मोदी को महज कोसने से कांग्रेस का भला नहीं होगा

21 नवंबर 2014
संपादकीय
दस दिनों के विदेश दौरे से लौटकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सीधे चुनाव प्रचार में जुट गए हैं। अभी हर दिन देश के बाहर के उनके कुछ भाषण, और कई खबरों ने मीडिया को घेर रखा था, और अब उनके लंबे चुनावी भाषण सामने है। इस बीच मोदी के विरोधियों के बीच यह बात कही और लिखी जा रही है कि मोदी एक प्रवासी भारतीय की तरह देश के बाहर बहुत वक्त गुजार रहे हैं, और देश के भीतर कई तरह की दिक्कतें खड़ी हुई हैं। 
यह समझने की जरूरत है कि रोजाना औसत से अधिक घंटे काम करने वाले किसी प्रधानमंत्री के लिए यह भी मुमकिन हो सकता है कि वह पिछले प्रधानमंत्रियों के मुकाबले अधिक विदेशी दौरे भी कर ले, और घर लौटने के बाद बकाया काम को भी निपटा ले। मोदी सरकार में काम की जो संस्कृति दिख रही है, उसके तहत हो सकता है कि बाहर जाना और घर का काम निपटाना दोनों मुमकिन हो। इसलिए हम अधिक दौरों को अपने आप में आलोचना के लायक कोई मुद्दा नहीं पाते। दूसरी बात यह कि अमरीका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक, कई जगहों पर मोदी के स्वागत में वहां बसे हुए हिन्दुस्तानियों की बड़ी भीड़ जुटी। और एक ऐसा उत्साह उन लोगों में देखने मिला, जो कि किसी भारतीय प्रधानमंत्री को पिछले कुछ दशकों में देखने नहीं मिला होगा। हालांकि बहुत पुरानी एक तस्वीर हमारे सामने है जिसमें अमरीका के कैलिफोर्निया के एक विश्वविद्यालय का स्टेडियम नेहरू की सभा के लिए खचाखच भरा हुआ था, और वह वक्त तो वहां पर अधिक प्रवासी भारतीयों का भी नहीं था, संपन्नता का भी नहीं था। लेकिन हाल के दशकों में मोदी ने बाहर बसे हिन्दुस्तानियों के बीच जिस तरह का उत्साह पैदा किया है, वह अभूतपूर्व है, और यह मुद्दा भी हमको किसी आलोचना के लायक नहीं लगता है।
प्रवासी भारतीयों के बीच अधिक संख्या भाजपा के समर्थकों की है, वे आज संपन्न भी हैं, सफल भी हैं, और वे एक ऐसे प्रधानमंत्री का स्वागत करने का उत्साह भी रखते हैं, जो अपनी बातों से, अपनी ताजा कामयाबी से, अपनी नाटकीयता से, और अपने वायदों से लोगों में दिलचस्पी जगा रहा है। सार्वजनिक जीवन में बहुत सी बातें धारणा पर भी चलती हैं। पिछले दस बरस भारत में यूपीए सरकार के कामकाज के बारे में दुनिया में एक आम धारणा यह है कि वह परले दर्जे की भ्रष्ट सरकार थी, प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह के बारे में यह आम धारणा है कि वे एक भले इंसान थे, अर्थशास्त्री थे, लेकिन वे अपने मातहत होने वाले हर भ्रष्टाचार को अनदेखा करते चले थे। यह एक आम धारणा है कि यूपीए की मुखिया कांग्रेस पार्टी कुनबापरस्ती की शिकार है, और असरहीन राहुल गांधी से परे धंधेबाज रॉबर्ट वाड्रा तक को कांग्रेस पार्टी झेल रही है। हम अभी इन तमाम बातों की हकीकत पर नहीं जाते, लेकिन कांग्रेस और सोनिया-राहुल के मुकाबले भाजपा और नरेन्द्र मोदी में एक यह फर्क बड़ा जाहिर है कि मोदी कांग्रेस लीडरशिप के मुकाबले अधिक काबिल दिखते हैं, उनके कंधों, सिर, और पीठ पर अपने कुनबे का बोझ नहीं लदा है, उनके सामने सत्ता को अपनी अगली पीढ़ी को देकर जाने की कोई बेबसी नहीं है, क्योंकि उनकी कोई अगली पीढ़ी नहीं है। इसलिए आज अगर दुनिया में बसे हुए हिन्दुस्तानी यूपीए के पिछले दस शर्मनाक बरसों के बाद एक असरदार और दिलचस्प प्रधानमंत्री पाकर उसे देखने आ रहे हैं, तो यह महज मोदी-मैनेजमेंट की बात नहीं है, यह एक प्राकृतिक और स्वाभाविक उत्साह की बात भी है। और इस सिलसिले में इस बात को भूलना नहीं चाहिए कि मोदी उस उदार बाजार व्यवस्था को बढ़ाने वाले हैं, जो कि प्रवासी भारतीयों के सबसे बड़े हिस्से की पसंदीदा व्यवस्था है। पश्चिम के पूंजीवादी और विकसित देशों में बसे हुए हिन्दुस्तानी वहां के पूंजीवाद की वजह से कामयाब है, और उनको मोदी की घरेलू नीतियां भी सुहाती हैं। इसलिए वे अगर मोदी में एक बेहतर लीडर देखते हैं, तो इसमें कुछ भी अटपटा नहीं है। 
मोदी विरोधियों और कांग्रेसियों की एक दिक्कत यह भी है कि वे मोदी को कोसने में अपना भविष्य देखते हैं। किसी का भविष्य किसी दूसरे को कोसते हुए नहीं सुधर सकता। जिस तरह कोई बिल्ली बैठकर किसी छींके को टकटकी लगाकर देखती रहे, तो वह छींका टूट नहीं जाता, उसी तरह हसरतों से हकीकतें नहीं बनतीं। हकीकतें असरदार हरकतों से बनती हैं, मेहनत से बनती हैं। कांग्रेस पार्टी को चाहिए कि मोदी की कामयाबी के पीछे की बातों से कम से कम उन बातों को तो समझने की कोशिश करे, जिन बातों से कांग्रेस की बीती-गुजरी नीतियों और उसके बीते कल के सिद्धांतों का कोई टकराव नहीं है। सार्वजनिक जीवन में विरोधी और दुश्मन से भी सीखने की जरूरत रहती है। जिस तरह मुकाबले वाले किसी खेल में प्रतिस्पर्धी खिलाड़ी की बारीकियों को देखे-समझे बिना, और उनको पार पाने की तरकीबें जुटाए बिना आज कोई अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में आगे नहीं बढ़ सकते, वैसा ही सार्वजनिक जीवन में किसी भी दायरे में आगे नहीं बढ़ा जा सकता। मोदी की विदेश यात्रा को ध्यान से देखकर कांग्रेस को अपने आपको एक ऐसे दिन के लिए तैयार करना चाहिए, जिस दिन उसके किसी नेता को देखने-सुनने के लिए भी अमरीका या ऑस्ट्रेलिया में लोग हजार डॉलर की टिकट खरीदने को तैयार हों। 

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