मरीजों के साथ-साथ सरकार को भी अपनी जांच और खुद के इलाज की जरूरत

11 नवंबर 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल के अपने शहर बिलासपुर में हुए एक नसबंदी शिविर में महिलाओं की भीड़ के ऑपरेशन हुए, और अब तक की खबरों में 85 में से आठ महिलाओं की मौत हो चुकी है, और कई महिलाएं बुरे हाल में बताई जा रही हैं। पहली खबरों में यह कहा गया है कि एक-दो डॉक्टरों ने छह घंटों में नसबंदी के आंकड़े पूरे करने के लिए रफ्तार से ये ऑपरेशन निपटा दिए थे। मामले की पूरी हकीकत तो जांच से सामने आएगी, लेकिन जिस तरह आपातकाल में संजय गांधी जैसे तानाशाह के दबाव में पूरे देश में नसबंदी के आंकड़े पूरे करने के लिए इंसानों को जानवरों से भी अधिक बुरी तरह काटा जाता था, आज भाजपा सरकार के दसवें बरस में उसी अंदाज में नसबंदी शिविर में ऐसी डॉक्टरी न सिर्फ स्थानीय लापरवाही बताती है, बल्कि सरकार की सोच पर भी सवाल खड़े करती है। 
लोगों को अगर याद हो तो इसी छत्तीसगढ़ के इसी स्वास्थ्य विभाग ने 2011 में दुर्ग जिले में आंखों के ऑपरेशन के एक कैंप में 46 गरीब मरीजों की आंखें तबाह कर दी थीं, और लंबी-चौड़ी अखबारबाजी के बाद जब मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुंचा तो उसके आदेश के बाद राज्य सरकार ने ऐसे 46 मरीजों को पचास-पचास हजार रुपये का मुआवजा और दिया था। और अगर इससे भी भयानक बात याद करनी हो, तो छत्तीसगढ़ के सरकारी मान्यता प्राप्त अस्पतालों ने, और चिकित्सा-बीमा के तहत ऑपरेशन करने वाले अस्पतालों ने एक संगठित साजिश के तहत हजारों कमउम्र महिलाओं के भी गर्भाशय बिना किसी वजह के महज कमाई के लिए निकाल दिए थे, और गोश्त के लिए जिस तरह जानवर को काटा जाता है, उसी अंदाज में डॉक्टरों ने गरीब अनजान महिलाओं के बदन काट डाले थे। इसमें गिरफ्तारियां भी हुई थीं, लेकिन पूरे मामले में राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग की साजिश में हिस्सेदारी जाहिर थी, लेकिन हुआ कुछ नहीं।
और अगर कुछ बरस पहले की बात करें तो छत्तीसगढ़ में ही चिकित्सा विभाग के तहत नकली और घटिया जांच-उपकरणों की करोड़ों की ऐसी खरीदी हुई थी, जिनमें सब कुछ साबित हो जाने के बावजूद कार्रवाई किसी पर नहीं हुई थी। एक संगठित साजिश की तरह राज्य सरकार के इस विभाग के बड़े-बड़े अफसरों ने नकली सामान खरीदकर बिना जरूरत, बिना प्रशिक्षण, अपने चिकित्सा केंद्रों में भिजवा दिया, जिसका आज तक कोई इस्तेमाल नहीं हुआ। 
राजधानी रायपुर में प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल, मेडिकल कॉलेज के मेकाहारा में बदहाली की खबरों से अखबार रोज भरे रहते हैं, और मरीज वहां जांच और इलाज बिना मरे रहते हैं। लेकिन पिछले दस बरसों में इस विभाग का काम नहीं सुधरा, तो नहीं सुधरा। राज्य में जो विभाग जनता की तकलीफ से सबसे अधिक जुड़े हुए हैं, ऐसे  एक-दो विभागों में स्वास्थ्य विभाग भी है। राज्य बनने के चौदह बरस बाद, और भाजपा सरकार के तीसरे कार्यकाल के ग्यारहवें बरस में भी अगर अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं, तो इसकी तोहमत न तो अविभाजित मध्यप्रदेश की कांगे्रस सरकार पर डाली जा सकती है, और न ही छत्तीसगढ़ की शुरूआती कांगे्रस सरकार पर। अपने ग्यारहवें बरस में भी जो सरकार न दवाईयां खरीद पा रही है, न डॉक्टर नियुक्त कर पा रही है, न ही अस्पतालों में जांच और इलाज कर पा रही है, वह सरकार एक बुरे हाल में दिखती है। 
पाठकों को याद होगा कि कुछ बरस पहले हमने एक लंबी रिपोर्ट छापी थी कि किस तरह छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले से विशेष संरक्षित बैगा आदिवासी समुदाय के सैकड़ों लोगों को दलाल मध्यप्रदेश के लगे हुए जिले मंडला ले गए थे, और वहां उनके नसबंदी ऑपरेशन कर दिए गए थे। जबकि उनकी गिरती हुई आबादी की वजह से उनकी नसबंदी पर केंद्र सरकार की ओर से रोक लगी हुई है। उस मामले में सारी जानकारी नाम और तस्वीर सहित छप जाने के बाद भी उस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। गरीबों और बेजुबान लोगों को सरकार और बाजार मिलकर जानवरों की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।
बिलासपुर के इस हादसे की जांच से परे राज्य सरकार को अपने खुद के हाल की जांच करनी चाहिए, और अपना खुद का इलाज करना चाहिए। इसके बिना हादसों पर तो सरकार किसी को कुसूरवार ठहराकर सजा दे देगी, लेकिन हादसों से परे रोज खत्म होती जिंदगियों की गिनती के आंकड़े सामने नहीं आते, लेकिन यह जाहिर है कि रोजाना सैकड़ों मौतें सरकारी खामियों और कमियों के चलते प्रदेश में हो रही हैं, जिनको कि सही और असरदार इलाज से बचाया जा सकता है।

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