एक महादलित नेता के बकवासी-बयानों से खतरे और नुकसान कई किस्म के

14 नवंबर 2014
संपादकीय
बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने अभी फिर मुंह खोला, और उसमें से निकालकर अपने लिए एक खासी बड़ी फजीहत खड़ी कर दी। सार्वजनिक मंच से मांझी ने लोगों से दूसरे राज्यों में पलायन न करने की अपील करते हुए कहा कि नीतीश कुमार और जीतन मांझी ने यह बात आपको बताई कि बेटा घर से बाहर न जाओ। घर पर ही रहो। बाल बच्चों को पढ़ाओ। महाराष्ट्र जाकर आप 5 हजार कमाते हो और इससे ज्यादा खर्च देते हो। आप बिहार में ही काम करो, 5 हजार रुपया आपको यहीं मिल जाएगा। उन्होंने कहा कि आप जवान आदमी बाहर चले जाते थे और साल भर बाद आते थे। आपकी पत्नी यहां घर पर क्या करती थी... यह सोचने की बात है। एक दिन पहले ही मांझी ने सवर्णों को विदेशी कहकर विवाद खड़ा कर दिया था। मांझी ने एक कार्यक्रम में कहा कि सवर्ण आर्यों के वंशज हैं और विदेशी हैं। दलित और आदिवासी ही मूल रूप से भारतीय हैं। इस बयान पर भाजपा ने कड़ी प्रतिक्रिया में कहा था कि सीएम प्रदेश में जातीय तनाव को बढ़ावा देना चाहते हैं। कुछ अरसा पहले सीएम मांझी ने यह भी कहा था- मैंने भी इस (नीतीश) सरकार में घूस देकर काम कराया है।
नीतीश कुमार को जिस तरह चुनावी शिकस्त के चलते अपने आपकी इज्जत बनाए रखने के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी छोडऩी पड़ी थी, उन्होंने बिहार के एक महादलित मंत्री जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनवाया था। वे मुसहर जाति के हैं, जो कि गरीबी के चलते चूहे खाने के लिए खबरों की चर्चा में आती है। और मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने मंच और माईक से यह कहा भी था कि वे भी चूहे खाते थे। हजारों बरस से शोषण की शिकार एक जाति से आने की वजह से देश के एक तबके में इसे एक राजनीतिक भरपाई माना जा रहा था, लेकिन पिछले इन महीनों में जिस तरह से उन्होंने बयान दिए हैं, उनसे वे न सिर्फ मुख्यमंत्री के ओहदे को नीचा दिखा रहे हैं, अपनी पार्टी को शर्मिंदगी दे रहे हैं, बल्कि वे अपनी जाति के बारे में भी उन जातिवादी लोगों को बोलने का मौका दे रहे हैं, जो कि यह मानते हैं कि नीची कही जाने वाली जातियों के लोग काबिल नहीं होते। 
लेकिन हम उनकी जाति, उनकी पार्टी, और उनके ओहदे से परे इस मुद्दे पर यह सोचते हैं कि क्या पांच किस्म के म मिलकर लोगों की मति भ्रष्ट कर देते हैं? मंच, माईक, माला, महत्व, और मौका, ऐसे पांच म मिलकर मांझी जैसे बहुत से लोगों को मटियामेट कर देते हैं। आज जगह-जगह लोग किस्म-किस्म की बकवास करते हैं, और फिर उनकी पार्टी, उनकी सरकार, पोंछे का कपड़ा लेकर उनके उगले हुए पोंछते हुए वक्त बरबाद करती है। और इसमें न किसी जाति, न किसी धर्म, न किसी प्रदेश, न किसी पार्टी, और न ही किसी सरकार का एकाधिकार है। और तो और भारत में बाकी पार्टियों से कुछ अधिक समझदार और सिद्धांतवादी वामपंथियों की बकवास भी पश्चिम बंगाल में बलात्कार की घटनाओं को लेकर सामने आ चुकी है, और उसके कुछ नेताओं ने ममता बैनर्जी के खिलाफ ओछी बातें कही थीं। 
हम इसी पर आज चर्चा करना चाहते हैं कि इंसानी बदन में सबसे नर्म और सबसे लचीली जुबान जिसके भीतर कोई हड्डी तक नहीं होती, जिसमें कोई नोंक भी नहीं होती, वह किस तरह लोगों को मुसीबत और परेशानी में डालती है। लापरवाह जुबान के लोग जैसी बकवास करते हैं, उससे उनका खुद का भी बहुत बड़ा नुकसान होता है, और वे अपने किस्म की बहुत सी दूसरी लापरवाह जुबानों को भड़काने का, उकसाने का काम भी करते हैं। हालांकि हम इंसानों की आलोचना करते हुए उससे बहुत अधिक बेहतर और बहुत अधिक वफादार प्राणी, कुत्ते को गाली की तरह इस्तेमाल करने के खिलाफ हैं, लेकिन फिर भी सार्वजनिक जीवन में एक बयान के बाद दूसरे बयान जिस तरह से सामने आते हैं, उस सिलसिले में हमें यह याद पड़ता है कि मुहल्ले में जब एक कुत्ता भौंकना शुरू करता है, तो उसके देखा-देखी, उसके जवाब में दूसरे बहुत से कुत्ते भौंकना शुरू कर देते हैं। इंसानों के संदर्भ में हम कुत्तों के नाम का बेजाइस्तेमाल करना नहीं चाहते, लेकिन भड़ककर और उकसावे में जवाबी बयानों के लिए यह मिसाल हमको जरूरी लग रही थी। जिस तरह कर्नाटक में अभी एक नेता ने बलात्कार की चर्चा में विरोधी नेता के परिवार की लड़कियों-महिलाओं की मिसाल दी, और फिर उसके बाद जवाबी हमले में दूसरे नेताओं ने पहले नेता की घर की महिलाओं को गिनाया, वह पूरा सिलसिला एक संक्रामक-बकवास का है। और कुत्ते तो बिना किसी बदनीयत के, बिना किसी फायदे के देखा-देखी भौंकते हैं, इंसानी राजनीतिक-बकवास तो बड़ी बदनीयत होती है, और फिर जवाबी-बकवास के पीछे भी एक जवाबी-नीयत होती है। 
इसलिए सार्वजनिक जीवन में ओछी बातों को हटाने के लिए राजनीतिक दलों को, नेताओं को सोचने पर मजबूर करने का काम गैरराजनीतिक ताकतें ही कर सकती हैं। राजनीतिक ताकतों को तो हिंसक, गंदी, अश्लील, और भड़काऊ बातों से कोई परहेज रह नहीं गया है। आज की यह बात हमने बिहार के एक महादलित नेता को लेकर शुरू की थी, इस देश में वैसे ही दलितों को लेकर गैरदलितों में से बहुतों के बीच एक हिकारत रहती है। भारत के दलितों में बाबा साहब आंबेडकर जैसे महान विद्वान हुए जिन्होंने जाति भेद और हिकारत की सवर्ण सोच को शिकस्त दी थी, और दलित-दिमाग की महानता को निर्विवाद रूप से स्थापित किया था। लेकिन आज भी जब भारत में आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक, महिलाएं, ग्रामीण, या शहरी शिक्षा से दूर के तबके जब कोई गलती करते हैं, तो उनके सारे तबकों को ताने झेलने पड़ते हैं। मांझी जैसे लोगों को इस बात का ख्याल भी करना चाहिए, उनके कंधों पर बिहार की सरकार का बोझ तो है ही, सबसे अधिक उपेक्षित और कुचली हुई महादलित जाति के सम्मान का जिम्मा भी है, जिसे वे ठीक से नहीं उठा रहे हैं। हम उनकी कही हुई अलग-अलग बेतुकी बातों के मुद्दों पर यहां नहीं लिख रहे हैं, एक बुनियादी बात कर रहे हैं।

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