किससे जांच कराएं और कितना मुआवजा दें?

17 नवंबर 14
संपादकीय
बिलासपुर की नसबंदी मौतों की खबरें हवा से हट नहीं रही हैं। मौतें थम गई हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ पहुंचने वाली हर उड़ान देश-विदेश के कुछ मीडिया कर्मियों को लेकर आ रही है। इस बीच इस हादसे या इस जुर्र्म के बाद सरकार के दो फैसलों को लेकर कुछ सोचने की जरूरत है। एक तो यह कि न्यायिक जांच जिस रिटायर्ड महिला जज को दी गई है, उसे दी गई पिछली जांच का क्या तजुर्बा रहा है, और उसके चलते क्या राज्य सरकार को कोई सबक लेना चाहिए था? दूसरी बात यह कि इस नसबंदी-हादसे के बाद हर मृतक महिला के परिवार को पहले चार लाख रूपए की घोषणा हुई, और अब उनके बच्चों के नाम दो-दो लाख रूपए और जमा करने की घोषणा की गई है। यह राज्य सरकार का अपना विशेषाधिकार होता है कि वह मुसीबत या सरकारी इंतजाम के मारे हुए किस इंसान के परिवार को कितना मुआवजा दे, लेकिन सरकार चूंकि एक निरंतर चलने वाली व्यवस्था है, इसलिए इस बारे में भी सोचना चाहिए। 
अब हम पहली बात को आगे बढ़ाते हैं, कि न्यायिक जांच जैसी गंभीर कार्रवाई के लिए राज्य सरकार को किस और कैसे जज को छांटना चाहिए था। हमारा अंदाज है कि छत्तीसगढ़ में या देश में ऐसे हजारों रिटायर्ड जिला जज, हाईकोर्ट जज, या सुप्रीम कोर्ट जज होंगे, जिनमें से किसी को भी यह जांच दी जा सकती थी। हमारा तो यह भी मानना है कि ऐसे किसी जज को यह काम नहीं देना चाहिए था जिसने कि छत्तीसगढ़ में काम किया हुआ है। लंबे समय तक यहीं पर नौकरी करने वाले लोगों का जुड़ाव और लगाव इस राज्य के नेताओं और अफसरों से हो जाता है, और ऐसे में एक ईमानदार जांच में रिश्ते और संबंध, पूर्वाग्रह और पसंद-नापसंद आड़े आते ही हैं। फिर दूसरी बात यह कि छत्तीसगढ़ से रिटायर हुए लोगों में से बहुत से लोग अपने कार्यकाल के बाद सरकार से किसी और किस्म के जिम्मे को पाने की कोशिश करते हैं, और ऐसे में उनकी निष्पक्षता शक के घेरे से बाहर नहीं निकल सकती। फिर इस मामले में अनिता झा नाम की जिस रिटायर्ड जज का नाम तय किया गया है, उनके बारे में खबरें छपी हैं कि उनको जो पिछली जांच दी गई थी, और तीन महीने में रिपोर्ट मांगी गई थी, उस मामले की जांच रिपोर्ट उन्होंने आज तीन बरस बाद भी दाखिल नहीं की है। जिसका ऐसा रिकॉर्ड रहा हो, उसे जांच देना एक शक खड़ा करता है, और राज्य सरकार को इससे परहेज करना चाहिए था। जांच करने वाले लोगों की कोई कमी नहीं है, और बेहतर तो यह होता कि किसी दूसरे राज्य से ऐसे रिटायर्ड जज को लाया गया होता, जिनका रिकॉर्ड भी अच्छा होता, और जिनका छत्तीसगढ़ से कभी कोई लेना-देना नहीं रहा होता। 
अब दूसरी बात पर आएं। एक ही किस्म के हादसों में जिंदगियों के अलग-अलग दाम या अलग-अलग मुआवजा तय करना किसी भी सरकार के अधिकार में तो आता है, लेकिन यह ठीक नहीं है। इसके पहले भी नसबंदी में कहीं एक तो कहीं दो महिलाओं की मौतें होती रही हैं। पूरे देश में इसके लिए केन्द्र सरकार ने एक सरीखे दो लाख रूपए के मुआवजे का इंतजाम किया है। छत्तीसगढ़ में चूंकि दर्जनभर मौतें शुरू में ही सामने आईं, सरकार दबाव मेें आ गई, और उसने चार-चार लाख रूपए मुआवजा घोषित किया, और कल बच्चों के लिए दो-दो लाख रूपए और मुआवजे के बाद अब राष्ट्रीय मुआवजा पैमाने के मुकाबले तीन गुना अधिक मुआवजा दिया जा रहा है। हमको इसमें कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि सरकारी नसबंदी शिविरों में सिर्फ गरीब महिलाएं ही जाती हैं। उनको कितना भी मुआवजा दिया जाए, वह ठीक है। लेकिन पिछले बरसों में इसी तरह जिन महिलाओं की मौत हुई है, उनको उस वक्त दिए गए कम मुआवजे की बात आज खटकती है। आज दरअसल मीडिया में जितने बड़े पैमाने पर बिलासपुर का यह नसबंदी-जुर्म आ गया, उसके चलते सरकार ने निर्धारित पैमाने से कई गुना मुआवजा दिया है। अब इससे एक तस्वीर ऐसी बनती है, और मीडिया में यह बात लिखी भी गई है कि क्या किसी खबर के छा जाने से सरकार उसका मुआवजा अधिक तय करती है? इन दो बातों पर सरकार को इसलिए सोचना चाहिए, और एक नीति तय करनी चाहिए, क्योंकि किसी भी प्रदेश की जिंदगी में इस किस्म के हादसे और मौतें आते ही रहते हैं, और सरकार को एक पूर्व निर्धारित और पारदर्शी नीति बनाकर रखना चाहिए। आज खासकर इस बात पर हमको बहुत निराशा है कि पिछली न्यायिक जांच को पूरा न करने वाली जज को जिम्मा देकर सरकार ने इस बार की जांच की संभावनाओं को बहुत कमजोर कर दिया है। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें