूसरी तरफ भारत के अधिकतर हिस्से में बाग-बगीचे में लड़के-लड़कियों को साथ बैठने नहीं दिया जाता, होटलों में शादी के बिना पहुंचे हुए जोड़ों को रूकने नहीं दिया जाता, और उनके साथ को सीधा बदन के धंधे से जोड़कर देखा जाता है। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले बरस यह साफ-साफ फैसला दिया कि वयस्क लोग बिना शादी भी साथ रह सकते हैं, अदालत ने यह इंतजाम भी किया कि बिना शादी साथ रहने वाले जोड़ों के बच्चों का हक भी पिता की संपत्ति पर होगा। लेकिन ऐसे साफ अदालती फैसले के बावजूद इस देश में नौजवान जोड़ों के लिए साथ उठना-बैठना, साथ रहना आसान नहीं है। 
इसका मतलब यही है कि देश की कानून की पोथी में लिखी हुई बातें, महज लिखी हुई हैं, और उनका किसी इस्तेमाल से अधिक लेना-देना नहीं है। ऐसे में नौजवान जोड़े बहुत बुरी तरह की निराशा के साथ जीते हैं, और अपनी मर्जी से शादी भी न कर पाने की वजह से जो कुंठा उनमें घर कर जाती है, उसके चलते उनका विकास प्रभावित होता है, उनकी उत्पादकता प्रभावित होती है। भारत के बहुत बड़े हिस्से में हमारा यह देखा हुआ है कि स्थानीय पुलिस प्रेमी जोड़ों के खिलाफ उनके मां-बाप के भेजे हुए मवालियों की तरह बर्ताव करती है, और ऐसे अनगिनत वीडियो समाचार चैनलों पर देखने मिलते हैं जिनमें पुरूष पुलिस के साथ-साथ महिला पुलिस भी लड़कियों को बगीचों में बुरी तरह पीटते हुए दिखती हैं। हम छत्तीसगढ़ के शहरों में ही देखते हैं कि फ्रेंडशिप डे हो, या वेलेंटाइन डे, क्रिसमस हो, नए साल का मौका, लड़के-लड़कियों के साथ उठने-बैठने के तमाम मौकों पर पुलिस बाग-बगीचों से लेकर फुटपाथों तक इस तरह फौजी छावनी बना देती है कि मानो प्रेम करना जुर्म है। दूसरी तरफ लड़के-लड़कियों के साथ के खिलाफ लाठियां लेकर निकलने वाले कट्टरपंथी और हिंसक नौजवान मानो पुलिस से बढ़ावा पाते हैं, और उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। 
भारत में सामाजिक बदलाव जरूरी है। लेकिन पिछले दिनों हमने भारत में वैज्ञानिक सोच को खत्म करने और कट्टरपंथ को बढ़ावा देने के खतरे के बारे में इसी जगह लिखा है। आज की यह बात उसी सिलसिले को आगे बढ़ाने वाली है। अगर भारत एक आधुनिक सामाजिक सोच नहीं पा सकेगा, तो वह विकसित देश भी नहीं हो पाएगा। इतिहास में भारत किस तरह सोने की चिडिय़ा था, ऐसे किस्से इस देश को आगे नहीं ले जा सकते। इस देश को यहां की खुशहाल नौजवान पीढ़ी ही आगे ले जा सकती है, जिसकी गिनती गिनाते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश और विदेश में थकते नहीं हैं। जिस पीढ़ी को देश की सबसे बड़ी ताकत कहा जा रहा है, उसकी स्वाभाविक सोच को कुचलने में ताकतें लगी हैं, और ऐसे माहौल के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पास कहने को कुछ नहीं है। यह समाज के एक बहुत बड़े नुकसान की बात है, और इसे समझे बिना भारत विकास की अपनी पूरी संभावनाओं तक कभी नहीं पहुंच सकेगा। 

बात की बात


22 November, 2014

मोदी को महज कोसने से कांग्रेस का भला नहीं होगा

21 नवंबर 2014
संपादकीय
दस दिनों के विदेश दौरे से लौटकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सीधे चुनाव प्रचार में जुट गए हैं। अभी हर दिन देश के बाहर के उनके कुछ भाषण, और कई खबरों ने मीडिया को घेर रखा था, और अब उनके लंबे चुनावी भाषण सामने है। इस बीच मोदी के विरोधियों के बीच यह बात कही और लिखी जा रही है कि मोदी एक प्रवासी भारतीय की तरह देश के बाहर बहुत वक्त गुजार रहे हैं, और देश के भीतर कई तरह की दिक्कतें खड़ी हुई हैं। 
यह समझने की जरूरत है कि रोजाना औसत से अधिक घंटे काम करने वाले किसी प्रधानमंत्री के लिए यह भी मुमकिन हो सकता है कि वह पिछले प्रधानमंत्रियों के मुकाबले अधिक विदेशी दौरे भी कर ले, और घर लौटने के बाद बकाया काम को भी निपटा ले। मोदी सरकार में काम की जो संस्कृति दिख रही है, उसके तहत हो सकता है कि बाहर जाना और घर का काम निपटाना दोनों मुमकिन हो। इसलिए हम अधिक दौरों को अपने आप में आलोचना के लायक कोई मुद्दा नहीं पाते। दूसरी बात यह कि अमरीका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक, कई जगहों पर मोदी के स्वागत में वहां बसे हुए हिन्दुस्तानियों की बड़ी भीड़ जुटी। और एक ऐसा उत्साह उन लोगों में देखने मिला, जो कि किसी भारतीय प्रधानमंत्री को पिछले कुछ दशकों में देखने नहीं मिला होगा। हालांकि बहुत पुरानी एक तस्वीर हमारे सामने है जिसमें अमरीका के कैलिफोर्निया के एक विश्वविद्यालय का स्टेडियम नेहरू की सभा के लिए खचाखच भरा हुआ था, और वह वक्त तो वहां पर अधिक प्रवासी भारतीयों का भी नहीं था, संपन्नता का भी नहीं था। लेकिन हाल के दशकों में मोदी ने बाहर बसे हिन्दुस्तानियों के बीच जिस तरह का उत्साह पैदा किया है, वह अभूतपूर्व है, और यह मुद्दा भी हमको किसी आलोचना के लायक नहीं लगता है।
प्रवासी भारतीयों के बीच अधिक संख्या भाजपा के समर्थकों की है, वे आज संपन्न भी हैं, सफल भी हैं, और वे एक ऐसे प्रधानमंत्री का स्वागत करने का उत्साह भी रखते हैं, जो अपनी बातों से, अपनी ताजा कामयाबी से, अपनी नाटकीयता से, और अपने वायदों से लोगों में दिलचस्पी जगा रहा है। सार्वजनिक जीवन में बहुत सी बातें धारणा पर भी चलती हैं। पिछले दस बरस भारत में यूपीए सरकार के कामकाज के बारे में दुनिया में एक आम धारणा यह है कि वह परले दर्जे की भ्रष्ट सरकार थी, प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह के बारे में यह आम धारणा है कि वे एक भले इंसान थे, अर्थशास्त्री थे, लेकिन वे अपने मातहत होने वाले हर भ्रष्टाचार को अनदेखा करते चले थे। यह एक आम धारणा है कि यूपीए की मुखिया कांग्रेस पार्टी कुनबापरस्ती की शिकार है, और असरहीन राहुल गांधी से परे धंधेबाज रॉबर्ट वाड्रा तक को कांग्रेस पार्टी झेल रही है। हम अभी इन तमाम बातों की हकीकत पर नहीं जाते, लेकिन कांग्रेस और सोनिया-राहुल के मुकाबले भाजपा और नरेन्द्र मोदी में एक यह फर्क बड़ा जाहिर है कि मोदी कांग्रेस लीडरशिप के मुकाबले अधिक काबिल दिखते हैं, उनके कंधों, सिर, और पीठ पर अपने कुनबे का बोझ नहीं लदा है, उनके सामने सत्ता को अपनी अगली पीढ़ी को देकर जाने की कोई बेबसी नहीं है, क्योंकि उनकी कोई अगली पीढ़ी नहीं है। इसलिए आज अगर दुनिया में बसे हुए हिन्दुस्तानी यूपीए के पिछले दस शर्मनाक बरसों के बाद एक असरदार और दिलचस्प प्रधानमंत्री पाकर उसे देखने आ रहे हैं, तो यह महज मोदी-मैनेजमेंट की बात नहीं है, यह एक प्राकृतिक और स्वाभाविक उत्साह की बात भी है। और इस सिलसिले में इस बात को भूलना नहीं चाहिए कि मोदी उस उदार बाजार व्यवस्था को बढ़ाने वाले हैं, जो कि प्रवासी भारतीयों के सबसे बड़े हिस्से की पसंदीदा व्यवस्था है। पश्चिम के पूंजीवादी और विकसित देशों में बसे हुए हिन्दुस्तानी वहां के पूंजीवाद की वजह से कामयाब है, और उनको मोदी की घरेलू नीतियां भी सुहाती हैं। इसलिए वे अगर मोदी में एक बेहतर लीडर देखते हैं, तो इसमें कुछ भी अटपटा नहीं है। 
मोदी विरोधियों और कांग्रेसियों की एक दिक्कत यह भी है कि वे मोदी को कोसने में अपना भविष्य देखते हैं। किसी का भविष्य किसी दूसरे को कोसते हुए नहीं सुधर सकता। जिस तरह कोई बिल्ली बैठकर किसी छींके को टकटकी लगाकर देखती रहे, तो वह छींका टूट नहीं जाता, उसी तरह हसरतों से हकीकतें नहीं बनतीं। हकीकतें असरदार हरकतों से बनती हैं, मेहनत से बनती हैं। कांग्रेस पार्टी को चाहिए कि मोदी की कामयाबी के पीछे की बातों से कम से कम उन बातों को तो समझने की कोशिश करे, जिन बातों से कांग्रेस की बीती-गुजरी नीतियों और उसके बीते कल के सिद्धांतों का कोई टकराव नहीं है। सार्वजनिक जीवन में विरोधी और दुश्मन से भी सीखने की जरूरत रहती है। जिस तरह मुकाबले वाले किसी खेल में प्रतिस्पर्धी खिलाड़ी की बारीकियों को देखे-समझे बिना, और उनको पार पाने की तरकीबें जुटाए बिना आज कोई अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में आगे नहीं बढ़ सकते, वैसा ही सार्वजनिक जीवन में किसी भी दायरे में आगे नहीं बढ़ा जा सकता। मोदी की विदेश यात्रा को ध्यान से देखकर कांग्रेस को अपने आपको एक ऐसे दिन के लिए तैयार करना चाहिए, जिस दिन उसके किसी नेता को देखने-सुनने के लिए भी अमरीका या ऑस्ट्रेलिया में लोग हजार डॉलर की टिकट खरीदने को तैयार हों। 

जरूरत देश में एक वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक सोच लाने की है...

20 नवंबर 2014
संपादकीय
आज जब भारतीय मीडिया हरियाणा के एक पाखंडी रामपाल की गिरफ्तारी का नजारा दिखा रहा है, तब मीडिया के कुछ लोगों को बीस बरस पहले अमरीका में इसी तरह एक सम्प्रदाय का सरकार से टकराव याद पड़ रहा है, जिसके चलते वहां पर भारी गोलीबारी से मामला निपटाया गया था, और 51 दिन तक वह घेराबंदी चली थी जिसमें  28 बच्चों सहित 76 लोग मारे गए थे। गनीमत कि भारत में आश्रम का यह मोर्चा इतना खतरनाक नहीं हुआ क्योंकि यहां पर अमरीका की तरह खतरनाक हथियारों की निजी मिल्कियत का कानून नहीं है। लेकिन ऐसे तमाम मौकों पर दुनिया के सबक से नसीहत लेने की जरूरत रहती है। 
इस मुद्दे पर हम लगातार दूसरे दिन इसलिए लिख रहे हैं कि आज ही एक दूसरी खबर अफ्रीका के एक देश केन्या से आई है जहां पर एक चर्च में पादरी ने वहां आने वाली लड़कियोंं और महिलाओं को कहा है कि वे अपने कपड़ों के भीतर कोई भीतरी कपड़े पहनकर न आएं, ताकि ईश्वर उनके शरीर में आसानी से घुस सके। इस खबर को लेकर दुनिया भर में प्रतिक्रियाएं हो रही हैं, लेकिन उस चर्च में जाने वाली लड़कियां और महिलाएं पादरी की बात को मानकर वहां उसी तरह से पहुंच रही हैं। दुनिया भर में जगह-जगह अंधविश्वास को जब धर्मान्धता और आध्यात्मिक ढांचों का सहारा मिल जाता है, तो वह सिर चढ़कर बोलने लगती है। मोटे तौर पर धर्म का किसी विज्ञान, किसी तर्क, किसी न्याय से कुछ लेना-देना नहीं होता। कहने के लिए धर्म की नसीहतें अच्छी गिना दी जाती हैं, लेकिन उनका नतीजा खूनखराबे से भरा हुआ रहता है। इसी तरह जब-जब आध्यात्मिक गुरू होने का दावा करने वाले लोग पकड़ में आते हैं, उनका भांडाफोड़ होता है, तो बलात्कार से लेकर हत्या तक कई किस्म के जुर्म उजागर होते हैं। हरियाणा में भी रामपाल नाम के इस आदमी के आश्रम में अब पुलिस को शौचालयों में कैमरे मिल रहे हैं, और कई दूसरे किस्म के सेक्स-सुबूत हाथ लग रहे हैं। 
लेकिन आज इसी मुद्दे पर बात खत्म करने की हमारी नीयत नहीं है। भारत जैसे लोकतंत्र में जहां पर सती प्रथा से लेकर बाल विवाह तक और छुआछूत से लेकर विधवाओं के सिर मुंडाने तक के कई किस्म के संस्कार सैकड़ों बरस से चले आ रहे थे, वहां समाज सुधारकों ने और सरकारी कानून ने मिलकर सुधार की जो पहल की थी, वह शहरीकरण से आगे बढ़ी, वैज्ञानिक सोच से आगे बढ़ी। लेकिन आज केन्द्र सरकार के कुछ लोग, राजनीतिक दलों के बहुत से लोग, और खाप पंचायतों जैसी हिंसक संस्थाओं के अधिकतर लोग मिलकर इस देश में जिस तरह के अंधविश्वास, और पाखंड को बढ़ावा दे रहे हैं, उससे पूरे देश में वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक सोच का कत्ल हो रहा है। जो लोग किसी एक धार्मिक, आध्यात्मिक, या सांस्कृतिक तर्क को लेकर न्याय और लोकतंत्र को छोड़ते हैं, वे लोग फिर आगे कई किस्म की हिंसा में भी जुट जाते हैं, और वे लोग कहीं पर वेद गिना देते हैं, कहीं पर पुराण गिना देते हैं, और ऐसी तमाम कहानियों को ये लोग इतिहास साबित करने पर जुट जाते हैं, जिन कहानियों को इतिहास मानने पर देश की सोच अतीत के नाम पर बढ़ाए जा रहे एक पाखंड तले कुचल जाएगी। 
भारतीय लोकतंत्र पर आज जो सबसे बड़ा खतरा मंडरा रहा है वह एक आधुनिक सोच को कुचलने का, लोकतंत्र से ऊपर इस देश की एक तथाकथित और काल्पनिक सांस्कृतिक पौराणिकता को थोपने का, और समाज के कमजोर तबकों को कुचलने का है। इसके साथ-साथ इस देश से इतिहास को मिटाकर अपनी मनचाही बातों को इतिहास के रूप में दर्ज करने का जो दौर चल रहा है, वह दौर भी अंधविश्वास और कट्टरता को, धर्मान्धता और आध्यात्मिक गुलामी को बढ़ाते चल रहा है। कोई अगर यह सोचता है कि आसाराम से लेकर रामपाल तक अनगिनत मुजरिम पूरे देश में जेलों में डालने पर भी जनता की मानसिक गुलामी खत्म हो जाएगी, तो यह गलत अंदाज है। जनता से आज आजाद सोच, वैज्ञानिक सोच, न्यायसंगत लोकतांत्रिक सोच छीनी जा रही है, और यह खतरा किसी धमाके के साथ खून फैलाते हुए नहीं आ रहा है, एक सांस्कृतिक गौरव के रूप में इसे थोपा जा रहा है। जब तक देश में एक दकियानूसी सोच को बढ़ावा मिलते रहेगा, किस्म-किस्म के पाखंडी बाबा और गुरू पनपते रहेंगे। जरूरत महज पुलिस कार्रवाई की नहीं है, देश की सोच में एक वैज्ञानिकता और लोकतांत्रिक न्याय लाने की है। 

परदेश से आए इबोला से परे के घरेलू खतरे भी हैं

19 नवंबर 2014
संपादकीय
नई दिल्ली में भारत का पहला इबोला केस मिलने के बाद अब एक बड़ा खतरा यह हो गया है कि अगर यह भयानक जानलेवा और संक्रामक बीमारी किसी तरह सरकारी चौकसी को पार करके देश में आ जाती है तो क्या होगा? छत्तीसगढ़ सहित देश के बहुत से हिस्सों में सरकारी चिकित्सा सेवा का बदहाल है। छत्तीसगढ़ के बारे में अब फिलहाल और अधिक लिखने की जरूरत नहीं है, और लोगों ने पश्चिम बंगाल के अस्पतालों में नवजात बच्चों की थोक मौतों के बारे में लगातार हर कुछ महीनों में पढ़ा ही है। ऐसे बदइंतजाम सरकारी चिकित्सा इंतजाम के चलते किसी बड़े संक्रामक रोग को कैसे रोका जा सकेगा? 
भारत से हर बरस हजारों लोग हज करने जाते हैं, और वहां पर दुनिया के तमाम देशों से आए हुए लोग रहते हैं। दूसरी तरफ दुनिया के सौ से अधिक देशों से भारत में पर्यटक आते हैं, और भारत के विमानतलों पर इतनी जांच तो हो सकती है कि वे लोग किन-किन देशों में पिछले महीनों में गए हैं, लेकिन ऐसी कोई जांच मुमकिन नहीं है कि उन देशों में उनकी मुलाकात इबोलाग्रस्त देशों के लोगों से हुई तो नहीं है। ऐसे में बिना इबोलाग्रस्त देशों में गए भी वे इबोला के जीवाणु लेकर भारत आ सकते हैं। और भारत में सरकारी जांच कितनी भरोसेमंद हो सकती है, इसको देखना हो तो जांच की सरकारी मशीनों, सरकारी इलाज, और दवाईयों की सरकारी खरीद को देखना काफी होगा। जो हाल छत्तीसगढ़ में है, उससे बेहतर हाल देश के दूसरे राज्यों में होगा, ऐसा मानने की कोई वजह नहीं है। 
एक भयानक तस्वीर यह बनती है कि ऐसी किसी महामारी के आने पर भारत के सरकारी इंतजाम सिर कटे मुर्गे की तरह बेतरतीब भागते दिखेंगे। और देश की सरकारी चिकित्सा धीरे-धीरे घटाकर पिछले बरसों में लगातार अस्पतालों के निजीकरण को बढ़ावा दिया गया है, और यह नौबत वापिस मुड़ते नहीं दिखती। अब जहां तक निजी अस्पतालों की बात है, तो उनकी संक्रामक रोगों से निपटने में कोई दिलचस्पी इसलिए नहीं रहती कि इनकी मार आमतौर पर गरीबों पर पड़ती है। और दूसरी बात यह भी कि संक्रामक रोगों को समाज के लिए खतरा मानकर केन्द्र और राज्य सरकारें उनका इलाज अपने मत्थे लेती हैं, और कमाई वाले इलाज निजी अस्पतालों के लिए छोड़ती हैं। इसलिए हिन्दुस्तान के जिन पांच सितारा अस्पतालों और इलाज का डंका प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बजा रहे हैं, उनसे देश के गरीबों का कुछ भी लेना-देना नहीं है। और जहां गरीब जाते हैं, वहां पर नकली मशीनें, नकली दवाएं, ऑपरेशन के जंग लगे औजार, और खाली कुर्सियां उनका स्वागत करने तैयार रहते हैं। 
अब इबोला हो, या किसी और नाम की कोई बीमारी हो, इससे निपटने के लिए भारत का सरकारी इंतजाम किसी तरह तैयार नहीं होगा, अगर इसके मरीज कुछ अधिक गिनती में निकल आएंगे। कुछ हफ्ते पहले ही हमने फिल्म कलाकार आमिर खान के एक टीवी कार्यक्रम सत्यमेव जयते में भारत में टीबी के खतरे को देखकर उसके बारे में इसी जगह लिखा था। और परदेश से आने वाले इबोला की ही जरूरत नहीं है, देश में वैसे ही मौजूद और चारों तरफ बिखरी हुई ऐसी टीबी भी देश में तबाही लाने के लिए काफी है जो कि प्रचलित टीबी-दवाओं के खिलाफ प्रतिरोध विकसित कर चुकी है। भारत में कुछ जानकार डॉक्टर टीबी को टाइम बम भी कह रहे हैं, जो कि फटने के इंतजार में है। और टीबी फिर ऐसे गरीब लोगों की ऐसी ताकतवर बीमारी है, जिसके इलाज में महंगे अस्पतालों की कोई दिलचस्पी नहीं होगी। और इसकी दवाइयों को बनाने में, उनको खरीदने में, उनको मरीजों तक लगातार और नियमित तरीके से पहुंचाने में अगर फिर सरकारी भर्राशाही रही, भ्रष्टाचार रहा, मिलावट रही, तो कब यह देश टीबी की मार से नसबंदी की जरूरत खो बैठेगा, इसका कोई ठिकाना नहीं है। फर्क यही होगा कि आबादी घटने के ऐसे किसी दौर की मार सबसे गरीब लोगों पर सबसे अधिक पड़ेगी, और पैसे वाले लोग, सत्ता पर बैठे ताकतवर लोग अपने आपको महंगे सुरक्षा कवच से घेरकर बच निकलेंगे। इबोला के नाम से जो खतरा आया है, उसके साथ-साथ भारत को टीबी और मलेरिया जैसे खतरों के बारे में भी सोचना चाहिए जो कि बहुत बड़ी संख्या में हिन्दुस्तानियों को मारने के लिए तैयार खड़े हैं।

धर्म, आध्यात्म के नाम पर हिंदुस्तान में जुर्म, आतंक

18 नवंबर 2014
संपादकीय
हरियाणा में एक सम्प्रदाय के एक मुखिया जो अपने नाम के साथ संत जोड़कर चलता है, उसे अदालती हुक्म पर भी राज्य सरकार आसानी से गिरफ्तार नहीं कर पा रही है। लंबे-चौड़े इलाके में बने उसके किलानुमा आश्रम में उसका अपना कमांडो दस्ता है, जिसमें फौज और दूसरे सुरक्षा बलों के रिटायर्ड लोग हैं। अभी जब पुलिस रामपाल नाम के इस आदमी को गिरफ्तार करने के लिए आश्रम के आसपास घेरा डाल चुकी है, तो आश्रम से ऐसे हजारों कमांडो गोलियां भी चल रहे हैं, और वहां पहुंचे भक्तों और अनुयायिओं को ढाल की तरह इस्तेमाल भी कर रहे हैं।
लेकिन यह मामला अपने-आपमें अकेला मामला नहीं है। धर्म और आध्यात्म से जुड़े हुए लोगों का कानून के लिए ऐसी हिकारत का नजरिया बहुत आम है। धर्म के नाम पर ही गांधी को मारा गया था, और धर्म के नाम पर ही इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी। धर्म के नाम पर ही बाबरी मस्जिद गिराई गई थी, और उसके बाद के दंगों में हजारों लोग मारे गए थे। धर्म के नाम पर ही गोधरा में रेलगाड़ी का डिब्बा जलाया गया था, और उसके बाद उसके जवाब में सरकारी मंजूरी से दंगे भड़कने दिए गए थे, और हजारों लोग मारे गए थे। धर्म के नाम पर ही पंजाब में भिंडरावाले के लोगों ने हजारों को मारा था, और सिखों के सबसे सम्माननीय माने जाने वाले स्वर्ण मंदिर पर आतंकी कब्जा भी किया गया था।
हिंदुस्तान का इतिहास धर्म के नाम पर हिंसा, आतंक, शोषण और हर किस्म के जुर्म से भरा हुआ। हरियाणा से लगे हुए डेरा सच्चा सौदा नाम के एक दूसरे सम्प्रदाय के गुरू पर बलात्कार के मामले चल रहे हैं, और लोगों को याद होगा कि दूर दक्षिण के चेन्नई में शंकराचार्य को कत्ल के एक मामले में गिरफ्तार करके जेल में रखा गया है। धार्मिक मतभेदों को लेकर भी सिखों के दो समुदायों के बीच हिंसा इतनी बढ़ी कि निरंकारी गुरू की हत्या कर दी गई थी। और एक धर्म के भीतर अगर देखें तो धर्म की मंजूरी से चलती जाति व्यवस्था के तहत दलितों की हत्या आए दिन होती है, और शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता है कि किसी दलित महिला से गैरदलित बलात्कार न करें।
भारत में धर्म और आध्यात्म को जिस तरह लोकतंत्र और संविधान से ऊपर करार दिया जाता है, उससे इनसे जुड़े हुए लोगों के जुर्म बढ़ते चलते हैं। एक तरफ आसाराम जैसा इंसान जब एक नाबालिग बच्ची के साथ बलात्कार के मामले मेें फंसता है, तो देश के बड़े-बड़े नेता आसाराम के हिमायती बनकर यह बयान देते हैं कि इस लड़की ने एक साजिश के तहत आसाराम को फंसाया है। और आज हिंदुस्तान की हर अदालत तक कई-कई फेरे लगाने के बाद भी एक तरफ तो आसाराम को जमानत नहीं मिलती है, दूसरी तरफ आसाराम के अनुयायी आज भी उसकी तस्वीरें लेकर सड़कों पर शोभायात्रा निकालते हैं। 
21वीं सदी में जो हिंदुस्तानी धर्म और आध्यात्म के नाम पर होते हुए जुर्मों को न सिर्फ अनदेखा करते हैं, बल्कि अपनी आस्था के चलते ऐसे मुजरिमों को बचाने के लिए घेरकर खड़े हो जाते हैं, उनको यह सोचना चाहिए कि वे अपने बच्चों के लिए एक ऐसा भारतीय समाज छोड़कर जा रहे हैं, जिसमें आस्था और अंधविश्वास के चलते हुए कोई धर्मगुरू या आध्यात्मिक गुरू उनके बच्चों से बलात्कार करते रहेंगे, और जरूरत पड़ेगी तो कभी वे उनके बच्चों को डेरा सच्चा सौदा की तरह बधिया बना देंगे, या किसी मठ या मंदिर की तरह उनको मार भी डालेंगे।
जब कभी आस्था कानून से ऊपर राज करेगी, तब-तब बेइंसाफी सिर चढ़ेगी, और लोकतंत्र कुचला जाएगा। हमारा मानना है कि जिस तरह आसाराम लंबे समय से जेल में है, उसी तरह हरियाणा का यह स्वघोषित संत रामपाल को भी अब मामले निपटने तक स्थाई रूप से जेल में रखना चाहिए क्योंकि जनता की सेवा के लिए बनी सरकार का यह काम नहीं है कि वह हफ्ता-पखवाड़ा अपना काम छोड़कर एक गिरफ्तारी में लगी रहे। और राज्य सरकार की भी यह जिम्मेदारी होती है कि इतनी बड़ी संख्या में निजी कमांडो अगर हथियारबंद होकर किसी एक जगह ऐसे जुट जाते हैं कि वे राज्य की सत्ता को चुनौती दें, तो वह राज्य सरकार भी बेवकूफ है जो इतनी निजी बंदूकों का एक जगह जमावड़ा होने देती है। भिंडरावाले भी अपने को संत कहलाता था, और उसकी तमाम हिंसा, उसके तमाम आतंक के पीछे भी धर्म की आड़ में बंदूकों का ऐसा बड़ा जमावड़ा ही था। राज्य सरकार को इस आश्रम से जुड़े हुए सारे बंदूक लायसेंस तुरंत खत्म करने चाहिए, और ऐसी कार्रवाई करनी चाहिए कि पंजाब-हरियाणा के इलाके में राज कर रहे ऐसे पाखंडी गुरूओं का धंधा बंद हो। 

किससे जांच कराएं और कितना मुआवजा दें?

17 नवंबर 14
संपादकीय
बिलासपुर की नसबंदी मौतों की खबरें हवा से हट नहीं रही हैं। मौतें थम गई हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ पहुंचने वाली हर उड़ान देश-विदेश के कुछ मीडिया कर्मियों को लेकर आ रही है। इस बीच इस हादसे या इस जुर्र्म के बाद सरकार के दो फैसलों को लेकर कुछ सोचने की जरूरत है। एक तो यह कि न्यायिक जांच जिस रिटायर्ड महिला जज को दी गई है, उसे दी गई पिछली जांच का क्या तजुर्बा रहा है, और उसके चलते क्या राज्य सरकार को कोई सबक लेना चाहिए था? दूसरी बात यह कि इस नसबंदी-हादसे के बाद हर मृतक महिला के परिवार को पहले चार लाख रूपए की घोषणा हुई, और अब उनके बच्चों के नाम दो-दो लाख रूपए और जमा करने की घोषणा की गई है। यह राज्य सरकार का अपना विशेषाधिकार होता है कि वह मुसीबत या सरकारी इंतजाम के मारे हुए किस इंसान के परिवार को कितना मुआवजा दे, लेकिन सरकार चूंकि एक निरंतर चलने वाली व्यवस्था है, इसलिए इस बारे में भी सोचना चाहिए। 
अब हम पहली बात को आगे बढ़ाते हैं, कि न्यायिक जांच जैसी गंभीर कार्रवाई के लिए राज्य सरकार को किस और कैसे जज को छांटना चाहिए था। हमारा अंदाज है कि छत्तीसगढ़ में या देश में ऐसे हजारों रिटायर्ड जिला जज, हाईकोर्ट जज, या सुप्रीम कोर्ट जज होंगे, जिनमें से किसी को भी यह जांच दी जा सकती थी। हमारा तो यह भी मानना है कि ऐसे किसी जज को यह काम नहीं देना चाहिए था जिसने कि छत्तीसगढ़ में काम किया हुआ है। लंबे समय तक यहीं पर नौकरी करने वाले लोगों का जुड़ाव और लगाव इस राज्य के नेताओं और अफसरों से हो जाता है, और ऐसे में एक ईमानदार जांच में रिश्ते और संबंध, पूर्वाग्रह और पसंद-नापसंद आड़े आते ही हैं। फिर दूसरी बात यह कि छत्तीसगढ़ से रिटायर हुए लोगों में से बहुत से लोग अपने कार्यकाल के बाद सरकार से किसी और किस्म के जिम्मे को पाने की कोशिश करते हैं, और ऐसे में उनकी निष्पक्षता शक के घेरे से बाहर नहीं निकल सकती। फिर इस मामले में अनिता झा नाम की जिस रिटायर्ड जज का नाम तय किया गया है, उनके बारे में खबरें छपी हैं कि उनको जो पिछली जांच दी गई थी, और तीन महीने में रिपोर्ट मांगी गई थी, उस मामले की जांच रिपोर्ट उन्होंने आज तीन बरस बाद भी दाखिल नहीं की है। जिसका ऐसा रिकॉर्ड रहा हो, उसे जांच देना एक शक खड़ा करता है, और राज्य सरकार को इससे परहेज करना चाहिए था। जांच करने वाले लोगों की कोई कमी नहीं है, और बेहतर तो यह होता कि किसी दूसरे राज्य से ऐसे रिटायर्ड जज को लाया गया होता, जिनका रिकॉर्ड भी अच्छा होता, और जिनका छत्तीसगढ़ से कभी कोई लेना-देना नहीं रहा होता। 
अब दूसरी बात पर आएं। एक ही किस्म के हादसों में जिंदगियों के अलग-अलग दाम या अलग-अलग मुआवजा तय करना किसी भी सरकार के अधिकार में तो आता है, लेकिन यह ठीक नहीं है। इसके पहले भी नसबंदी में कहीं एक तो कहीं दो महिलाओं की मौतें होती रही हैं। पूरे देश में इसके लिए केन्द्र सरकार ने एक सरीखे दो लाख रूपए के मुआवजे का इंतजाम किया है। छत्तीसगढ़ में चूंकि दर्जनभर मौतें शुरू में ही सामने आईं, सरकार दबाव मेें आ गई, और उसने चार-चार लाख रूपए मुआवजा घोषित किया, और कल बच्चों के लिए दो-दो लाख रूपए और मुआवजे के बाद अब राष्ट्रीय मुआवजा पैमाने के मुकाबले तीन गुना अधिक मुआवजा दिया जा रहा है। हमको इसमें कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि सरकारी नसबंदी शिविरों में सिर्फ गरीब महिलाएं ही जाती हैं। उनको कितना भी मुआवजा दिया जाए, वह ठीक है। लेकिन पिछले बरसों में इसी तरह जिन महिलाओं की मौत हुई है, उनको उस वक्त दिए गए कम मुआवजे की बात आज खटकती है। आज दरअसल मीडिया में जितने बड़े पैमाने पर बिलासपुर का यह नसबंदी-जुर्म आ गया, उसके चलते सरकार ने निर्धारित पैमाने से कई गुना मुआवजा दिया है। अब इससे एक तस्वीर ऐसी बनती है, और मीडिया में यह बात लिखी भी गई है कि क्या किसी खबर के छा जाने से सरकार उसका मुआवजा अधिक तय करती है? इन दो बातों पर सरकार को इसलिए सोचना चाहिए, और एक नीति तय करनी चाहिए, क्योंकि किसी भी प्रदेश की जिंदगी में इस किस्म के हादसे और मौतें आते ही रहते हैं, और सरकार को एक पूर्व निर्धारित और पारदर्शी नीति बनाकर रखना चाहिए। आज खासकर इस बात पर हमको बहुत निराशा है कि पिछली न्यायिक जांच को पूरा न करने वाली जज को जिम्मा देकर सरकार ने इस बार की जांच की संभावनाओं को बहुत कमजोर कर दिया है। 

नेहरू की पार्टी वाले प्रणब द्वारा मंदिर का शिलान्यास...

16 नवंबर 2014
संपादकीय
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी आज वृंदावन जा रहे हैं, जहां वे दुनिया के सबसे बड़े मंदिर का शिलान्यास करेंगे। इसके पहले भी केन्द्रीय मंत्री रहते हुए और बाद में राष्ट्रपति रहते हुए वे दुर्गा पूजा पर जब अपने घर गए, तो वे खबरें बहुत विस्तार से तस्वीरों सहित छपीं। राष्ट्रपति की अपनी एक निजी धार्मिक आस्था है, और राष्ट्रपति के ओहदे के मुताबिक खबरों में उनकी हर बात का, उनके हर काम का महत्व रहता है, इसलिए उनकी निजी आस्था भी सार्वजनिक खबर बन जाती है। लेकिन ऐसे मौकों पर एक पुरानी घटना भी याद आती है जब देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के इस व्यवहार से असहमति जताई थी कि वे सार्वजनिक रूप से ब्राम्हणों के पैर धोएं। इसके अलावा एक दूसरी घटना भी थी जिसे लेकर सार्वजनिक जीवन से निजी आस्था को अलग रखने के हिमायती नेहरू ने राजेन्द्र बाबू से असहमति जाहिर की थी। 
एक पुरानी घटना याद करें तो राष्ट्रपति रहते हुए राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन और शिव मूर्ति की स्थापना की थी। भारत की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल न उठे इसलिए पंडित जवाहर लाल नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के नवीनीकरण और पुनस्र्थापन कमेटी से खुद को अलग कर लिया था। नेहरू ने सौराष्ट्र (गुजरात के गठन से पहले) के तत्कालीन मुख्यमंत्री को मंदिर निर्माण और उद्घाटन में सरकारी पैसा खर्च न करने का निर्देश दिया था। उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से मंदिर का उद्घाटन न करने का आग्रह किया था। उनका तर्क था कि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के प्रमुख को मंदिर के उद्घाटन से बचना चाहिए। हालांकि नेहरू का आग्रह दरकिनार कर राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ मंदिर में शिव मूर्ति की स्थापना की थी, तब उन्होंने कहा था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है लेकिन नास्तिक राष्ट्र नहीं है। नेहरू सोचते थे कि सरकारी अधिकारियों को सार्वजनिक जीवन में धर्म या धर्मस्थलों से नहीं जुडऩा चाहिए। वहीं राजेंद्र प्रसाद मानते थे कि उन्हें सभी धर्मों के प्रति बराबर और सार्वजनिक सम्मान प्रदर्शित करना चाहिए।
सार्वजनिक जीवन, और उसमें भी सरकारी, अदालती, या संवैधानिक पदों पर रहते हुए, जनता के खजाने से तनख्वाह और सहूलियतें पाते हुए लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि उनकी निजी आस्था का सार्वजनिक प्रदर्शन न हो। और खासकर ऐसे वक्त तो बिल्कुल ही न हो जबकि वे सरकारी खर्च पर सफर कर रहे हों, अपने ओहदे की हैसियत से किसी कार्यक्रम में जा रहे हों। हम इस बात से तो सहमत हैं कि राष्ट्रपति बनने के बाद भी या उसके पहले वित्त मंत्री रहते हुए प्रणब मुखर्जी को न सिर्फ दुर्गा पूजा पर घर जाने का हक था, बल्कि वे चाहें तो वृंदावन के किसी मंदिर में पूजा करने भी जा सकते हैं। लेकिन जब राष्ट्रपति की हैसियत से वे एक मंदिर का भूमिपूजन या शिलान्यास करते हैं, तो वह काम एक धर्म के काम में अपनी सरकारी और संवैधानिक हैसियत के साथ जाने का होता है, और हमारे हिसाब से भारत में ऐसा व्यवहार ठीक नहीं है। इस देश में बहुत से धर्म हैं, बहुत से संप्रदाय हैं, और बहुत से आध्यात्मिक संगठन और गुरू हैं। लोगों को याद होगा कि एक समय चन्द्रास्वामी नाम के एक बहुत ही कुख्यात तांत्रिक के दरबार में पूरी की पूरी भारत सरकार और देश के विपक्ष की कतारें देखी जाती थीं। बाद में पता लगा कि चन्द्रास्वामी के हथियारों के दलालों से रिश्ते थे। इसलिए धर्म से परे ऐसे गुरूओं के प्रति सार्वजनिक आस्था प्रदर्शन से भी जनता के पैसों पर चलते ओहदों को बचना चाहिए। 
आज भारत में बहुत से धर्म मान्यता प्राप्त हैं, और कई धर्म ऐसे हैं जो कम लोग मानते हैं, लेकिन आगे चलकर हो सकता है कि वे पूरी तरह से संगठित धर्म बन जाएं। आज के अधिकतर धर्म पिछले हजार-दो हजार बरसों के ही तो हैं, और ऐसे में आज अगर कोई अपना एक नया धर्म शुरू करने की बात करे, तो उसे सरकार किस आधार पर मान्यता नहीं देगी? और भारतीय संविधान में किसी धर्म के दर्जे के लिए न तो उसे मानने वालों की गिनती का कोई पैमाना है, और न ही कोई संवैधानिक मान्यता अलग-अलग धर्मों को है। ऐसे में सार्वजनिक जीवन में धर्मों को लेकर सरकारी और संवैधानिक लोगों का कुछ दूर रहना ही ठीक है। किसी मंत्री, राज्यपाल या राष्ट्रपति, जज या संवैधानिक आयोग के सदस्यों के सामने बहुत से ऐसे मौके आते हैं जब उन्हें अपने विवेक से कुछ फैसले लेने होते हैं। ऐसे में अगर वे किसी एक धर्म से इस तरह जुड़े हुए दिखते हैं, तो दूसरे धर्म के लोगों का भरोसा उन पर कम हो सकता है, खासकर ऐसे मामलों में जिनमें दो अलग-अलग धर्मों के लोगों का मामला उनके सामने हो। 
लोगों को याद होगा कि संवैधानिक जिम्मेदारी के साथ धार्मिक आस्था का सबसे भयानक प्रदर्शन मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री बनने पर उमा भारती ने किया था, उन्होंने न सिर्फ मुख्यमंत्री निवास के अहाते के भीतर मंदिर बनवा दिया था, बल्कि मुख्यमंत्री की दफ्तर की मेज पर भगवान स्थापित करके वहां भी मंदिर जैसी साज-सज्जा कर दी थी। उनके अपने पहरावे से लेकर उनकी सोच और उनकी भाषा के साथ-साथ जब इस तरह का एक नजारा मुख्यमंत्री का टेबिल पेश करता था, तो उनके राज में दूसरे धर्म के लोगों को उन पर भरोसा कैसे हो सकता था? 
न सिर्फ नेताओं को, बल्कि सरकारी दफ्तरों और सरकारी अहातों को भी किसी धार्मिक जुड़ाव से दूर रहना चाहिए। देश के सामाजिक ताने-बाने को बनाए रखने के लिए यह जरूरी है। इस नाते हम प्रणब मुखर्जी के एक मंदिर के शिलान्यास से असहमति रखते हैं। 

नसबंदी की न्यायिक जांच में जोड़े गए सामाजिक मुद्दे पर...

15 नवंबर 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में नसबंदी से होने वाली मौतें करीब डेढ़ दर्जन तक पहुंच रही हैं, और इस बीच राज्य सरकार ने मामले की न्यायिक जांच की घोषणा करके अधिकतर सवालों से अपना पल्ला झाड़ लिया है। जिन दिक्कत भरे सवालों पर कोई जवाब न देना हो, उनके लिए न्यायिक जांच का हवाला देना एक तर्कसंगत और न्यायसंगत तरीका है, और सरकार उसी को ध्यान में रखते हुए शायद न्यायिक जांच की तरफ बढ़ी है। 
लेकिन हम न्यायिक जांच और इस घटना को लेकर कोई ऐसी बात यहां नहीं लिख सकते जो कि हमने पिछले चार दिनों में न लिखी हो। न्यायिक जांच के जो मुद्दे तय किए हैं, उनमें से एक यह भी है कि इस राज्य में नसबंदी के आंकड़ों में जो लैंगिक असमानता है, उसे दूर करने के बारे मेंं भी इस जांच में विचार किया जाए। यह हो सकता है कि जांच करने वाली जज इस बात को जांच के लायक न पाए कि एक मेडिकल हादसे की जांच में ऐसे सामाजिक पहलू की भी जांच की जाए जो कि भारतीय समाज में हजारों बरस पुरानी पुरूषवादी सोच का नतीजा है। लेकिन फिर भी हम इस बात को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं कि राज्य सरकार औरत और मर्द के बीच नसबंदी के हौसले को लेकर चल रहे फासले को कम करने के बारे में सोच भी रही है। आज तो जो आंकड़े हमारे सामने हैं उनके मुताबिक 2010-11 के एक बरस में इस प्रदेश में करीब डेढ़ लाख महिलाओं ने नसबंदी कराई, और इसी बरस में नसबंदी कराने वाले पुरूषों की संख्या महज सात हजार थी। यह फासला बतलाता है कि एक बहुत आसान ऑपरेशन से बचते हुए भी आदमी किस तरह अपनी औरत को एक जटिल ऑपरेशन की तरफ धकेलता है, और इसके बावजूद बात-बात में औरत को कमजोर और नीचा दिखाने का काम भी करता है। 
हम बिलासपुर के इस हादसे या जुर्म से परे इस सामाजिक बहस को आगे बढ़ाना चाहते हैं कि जब कभी औरत और मर्द के बीच तकलीफ झेलने का एक मौका आता है, तो जरा सी तकलीफ को छोड़कर आदमी औरत को बड़ी तकलीफ की तरफ धकेलता है, और इस सोच को कैसे बदला जाए। भारत में एक दिक्कत यह भी है कि बदन, सेक्स, गर्भधारण, और नसबंदी या परिवार नियोजन के दूसरे तरीकों पर चर्चा करना भी भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताने वाले लठैत ठेकेदार खड़े हुए हैं। जिंदगी की जितनी जरूरी बातें हैं, और जो बातें हजारों बरस से भारतीय संस्कृति का हिस्सा भी रही हैं, उन तमाम बातों को आज विदेशी, पश्चिमी, और बनते कोशिश ईसाई भी साबित करने की एक हमलावर सोच भारत पर हावी है। ऐसे में समझदारी की किसी भी बात पर तब तक सार्वजनिक चर्चा आसान नहीं है, जब तक कि ऐसे दकियानूसी और पाखंडी लोगों के झंडे-डंडे रखवाए न जा सकें।
भारत में महिला की हालत इतनी खराब इसलिए भी है कि उससे जुड़े हुए बहुत से वयस्क मुद्दों पर वयस्क लोगों के बीच भी बातचीत को अश्लील मान लिया जाता है। इस देश में ऐसे हमलावर कट्टरपंथियों को देखा है जो कि लड़कियों के स्कूल में लड़कियों के बीच सेनेटरी नैपकिन की जागरूकता खड़ी करने के खिलाफ लाठियां लेकर तोडफ़ोड़ करते खड़े हो जाते हैं। ऐसे में परिवार नियोजन के ऑपरेशन को लेकर जब एक औरत को ही तकलीफ और खतरे में धकेला जाता है, तो उस मुद्दे पर इसी चर्चा का माहौल भी नहीं रह जाता। 
इस न्यायिक जांच के बीच छत्तीसगढ़ सरकार ने जिस सामाजिक बहस की एक संभावना छेड़ी है, वह जांच में शायद न भी उठ पाए, लेकिन इस सरकार को देश में एक मौलिक और बड़ी पहल करना चाहिए, और पुरूष नसबंदी को बढ़ाने के लिए एक जागरूकता अभियान छेडऩा चाहिए। ऐसा करना एक महिला के लिए न सिर्फ सेहत के फायदे का होगा, बल्कि इससे समाज में महिलाओं की तकलीफ के बारे में लोगों में जागरूकता भी आएगी। 

एक महादलित नेता के बकवासी-बयानों से खतरे और नुकसान कई किस्म के

14 नवंबर 2014
संपादकीय
बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने अभी फिर मुंह खोला, और उसमें से निकालकर अपने लिए एक खासी बड़ी फजीहत खड़ी कर दी। सार्वजनिक मंच से मांझी ने लोगों से दूसरे राज्यों में पलायन न करने की अपील करते हुए कहा कि नीतीश कुमार और जीतन मांझी ने यह बात आपको बताई कि बेटा घर से बाहर न जाओ। घर पर ही रहो। बाल बच्चों को पढ़ाओ। महाराष्ट्र जाकर आप 5 हजार कमाते हो और इससे ज्यादा खर्च देते हो। आप बिहार में ही काम करो, 5 हजार रुपया आपको यहीं मिल जाएगा। उन्होंने कहा कि आप जवान आदमी बाहर चले जाते थे और साल भर बाद आते थे। आपकी पत्नी यहां घर पर क्या करती थी... यह सोचने की बात है। एक दिन पहले ही मांझी ने सवर्णों को विदेशी कहकर विवाद खड़ा कर दिया था। मांझी ने एक कार्यक्रम में कहा कि सवर्ण आर्यों के वंशज हैं और विदेशी हैं। दलित और आदिवासी ही मूल रूप से भारतीय हैं। इस बयान पर भाजपा ने कड़ी प्रतिक्रिया में कहा था कि सीएम प्रदेश में जातीय तनाव को बढ़ावा देना चाहते हैं। कुछ अरसा पहले सीएम मांझी ने यह भी कहा था- मैंने भी इस (नीतीश) सरकार में घूस देकर काम कराया है।
नीतीश कुमार को जिस तरह चुनावी शिकस्त के चलते अपने आपकी इज्जत बनाए रखने के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी छोडऩी पड़ी थी, उन्होंने बिहार के एक महादलित मंत्री जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनवाया था। वे मुसहर जाति के हैं, जो कि गरीबी के चलते चूहे खाने के लिए खबरों की चर्चा में आती है। और मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने मंच और माईक से यह कहा भी था कि वे भी चूहे खाते थे। हजारों बरस से शोषण की शिकार एक जाति से आने की वजह से देश के एक तबके में इसे एक राजनीतिक भरपाई माना जा रहा था, लेकिन पिछले इन महीनों में जिस तरह से उन्होंने बयान दिए हैं, उनसे वे न सिर्फ मुख्यमंत्री के ओहदे को नीचा दिखा रहे हैं, अपनी पार्टी को शर्मिंदगी दे रहे हैं, बल्कि वे अपनी जाति के बारे में भी उन जातिवादी लोगों को बोलने का मौका दे रहे हैं, जो कि यह मानते हैं कि नीची कही जाने वाली जातियों के लोग काबिल नहीं होते। 
लेकिन हम उनकी जाति, उनकी पार्टी, और उनके ओहदे से परे इस मुद्दे पर यह सोचते हैं कि क्या पांच किस्म के म मिलकर लोगों की मति भ्रष्ट कर देते हैं? मंच, माईक, माला, महत्व, और मौका, ऐसे पांच म मिलकर मांझी जैसे बहुत से लोगों को मटियामेट कर देते हैं। आज जगह-जगह लोग किस्म-किस्म की बकवास करते हैं, और फिर उनकी पार्टी, उनकी सरकार, पोंछे का कपड़ा लेकर उनके उगले हुए पोंछते हुए वक्त बरबाद करती है। और इसमें न किसी जाति, न किसी धर्म, न किसी प्रदेश, न किसी पार्टी, और न ही किसी सरकार का एकाधिकार है। और तो और भारत में बाकी पार्टियों से कुछ अधिक समझदार और सिद्धांतवादी वामपंथियों की बकवास भी पश्चिम बंगाल में बलात्कार की घटनाओं को लेकर सामने आ चुकी है, और उसके कुछ नेताओं ने ममता बैनर्जी के खिलाफ ओछी बातें कही थीं। 
हम इसी पर आज चर्चा करना चाहते हैं कि इंसानी बदन में सबसे नर्म और सबसे लचीली जुबान जिसके भीतर कोई हड्डी तक नहीं होती, जिसमें कोई नोंक भी नहीं होती, वह किस तरह लोगों को मुसीबत और परेशानी में डालती है। लापरवाह जुबान के लोग जैसी बकवास करते हैं, उससे उनका खुद का भी बहुत बड़ा नुकसान होता है, और वे अपने किस्म की बहुत सी दूसरी लापरवाह जुबानों को भड़काने का, उकसाने का काम भी करते हैं। हालांकि हम इंसानों की आलोचना करते हुए उससे बहुत अधिक बेहतर और बहुत अधिक वफादार प्राणी, कुत्ते को गाली की तरह इस्तेमाल करने के खिलाफ हैं, लेकिन फिर भी सार्वजनिक जीवन में एक बयान के बाद दूसरे बयान जिस तरह से सामने आते हैं, उस सिलसिले में हमें यह याद पड़ता है कि मुहल्ले में जब एक कुत्ता भौंकना शुरू करता है, तो उसके देखा-देखी, उसके जवाब में दूसरे बहुत से कुत्ते भौंकना शुरू कर देते हैं। इंसानों के संदर्भ में हम कुत्तों के नाम का बेजाइस्तेमाल करना नहीं चाहते, लेकिन भड़ककर और उकसावे में जवाबी बयानों के लिए यह मिसाल हमको जरूरी लग रही थी। जिस तरह कर्नाटक में अभी एक नेता ने बलात्कार की चर्चा में विरोधी नेता के परिवार की लड़कियों-महिलाओं की मिसाल दी, और फिर उसके बाद जवाबी हमले में दूसरे नेताओं ने पहले नेता की घर की महिलाओं को गिनाया, वह पूरा सिलसिला एक संक्रामक-बकवास का है। और कुत्ते तो बिना किसी बदनीयत के, बिना किसी फायदे के देखा-देखी भौंकते हैं, इंसानी राजनीतिक-बकवास तो बड़ी बदनीयत होती है, और फिर जवाबी-बकवास के पीछे भी एक जवाबी-नीयत होती है। 
इसलिए सार्वजनिक जीवन में ओछी बातों को हटाने के लिए राजनीतिक दलों को, नेताओं को सोचने पर मजबूर करने का काम गैरराजनीतिक ताकतें ही कर सकती हैं। राजनीतिक ताकतों को तो हिंसक, गंदी, अश्लील, और भड़काऊ बातों से कोई परहेज रह नहीं गया है। आज की यह बात हमने बिहार के एक महादलित नेता को लेकर शुरू की थी, इस देश में वैसे ही दलितों को लेकर गैरदलितों में से बहुतों के बीच एक हिकारत रहती है। भारत के दलितों में बाबा साहब आंबेडकर जैसे महान विद्वान हुए जिन्होंने जाति भेद और हिकारत की सवर्ण सोच को शिकस्त दी थी, और दलित-दिमाग की महानता को निर्विवाद रूप से स्थापित किया था। लेकिन आज भी जब भारत में आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक, महिलाएं, ग्रामीण, या शहरी शिक्षा से दूर के तबके जब कोई गलती करते हैं, तो उनके सारे तबकों को ताने झेलने पड़ते हैं। मांझी जैसे लोगों को इस बात का ख्याल भी करना चाहिए, उनके कंधों पर बिहार की सरकार का बोझ तो है ही, सबसे अधिक उपेक्षित और कुचली हुई महादलित जाति के सम्मान का जिम्मा भी है, जिसे वे ठीक से नहीं उठा रहे हैं। हम उनकी कही हुई अलग-अलग बेतुकी बातों के मुद्दों पर यहां नहीं लिख रहे हैं, एक बुनियादी बात कर रहे हैं।

नसबंदी जैसा हादसा सरकार के लिए सबक, और सुधार का भी

13 नवंबर 2014
संपादकीय

एक बड़ा हादसा हर किसी को सम्हलने का मौका भी देता है, अगर हादसे के लिए जिम्मेदार लोग उससे सबक लेने को तैयार हों। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में नसबंदी के बाद हुई मौतों की भयानक खबरें पूरी दुनिया का दौरा कर चुकी हैं, और राज्य सरकार से लेकर केन्द्र सरकार तक इससे विचलित हैं। लेकिन जिन पर जिम्मेदारी रहती है, और जिनके हाथ अधिकार रहते हैं उनका विचलित होना काफी नहीं होता, ऐसी भयानक गलतियों और गलत कामों के बाद उनसे सबक लेकर आगे के लिए सुधार करना जरूरी होता है। छत्तीसगढ़ सरकार के पास आज की तमाम बदनामी के बाद यह एक मौका आया है कि अपने पूरे इंतजाम को वह ठीक से जांचे-परखे, और हर चीज को सुधारने की कोशिश करें। राज्य की सरकारी चिकित्सा व्यवस्था की बदहाली बरसों से सबके सामने है, और अखबारों में जिन सरकारी विभागों की कमियों और खामियों की सबसे अधिक खबरें आती हैं, उनमें से स्वास्थ्य विभाग सबसे ऊपर है। लेकिन हम पिछले दो दिनों में इस बारे में यहां जो लिख चुके हैं, उसे दुहराना ठीक नहीं है। इसलिए अब हम बीती को बिसार देने के बजाय, उसे याद रखते हुए आगे की सुधि लेने की बात करना चाहते हैं।
बिलासपुर के नसबंदी कैम्प में जिस तरह थोक में मौतें हुई हैं, उस शिविर की जितनी खामियां अब तक सामने आ चुकी हैं, डॉक्टरों पर सरकारी दबाव की जो खबरें आ चुकी हैं, नसबंदी का लक्ष्य पूरा करने के लिए जैसी हड़बड़ी सामने दिख रही है, और सरकारी खरीद की दबावों के घटिया या जानलेवा होने की जो आशंका सामने आ चुकी है, इन तमाम बातों से छत्तीसगढ़ सरकार बहुत कुछ सीख सकती है, और अगर अपने आपको यह सरकार इस बार के तजुर्बे से सुधारती है, तो ये मौतें प्रदेश के बाकी मरीजों की भलाई के लिए शहादत की तरह होंगी, वरना तो सरकार का यह विभाग पिछले दस बरस से ऐसा ही चल ही रहा है। गलतियों और गलत कामों के तजुर्बों से सीखना मानो सरकार ने सीखा ही नहीं है, इसीलिए कुछ विभागों में लगातार बदहाली चलती है, और सरकार ऐसे हर हादसे के बाद एक जांच बिठाती है, और पहली नजर में जो लोग जिम्मेदार मानकर निलंबित किए जाते हैं, वे फिर कुर्सियों पर पहुंच जाते हैं।
जब प्रदेश की सबसे गरीब जनता की सेहत और जिंदगी का मामला हो, तो सरकार को अपने आपको सुधारना चाहिए। ऐसी कोई वजह नहीं हो सकती कि डॉ. रमन सिंह की सरकार अपने तीसरे कार्यकाल और ग्यारहवें बरस में भी जनता के इलाज में चल रही सरकारी भर्राशाही को काबू न कर सकें। गरीब जनता के हक का पैसा सरकारी खरीद के भ्रष्टाचार में जा रहा है, सरकार समय पर लोगों को नियुक्त नहीं कर पा रही है, और कुर्सियां खाली पड़ी हैं, मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के लिए डॉक्टर ढूंढे नहीं मिल रहे हैं, अस्पतालों में नकली मशीनें खरीदकर उन्हें कबाड़ में डाल देने वाले मजे में बैठे हैं, ब्लैकलिस्ट होने वाले सप्लायर और ठेकेदार अलग-अलग नामों से आज भी सरकार पर काबिज हैं, और जांच से लेकर इलाज तक हर जगह परले दर्जे की बदइंतजामी है।
मुख्यमंत्री को चाहिए कि इस विभाग से जुड़े हुए तमाम मामलों को लेकर बैठें, और हर पहलू को सुधारने की कोशिश करें। वे खुद डॉक्टर रहे हैं जो कि अस्पताल में काम भी करते थे, और उनकी समझ दूसरों के मुकाबले कुछ अधिक ही होगी। आज भी अगर राज्य सरकार अपने इंतजाम को सुधारने का काम तुरंत नहीं करती है, तो पिछले बरसों में तो हर कुछ महीनों में ऐसे इलाज-हादसे सामने आते ही रहे हैं। आज राज्य सरकार बिलासपुर के अस्पतालों में भर्ती महिलाओं के लिए जितना आपात-इंतजाम कर रही है, वह मोटे तौर पर अचानक लगी चोट से बिलबिलाते हुए हड़बड़ी में किया गया इंतजाम है। वह इंतजाम जरूरी तो है, लेकिन वह काफी नहीं है। काफी तो वह होगा कि इस मुसीबत से उबरने के साथ-साथ सरकार एक अभियान चलाकर प्रदेश में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं और सुविधाओं को सुधारने का काम करे।
 

सरकार को चिकित्सा सेवा की बदहाली पर सोचना चाहिए...

12 नवंबर 2014
संपादकीय

छत्तीसगढ़ में पिछले दो दिनों में हुई नसबंदी मौतों को लेकर सरकार चाहे कोई बड़ी बात बोल नहीं रही हो, लेकिन हकीकत यह है कि वह हिल चुकी है। म्युनिसिपल और पंचायत के चुनाव सामने हैं, और सत्तारूढ़ पार्टी समझ नहीं पा रही है कि राशन कार्ड और शहरी गंदगी के बाद अब अचानक सिर पर आ गिरी इस बला से स्थानीय चुनावों में कैसे निपटा जाएगा, जहां वार्डों और पंचायतों के फैसले सौ-पचास वोटों से भी होते हैं। लेकिन चुनावी फिक्र एक अलग मुद्दा है, आज पूरे प्रदेश में सरकार के इलाज के ढांचे को लेकर जनता के मन में एक बहुत बड़ा शक खड़ा हो गया है। कल हमने इसी जगह इसी मुद्दे पर लिखते हुए आंखों के ऑपरेशन में सरकारी गड़बड़ी, और सरकारी अनदेखी-हिस्सेदारी से हुए गर्भाशय कांड की चर्चा की थी। अब यह नसबंदी कांड होने से सरकारी चिकित्सा सुविधाओं को लेकर आम जनता के मन में एक बहुत बड़ा अविश्वास हो गया है कि मुफ्त के इलाज के चक्कर में अपनी जान गंवाई जाए, या फिर गहने-बर्तन बेचकर निजी अस्पतालों में जाया जाए। 
पिछले बरसों में छत्तीसगढ़ में चिकित्सा बीमा के तहत गरीबों को मुफ्त इलाज के जो कार्ड मिले हैं, उनमें धांधली करते हुए प्रदेश के बड़े-बड़े अस्पताल पकड़ाए, और कई डॉक्टर गिरफ्तार हुए जिनके मुकदमे अभी तक चल रहे हैं। खुद सरकारी अमले में से कई लोगों की इस धांधली में हिस्सेदारी की चर्चा रही, लेकिन साबित कुछ नहीं हो पाया। अब हम दो-तीन बातों को मिलाकर देखना चाहते हैं। एक तो छत्तीसगढ़ में हर गरीब को अपने परिवार के इलाज के लिए सालाना 30 हजार तक के खर्च वाला कार्ड सरकार की तरफ से दिया गया है। और प्रदेश के सैकड़ों निजी अस्पताल इस कार्ड के आधार पर इलाज के लिए मान्यता प्राप्त हैं। नतीजा यह हुआ कि हजारों महिलाओं के गर्भाशय निकालकर फेंक दिए गए, क्योंकि उनके परिवार के कार्ड पर खर्च की ताकत बची हुई थी। अब आंखों के ऑपरेशन और नसबंदी ऑपरेशन में सरकारी शिविरों और अस्पतालों की बदहाली की खबरों से यह बात और होने जा रही है कि अब लोग इन साधारण ऑपरेशनों के लिए भी निजी अस्पतालों की तरफ जाएंगे। भारत में कई दशकों से इन दो ऑपरेशनों के लिए सरकार अपनी अस्पतालों में और अस्पतालों के बाहर भी कैम्प लगाते आई है। खुद छत्तीसगढ़ का पिछले दशकों का अनुभव यह रहा है कि जहां-जहां प्रशासन या सरकार ने अच्छे इंतजाम किए, हजारों ऑपरेशन हुए, न कोई मौत हुई, और न कोई आंखें खराब हुईं। लेकिन आज जब आंखें भी जा रही हैं और जिंदगी भी, तो फिर लोग हड़बड़ाकर निजी अस्पतालों की तरफ भागेंगे ही। 
यह नौबत सरकारी क्षेत्र में यह नौबत चिकित्सा सुविधा के निजीकरण और उसके बाजारूकरण के फायदे की है। सरकारी इलाज की विश्वसनीयता जितनी गिरेगी, निजी कारोबार उतना ही अधिक चलेगा। हम अभी सरकारी इलाज में ऐसी मौतों के पीछे किसी साजिश को नहीं देखते, लेकिन यह बात तो अपनी जगह है ही कि बाजार की ताकतों को इससे फायदा होने जा रहा है। और सरकारी नौकरी के अधिकतर सर्जन सरकारी अस्पतालों से बाहर भी निजी अस्पतालों में ऑपरेशन करते हैं। यह पूरा सिलसिला लोगों के निजी फायदे वाला है, अब यह साजिश के तहत हुआ है, या ऐसी लापरवाही से अनजाने में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सरकार पिछले बरसों से लगातार इलाज की अपनी बुनियादी जिम्मेदारी से कतराते चल रही थी, और अधिक से अधिक निजीकरण किया जा रहा था। ऐसे सरकारी हादसे निजीकरण को न्यायोचित भी ठहराते हैं, और निजी हाथों में सरकार का बहुत सा पैसा पहुंचा भी देते हैं। क्या आज सरकार इस बारे में सोचेगी कि दसियों बरस पहले जो सरकारी ढांचा ऐसे हादसों के बिना भी हजारों ऑपरेशन कर लेता था, आज हजारों करोड़ अधिक खर्च करने के बाद बना ढांचा क्यों इतना अविश्वसनीय हो गया है? और आज तो बात महज इलाज की है, कल के दिन सरकारी पानी पीकर लोग मरेंगे, तो क्या सरकार लोगों को बोतल बंद पानी के लिए कार्ड देने लगेगी? और परसों किसी और चीज के लिए? निजीकरण का नारा पूंजीवादी व्यवस्था में खासे खर्च से गुंजाया जाता है, लेकिन सरकार को अपनी बुनियादी जिम्मेदारी से भागना नहीं चाहिए। और आज छत्तीसगढ़ की चिकित्सा सेवा की बदहाली सरकार को यह सोचने का मौका और सामान दोनों दे रही है।

मरीजों के साथ-साथ सरकार को भी अपनी जांच और खुद के इलाज की जरूरत

11 नवंबर 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल के अपने शहर बिलासपुर में हुए एक नसबंदी शिविर में महिलाओं की भीड़ के ऑपरेशन हुए, और अब तक की खबरों में 85 में से आठ महिलाओं की मौत हो चुकी है, और कई महिलाएं बुरे हाल में बताई जा रही हैं। पहली खबरों में यह कहा गया है कि एक-दो डॉक्टरों ने छह घंटों में नसबंदी के आंकड़े पूरे करने के लिए रफ्तार से ये ऑपरेशन निपटा दिए थे। मामले की पूरी हकीकत तो जांच से सामने आएगी, लेकिन जिस तरह आपातकाल में संजय गांधी जैसे तानाशाह के दबाव में पूरे देश में नसबंदी के आंकड़े पूरे करने के लिए इंसानों को जानवरों से भी अधिक बुरी तरह काटा जाता था, आज भाजपा सरकार के दसवें बरस में उसी अंदाज में नसबंदी शिविर में ऐसी डॉक्टरी न सिर्फ स्थानीय लापरवाही बताती है, बल्कि सरकार की सोच पर भी सवाल खड़े करती है। 
लोगों को अगर याद हो तो इसी छत्तीसगढ़ के इसी स्वास्थ्य विभाग ने 2011 में दुर्ग जिले में आंखों के ऑपरेशन के एक कैंप में 46 गरीब मरीजों की आंखें तबाह कर दी थीं, और लंबी-चौड़ी अखबारबाजी के बाद जब मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुंचा तो उसके आदेश के बाद राज्य सरकार ने ऐसे 46 मरीजों को पचास-पचास हजार रुपये का मुआवजा और दिया था। और अगर इससे भी भयानक बात याद करनी हो, तो छत्तीसगढ़ के सरकारी मान्यता प्राप्त अस्पतालों ने, और चिकित्सा-बीमा के तहत ऑपरेशन करने वाले अस्पतालों ने एक संगठित साजिश के तहत हजारों कमउम्र महिलाओं के भी गर्भाशय बिना किसी वजह के महज कमाई के लिए निकाल दिए थे, और गोश्त के लिए जिस तरह जानवर को काटा जाता है, उसी अंदाज में डॉक्टरों ने गरीब अनजान महिलाओं के बदन काट डाले थे। इसमें गिरफ्तारियां भी हुई थीं, लेकिन पूरे मामले में राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग की साजिश में हिस्सेदारी जाहिर थी, लेकिन हुआ कुछ नहीं।
और अगर कुछ बरस पहले की बात करें तो छत्तीसगढ़ में ही चिकित्सा विभाग के तहत नकली और घटिया जांच-उपकरणों की करोड़ों की ऐसी खरीदी हुई थी, जिनमें सब कुछ साबित हो जाने के बावजूद कार्रवाई किसी पर नहीं हुई थी। एक संगठित साजिश की तरह राज्य सरकार के इस विभाग के बड़े-बड़े अफसरों ने नकली सामान खरीदकर बिना जरूरत, बिना प्रशिक्षण, अपने चिकित्सा केंद्रों में भिजवा दिया, जिसका आज तक कोई इस्तेमाल नहीं हुआ। 
राजधानी रायपुर में प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल, मेडिकल कॉलेज के मेकाहारा में बदहाली की खबरों से अखबार रोज भरे रहते हैं, और मरीज वहां जांच और इलाज बिना मरे रहते हैं। लेकिन पिछले दस बरसों में इस विभाग का काम नहीं सुधरा, तो नहीं सुधरा। राज्य में जो विभाग जनता की तकलीफ से सबसे अधिक जुड़े हुए हैं, ऐसे  एक-दो विभागों में स्वास्थ्य विभाग भी है। राज्य बनने के चौदह बरस बाद, और भाजपा सरकार के तीसरे कार्यकाल के ग्यारहवें बरस में भी अगर अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं, तो इसकी तोहमत न तो अविभाजित मध्यप्रदेश की कांगे्रस सरकार पर डाली जा सकती है, और न ही छत्तीसगढ़ की शुरूआती कांगे्रस सरकार पर। अपने ग्यारहवें बरस में भी जो सरकार न दवाईयां खरीद पा रही है, न डॉक्टर नियुक्त कर पा रही है, न ही अस्पतालों में जांच और इलाज कर पा रही है, वह सरकार एक बुरे हाल में दिखती है। 
पाठकों को याद होगा कि कुछ बरस पहले हमने एक लंबी रिपोर्ट छापी थी कि किस तरह छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले से विशेष संरक्षित बैगा आदिवासी समुदाय के सैकड़ों लोगों को दलाल मध्यप्रदेश के लगे हुए जिले मंडला ले गए थे, और वहां उनके नसबंदी ऑपरेशन कर दिए गए थे। जबकि उनकी गिरती हुई आबादी की वजह से उनकी नसबंदी पर केंद्र सरकार की ओर से रोक लगी हुई है। उस मामले में सारी जानकारी नाम और तस्वीर सहित छप जाने के बाद भी उस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। गरीबों और बेजुबान लोगों को सरकार और बाजार मिलकर जानवरों की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।
बिलासपुर के इस हादसे की जांच से परे राज्य सरकार को अपने खुद के हाल की जांच करनी चाहिए, और अपना खुद का इलाज करना चाहिए। इसके बिना हादसों पर तो सरकार किसी को कुसूरवार ठहराकर सजा दे देगी, लेकिन हादसों से परे रोज खत्म होती जिंदगियों की गिनती के आंकड़े सामने नहीं आते, लेकिन यह जाहिर है कि रोजाना सैकड़ों मौतें सरकारी खामियों और कमियों के चलते प्रदेश में हो रही हैं, जिनको कि सही और असरदार इलाज से बचाया जा सकता है।

राजधानी पर लदे कचरे को सूरत के प्लेग जैसी किसी संक्रामक बीमारी का इंतजार?

10 नवंबर 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में म्युनिसिपल से कचरा उठाने का ठेका लेने वाली एक निजी कंपनी राज्य सरकार और म्युनिसिपल दोनों से अधिक ताकतवर दिख रही है। इस कंपनी के साथ राज्य सरकार के व्यापारिक ठेके को लेकर कांग्रेस पार्टी ने पहले भी कई तरह के आरोप लगाए थे, और आज चार-पांच महीने हो रहे हैं कि रायपुर शहर घूरा बना हुआ है, और न म्युनिसिपल, न राज्य सरकार इस कंपनी के खिलाफ कुछ कर पा रहे, और न ही शहर को साफ कर पा रहे हैं। आज हालत इतनी बुरी हो चुकी है कि हर मोड़ पर घूरे बढ़ते चल रहे हैं, और जब मशीनों से उठाकर ट्रकों में भरने लायक कचरा जमा हो चुका रहता है, तब म्युनिसिपल उसे साफ कर रही है। यह पूरा सिलसिला न सिर्फ भारी निराशा पैदा करता है, बल्कि बहुत रहस्यमय भी है कि प्रदेश की राजधानी में आरोपों से घिरे हुए एक ठेके की ऐसी बदहाली है, और सत्ता पर बैठे किसी को इसकी फिक्र नहीं है। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पूरे देश में सफाई अभियान छेड़े हुए हैं, और उसी के तहत मुख्यमंत्री रमन सिंह सहित प्रदेश के तमाम ताकतवर लोग झाड़ू लेकर सड़कों पर उतर चुके हैं। लेकिन राजधानी की यह बदहाली है कि कुछ लोग यह कहने लगे हैं कि प्रधानमंत्री को इस शहर को गोद ले लेना चाहिए, तभी कुछ हो पाएगा। 
और यह हालत तब है जब म्युनिसिपल के चुनाव होने हैं। हर वार्ड में प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा के कई लोगों ने घूमना शुरू कर दिया है, और कम से कम आधा दर्जन नेता महापौर का चुनाव लडऩे के लिए शहर का दौरा भी कर रहे हैं। यह बात समझ से बिल्कुल परे है कि चुनाव के मुहाने पर खड़ी हुई सत्तारूढ़ पार्टी शहर की एक बुनियादी जरूरत की इस कदर अनदेखी कर रही है। शहर के लोगों की सेहत पर मंडराता हुआ खतरा सत्ता पर बैठे लोगों को चाहे न दिख रहा हो, सत्तारूढ़ संगठन के लोगों को तो चुनाव पर मंडराता खतरा दिखना चाहिए। आज हालत इतनी खराब है कि बंद शीशों वाली कारों के अलावा घूरों के पास से पैदल निकलना मुश्किल हो चुका है। और शहर के नब्बे फीसदी वोटर ऐसी कारों के बिना चलते हैं, और जो लोग रोज घूरों की बदबू को झेलते हुए उनके बगल से निकलते हैं, वे लोग वोट के दिन क्या सोचेंगे, यह अंदाज लगाना मुश्किल नहीं है। 
ऐसा भी नहीं है कि राजधानी पर सरकारी खर्च में कोई कमी हो रही हो। न सिर्फ सड़कों को बनाने में, बल्कि शहर को खूबसूरत बनाने में भी हर बरस राज्य सरकार सैकड़ों करोड़ खर्च कर रही है। एक तरफ सड़क किनारे दीवारों पर मूर्तियां लगाई जा रही हैं, बगीचे बनाए जा रहे हैं, और दूसरी तरफ घूरों पर से कचरा भी नहीं उठ पा रहा है। यह राज्य सरकार और नगर निगम दोनों की परले दर्जे की नाकामयाबी है, और हमारा तो यह भी मानना है कि अगर यह हाल हाईकोर्ट वाले किसी शहर का रहता, तो अब तक कोई जज कार के भीतर से दिखते बाहर के कचरे को लेकर खुद होकर एक जनहित याचिका मान लेता, और सरकार को नोटिस दे देता। राज्य सरकार की यह सोच, और उसका यह रूख समझ से बिल्कुल परे है कि बड़े-बड़े सजावटी कामों के लिए सैकड़ों करोड़ खर्च किए जाएं, सितारों से भरे कार्यक्रम करवाए जाएं, और  शहर की सबसे पहली बुनियादी जरूरत, सफाई को एक डिफाल्टर ठेकेदार के भरोसे छोड़ दिया जाए। 
स्थानीय चुनाव बहुत छोटे-छोटे मुद्दों पर लड़ा और जीता-हारा जाता है। आज राजधानी के तमाम आम इंसानों के आसपास जमा कचरा इसके लिए जिम्मेदार लोगों को हरा सकता है। लेकिन जीत-हार से परे भी राज्य सरकार को यह सोचना चाहिए कि गुजरात के सूरत की तरह अगर यहां पर प्लेग जैसी कोई संक्रामक बीमारी फैली तो उसका जवाबदेह कौन होगा? 

मोदी मंत्रिमंडल विस्तार के मौके पर कुछ बातें...

9 नवंबर 2014
संपादकीय
 न चाहते हुए भी आए दिन मोदी, या उनकी सरकार से जुड़े मुद्दों पर लिखना पड़ता है, क्योंकि बाकी पार्टियां ठंडी पड़ी हुई हैं। आज मोदी सरकार का एक बड़ा विस्तार हुआ है, और अब यह माना जा सकता है कि मंत्रिमंडल पूरा हो गया है। हम किन वजहों से किन लोगों को नहीं लिया गया, और किन लोगों को लिया गया, उस पर जाना नहीं चाहते। लेकिन इस मौके का इस्तेमाल करते हुए हम मोदी सरकार या किसी प्रदेश की सरकार, या जिला पंचायत से लेकर म्युनिसिपलों तक की स्थानीय सरकारों की बात करना चाहते हैं कि देश की बदली हुई हवा में अब उनसे लोगों की क्या उम्मीदें हैं। 
नरेन्द्र मोदी ने काम सम्हालने के साथ ही पिछली दस बरस की यूपीए सरकार और उसकी मुखिया कांग्रेस पार्टी की राजनीतिक संस्कृति से परे जाकर जो अलग तस्वीर सामने रखी, वह एक खासी मेहनतकश सरकार की है। मंत्रियों और अफसरों से अधिक काम करने की उम्मीद प्रधानमंत्री ने की, और कुछ लोगों का यह भी मानना है कि उनका काम करने का अंदाज एक तानाशाह जैसा है, जिसमें मंत्रियों का कोई अधिक वजन नहीं है। अब मंत्रियों के मन में प्रधानमंत्री को लेकर क्या सोच है इस पर जाने के बजाय हम यह देख रहे हैं कि अगर मंत्रियों और आला अफसरों को पूरे वक्त बैठकर काम करना पड़ रहा है, उनके पास काम बचा न रहे यह उम्मीद की जा रही है, तो इसमें तानाशाही के बजाय पहली नजर में हमें मेहनत और अनुशासन दिखता है। पिछली मनमोहन सिंह सरकार में प्रधानमंत्री आदतन खुद मेहनत करते थे, और उनके अधिकतर मंत्री अपने विभागों में महीनों तक कामों को रोके रखने के लिए बदनाम थे, और ऐसा रोकना किन वजहों से होता था, वह जाहिर भी था, और उन वजहों के साथ कई मंत्री आज कटघरों में हैं, जेल में हैं, जमानत पर हैं। 
आज देश में जनता बिना काम पलने वाले नेताओं और अफसरों के खिलाफ है, और वह हर किसी से अपने दिए दाम के बदले काम चाहती है। पिछले बरसों में सरकार के साथ-साथ संसद भी काम न करने के लिए खासी बदनाम हुई, और वहां का रियायती खाना गरीब और भूखी जनता की नजरों में खटकने लगा। लोग बहुत हमलावर जुबान में सांसदों और नेताओं के खिलाफ बोलने लगे। अब नरेन्द्र मोदी न सिर्फ केन्द्र सरकार में, बल्कि राज्यों में भी काम की संस्कृति पर सरकारों को सोचने पर मजबूर किया है। आज उनकी सरकार का जो विस्तार हो रहा है, उसके पीछे काम करने वाले लोगों को बढ़ावा देने की एक नीयत हो सकती है, और ऐसे लोग जो वरिष्ठ तो हैं, लेकिन जिनके अधिक काम करने का इतिहास नहीं रहा है, वैसे लोगों को शायद इसमें छोड़ भी दिया गया हो। 
हमारी अपनी उम्मीद न सिर्फ मोदी सरकार के पुराने-नए मंत्रियों से, बल्कि देश के सभी सरकारी ओहदेदारों से है कि उनको जनता के लिए अधिक से अधिक काम करना चाहिए, ईमानदारी से काम करना चाहिए, और सरकारी काम के अलावा जनहित के गैरसरकारी मुद्दों को भी उठाना चाहिए, जैसे कि मोदी ने झाड़ू उठाकर देश के सामने एक चुनौती खड़ी की है। हकीकत तो यह है कि इस देश में सफाई के काम का सबसे अधिक सम्मान, और सफाई की सबसे अधिक जरूरत महात्मा गांधी ने सामने रखी थी, जिनके नाम को कांग्रेस पार्टी अपने बुजुर्ग की तरह इस्तेमाल करते आई है। लेकिन इतने बरसों के कांग्रेस राज में सरकार से परे जनता को शामिल करके सफाई जैसे मुद्दे को देश में कभी नहीं उठाया गया था, और आज प्रधानमंत्री की पहल के बाद देश में उनके विरोधी भी, उनसे असहमत गैरभाजपाई भी सफाई के काम में हिस्सा ले रहे हैं, उसके बारे में सोच रहे हैं। 
लेकिन राज्यों की सरकारों को सिर्फ देश की सरकार की नकल करने की जरूरत नहीं है। राज्य सरकारें बहुत से मौलिक काम भी कर सकती हैं, और हर किसी को नई-नई अनूठी पहल, अनूठी सोच सामने रखने भी चाहिए। अकेले प्रधानमंत्री के उठाए हुए मुद्दों के झंडे-बैनर लेकर चलने के बजाय राज्यों, म्युनिसिपलों, और पंचायतों को अपने-अपने स्तर पर भी जनकल्याण की मौलिक पहल करनी चाहिए। आज इस मौके पर हम इन टुकड़ा-टुकड़ा बातों को लोगों के सोचने के लिए सामने रख रहे हैं। 


Bat ke bat, बात की बात,

8 nov 2014 
8 nov 2014 

राष्ट्रीय कांग्रेस को सीखने की जरूरत है छत्तीसगढ़ कांग्रेस से

8 नवंबर 2014
संपादकीय
कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले गुजरात से आए मधुसूदन मिस्त्री को पार्टी का महासचिव भी बनाया गया, और जिस उत्तरप्रदेश में कांग्रेस का सफाया हो चुका है, वे वहां के पार्टी प्रभारी भी थे। उन्होंने अभी नरेन्द्र मोदी को बेईमान कहते हुए कहा कि वे उनकी नस-नस से वाकिफ हैं। और उन्होंने यह भी कहा कि वे संसद के भीतर भी मोदी को बेईमान ही कहेंगे। 
भारतीय लोकतंत्र में किसी को किसी दूसरे को बेईमान कहने की पूरी आजादी है, और उसके बदले में अदालत के कटघरे में खड़े होकर इस आरोप को साबित करने की जिम्मेदारी भी है। आज देश में मोदी की जो स्थिति है, और कांग्रेस पार्टी की जो हालत है, उसमें ऐसा नहीं लगता कि नरेन्द्र मोदी के पास ऐसे बयानों पर अदालत जाने का वक्त होगा, या उनको ऐसी बातों की अधिक परवाह होगी। राजनीति में यह शब्दावली एकदम आम है, हालांकि संसद और विधानसभा में ऐसे शब्दों को असंसदीय करार देते हुए कार्रवाई से हटा दिया जाता है। हम आज यहां भारतीय राजनीति की जुबान पर लिखना नहीं चाहते, लेकिन अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर में पहुंची कांग्रेस पार्टी की दिमागी हालत और उसके तौर-तरीकों के बारे में जरूर बात करना चाहते हैं। 
आम चुनाव हारने के बाद से कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व के स्तर पर एकदम मरघटी सन्नाटा छाया हुआ है। सोनिया गांधी और राहुल गांधी मानो एकदम घर बैठ गए हैं, और दिग्विजय सिंह सरीखे एक्का-दुक्का कांग्रेस नेता हैं जो राष्ट्रीय स्तर पर अभी भी नरेन्द्र मोदी, भाजपा, और आरएसएस पर अपने हमले पहले की रफ्तार से ही चला रहे हैं। लेकिन राष्ट्रीय स्तर की एक ऐतिहासिक पार्टी से यह उम्मीद नहीं की जाती कि संसद के भीतर विपक्ष न रह जाने पर वह संसद के बाहर भी एक प्रमुख विपक्षी दल की अपनी भूमिका को ताक पर धरकर चुप बैठ जाए। दिग्विजय सिंह सोनिया-राहुल के करीबी माने जाते हैं, और संगठन में उनका बहुत वजन न रहने पर भी वे इस कुनबे के अघोषित या स्वघोषित सिपहसालार की तरह लगातार बयान देते हैं, कांग्रेस संगठन और कांग्रेस लीडरशिप के बारे में भी। हाल के हफ्तों में उन्होंने लगातार राहुल गांधी को अधिक सक्रिय होने की सलाह दी है, ट्विटर पर खाता खोलने की बात कही है, कांग्रेस संगठन का मुखिया राहुल को खुद बन जाना चाहिए ऐसी बात भी कही है। उन्होंने संगठन की घोषित रीति-नीति से परे जाकर भी सार्वजनिक रूप से यह कहा है कि राहुल गांधी को अधिक बोलना चाहिए, अधिक सक्रिय होना चाहिए। 
अब सोनिया सक्रिय हों, या राहुल, या प्रियंका, हम इस घरेलू मुद्दे पर कुछ कहना नहीं चाहते। लेकिन कांग्रेस को एक पार्टी के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह का बर्ताव करना चाहिए, उस तरह का बर्ताव प्रादेशिक स्तर पर छत्तीसगढ़ कांग्रेस पिछले कई महीनों में लगातार कर रही है। इस राज्य में कांग्रेस पार्टी दस बरस से सत्ता से बाहर है, और मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल इन दस बरसों के पहले भी कांग्रेस मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बहुत पसंदीदा नहीं रहे। इसके बावजूद इतने बरसों में उन्होंने भाजपा के खिलाफ लगातार आक्रामक तेवर जारी रखे, और उनके बारे में ऐसा कोई आभास कभी नहीं हो पाया कि वे राज्य की भाजपा से मिलकर कांग्रेस को नुकसान पहुंचा रहे हैं। और प्रदेश में विधानसभा चुनाव, लोकसभा चुनाव दोनों में कांग्रेस पार्टी की हार के बावजूद यहां पर पार्टी लगातार एक मजबूत विपक्ष की तरह काम कर रही है, और एक दिन भी ऐसा नहीं गुजरता जब छत्तीसगढ़ कांग्रेस राज्य की भाजपा सरकार को न घेरती हो। एक मजबूत विपक्ष लोकतंत्र के लिए जरूरी होता है, और कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन और नेतृत्व को छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश के अपने संगठन से कुछ सीखना चाहिए कि विपक्ष के दिन घर बैठने के, चुप बैठने के नहीं होते। भारत का संसदीय इतिहास है कि लोकसभा में दो सीटों वाली भाजपा आज देश पर अकेले अपने बूते पर 280 से अधिक सीटें लेकर राज कर रही है। ऐसी कोई वजह नहीं है कि मोदी सरकार से गलतियां न हों, और कांग्रेस के दुबारा आने की कोई गुंजाइश ही न हो। राजनीति मेें बहुत किस्म के उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, और चुनावी संभावनाओं से परे भी कांग्रेस को देश की जनता के प्रति विपक्ष की अपनी भूमिका पूरी करनी चाहिए।