एक तरफ रैनबसेरे का अदालती आदेश और दूसरी तरफ दिल्ली में गरीबों पर बुलडोजर

28 नवंबर 2014
संपादकीय
दिल्ली से एक खबर है कि पिछले दस-बारह बरसों से वहां पर एक पहाड़ी की जंगल-जमीन पर रह रहे करीब दो हजार गरीबों के झोपड़े गिरा दिए गए। जैसा कि आज दिल्ली का मौसम है, वहां पर दर्जनभर से अधिक रेलगाडिय़ां रद्द हो गई हैं, क्योंकि वहां ठंड बहुत है, और गहरी धुंध छाई हुई है। ऐसे में गरीबों के ऐसे झोपड़े, और कच्चे मकान, जो कि उनके बिजली बिल, आधार कार्ड, राशन कार्ड के पतों वाले थे, उनको बुलडोजर लाकर गिरा दिया गया। चूंकि दिल्ली में चुनाव सामने हैं, शायद इसलिए कांग्रेस के नेता राहुल गांधी वहां पहुंचे, और उन्होंने मलबे पर खड़े रहकर कहा कि बुलडोजर को उनके ऊपर से गुजरना होगा। हम इस बयान को कोई अहमियत नहीं देते, क्योंकि जहां कांग्रेस की सरकारें रहती हैं, वहां भी बुलडोजर गरीबों पर ही चलते हैं, और अमीरों की बारी शायद ही कभी आती है। लेकिन आज इस मुद्दे पर लिखने का हमारा दूसरा मकसद है। 
सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश की सरकारों को नोटिस भेजा है कि वे ठंड में बेघर लोगों को बचाने के लिए रैनबसेरे का इंतजाम करें, और अदालत को रिपोर्ट दें। आज जब दिल्ली में सड़क किनारे के फुटपाथों पर बड़े-बड़े शामियाने लगाकर बेघर लोगों के लिए रात में सिर छुपाने का इंतजाम किया जा रहा है, पिछले कई बरसों से अदालतों के कहे हुए ऐसा करना पड़ रहा है, तब नवंबर के महीने के आखिरी कड़कड़ाते दिनों में अगर सरकारी बुलडोजर गरीबों की पूरी की पूरी बस्ती को उजाड़ रहे हैं, तो हमारे हिसाब से यह सुप्रीम कोर्ट की सीधी-सीधी अवमानना है, जिसने कि पूरे देश में ठंड में बेघरों के रहने के लिए सरकारी खर्च पर इंतजाम की गारंटी मांगी है। अब सुप्रीम कोर्ट इसी दिल्ली में बैठा हुआ है, और दो दिनों से छप रही इन तस्वीरों को देखने के बाद अगर उसने अब तक दिल्ली सरकार को नोटिस नहीं भेजा है, तो हमारे हिसाब से जज शायद इतने अधिक व्यस्त हैं, कि इन दो हजार लोगों में से कुछ बच्चों के गुजर जाने पर ही उन्हें नोटिस भेजने का वक्त मिले। 
सरकार एक ऐसे ऑक्टोपस की तरह काम करती है जिसके कि आठ हाथ-पैर होते हैं, और समंदर में यह प्राणी अलग-अलग हाथ-पैर से अलग-अलग काम करता है। और ऐसा कहना भी ऑक्टोपस के साथ कुछ ज्यादती इसलिए भी होगी क्योंकि उसके सब हाथ-पैर यह जानते हैं कि बाकी हाथ-पैर क्या कर रहे हैं। दिल्ली में एक तरफ सरकार रात का इंतजाम कर रही है, और दूसरी तरफ गरीबों के सिर पर से उनका अपना इंतजाम हटा रही है। इस सिलसिले में सरकार के नेताओं या अफसरों, ठेकेदारों और सप्लायरों का भला जरूर हो जाएगा, क्योंकि इन दो हजार लोगों के लिए सरकारी खर्च पर रैनबसेरा बनाने और चलाने का मजेदार काम सरकार को शायद और मिल जाए। हम चारों तरफ देखते हैं कि सरकार बहुत से काम रात-दिन ऐसे करते चलती है कि जिससे जनता के खजाने का अधिक से अधिक नुकसान हो, क्योंकि जब तक खर्च नहीं होगा, तब तक नेता, अफसर, ठेकेदार को बचेगा क्या? सरकार की बेदिमागी का एक किस्सा है, जिसे इस गंभीर जगह पर भी लिखना जायजा होगा। जंगल विभाग के अफसरों ने एक बार एक जगह पेड़ लगाने के लिए तीन किस्म के लोगों को तैनात किया। एक टीम गड्ढे खोद रही थी, दूसरी टीम का काम था उन गड्ढों में पौधे रखना, और तीसरी टीम का काम था, इन पौधों के रखे जाने के बाद बची जगह पर खाद और मिट्टी भरना। किसी वजह से यह दूसरी टीम नहीं पहुंच सकी, तो पहली टीम गड्ढे खोदती चली गई, और तीसरी टीम उन गड्ढों में खाद और मिट्टी भरते चली गई। छत्तीसगढ़ में भी इस तरह के भ्रष्टाचार, और फिजूलखर्च की अनगिनत मिसालें हैं, और ऐसे तमाम भ्रष्ट अफसर बचे हुए हैं, और जनता के खजाने को लूटने के काम को बखूबी करते चल रहे हैं। 
लेकिन दिल्ली में गरीबों की बेदखली के मुद्दे को देश के आम भ्रष्टाचार की तरफ मोड़ देना ज्यादती होगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पूरे देश के लिए एक ऐसी नीति बनानी चाहिए, जब तक किसी गरीब को दूसरा इंतजाम करके न दिया जा सके, तब तक उसे बेदखल न किया जाए। एक तरफ मोदी सरकार यह मुनादी करते थकती नहीं है कि 2022 तक हर नागरिक को मकान मिल चुका रहेगा। तो आने वाले इन बरसों में बसे हुए लोगों को हटाकर, कुचलकर, उन्हें जीते जी मौत सरीखी जिंदगी देकर दिल्ली की सरकार क्या हासिल कर रही है? बुलडोजर का अपना कोई दिमाग नहीं होता है, और सरकार के पास दिल नहीं होता है, महज दिमाग होता है। लेकिन एक जनकल्याणकारी सरकार को अपने ही लगाए हुए नारे के बारे में भी सोचना चाहिए कि गरीबों को उजाड़कर किस तरह देश भर में हर किसी को मकान दिए जा सकेंगे? जो लोग आज बसे हुए हैं, उनको न उजाडऩा अपने आप में उनको मकान देने सरीखा है, और आने वाले बरसों में ऐसे लोगों को तभी हटाना चाहिए, जब उनके लिए सरकार दूसरा इंतजाम कर सके।

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