जरूरत देश में एक वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक सोच लाने की है...

20 नवंबर 2014
संपादकीय
आज जब भारतीय मीडिया हरियाणा के एक पाखंडी रामपाल की गिरफ्तारी का नजारा दिखा रहा है, तब मीडिया के कुछ लोगों को बीस बरस पहले अमरीका में इसी तरह एक सम्प्रदाय का सरकार से टकराव याद पड़ रहा है, जिसके चलते वहां पर भारी गोलीबारी से मामला निपटाया गया था, और 51 दिन तक वह घेराबंदी चली थी जिसमें  28 बच्चों सहित 76 लोग मारे गए थे। गनीमत कि भारत में आश्रम का यह मोर्चा इतना खतरनाक नहीं हुआ क्योंकि यहां पर अमरीका की तरह खतरनाक हथियारों की निजी मिल्कियत का कानून नहीं है। लेकिन ऐसे तमाम मौकों पर दुनिया के सबक से नसीहत लेने की जरूरत रहती है। 
इस मुद्दे पर हम लगातार दूसरे दिन इसलिए लिख रहे हैं कि आज ही एक दूसरी खबर अफ्रीका के एक देश केन्या से आई है जहां पर एक चर्च में पादरी ने वहां आने वाली लड़कियोंं और महिलाओं को कहा है कि वे अपने कपड़ों के भीतर कोई भीतरी कपड़े पहनकर न आएं, ताकि ईश्वर उनके शरीर में आसानी से घुस सके। इस खबर को लेकर दुनिया भर में प्रतिक्रियाएं हो रही हैं, लेकिन उस चर्च में जाने वाली लड़कियां और महिलाएं पादरी की बात को मानकर वहां उसी तरह से पहुंच रही हैं। दुनिया भर में जगह-जगह अंधविश्वास को जब धर्मान्धता और आध्यात्मिक ढांचों का सहारा मिल जाता है, तो वह सिर चढ़कर बोलने लगती है। मोटे तौर पर धर्म का किसी विज्ञान, किसी तर्क, किसी न्याय से कुछ लेना-देना नहीं होता। कहने के लिए धर्म की नसीहतें अच्छी गिना दी जाती हैं, लेकिन उनका नतीजा खूनखराबे से भरा हुआ रहता है। इसी तरह जब-जब आध्यात्मिक गुरू होने का दावा करने वाले लोग पकड़ में आते हैं, उनका भांडाफोड़ होता है, तो बलात्कार से लेकर हत्या तक कई किस्म के जुर्म उजागर होते हैं। हरियाणा में भी रामपाल नाम के इस आदमी के आश्रम में अब पुलिस को शौचालयों में कैमरे मिल रहे हैं, और कई दूसरे किस्म के सेक्स-सुबूत हाथ लग रहे हैं। 
लेकिन आज इसी मुद्दे पर बात खत्म करने की हमारी नीयत नहीं है। भारत जैसे लोकतंत्र में जहां पर सती प्रथा से लेकर बाल विवाह तक और छुआछूत से लेकर विधवाओं के सिर मुंडाने तक के कई किस्म के संस्कार सैकड़ों बरस से चले आ रहे थे, वहां समाज सुधारकों ने और सरकारी कानून ने मिलकर सुधार की जो पहल की थी, वह शहरीकरण से आगे बढ़ी, वैज्ञानिक सोच से आगे बढ़ी। लेकिन आज केन्द्र सरकार के कुछ लोग, राजनीतिक दलों के बहुत से लोग, और खाप पंचायतों जैसी हिंसक संस्थाओं के अधिकतर लोग मिलकर इस देश में जिस तरह के अंधविश्वास, और पाखंड को बढ़ावा दे रहे हैं, उससे पूरे देश में वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक सोच का कत्ल हो रहा है। जो लोग किसी एक धार्मिक, आध्यात्मिक, या सांस्कृतिक तर्क को लेकर न्याय और लोकतंत्र को छोड़ते हैं, वे लोग फिर आगे कई किस्म की हिंसा में भी जुट जाते हैं, और वे लोग कहीं पर वेद गिना देते हैं, कहीं पर पुराण गिना देते हैं, और ऐसी तमाम कहानियों को ये लोग इतिहास साबित करने पर जुट जाते हैं, जिन कहानियों को इतिहास मानने पर देश की सोच अतीत के नाम पर बढ़ाए जा रहे एक पाखंड तले कुचल जाएगी। 
भारतीय लोकतंत्र पर आज जो सबसे बड़ा खतरा मंडरा रहा है वह एक आधुनिक सोच को कुचलने का, लोकतंत्र से ऊपर इस देश की एक तथाकथित और काल्पनिक सांस्कृतिक पौराणिकता को थोपने का, और समाज के कमजोर तबकों को कुचलने का है। इसके साथ-साथ इस देश से इतिहास को मिटाकर अपनी मनचाही बातों को इतिहास के रूप में दर्ज करने का जो दौर चल रहा है, वह दौर भी अंधविश्वास और कट्टरता को, धर्मान्धता और आध्यात्मिक गुलामी को बढ़ाते चल रहा है। कोई अगर यह सोचता है कि आसाराम से लेकर रामपाल तक अनगिनत मुजरिम पूरे देश में जेलों में डालने पर भी जनता की मानसिक गुलामी खत्म हो जाएगी, तो यह गलत अंदाज है। जनता से आज आजाद सोच, वैज्ञानिक सोच, न्यायसंगत लोकतांत्रिक सोच छीनी जा रही है, और यह खतरा किसी धमाके के साथ खून फैलाते हुए नहीं आ रहा है, एक सांस्कृतिक गौरव के रूप में इसे थोपा जा रहा है। जब तक देश में एक दकियानूसी सोच को बढ़ावा मिलते रहेगा, किस्म-किस्म के पाखंडी बाबा और गुरू पनपते रहेंगे। जरूरत महज पुलिस कार्रवाई की नहीं है, देश की सोच में एक वैज्ञानिकता और लोकतांत्रिक न्याय लाने की है। 

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