खुली सिगरेट बिक्री पर रोक का फैसला नासमझी का या सिगरेट कंपनियों की मर्जी का?

26 नवंबर 2014
संपादकीय
केन्द्र सरकार ने यह फैसला ले लिया है कि सिगरेट की खुली बिक्री बंद कर दी जाए। हो सकता है कि यह तुरंत लागू भी हो जाए, और इसकी खबर आते ही बाजार में हड़बड़ी में सिगरेट कंपनियों के शेयर गिर गए। हो सकता है कि यह दहशत सही हो, और सिगरेट की बिक्री कम हो जाए। लेकिन हमारा अंदाज इससे अलग है, और एक दूसरी बात इससे जुड़ी हुई ऐसी है जो यह सुझाती है कि इससे बिक्री कम होने के बजाय बढ़ भी सकती है। 
आज देश में सिगरेट की खुली बिक्री सिर्फ छोटी-छोटी फुटपाथी दुकानों, और पानठेलों पर होती है। ऐसी जगहों पर आज भी उन प्रदेशों में धड़ल्ले से तम्बाकू वाला गुटखा बिकता है, जहां पर इस पर कानूनी रोक लगी हुई है। भारत में सरकार का ऐसा कोई ढांचा नहीं है जो कि हर हजार-पांच सौ आबादी पर रहने वाली ऐसी एक-एक दुकान पर जाकर जांच कर सके। छत्तीसगढ़ में ही गुटखा पर रोक लगी हुई है, लेकिन हर सौ कदम पर यह मिल जाता है, इसमें कालाबाजारी की वजह से अधिक दाम जुड़ जाता है। सिगरेट का पैकेट बेचना जब कानूनी होगा, तो उस पैकेट से निकालकर सिगरेट बेचना कैसे रोका जा सकेगा? ऐसे कानून बनाने का कोई मतलब नहीं होता जिनको कि लागू नहीं किया जा सकता। आज हिन्दुस्तान के बहुत से प्रदेशों में दुपहिया पर लोगों के सिरों पर हेलमेट तो सरकार लागू नहीं कर पाई, जो कि एक अधिक आसान काम हो सकता था, बजाय सिगरेट की खुली बिक्री रोकने के। इसी तरह आज भी देश भर में स्कूल-कॉलेजों के आसपास सिगरेट और तम्बाकू की बिक्री पर रोक है, लेकिन उस पर कोई अमल नहीं हो पाता। सार्वजनिक जगहों पर सिगरेट पीने पर भी रोक है, लेकिन उसे भी कोई लागू नहीं कर पाता। ऐसे में एक और कानून महज अपनी नीयत को साबित करने के लिए तो ठीक है, उसका और कोई इस्तेमाल हमको नहीं दिखता। 
अब हम बहस के लिए पल भर को यह मान लेते हैं कि सरकार इसे कड़ाई से लागू कर ही लेगी। तो सिगरेट के सिर्फ पैकेट बिकने से उन लोगों का अधिक नुकसान हो सकता है जो आज अपनी आदत पर काबू पाने के लिए एक बार में सिर्फ एक सिगरेट खरीदते हैं, और फिर दुकान से हट जाते हैं। अब ऐसे लोगों के पास हमेशा उनका पैकेट रहेगा, और सिगरेट पीना बढ़ जाएगा। इसके साथ-साथ अब जो लोग सिर्फ बाहर सिगरेट पीते थे, उनके साथ उनके घर-दफ्तर भी यह पैकेट पहुंच जाएगा, और आसपास के लोग इस धुएं का नुकसान और अधिक झेलेंगे। 
आज भले सिगरेट कंपनियों के शेयरों के दाम गिर गए हों, हमको ऐसा भी लगता है कि इसके पीछे सिगरेट कंपनियों की एक साजिश भी हो सकती है, और उन्हीं के कहे हुए सरकार ने ऐसा फैसला लिया हो, और उन्होंने ही दिखावे के लिए कुछ दिनों के लिए अपने शेयरों के दाम गिरवा दिए हों। पूरा पैकेट बिकने से हो सकता है कि सिगरेट की बिक्री खासी बढ़ जाए, और उसकी खपत बढ़ जाए। सरकार के काम करने के तरीके से वाकिफ लोग यह जानते हैं कि तम्बाकू-लॉबी की मर्जी के खिलाफ इस देश में शायद ही कोई फैसला हो पाता है। देश के लोगों की संपन्नता पहले के मुकाबले कुछ अधिक, और लोग एक-दो सिगरेट के बजाय शायद पूरा पैकेट भी खरीद सकते हैं, और पैकेट पूरे समय साथ रहने से लोगों का मौत की तरफ तेजी से बढऩा जारी रहेगा। 
यह मामला कुछ उसी तरह का लगता है कि आज जो लोग शराब की एक छोटी बोतल, एक पौव्वा, खरीद सकते हैं, उन्हें कहा जाए कि अब उन्हें सिर्फ दो लीटर की बोतल मिल सकेगी, और छोटी बोतल में शराब बंद हो गई है। ऐसे में खपत कम होने के बजाय बढऩे का खतरा अधिक लगता है। और कुल मिलाकर आखिर में हम यही कहेंगे कि सरकार जब बड़े-बड़े कानून, बड़े-बड़े नियम लागू नहीं कर पा रही है, तो एक-एक पानठेले और फुटपाथी दुकान पर ऐसा एक और बेअसर कानून लादकर सरकार सिर्फ अपने कानूनों का सम्मान खत्म करेगी। 

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