परदेश से आए इबोला से परे के घरेलू खतरे भी हैं

19 नवंबर 2014
संपादकीय
नई दिल्ली में भारत का पहला इबोला केस मिलने के बाद अब एक बड़ा खतरा यह हो गया है कि अगर यह भयानक जानलेवा और संक्रामक बीमारी किसी तरह सरकारी चौकसी को पार करके देश में आ जाती है तो क्या होगा? छत्तीसगढ़ सहित देश के बहुत से हिस्सों में सरकारी चिकित्सा सेवा का बदहाल है। छत्तीसगढ़ के बारे में अब फिलहाल और अधिक लिखने की जरूरत नहीं है, और लोगों ने पश्चिम बंगाल के अस्पतालों में नवजात बच्चों की थोक मौतों के बारे में लगातार हर कुछ महीनों में पढ़ा ही है। ऐसे बदइंतजाम सरकारी चिकित्सा इंतजाम के चलते किसी बड़े संक्रामक रोग को कैसे रोका जा सकेगा? 
भारत से हर बरस हजारों लोग हज करने जाते हैं, और वहां पर दुनिया के तमाम देशों से आए हुए लोग रहते हैं। दूसरी तरफ दुनिया के सौ से अधिक देशों से भारत में पर्यटक आते हैं, और भारत के विमानतलों पर इतनी जांच तो हो सकती है कि वे लोग किन-किन देशों में पिछले महीनों में गए हैं, लेकिन ऐसी कोई जांच मुमकिन नहीं है कि उन देशों में उनकी मुलाकात इबोलाग्रस्त देशों के लोगों से हुई तो नहीं है। ऐसे में बिना इबोलाग्रस्त देशों में गए भी वे इबोला के जीवाणु लेकर भारत आ सकते हैं। और भारत में सरकारी जांच कितनी भरोसेमंद हो सकती है, इसको देखना हो तो जांच की सरकारी मशीनों, सरकारी इलाज, और दवाईयों की सरकारी खरीद को देखना काफी होगा। जो हाल छत्तीसगढ़ में है, उससे बेहतर हाल देश के दूसरे राज्यों में होगा, ऐसा मानने की कोई वजह नहीं है। 
एक भयानक तस्वीर यह बनती है कि ऐसी किसी महामारी के आने पर भारत के सरकारी इंतजाम सिर कटे मुर्गे की तरह बेतरतीब भागते दिखेंगे। और देश की सरकारी चिकित्सा धीरे-धीरे घटाकर पिछले बरसों में लगातार अस्पतालों के निजीकरण को बढ़ावा दिया गया है, और यह नौबत वापिस मुड़ते नहीं दिखती। अब जहां तक निजी अस्पतालों की बात है, तो उनकी संक्रामक रोगों से निपटने में कोई दिलचस्पी इसलिए नहीं रहती कि इनकी मार आमतौर पर गरीबों पर पड़ती है। और दूसरी बात यह भी कि संक्रामक रोगों को समाज के लिए खतरा मानकर केन्द्र और राज्य सरकारें उनका इलाज अपने मत्थे लेती हैं, और कमाई वाले इलाज निजी अस्पतालों के लिए छोड़ती हैं। इसलिए हिन्दुस्तान के जिन पांच सितारा अस्पतालों और इलाज का डंका प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बजा रहे हैं, उनसे देश के गरीबों का कुछ भी लेना-देना नहीं है। और जहां गरीब जाते हैं, वहां पर नकली मशीनें, नकली दवाएं, ऑपरेशन के जंग लगे औजार, और खाली कुर्सियां उनका स्वागत करने तैयार रहते हैं। 
अब इबोला हो, या किसी और नाम की कोई बीमारी हो, इससे निपटने के लिए भारत का सरकारी इंतजाम किसी तरह तैयार नहीं होगा, अगर इसके मरीज कुछ अधिक गिनती में निकल आएंगे। कुछ हफ्ते पहले ही हमने फिल्म कलाकार आमिर खान के एक टीवी कार्यक्रम सत्यमेव जयते में भारत में टीबी के खतरे को देखकर उसके बारे में इसी जगह लिखा था। और परदेश से आने वाले इबोला की ही जरूरत नहीं है, देश में वैसे ही मौजूद और चारों तरफ बिखरी हुई ऐसी टीबी भी देश में तबाही लाने के लिए काफी है जो कि प्रचलित टीबी-दवाओं के खिलाफ प्रतिरोध विकसित कर चुकी है। भारत में कुछ जानकार डॉक्टर टीबी को टाइम बम भी कह रहे हैं, जो कि फटने के इंतजार में है। और टीबी फिर ऐसे गरीब लोगों की ऐसी ताकतवर बीमारी है, जिसके इलाज में महंगे अस्पतालों की कोई दिलचस्पी नहीं होगी। और इसकी दवाइयों को बनाने में, उनको खरीदने में, उनको मरीजों तक लगातार और नियमित तरीके से पहुंचाने में अगर फिर सरकारी भर्राशाही रही, भ्रष्टाचार रहा, मिलावट रही, तो कब यह देश टीबी की मार से नसबंदी की जरूरत खो बैठेगा, इसका कोई ठिकाना नहीं है। फर्क यही होगा कि आबादी घटने के ऐसे किसी दौर की मार सबसे गरीब लोगों पर सबसे अधिक पड़ेगी, और पैसे वाले लोग, सत्ता पर बैठे ताकतवर लोग अपने आपको महंगे सुरक्षा कवच से घेरकर बच निकलेंगे। इबोला के नाम से जो खतरा आया है, उसके साथ-साथ भारत को टीबी और मलेरिया जैसे खतरों के बारे में भी सोचना चाहिए जो कि बहुत बड़ी संख्या में हिन्दुस्तानियों को मारने के लिए तैयार खड़े हैं।

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