मायावती से लेकर बस्तर तक भाजपा को सोचने की जरूरत

25 नवंबर 14
संपादकीय

देश की राजनीति में सबसे बड़ी दलित नेता मायावती का अपमान पहली बार नहीं  हो रहा है। बहुत से लोगों ने समय-समय पर उनके खिलाफ भद्दी, अश्लील, और हिंसक बातें कही हैं। इस बार भाजपा की एक महिला प्रवक्ता शायना एनसी ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मंच पर से कहा- समझ नहीं आता कि मायावती मर्द हैं या औरत।
भाजपा की इस महिला नेता को मायावती के बारे में यह बात समझ आ रही हो या नहीं, यह तो हमको नहीं पता, लेकिन हमको ऐसा बयान देने वाली महिला की समझ जरूर समझ आ रही है। यह एक निहायत घटिया सोच है, और यह एक पुरूषप्रधान सोच है जो कि किसी महिला को उसकी कामयाबी पर, या उसके रूप-रंग पर, या उसके तौर-तरीकों पर खिल्ली उड़ाने के लायक समझ लेती है। इसके साथ-साथ यह एक हिन्दूवादी सवर्ण सोच भी है, जो कि एक दलित महिला को अपमान के लायक समझती है। यह एक अलोकतांत्रिक सोच भी है, जो कि एक विरोधी या विपक्षी नेता के बारे में ऐसी फूहड़ और गंदी बात कहने का हौसला देती है। हमको अफसोस यही है कि दलित मुद्दों को लेकर भारत के लोकतंत्र के भीतर की हालत पर दो दिनों के भीतर हमको दूसरी बार लिखना पड़ रहा है। कल ही इसी जगह हमने भारत की जेलों में बंद मुस्लिम, दलित, और आदिवासी लोगों के बारे में लिखा था कि किस तरह जेलों में उनका अनुपात आबादी में उनके अनुपात से अधिक है, और किन वजहों से अधिक है। कल शायद जिस वक्त हम उन बातों को लिख रहे थे, उसी वक्त भाजपा की यह महिला नेता राजस्थान के एक गैरचुनावी आम कार्यक्रम के मंच से, बिना किसी उकसावे और भड़कावे के ऐसा अश्लील बयान दे रही थी। 
आज जब हम यह लिख रहे हैं, तब अमरीका जल रहा है। कुछ महीने पहले वहां एक गोरे पुलिस वाले ने बिना किसी उकसावे और भड़कावे के सड़क पर एक अश्वेत किशोर को गोली मार दी थी, और उस पर भी अमरीका में जगह-जगह अश्वेत लोगों ने, और नस्लवाद के विरोधी लोगों ने प्रदर्शन किए थे। आज जब अदालत में जनता के बीच से चुने गए जूरी-सदस्यों का यह फैसला सामने आया कि इस गोरे अफसर पर मुकदमा चलाने की जरूरत नहीं है, तो अमरीका में जगह-जगह विचलित लोगों ने हिंसा शुरू कर दी, आगजनी और तोडफ़ोड़ शुरू हो गई, और हालत इतनी खराब हो गई है कि वहां के राष्ट्रपति को टीवी पर आकर देश के लोगों को दस मिनट तक समझाना पड़ा कि इस अदालती फैसले के खिलाफ हिंसा ठीक नहीं है, और नस्लवादी मुद्दे हिंसा से नहीं, शांति से ही निपट सकते हैं। 
लेकिन भारत में पिछले कुछ महीनों में लगातार कहीं अल्पसंख्यकों के खिलाफ, तो कहीं दलितों के खिलाफ लगातार अभियान चल रहा है। छत्तीसगढ़ के ही बस्तर में जिस तरह अल्पसंख्यक ईसाई समाज की स्कूलों में विश्व हिन्दू परिषद द्वारा दबाव डालकर एक समझौता कराया गया है, और जिस तरह वहां सरस्वती की तस्वीरों को बलपूर्वक लगाने का काम किया जा रहा है, जिस तरह उन स्कूलों में प्राचार्य के लिए संबोधन तक बदलवाया जा रहा है, उसके नतीजे आगे जाकर बहुत खराब निकलेंगे। छत्तीसगढ़ में अल्पसंख्यकों के लिए ऐसी नौबत इसके पहले कभी नहीं रही, और भाजपा की सरकार के पहले के दस बरसों में ऐसा नहीं हुआ था, जो कि आज देश में मोदी सरकार आने के बाद इस राज्य में साम्प्रदायिक संगठन कर रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को इस मामले की गंभीरता को तुरंत समझना चाहिए। यहां यह याद दिलाना जरूरी होगा कि नरेन्द्र मोदी गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए विश्व हिन्दू परिषद जैसे संगठनों के अस्तित्व, और उसकी हलचल को हाशिए पर कर रखा था। उनके खुद के फैसले चाहे जैसे रहे हों, गुजरात में विहिप को इस तरह के काम नहीं करने दिए गए थे, और जब मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में सड़क किनारे के हजारों मंदिरों को हटवाया था, तब भी विहिप को बोलने का कोई मौका नहीं दिया गया था। आज बस्तर में जो कुछ हो रहा है, उसे लेकर अगर मुख्यमंत्री यहां पर चुप रहते हैं, तो प्रदेश में यह साम्प्रदायिक तनाव को बढ़ाने की एक नौबत लाने वाली चुप्पी होगी। इस पर तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। और जिस बात से हमने आज की चर्चा यहां शुरू की है, भारतीय जनता पार्टी को भी मायावती के खिलाफ ऐसी गंदी जुबान बोलने वाली अपनी प्रवक्ता को तुरंत इस काम से हटाना चाहिए। आज जब देश महिलाओं के अधिकारों को लेकर अधिक बहस देख रहा है, तब एक दलित महिला के खिलाफ ऐसी गंदी बात करने वाली पार्टी पूरे देश में दलितों और महिलाओं का साथ खो बैठेगी। 

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