धर्म, आध्यात्म के नाम पर हिंदुस्तान में जुर्म, आतंक

18 नवंबर 2014
संपादकीय
हरियाणा में एक सम्प्रदाय के एक मुखिया जो अपने नाम के साथ संत जोड़कर चलता है, उसे अदालती हुक्म पर भी राज्य सरकार आसानी से गिरफ्तार नहीं कर पा रही है। लंबे-चौड़े इलाके में बने उसके किलानुमा आश्रम में उसका अपना कमांडो दस्ता है, जिसमें फौज और दूसरे सुरक्षा बलों के रिटायर्ड लोग हैं। अभी जब पुलिस रामपाल नाम के इस आदमी को गिरफ्तार करने के लिए आश्रम के आसपास घेरा डाल चुकी है, तो आश्रम से ऐसे हजारों कमांडो गोलियां भी चल रहे हैं, और वहां पहुंचे भक्तों और अनुयायिओं को ढाल की तरह इस्तेमाल भी कर रहे हैं।
लेकिन यह मामला अपने-आपमें अकेला मामला नहीं है। धर्म और आध्यात्म से जुड़े हुए लोगों का कानून के लिए ऐसी हिकारत का नजरिया बहुत आम है। धर्म के नाम पर ही गांधी को मारा गया था, और धर्म के नाम पर ही इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी। धर्म के नाम पर ही बाबरी मस्जिद गिराई गई थी, और उसके बाद के दंगों में हजारों लोग मारे गए थे। धर्म के नाम पर ही गोधरा में रेलगाड़ी का डिब्बा जलाया गया था, और उसके बाद उसके जवाब में सरकारी मंजूरी से दंगे भड़कने दिए गए थे, और हजारों लोग मारे गए थे। धर्म के नाम पर ही पंजाब में भिंडरावाले के लोगों ने हजारों को मारा था, और सिखों के सबसे सम्माननीय माने जाने वाले स्वर्ण मंदिर पर आतंकी कब्जा भी किया गया था।
हिंदुस्तान का इतिहास धर्म के नाम पर हिंसा, आतंक, शोषण और हर किस्म के जुर्म से भरा हुआ। हरियाणा से लगे हुए डेरा सच्चा सौदा नाम के एक दूसरे सम्प्रदाय के गुरू पर बलात्कार के मामले चल रहे हैं, और लोगों को याद होगा कि दूर दक्षिण के चेन्नई में शंकराचार्य को कत्ल के एक मामले में गिरफ्तार करके जेल में रखा गया है। धार्मिक मतभेदों को लेकर भी सिखों के दो समुदायों के बीच हिंसा इतनी बढ़ी कि निरंकारी गुरू की हत्या कर दी गई थी। और एक धर्म के भीतर अगर देखें तो धर्म की मंजूरी से चलती जाति व्यवस्था के तहत दलितों की हत्या आए दिन होती है, और शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता है कि किसी दलित महिला से गैरदलित बलात्कार न करें।
भारत में धर्म और आध्यात्म को जिस तरह लोकतंत्र और संविधान से ऊपर करार दिया जाता है, उससे इनसे जुड़े हुए लोगों के जुर्म बढ़ते चलते हैं। एक तरफ आसाराम जैसा इंसान जब एक नाबालिग बच्ची के साथ बलात्कार के मामले मेें फंसता है, तो देश के बड़े-बड़े नेता आसाराम के हिमायती बनकर यह बयान देते हैं कि इस लड़की ने एक साजिश के तहत आसाराम को फंसाया है। और आज हिंदुस्तान की हर अदालत तक कई-कई फेरे लगाने के बाद भी एक तरफ तो आसाराम को जमानत नहीं मिलती है, दूसरी तरफ आसाराम के अनुयायी आज भी उसकी तस्वीरें लेकर सड़कों पर शोभायात्रा निकालते हैं। 
21वीं सदी में जो हिंदुस्तानी धर्म और आध्यात्म के नाम पर होते हुए जुर्मों को न सिर्फ अनदेखा करते हैं, बल्कि अपनी आस्था के चलते ऐसे मुजरिमों को बचाने के लिए घेरकर खड़े हो जाते हैं, उनको यह सोचना चाहिए कि वे अपने बच्चों के लिए एक ऐसा भारतीय समाज छोड़कर जा रहे हैं, जिसमें आस्था और अंधविश्वास के चलते हुए कोई धर्मगुरू या आध्यात्मिक गुरू उनके बच्चों से बलात्कार करते रहेंगे, और जरूरत पड़ेगी तो कभी वे उनके बच्चों को डेरा सच्चा सौदा की तरह बधिया बना देंगे, या किसी मठ या मंदिर की तरह उनको मार भी डालेंगे।
जब कभी आस्था कानून से ऊपर राज करेगी, तब-तब बेइंसाफी सिर चढ़ेगी, और लोकतंत्र कुचला जाएगा। हमारा मानना है कि जिस तरह आसाराम लंबे समय से जेल में है, उसी तरह हरियाणा का यह स्वघोषित संत रामपाल को भी अब मामले निपटने तक स्थाई रूप से जेल में रखना चाहिए क्योंकि जनता की सेवा के लिए बनी सरकार का यह काम नहीं है कि वह हफ्ता-पखवाड़ा अपना काम छोड़कर एक गिरफ्तारी में लगी रहे। और राज्य सरकार की भी यह जिम्मेदारी होती है कि इतनी बड़ी संख्या में निजी कमांडो अगर हथियारबंद होकर किसी एक जगह ऐसे जुट जाते हैं कि वे राज्य की सत्ता को चुनौती दें, तो वह राज्य सरकार भी बेवकूफ है जो इतनी निजी बंदूकों का एक जगह जमावड़ा होने देती है। भिंडरावाले भी अपने को संत कहलाता था, और उसकी तमाम हिंसा, उसके तमाम आतंक के पीछे भी धर्म की आड़ में बंदूकों का ऐसा बड़ा जमावड़ा ही था। राज्य सरकार को इस आश्रम से जुड़े हुए सारे बंदूक लायसेंस तुरंत खत्म करने चाहिए, और ऐसी कार्रवाई करनी चाहिए कि पंजाब-हरियाणा के इलाके में राज कर रहे ऐसे पाखंडी गुरूओं का धंधा बंद हो। 

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