कांग्रेस और कुनबा, यह सब, कब तक

2 नवंबर 2014
संपादकीय
कल रात से भारत का मीडिया और सोशल मीडिया इस बात पर गर्म है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद और जमीनों के सौदों में गले-गले तक विवादों में डूबे हुए रॉबर्ट वाड्रा का एक टीवी पत्रकार के साथ बुरा बर्ताव देखने के बाद इस कारोबारी को देश की सबसे ऊंचे दर्जे की सरकारी हिफाजत क्यों दी जा रही है? किसी की बदसलूकी के खिलाफ मीडिया और सोशल मीडिया पर आलोचना वैसे बर्ताव का खासा जवाब हो जाती है, लेकिन सोनिया गांधी के दामाद का मामला कुछ अलग है। कुछ अरसे पहले तक जो परिवार देश का सबसे ताकतवर परिवार था, और जो सोनिया गांधी दुनिया की दस सबसे ताकतवर महिलाओं में गिनी जाती थीं, उनके इकलौते दामाद को सरकारी मेहरबानी से अरबों का फायदा पहुंचने की खबरें, चुनाव में कांग्रेस की हार की सौ में से एक वजह तो रही ही होगी। लेकिन इस परिवार के जिस राहुल गांधी की जगह प्रियंका गांधी को लाने की हल्की-फुल्की राजनीतिक मांग कांग्रेस की हर शिकस्त के बाद उठती है, उस प्रियंका के पति के कारोबार पर लगे आरोपों का जवाब देने के लिए यूपीए सरकार के वित्त मंत्री चिदंबरम सामने आते थे, पूरी पार्टी खड़ी रहती थी, और कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों का काम फाईल ढोने वाले क्लर्कों जैसा दिखता था। वैसे रॉबर्ट वाड्रा को लेकर एक बदसलूकी पर बात खत्म नहीं की जा सकती। 
यूपीए के दस बरसों के राज में जिस अंदाज में रॉबर्ट वाड्रा का कारोबार और उनकी जायदाद में इजाफा हुआ, उसे लेकर बहुत से दस्तावेज हवा में तैरते रहे, और हो सकता है कि आगे किसी जांच का सामान भी बनें। लेकिन जिस देश की राजनीति स्विस बैंक में काले धन रखकर चलते आ रही है, उस राजनीति में सबसे बड़ी पार्टी के मालिकाना हक वाला कुनबा अगर अपने दामाद के कारोबार को लेकर इस तरह के आरोपों में फंसा, तो यह बहुत ही अदूरदर्शिता और कमसमझी की बात थी। राजनीति में देश पर दस बरस राज करने वाले परिवार की नीयत अगर पैसे कमाने की थी, तो जमीनों के धंधों से परे भी सैकड़ों करोड़ रूपए हर महीने कमाए जा सकते थे, और रॉबर्ट वाड्रा की कमाई को लेकर जितनी बदनामी सोनिया-कांग्रेस की हुई है, वह शायद कांग्रेस के इतिहास का सबसे महंगा राजनीतिक-कारोबारी सौदा रहा है। ऐसी कोई वजह नहीं थी कि राहुल और सोनिया मिलकर अपनी पार्टी को, और अपने कुनबे को ऐसी तोहमतों से बचा नहीं सकते थे। चुनाव में राजनीतिक हार तो आती-जाती रहती है, लेकिन ऐसी बदनामी जाने के लिए नहीं आती, और अभी तो इस पूरे मामले में जांच शुरू भी नहीं हुई है। 
हम यहां पर रॉबर्ट वाड्रा के सिलसिले में दो पिछली बातें याद दिलाना चाहते हैं। अमेठी-रायबरेली के एक चुनाव प्रचार के दौरान मीडिया के पूछने पर कैमरों के सामने ही इस दामाद ने बयान दिया था कि अभी राहुल गांधी का मौका है, फिर वक्त आने पर प्रियंका गांधी राजनीति में आएंगी, और फिर वे खुद राजनीति में आएंगे। इसी चुनाव प्रचार के दौरान प्रियंका-रॉबर्ट के बच्चे भी चुनावी सभा के मंच पर लाए गए थे, और उनकी तस्वीरें टीवी-अखबारों में खूब छाई थीं। इसके बाद जब कभी कारोबार को लेकर कोई आरोप लगे, और सवाल उठे, तो इस परिवार ने अपने आपकी निजी जिंदगी से मीडिया को दूर रहने की सलाह दी। जो लोग देश पर राज करने की राजनीति की खुद होकर घोषणा करते हैं, वे किस तरह बाद में अपने आपको निजी बता सकते हैं? देश के लोगों को कुछ ही बरस पहले का वह दूसरा मौका याद होगा जब जमीन के धंधों में गैरकानूनी काम करके अरबों कमाने के आरोप लगे, और इसके जवाब में रॉबर्ट वाड्रा ने इंटरनेट पर सार्वजनिक रूप से ऐसे आरोप लगाने वाले हिन्दुस्तानियों को मैंगो पीपुल ऑफ बनाना रिपब्लिक कहा था। अंग्रेजी की इस बात का मतलब होता है कि ऐसे किसी देश में, जो कि नाम का लोकतंत्र हो, वहां के आम लोग। हिन्दुस्तानियों के लिए ऐसी हिकारत की बात खुलकर कहने के बावजूद सोनिया-परिवार की ओर से इस बात की कोई आलोचना नहीं हुई, कोई माफी नहीं मांगी गई। 
अब यह राहुल-सोनिया परिवार और उनके कब्जे की कांग्रेस पार्टी की मर्जी की बात है कि वे अपने परिवार, अपने रिश्तेदार, और अपनी पार्टी में से किसको क्या प्राथमिकता देते हैं। कुछ लोग यह भी मान सकते हैं कि कांग्रेस के पास अब खोने को कुछ नहीं बचा है, कुछ लोग यह कह रहे हैं कि अब राहुल को अकेले पार्टी सम्हाल लेनी चाहिए, कुछ लोग अभी भी सोनिया की लीडरशिप जारी रखना चाहते हैं, और कुछ ऐसे भी हैं जो प्रियंका में इंदिरा गांधी की छाया देखते हैं, और उन्हें राहुल के मुकाबले एक बेहतर संभावना समझते हैं। कांग्रेस का भविष्य इनमें से जिस किसी के हाथ हो, यह उसके खुद के लिए सबसे बड़ी फिक्र की बात होनी चाहिए, क्योंकि देश को अब कांग्रेस की और अधिक फिक्र रह गई नहीं दिखती है। जो दामाद इस देश को एक नकली या दिखावे का लोकतंत्र कहे, यहां के आम लोगों का हिकारत से मखौल उड़ाते हुए उन्हें मैंगो पीपुल कहे, वैसे दामाद से इस पार्टी का कोई भला तो होते दिखता नहीं। लेकिन इस पार्टी की जो रीति-नीति है, उसमें किसी बाहरी सलाह की कोई गुंजाइश नहीं है, और यह नौबत इस पार्टी के भविष्य को एक अंधेरी गहरी सुरंग में पहुंचा चुकी है। यह बात हम सिर्फ चुनावी हार या सरकारों के हाथ से निकलने को लेकर नहीं कह रहे, यह बात हम नेहरू के परिवार और गांधी की इस पार्टी की साख हाथ से निकल जाने को लेकर कह रहे हैं। इस बात को कांग्रेस में कोई सुने या नहीं, देश की जनता ने पिछले कुछ चुनावों में यह साबित कर दिया है कि वह सब सुन और समझ रही है। 
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