ऑपरेशन घरवापिसी से भी अधिक जरूरी एक वापिसी

30 दिसंबर 2014
संपादकीय
जब पूरा हिंदुस्तान तरह-तरह की नकारात्मक और निराशाजनक खबरों से घिरा हुआ है, तब दिल्ली से एक अच्छी खबर यह आती है कि शिक्षकों का एक संगठन स्कूल छोड़ चुके बच्चों की स्कूलवापिसी का अभियान शुरू करने जा रहा है। इसके बिना देश में ऐसा अंधकार छाया हुआ है कि लोग तरह-तरह से धर्म बदलवाकर घरवापिसी का अभियान चला रहे हैं, और पिछले सैकड़ों-हजारों बरसों के इतिहास को इस तरह वापिस घुमा देना चाहते हैं मानो दुनिया की जिंदगी एक दीवालघड़ी हो और उसके कांटों को घुमाकर हजार बरस पहले ले जाया जा सकता है। लोग कुदरत की विविधता से कुछ सीखना नहीं चाहते, और हर फूल को एक ही रंग का, एक ही आकार का देखना चाहते हैं। घरवापिसी के ऐसे तनाव भरे साम्प्रदायिक अभियान के बीच जब कोई भी तबका कोई छोटी सी भी अच्छी बात करता है, तो वह बहुत अधिक सुहानी लगने लगती है। जिन लोगों को धर्म बदलकर, या किसी शहरी-संगठित धर्म को पहली बार अपनाने वाले आदिवासियों को हिंदू बनाने के अभियान में किसी भी दर्जे की आक्रामकता जायज लगती है, उन लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि धर्म से अधिक जरूरी, जिंदा रहने के लिए रोटी, कपड़ा, और मकान, पढ़ाई और इलाज, जैसे कई हकों की तरफ लोगों की वापिसी कैसे करवाई जा सकती है? 
जिस वक्त के धर्म और धर्म बदलने की बात की जा रही है, उस वक्त लोगों के हक क्या थे, उस वक्त के आम लोग आज किस तरह आर्थिक और सामाजिक शोषण का शिकार होकर गरीब और भुखमरी के शिकार हो चुके हैं, और उनकी उनके हकों की तरफ वापिसी कैसे हो सकती है,  इस सोच को धर्म और जाति व्यवस्था कभी आगे बढ़ाना नहीं चाहेंगे। धर्म और जाति का सारा कारोबार लोगों को दबा-कुचला बनाए रखने के हिसाब से बनाया गया है, और ऐसे में ऑपरेशन स्कूलवापिसी से तो इस कारोबार को एक बड़ा खतरा खड़ा हो सकता है। अगर लोग पढ़-लिख गए, तो हो सकता है कि वे धर्म और जाति की पकड़ के बाहर हो जाएं। इसलिए इंसाफ की तरफ वापिसी, इंसान की तरफ वापिसी, कुदरत के दिए हुए बराबरी के हक की तरफ वापिसी की बात भी कोई नहीं करता। कुल मिलाकर कुछ सौ बरस पहले के एक कैलेंडर पर ले जाकर घड़ी को रोक देना चाहते हैं, और उससे अधिक पीछे तक की वापिसी कोई नहीं चाहते, कोई यह नहीं चाहते कि लोग इंसानियत तक वापिस चले जाएं, लोग धर्म के पहले तक वापिस चले जाएं।
देश में किसी भी विचारधारा के लोग अगर स्कूल और हकवापिसी के अभियान चलाते हैं, तो उसको बढ़ावा मिलना चाहिए। हम दिल्ली से परे बाकी जगहों पर भी सरकार के स्कूल दाखिला वाले सालाना अभियान से परे भी समाज की तरफ से ऐसे अभियान की राह देख रहे हैं जो कि धर्मों से परे बच्चों को पढऩा-लिखना सिखाए, और फिर बड़े होकर वे अपनी मर्जी का धर्म खुद तय कर सकें, या बिना धर्म के नास्तिक रहना तय कर सकें।

नए साल पर क्या संकल्प लें? कुछ छोटी-छोटी नसीहतें...

29 दिसंबर 2014
संपादकीय

नया साल बस दो दिन परे खड़ा है। जो लोग इसके आने के जश्न को नहीं भी मना पाते हैं, वे भी नए साल के लिए कई किस्म की बातें सोचना शुरू करते हैं कि इस बरस में कौन-कौन सा बुरा काम छोड़ेंगे, और कौन-कौन से अच्छे काम करना शुरू करेंगे। इंसान का मिजाज ही ऐसा होता है कि वे कुछ तारीखों से जोड़कर कुछ तय करने की कोशिश करते हैं, कभी जन्मदिन से, तो कभी किसी और सालगिरह से, तो कभी किसी त्यौहार से जोड़कर लोग कुछ संकल्प लेते हैं। बहुत से लोगों का यह भी मानना है कि ऐसे दिनों पर लिए गए संकल्प किसी किनारे नहीं पहुंचते, और बेकार हो जाते हैं। 
लेकिन हमारा मानना है कि किसी संकल्प के पूरे होने की संभावना उसे लेने के बाद ही शुरू हो सकती है, जब तक लोग इस बात के लिए कसम खाने की सोचें भी नहीं, तब तक क्या हो सकता है। इसलिए हर किसी को ऐसे मौके पर अपने, और अपने आसपास के लोगों के बारे में सोचना-विचारना चाहिए, और कुछ अच्छे काम करने का इरादा जुटाकर उसकी कोशिश जरूर करनी चाहिए। कोशिश में नाकामयाब भी वे ही लोग हो सकते हैं, जो कि उसकी कोशिश करते हैं। जंग के बारे में कहा जाता है कि गिरते हैं शहसवार ही मैदाने जंग में...। मतलब यह कि जो कोशिश करते हैं उन्हीं का तो बाद में मूल्यांकन हो सकता है, जो इतने लापरवाह रहते हैं कि कभी कोशिश भी नहीं करते, उनको कौन आंकता है। 
हम कुछ छोटी-छोटी बातें आज यहां पर सुझाते हैं, जो कि हमारे तकरीबन हर पाठक पर लागू होती हैं, और इनमें से अपने फायदे की और अपनी मर्जी की बातों को छांटकर लोग अगले दो दिन अपने मन के भीतर, अपने परिवार में, और अपने दोस्तों में इसकी चर्चा करके खुद भी एक नया बरस तय कर सकते हैं, और आसपास के लोगों को इसके लिए सोचने पर मजबूर भी कर सकते हैं। अब जैसे सबसे पहली बात जो हमको सूझती है, वह है सिगरेट-बीड़ी, और तम्बाकू से परे रहने की। हमारे पाठकों में से शायद एक चौथाई ऐसे होंगे, जो इनमें से किसी एक आदत के शिकार होंगे। इनको यह सोचना चाहिए कि अगर मुंह या गले का कैंसर इनको हुआ, या कैंसर ने इनके फेफड़े खा लिए, तो ये लोग परिवार पर किस तरह का बोझ बन जाएंगे, और किस तरह आधे रास्ते में अपने परिवार को छोड़कर वे चल बसेंगे। इसी तरह की बात शराब पीने वालों के साथ हो सकती हैं, खासकर जो लोग अधिक पीते हैं, और गरीबी के बावजूद पीते हैं। जो लोग इसका खर्च उठा सकते हैं, और काबू के भीतर पीते हैं, उनके लिए यह शायद उतनी नुकसानदेह नहीं है, जितनी कि सिगरेट हो सकती है। लेकिन बुरी लत कब बढ़कर बेकाबू हो जाती है, यह किसने देखा है?
संपन्न तबकों के कुछ लोगों का खानपान बड़ा नुकसानदेह रहता है। जरूरत से अधिक घी-तेल, मुर्गा-मछली, या अधिक तला हुआ, अधिक नमक या अधिक शक्कर वाला खाना या तो आज ही तकलीफ दे देता है, या फिर लंबी बीमारियों की शुरुआत करता है। ऐसे परिवार यह तय कर सकते हैं कि नए साल में वे किस तरह अपने खानपान को अधिक सेहतमंद बनाएंगे, और इसकी जानकारी अधिक मुश्किल भी नहीं है, बाजार में ऐसी सस्ती किताबें मौजूद हैं जो कि खानपान की खामियों और खूबियों के वैज्ञानिक तथ्य बतलाती हैं। लोगों को एक-दूसरे को ऐसी कुछ अच्छी किताबें भी नए साल के तोहफे में देना चाहिए, और आगे का खानपान भी बेहतर बनाने का संकल्प लेना चाहिए। बहुत से लोगों को यह लगता है कि आजकल खानपान और जीवन शैली से होने वाली तमाम बीमारियों के इलाज कुछ दाम पर ही सही, मौजूद हैं। लेकिन ऐसा होता नहीं है, कितना भी महंगा और अच्छा इलाज हो, वह पूरी भरपाई कभी नहीं कर सकता। इसलिए पूरे घर को इस बारे में बैठकर तय करना चाहिए, इससे बड़े लोगों का तो तुरंत ही भला होगा और छोटे बच्चों की बेहतर आदतें शुरू होंगी। 
एक और मुद्दा जो हमको बहुत जरूरी लगता है और जिसके बारे में हम लगातार लिखते और छापते हैं, वह है हेलमेट का। दुपहिया दुर्घटनाओं में होने वाली अधिकतर मौतें ऐसी रहती हैं जो कि हेलमेट लगने से टल सकती हैं, या कम से कम बहुत गंभीर चोट से लोग बच सकते हैं, और बाकी पूरी जिंदगी अपाहिज की तरह रहने की बेबसी से भी। लोगों को अपने आसपास के लोगों के बारे में भी यह तय करना चाहिए कि वे बिना हेलमेट दुपहियों पर नहीं बैठेंगे। 
एक और बात जो जरूरी है और लोग जिसे अनदेखा करते हैं, वह है एक स्वस्थ जीवन शैली की। लोग घूमने नहीं जाते, कसरत नहीं करते, योग, ध्यान या प्राणायाम नहीं करते। ये तमाम बातें लोगों को मुफ्त में मिली हुई हैं, और जिसे यह लगता है कि उनके जीवन में इनके लिए समय नहीं है, उन्हीं के जीवन में इन बातों की जरूरत उतनी अधिक है। हम तो सिर्फ इतना ही याद दिला सकते हैं कि कसरत और योग जैसे बचाव के काम में लोग जितना समय लगाएंगे, उससे कई गुना अधिक समय उनकी जिंदगी में बढ़ जाता है, और जिंदगी कम तकलीफदेह भी हो जाती है, और अधिक उत्पादक भी हो जाती है। इस बारे में हर किसी को जरूरत सोचना चाहिए, और यह भी याद रखना चाहिए कि दुनिया के अधिकतर सफल लोग अपने तन और मन के लिए बचाव के ऐसे काम करते हैं, और नुकसान उनसे दूर रहता है। ऐसा करके लोग बुढ़ापे में महंगे इलाज की जरूरत से भी बच सकते हैं। इनमें से किसी भी बात के लिए कुछ खर्च करने की जरूरत नहीं रहती। 
इसके बाद की अच्छी बातों के लिए हम लोगों को उनकी कल्पना के साथ छोड़ देते हैं, क्योंकि जब भी वे आसपास के समझदार लोगों के साथ बैठकर नए साल के संकल्पों के बारे में बात करेंगे, लोग भी उनको सलाह दे सकेेंगे।

सेहत कुछ कम-ज्यादा हो तो भी वोट डालने निकलें

28 दिसंबर 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ में कल इस वक्त मतदान जोरों पर होगा। यह राज्य एक बरस के भीतर विधानसभा, लोकसभा, म्युनिसिपल, और पंचायतों के चुनाव देख लेता है। इसके बाद के चार बरस चुनावों से मुक्त रहते हैं, और सरकार के लिए काम करने का खासा मौका रहता है। लेकिन आज जो चुनाव चल रहे हैं, उनसे लोग अपने-अपने वार्ड के पार्षद भी चुनेंगे, और अपने शहर-कस्बे के म्युनिसिपल के मुखिया भी। लोगों को वैसे तो हर चुनाव में बाहर निकलकर वोट डालने चाहिए, लेकिन स्थानीय संस्थाओं के चुनाव इतने अधिक महत्वपूर्ण होते हैं कि ब्रिटेन जैसे देश में जो लोग वहां के निवासी नहीं भी हैं, वे भी अगर छह महीने से अधिक से वहां रह रहे हैं, तो उनको भी म्युनिसिपल चुनाव में वोट डालने का हक रहता है। वहां का लोकतंत्र यह मानता है कि स्थानीय चुनावों में वोट डालने का हक सिर्फ नागरिकों का नहीं रहता, बल्कि वहां बसे हुए, रह रहे तमाम लोगों की रोज की जिंदगी स्थानीय संस्थाओं से जुड़ी रहती है, और इसलिए सब लोगों को वोट डालने का हक रहना चाहिए। अब ऐसी सोच के सामने भारत में लोग अगर घर बैठे रहें, और पार्षद या महापौर-अध्यक्ष चुनने बाहर न निकलें, तो यह एक बड़ी गैरजिम्मेदारी की बात होगी। जो लोग अभी वोट डालने नहीं निकलेंगे, वे लोग घूरों पर ही रहने के हकदार रहेंगे। जिनको एक साफ-सुथरी जिंदगी चाहिए, उनको साफ-सुथरे उम्मीदवारों को चुनने के लिए बाहर निकलना चाहिए। 
शहरों में म्युनिसिपल, और गांवों में पंचायत, ये ही संस्थाएं लोकतंत्र को मजबूत करने का काम कर सकती हैं। अंगे्रजों के समय भी देश में आजादी के पहले से स्थानीय संस्थाओं के चुनाव होते थे, और देश के कई बड़े-बड़े नेता स्थानीय चुनावों से उभरकर विधाानसभाओं तक पहुंचे, और फिर संसद तक गए। इसलिए ये चुनाव विधानसभा या लोकसभा चुनावों के मुकाबले अधिक ईमानदार, अधिक महत्वपूर्ण, और अधिक मुश्किल भी होते हैं। फिर इसके बाद यह साफ होने लगता है कि आने वाले वक्त में उस इलाके से किस तरह का नेतृत्व विकसित होकर सामने आएगा।
हम इस मुद्दे पर पिछले कुछ हफ्तों में एक-दो बार और भी लिख चुके हैं, लेकिन कल चूंकि मतदान शुरू हो रहा है, इसलिए इस बारे में और लिखना जरूरी लग रहा है। चुनाव के नतीजे बतलाएंगे कि जितने लोग वोट डालने नहीं निकलते हैं, उससे कम वोटों से जीत या हार हो जाती है। ऐसा होने पर राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को यह आसान पड़ता है कि वे आमतौर पर वोट डालने वाले लोगों की गिनती का अंदाज लगाकर जीत के लिए कोशिश करें। लेकिन अगर हर कोई वोट  डालने निकल जाए, तो पार्टियों और प्रत्याशियों का सारा गणित गड़बड़ा जाएगा। इसलिए लोकतंत्र की सेहत के यह जरूरी है कि कल जिनकी सेहत ठीक है वे तो वोट डालने निकले ही, जिनकी सेहत कुछ कम-ज्यादा भी है, वे भी वोट डालने निकलें। अच्छे उम्मीदवार को चुनें, जिस पर ईमानदारी का भरोसा हो, उसे चुनें, और इस तरह अपने लिए एक बेहतर कल चुनें। ऐसा न करने वाले अपने आसपास के घूरों को लेकर, वार्ड और शहर की घूरों जैसी जिंदगी को लेकर बाद में कोई शिकायत न करें।

पुराण कथाओं को लेकर खोज-आविष्कार के दावे

27 दिसंबर 2014
संपादकीय
अगले हफ्ते मुंबई में भारतीय विज्ञान कांग्रेस का पांच दिनों का एक कार्यक्रम होने जा रहा है, और इसमें वैदिक काल में भारत में विमानों के बारे में एक सत्र रखा गया है। पिछले कुछ महीनों से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद से लगातार भारतीय पौराणिक काल की कहानियों को इतिहास का दर्जा देने की होड़ लगी हुई है, और आज की विकसित दुनिया की बहुत सी वैज्ञानिक खोजों को, आविष्कारों को, भारतीय वैदिक काल की भारतीय उपलब्धि होने का दावा किया जा रहा है। इसमें कारों का आविष्कार भारत में होने से प्लास्टिक सर्जरी, कृत्रिम गर्भाधान जैसी बहुत सी वैज्ञानिक तकनीकों को भारत में खोजा हुआ बताया जा रहा है। यह दावा किया जा रहा है कि बीच की सदियों में विदेशी हमलावरों के राज की वजह से भारतीय इतिहास खो गया और उसकी गौरवशाली उपलब्धियां दबा दी गईं। अब पुराण कथाओं को लेकर उसी तरह वैज्ञानिक उपलब्धियों का दावा किया जा रहा है जिस तरह कि आज कोई  विज्ञान कथा को लेकर अपने देश को कई तरह की खोजों की वाहवाही दे दे। 
मुंबई में होने वाली भारतीय साईंस कांग्रेस के एक वक्ता कैप्टन आनंद जे. बोडस भी हैं, और उन्होंने अभी मुंबई में कहा कि विमानों की खोज भारत में वैदिक काल में कर ली गई थी और ये विमान एक देश से दूसरे देश ही नहीं, एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर भी जाते थे। उन्होंने कहा कि उस समय के विमान आकार में बहुत बड़े होते थे और आज तो विमान सिर्फ आगे उड़ान भरते हैं, उस समय के भारतीय विमान दाएं-बाएं भी उड़ सकते थे, और पीछे भी उड़ान भर सकते थे। आज इस तरह के कई लोग केन्द्र सरकार के शोध संस्थानों पर बिठाए गए हैं, जो कि इतिहास लेखन की किसी भी वैज्ञानिक पद्धति को खारिज करते हुए पौराणिक कहानियों को ही इतिहास करार देने पर उतारू हैं। 
खैर, हिन्दुस्तान का इतिहास महज हिन्दुस्तान में ही दर्ज नहीं है, यह दुनिया के कई देशों के लोगों ने लिखा है, और हिन्दुस्तान के ही जाने-माने इतिहासकार काम कर चुके हैं। इसलिए दर्ज हो चुके इतिहास को आज सरकारी कुर्सियों पर बैठकर भी खारिज नहीं किया जा सकता, और न ही अवैज्ञानिक बातों को सरकारी स्कूलों में किताबों में डालकर दुनिया का इतिहास बदला जा सकता है। इससे देश का नुकसान होने के अलावा और कुछ नहीं होने जा रहा। ऐसा कोई भी देश या समाज, जो कि एक काल्पनिक अतीत पर गौरव करते हुए अपने आपको दूसरों से बेहतर समझता है, उसके आगे बढऩे की संभावनाएं बुरी तरह बर्बाद होती हैं। ऐसे देश या समाज के मन में अपनी पौराणिक कथाओं को लेकर जो एक झूठी आत्मसंतुष्टि घर कर जाती है, वह लोगों को बाकी दुनिया के मुकाबले आज काम करने, खोज और आविष्कार करने, और आगे बढऩे से रोक देती है। काल्पनिक कहानियां हमेशा ही बहुत सुखद होती हैं, क्योंकि उनको किसी वैज्ञानिक कसौटी पर खरा उतरकर कुछ साबित करने की जरूरत नहीं होती। लेकिन देश की वैज्ञानिक सोच को अगर स्कूलों के स्तर से इस आधार पर बर्बाद करना है कि विदेशी शासकों ने कुछ सदियों तक भारत का वैदिक काल का इतिहास दबा दिया था, तो उससे आज भारी नुकसान छोड़, कोई नफा नहीं होने वाला है। एक झूठी शान में जीना आज के लिए तो मजे की बात होती है, लेकिन उसके पीछे न तो बीते इतिहास में की गई कोई मेहनत होती, और न ही आने वाले भविष्य में उससे कोई फायदा होता। 
देश में एक अलग तरह की भावनात्मक, सांस्कृतिक धर्मान्धता बढ़ाने से किसी चुनाव में वोटों का थोड़ा-बहुत फायदा शायद होता होगा, लेकिन देश का उससे बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है। आज जब जनता के बीच, स्कूली बच्चों के बीच, वैज्ञानिक सोच खत्म की जा रही है, तो फिर उनके बीच लोकतांत्रिक न्यायप्रिय सोच भी खत्म होती है, और कट्टरता बढ़ती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश के लोगों को एक तरफ तो आर्थिक विकास की ओर ले जाना चाहते हैं, दुनिया के मुकाबले खड़ा करना चाहते हैं, और दूसरी तरफ वे एक काल्पनिक इतिहास के नर्म गद्दे पर मौजूदा पीढ़ी को सुलाकर जिंदगी की कड़ी जमीन पर मुकाबले से दूर भी करने का माहौल खड़ा कर रहे हैं। एकाएक भारत का ऐसा सांस्कृतिक फेरबदल कई पीढिय़ों की सोच का बड़ा नुकसान कर रहा है, और जो इतिहास कभी रहा नहीं, उसके झंडे बनाकर नारों के साथ आज कोई देश या समाज किसी कामयाबी तक नहीं पहुंच सकते।

Bat ke bat, बात की बात,

26 dec 2014

बिना विरासत अपने ही बूते पर पीएम से सीएम तक बनने वाले

26 दिसंबर 2014
संपादकीय
झारखंड के अगले मुख्यमंत्री बनने जा रहे रघुबर दास के बारे में छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गांव से खबर मिली है कि वे बचपन में वहां रहे हुए हैं, और अपने मजदूर मां-बाप के साथ वे यहां से झारखंड गए थे क्योंकि उनके मां-बाप के लिए यहां काम नहीं था। देश के सबसे अधिक खनिज-संपन्न राज्यों में से एक झारखंड में डेढ़ दशक की राजनीतिक अस्थिरता के बाद अब भाजपा का जो मुख्यमंत्री बनने जा रहा है, वह ऐसे बचपन से ऊपर उठकर यहां तक पहुंचा है, यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक गौरव की बात है। लोगों के कामकाज तो इतिहास में दर्ज होते हैं, लेकिन इस लोकतंत्र में लोगों की संभावना देखने लायक है। बचपन में चाय बेचने वाला इस देश का प्रधानमंत्री है, और यह कोई आज की ही बात नहीं है, तमिलनाडू के एक वक्त मुख्यमंत्री रहे, और कांग्रेस की केन्द्रीय राजनीति में सबसे बड़े नेताओं में से एक कामराज नाडर को 11 बरस की उम्र में स्कूल छोड़ देनी पड़ी थी, क्योंकि पिता गुजर गए थे, और मां की जिम्मेदारी थी। उन्होंने कपड़े की दुकान में काम करते हुए जिंदगी आगे बढ़ाई। लेकिन देश भर में राजनीति का यह हाल आम नहीं है। आम तो भारतीय राजनीति में कुछ कुनबों का दबदबा है। हम कई बार देश भर में कई प्रदेशों में, और केन्द्रीय राजनीति में भी बुरी तरह और पूरी तरह से हावी कुछ परिवारों का जिक्र कर चुके हैं, जो कि लोकतांत्रिक राजनीति को एक गृह उद्योग की तरह चलाते हैं। ऐसे में जब पहली पीढ़ी के राजनेता उभरकर सामने आते हैं, और ऊंचाई तक पहुंचते हैं, तो अमरीका के बराक ओबामा की भी याद आती है जो कि एक प्रवासी परिवार में पैदा, अफ्रीकी मूल के, अमरीका में वंचित तबके के, नस्लभेद के शिकार रहते हुए भी राष्ट्रपति बने। 
मोदी से लेकर रघुबर दास तक की मिसालें बहुत से लोगों के लिए एक उम्मीद लेकर आती हैं कि अपने कुनबे की ताकत के बिना भी लोग लगातार मेहनत करके ऊपर तक पहुंच सकते हैं। न राजनीतिक विरासत, न सांसदों या विधायकों को खरीदने की जरूरत, अकेले अपने दम पर भी लोग बड़ी कमजोर जिंदगी से लोकतंत्र के सबसे ऊंचे ओहदों तक पहुंच सकते हैं। और राजनीति से परे भी हर बरस केन्द्र सरकार की सबसे बड़ी नौकरियों के लिए होने वाली यूपीएससी परीक्षाओं के बाद कहानियां सामने आती हैं कि किस तरह एक ऑटो रिक्शा वाले की बेटी आईएएस अफसर बन गई, या रोजी पर मजदूरी करने वाले मां-बाप के बच्चे आईपीएस बन गए। यह बात सही है कि भारतीय लोकतंत्र में गैरबराबरी बहुत अधिक है, और ऐसी मिसालें अधिक नहीं हैं, लेकिन मिसालें तो गिनती की ही होती हैं, और उनसे निकलने वाला हौसला दूर तक रौशनी बिखेरता है। 
भारत में कई खेलों में भी ऐसे खिलाड़ी बहुत ऊपर तक पहुंचे जहां उनका मुकाबला बड़े ताकतवर और संपन्न परिवारों के बच्चों से हुआ। उसके बावजूद नंगे पैर दौडऩे वाले बच्चे भी आसमान तक पहुंचे। आज जब देश में चारों तरफ चोरी और बेईमानी के चलते आने वाले दिन लोगों को अंधेरे में लगते हैं, तब ऐसी मिसालें भी आगे बढ़ानी चाहिए, ताकि लोग सिर्फ गैरबराबरी का बहाना लेकर मेहनत छोड़ न दें।

Bat ke bat, बात की बात

25 dec 2014

Bat ke bat, बात की बात

21 dec 2014


सुशासन का नारा तो ठीक है, पर जमीनी जरूरत है कि...

25 दिसंबर 2014
संपादकीय
आज जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश में अटल-जन्मदिवस पर राष्ट्रीय सुशासन दिवस शुरू कर रहे हैं, तब असम की खबर यह है कि वहां के मुख्य सचिव हाथी पर चढ़कर जंगल के जीवन को देखते हुए परिवार सहित छुट्टियां मना रहे हैं, सैर कर रहे हैं। यह खबर बताती है कि किस तरह इस देश में सुशासन की जरूरत है। और यह हाल सिर्फ असम में इस एक अफसर का हो, या किसी दूसरे राज्य में किसी एक मंत्री का हो, ऐसा नहीं है। देश भर में जगह-जगह से भयानक खबरें आती हैं कि किस तरह जब लोग मरते रहते हैं, नेता और अफसर अपने में मस्त रहते हैं। शासन में ये दोनों तबके हिस्सेदार होते हैं, और आज के इस दिन पर अगर नारे से अधिक कुछ करना है, तो प्रधानमंत्री को, और राज्यों के मुख्यमंत्रियों को यह सोचना होगा कि किस तरह सरकारों को संवेदनशील बनाया जा सकता है। 
कुछ बरस पहले की बात हमको याद आती है जब कर्नाटक में भयानक बाढ़ आई थी और लोगों का बहुत बुरा हाल था, तब भाजपा के उस वक्त के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के खिलाफ पार्टी के विधायकों में बगावत को बढ़ावा दिया जा रहा था, और बेल्लारी के कुख्यात लोहा चोर मंत्री-भाई विधायकों को खरीदकर दूसरे प्रदेशों के पांच और सात सितारा होटलों में अय्याशी करवा रहे थे। ऐसा हाल अलग-अलग प्रदेशों के विधायकों का, देश के सांसदों का, मंत्रियों और अफसरों का बहुत बार सामने आता है। अभी कुछ हफ्ते पहले ही कश्मीर की एक खबर आई थी कि किस तरह वहां के एक बड़े पुलिस अफसर के बेटे ने अपने बाप की एक तस्वीर के साथ फेसबुक पर यह पोस्ट किया था कि उसने पिछले बीस बरस से किस तरह कभी अपने जूतों के तस्में नहीं बांधे। अर्दली से जूते बंधवाने का शौक छत्तीसगढ़ में राज्यपाल रहे के.एम. सेठ को भी था, और उनके पहले से लेकर उनके बाद तक अनगिनत ऐसे नेता और अफसर रहे लोग हैं जिनके बंगलों पर सरकारी कर्मचारियों को बंधुआ मजदूरों की तरह इस्तेमाल किया जाता है। 
हम इन तमाम बातों को परले दर्जे का कुशासन मानते हैं, और देश में अगर सुशासन की तरफ पहला कदम भी बढ़ाना है, तो ऐसी सामंती सोच को हर दफ्तर और घर में कुचलना होगा। हम भ्रष्टाचार से परे भी इन ना दिखती बातों की चर्चा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि भ्रष्टाचार तो लोगों को शायद कभी कटघरे तक ले जाए, लेकिन ऐसी राजशाही तबियत और ऐसा सामंती मिजाज कानून के कटघरे में खड़ा करना मुश्किल होता है। सरकार के किसी भी तबके को देखें तो उसमें यह बात बहुत आम दिखती है कि वह अपने से नीचे के तबकों का इस्तेमाल अपनी निजी जरूरतों और अपनी निजी सनक के लिए, अपने दिखावे के लिए, और एक झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए खुलकर करता है। ऐसे में लोगों को यह सोचना चाहिए कि जनता के पैसों पर चलने वाली सरकारों में जो घोषित और अघोषित सहूलियतें और अय्याशी हैं, वे गरीब जनता के खून-पसीनों पर चलती हैं। इनको कैसे खत्म किया जा सकता है, इसके बारे में देश में कोई चर्चा भी इसलिए नहीं हो पाती क्योंकि सरकार से लेकर संसद तक, और अदालतों से लेकर बाकी संवैधानिक संस्थाओं तक पर काबिज लोग ही ऐसी अय्याशी उठाते हैं, और वे भला क्यों अपने सामंती राज को खत्म करना चाहेंगे? 
देश में नेताओं और अफसरों के लिए जनता के मन में सम्मान इसलिए कम है क्योंकि उनकी फिजूलखर्ची लोग देखते हैं, और कांग्रेस राज से लेकर उस भाजपा राज तक देखते हैं जो कि अपने आपको आरएसएस की सादगी वाली संस्कृति की पार्टी कहती है। आज भाजपा राज को देखकर भी यह अंदाज लगाना मुश्किल है कि इस सत्तारूढ़ पार्टी की सोच के पीछे किसी तरह की कोई सादगी है। सुशासन का पहला सबक किफायत और सादगी से शुरू होना चाहिए, और इसके लिए केन्द्र और राज्य सरकारों को अपने-अपने स्तर पर नए-नए तरीके सोचने चाहिए, और जनता भी सूचना के अधिकार के तहत जानकारी लेकर सत्ता को किफायत के लिए मजबूर कर सकती है। 

भारत रत्न से जुड़े मुद्दे

24 दिसंबर 2014
संपादकीय
जैसी कि पहले से घोषणा की जा चुकी थी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने नए चुनाव क्षेत्र बनारस के सबसे बड़े नेता पं. मदन मोहन मालवीय और भाजपा के सबसे बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न देने का फैसला लिया है। मालवीयजी पूरी जिंदगी कांग्रेस के सबसे बड़े नेताओं में से रहे, उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना भी की, और वे गांधी के समकालीन होने के साथ-साथ कुछ बार कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे। उनकी मौत के आधी-पौन सदी बाद उनको यह राष्ट्रीय सम्मान भाजपा के प्रधानमंत्री की ओर से दिया गया, और कांग्रेस पार्टी ने अपनी सरकारों के चलते यह फैसला नहीं लिया था। लेकिन खैर आज कांग्रेस सरकार के पिछले फैसलों के बारे में, लिए गए फैसलों के बारे में भी और न लिए गए फैसलों के बारे में भी, अधिक सोच-विचार की कोई जरूरत नहीं बची है। 
अब अगले साढ़े चार बरस भाजपा के पास पांच-दस और लोगों को भारत रत्न देने की संभावना बची हुई है, और देश का यह सबसे बड़ा सम्मान चुनावी राजनीति से लेकर धर्म और जाति तक, प्रदेशों के संतुलन तक, और सत्तारूढ़ पार्टी की रीति-नीति से प्रभावित रहता है। वैसे तो हर बरस केन्द्र सरकार द्वारा दिए जाने वाले पद्म सम्मानों को लेकर भी ये ही तमाम बातें सामने आती हैं, और हमारा तो हमेशा से यह कहना रहा है कि सरकारों को ऐसे सम्मान नहीं देने चाहिए। लोग अपने कामकाज से समाज के भीतर पर्याप्त सम्मान पाते हैं, और अक्सर सम्मानों की लंबी फेहरिस्त में कई नामों पर लोगों को हैरानी होती है, और उनके मुकाबले अधिक महत्वपूर्ण कई नामों को लिस्ट में न पाकर भी लोगों को सदमा लगता है। जब तक सरकारों के पास कोई ऐसे पैमाने न हों, कि जिनके आधार पर सरकार से परे का कोई निर्णायक मंडल पुरस्कार या सम्मान के ऐसे नाम तय कर सके, तब तक सरकार को ऐसे काम से बचना चाहिए। हम तो पत्रकारिता के भी ऐसे तमाम पुरस्कारों और सम्मानों के खिलाफ हैं, जो कि बिना किसी सार्वजनिक रूप से घोषित पैमानों के, बिना निर्णायक मंडल के, और बिना सबको खुला मौका दिए हुए तय हो जाते हैं, और दे दिए जाते हैं। 
दुनिया के सामने नोबल पुरस्कार तय करने के लिए जिस तरह की एक कमेटी रहती है, जिस तरह से नामांकन होते हैं, जिस तरह से नामों पर विचार होता है, उस तरह की एक प्रक्रिया सम्मान और पुरस्कार के लिए होनी चाहिए। हालांकि नोबल के इतिहास पर भी यह एक धब्बा लगा हुआ है कि उसके पैमानों पर गांधी को किसी बरस इस सम्मान के लायक नहीं पाया गया, लेकिन खुद नोबल कमेटी ने अपनी इस ऐतिहासिक गलती को कुबूल किया है। भारत में जब सरकार ऐसे सम्मान-पुरस्कार हर बरस तय करती है, तो उसे खुद अपनी राजनीतिक पसंद-नापसंद को परे रखना चाहिए। हमारे पाठकों को याद होगा कि कुछ बरस पहले जब यूपीए सरकार की पद्मभूषण या पद्मविभूषण की लिस्ट में उसके खुद के मंत्री प्रणब मुखर्जी का नाम था, तब भी हमने उसका विरोध किया था। आज देश भर में बहुत से तबकों में, बहुत से प्रदेशों में यह उम्मीद जागेगी कि उनके भी किसी महान व्यक्ति को भारत रत्न दिया जाए। अब देखना यह होगा कि अपने बाकी कार्यकाल में मोदी सरकार किस तरह के नामों को तय करती है। 

झारखंड और जम्मू-कश्मीर के चुनावी नतीजों के मायने

23 दिसंबर 2014
संपादकीय
आज सुबह से हिंदुस्तान झारखंड और जम्मू-कश्मीर के चुनावी नतीजे देख रहा है। इन दोनों ही जगहों पर कांगे्रस या उसकी भागीदार पार्टियों के जीतने के आसार छोड़कर बाकी कुछ भी होने की उम्मीद थी, और वैसा ही हो भी रहा है। झारखंड में भाजपा के जिस तरह के बहुमत की भविष्यवाणी की जा रही थी, वह उससे कुछ पीछे जरूर है, लेकिन वह सत्ता के करीब है, और ऐसे आसार दिख रहे हैं कि वहां वह अपनी खुद की, या किसी गठबंधन से एक स्थाई सरकार बना पाएगी। यह बात इस नए राज्य के लिए इसलिए भी मायने रखेगी कि इसने चौदह बरसों की अपनी जिंदगी में नौ मुख्यमंत्री, और दो बार का राष्ट्रपति शासन सब देख लिया है। अल्पमत की सरकार देखी है, और मुख्यमंत्री को जेल में देख लिया है। ऐसे में मतदाताओं के फैसले से अगर एक मजबूत सरकार वहां बनती है, तो यह बात कम महत्वपूर्ण है कि वह किस पार्टी या गठबंधन की बनती है। दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर में भी नौबत यही है कि वहां किस पार्टी की सरकार बनती है, या कौन सा गठबंधन सत्ता पर आता है, उसके बजाय महत्वपूर्ण यह है कि वहां एक मजबूत सरकार बने, जो अच्छी तरह काम करे। 
आज दोपहर इस संपादकीय को लिखे जाते कश्मीर में जो नौबत दिख रही है, वह कुनबापरस्ती पर टिकी पार्टियों की वापिसी की है। भाजपा को छोड़ दें, तो कश्मीर में पीडीपी, नेशनल कांफे्रंस, और कांगे्रस, ये तीनों पार्टियां एक कुनबे वाली पार्टियां हैं, और वहां की अगली सरकार में इनमें से कोई न कोई शामिल रहना तय है। इसलिए जम्मू-कश्मीर की राजनीति से कुनबापरस्ती इस चुनाव में भी खत्म नहीं हुई है, और दमखम के साथ डटी हुई है। लेकिन जम्मू-कश्मीर में सबसे बड़ी बात भाजपा की बहुत दमदार जीत है, जो बहुमत से दूर है, लेकिन पहली बार इस विधानसभा में वह इतनी ताकत के साथ पहुंच रही है। दूसरी तरफ झारखंड में भी झारखंड मुक्तिमोर्चा एक कुनबे वाली पार्टी के रूप में चुनाव लड़ रही थीं, और जेल काट रहे भूतपूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने भी अपनी पत्नी के साथ मिलकर एक पार्टी बना ली थी। कश्मीर में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला दो सीटों से लड़े थे, दोनों पर हार गए, वहां पर घाटी में भाजपा का चेहरा कही जाने वाली बड़बोली नेता हीना भट के वोटों की गिनती हजार तक भी नहीं पहुंच पाई, और वे तीसरे नंबर पर रहीं। झारखंड में भ्रष्टाचार के मामले में जेल काट रहे भूतपूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा चुनाव हार गए, और भूतपूर्व मुख्यमंत्री, और संभावित भावी मुख्यमंत्री समझे जा रहे अर्जुन मुंडा सहित कुछ बड़े नामों के हार के आसार दिख रहे हैं। 
कांगे्रस और भाजपा के बीच यह जुबानी जंग चल रही है कि पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले भाजपा को इस बार कितने विधानसभा क्षेत्रों में लीड मिली है, और उसके वोट कम या ज्यादा क्या हुए हैं? लेकिन विवादों से परे जो बात है वह यह है कि इन दोनों जगहों पर भाजपा बड़ी पार्टी की तरह उभरी है, झारखंड में वह सत्ता तक पहुंच गई है, और कश्मीर में भी वह या तो किंगमेकर रहेगी, या विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी रहेगी। देश के अकेले मुस्लिम बहुसंख्यक राज्य में भाजपा की ऐसी घुसपैठ मामूली नहीं समझी जानी चाहिए, और कम से कम देश भर में भाजपा के मुकाबले पार्टी के रूप में जो सबसे अधिक राज्यों में मौजूदगी वाली पार्टी है, उस कांगे्रस के लिए तसल्ली की कहीं कोई बात नहीं है। ये वोट भाजपा के बढ़ते हुए दबदबे और कब्जे की एक निरंतरता है, और चाहे उसकी सरकार कश्मीर में न बन सके, कश्मीर विधानसभा में उसकी मौजूदगी दमदार रहेगी, और हो सकता है कि कल तक वह वहां की सत्ता में भागीदार भी हो।
इन दो राज्यों के चुनावी नतीजे देश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की राजनीति और रणनीति की निरंतरता वाले हैं, और इनके खिलाफ जिन लोगों को राजनीति में कोई महत्वाकांक्षा है, उनको अगले दो-तीन दिन टीवी पर मनचाहे बयान देने के बाद, घर बैठकर आत्मचिंतन करना चाहिए, उसके बिना उनका कोई भविष्य खुद होकर आकर दरवाजा नहीं खटखटाएगा।

लोग बेहतर को वोट दें, सबसे अच्छे को वोट दें

22 दिसंबर 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ में शहरी म्युनिसिपलों के चुनाव अब मतदान के करीब पहुंच रहे हैं। उम्मीदवार साफ हैं, दोनों बड़ी पार्टियों के चुनावी घोषणा पत्र आ चुके हैं, गुटबाजी और भीतरघात के आसार भी साफ हैं। वार्ड छोटे-छोटे होने से तीसरे और चौथे नंबर के उम्मीदवार भी मैदान में हैं, जिनमें से कुछ बागी हैं और कुछ नए भी हैं। पार्टियों के उम्मीदवारों में कुछ पुराने परखे हुए हैं, और कुछ नए हैं। कई जगहों पर नेताओं ने अपनी पत्नियों को टिकट दिला दिए हैं, और वे एक किस्म से परदे के पीछे से कठपुतली के धागे थामकर काम चलाने की उम्मीद में हैं। चूंकि इसके बाद करीब पांच बरस तक शहरी मतदाता को वोट डालने नहीं मिलेंगे, इसलिए उसका यह वोट उसकी पसंद के मामले में रात की आखिरी गाड़ी जैसा है, जिसे समय पर पकड़ा नहीं गया, तो अगली गाड़ी पांच बरस बाद मिलेगी। 
प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी कांग्रेस के तेवर, और उनका कामकाज जनता के सामने है। लेकिन स्थानीय संस्थाओं के कामकाज को लेकर हमारा यह मानना है कि पार्टियों से परे बेहतर उम्मीदवार पर भी नजर डालनी चाहिए, क्योंकि किसी एक वार्ड के काम में किसी राजनीतिक दल की रीति-नीति से परे, उसके वार्ड स्तर के नेता के चाल-चलन, उसकी सक्रियता, जनहित की उसकी सोच अधिक मायने रखती है। हालांकि इस चुनाव के पोस्टर देखें तो छत्तीसगढ़ में भाजपा म्युनिसिपल के चुनाव भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के चेहरों को दिखाकर लड़ रही है, ऐसा इसलिए भी है कि उसके स्थानीय उम्मीदवारों की साख अपने वार्ड में भी, अपने शहर और कस्बे में भी मोदी-रमन किस्म की नहीं है। दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी हमेशा की तरह अपने आपसे लड़ रही है, और पिछले चुनावों के नतीजे इस बात के गवाह हैं कि कांग्रेस कई चुनावों में जीत चुकी होती अगर पार्टी अपने ही भीतर के अजीत जोगी से जीत जाती। इस बार भी आसार बहुत अलग नहीं दिख रहे हैं।
लेकिन हम जीत-हार को लेकर यहां कोई विश्लेषण करना नहीं चाहते, जनता अपना फैसला जब करेगी, तो वह नतीजों में सामने आ जाएगा। आज हम चर्चा इस पर करना चाहते हैं कि लोगों को पार्टियों से परे भी अपने शहर-कस्बों और वार्डों में यह देखना चाहिए कि सबसे अच्छे उम्मीदवार कौन हैं। यह बात कम मायने रखती है कि वे किस पार्टी के हैं। अगर उनकी पार्टी अच्छी नहीं है, तो वे जीतकर जाकर गलत बातों के लिए एक गिरोहबंदी में भागीदार होने को मजबूर होंगे। और उनकी पार्टी अच्छी है, लेकिन वे खुद अच्छे नहीं हैं, तो पांच बरस तक ऐसे नेता को झेलना भारी पड़ेगा। ऐसे में जनता को चाहिए कि वह सबसे अच्छे उम्मीदवार को चुने, और फिर ऐसा करने से चाहे किसी एक म्युनिसिपल में चाहे किसी एक दल का बहुमत न बने। हम स्थानीय संस्थाओं में ऐसे बहुमत का नुकसान भी देख चुके हैं जो कि मनमानी करने का एक मौका देता है। लोगों को बहुमत की परवाह किए बिना सबसे अच्छे उम्मीदवारों को जिताना चाहिए, ताकि वे म्युनिसिपल में बैठकर बेहतर काम कर सकें। यह कहीं जरूरी नहीं है कि किसी एक पार्टी के ही पार्षद हों, और उसी के मेयर या अध्यक्ष हों। ये लोग अलग-अलग पार्टियों के भी हो सकते हैं, और वैसी स्थिति एक बेहतर शक्ति संतुलन के काम की भी हो सकती है। हमने देश की संसद में भी राजीव गांधी के वक्त एक ऐतिहासिक बाहुबल का नतीजा देखा था जब एक बूढ़ी शाहबानो को कुचल दिया गया था। और आज देश की संसद में एक दूसरे ऐतिहासिक बाहुबल का नतीजा देश देख रहा है कि किस तरह धर्मांतरण पर सरकार चुप है। इसलिए ऐतिहासिक बहुमत कई बार, या अक्सर, कई तरह के नुकसान लेकर भी आता है। 
वार्डों के चुनाव से छोटे और कोई चुनाव नहीं होते, और अगर इस चुनाव में भी लोग ईमानदार, जनता के हमदर्द, और मेहनती उम्मीदवारों को नहीं चुनेंगे, तो वे अपने वार्ड और अपने शहर-कस्बे की संभावनाओं को खत्म ही करेंगे। हमारी सिफारिश किसी पार्टी या उम्मीदवार के लिए नहीं है, लेकिन लोग बेहतर को वोट दें, सबसे अच्छे को वोट दें।

देश भर की कतरा-कतरा खबरों से बन रही एक भयानक तस्वीर

21 दिसंबर 2014
संपादकीय
देश भर में चारों तरफ जिस तरह की हिंसा की खबरें आ रही हैं, महिलाओं से, और छोटी बच्चियों से जिस तरह बलात्कार हो रहा है, जिस तरह सत्ता की ताकत में मदमस्त नेता अपनी पार्टी के राज में सरकारी अफसरों को धमका रहे हैं, गालियां दे रहे हैं, पीट रहे हैं, जिस तरह प्रेम में निराश होकर लोग आत्महत्या कर रहे हैं, सामाजिक मंजूरी न मिलने पर प्रेमी जोड़े ट्रेन तले कट जा रहे हैं, पंचायतों से बलात्कार के हुक्म जारी हो रहे हैं, धर्मान्धता और धर्मांतरण के नारे उठ रहे हैं, देश में रहने वाले हर नागरिक को हिन्दू बनाने की घोषणा हो रही है, सरकार की कुर्सियों पर बैठे लोग भ्रष्टाचार करते पकड़ा रहे हैं, ऐसी हर किस्म की खबरों को पढऩे के बाद उनके बारे में सोचें, तो यही लगता है कि इस देश में लोकतंत्र बड़ी दूर तक नाकामयाब हो गया है, और इसके तीनों स्तंभ अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा पा रहे हैं। सरकारें पकड़ में आने के पहले तक के दर्जे के भ्रष्टाचार में डूबी हैं, चुनावों में जीत को खरीदकर लोग संसद और विधानसभा पहुंच रहे हैं, कई जगहों पर जीते हुए सांसदों और विधायकों को खरीदकर सरकारें बन या बच रही हैं, और ऐसे में अदालतों के हाथ-पैर बांधकर रखे गए हैं ताकि वे सत्ता के जुर्म का तेजी से निपटारा न कर सकें। इसके साथ-साथ यह भी है कि अदालतें अपने आपमें भ्रष्टाचार का हिस्सा हो गई हैं, और बहुत सी अदालतों पर अधिकतर लोगों का कोई भरोसा नहीं है। लोकतंत्र में चौथा स्तंभ कहा जाने वाला, या होने का दावा करने वाला मीडिया भी जनता के सर्वे में सबसे भ्रष्ट पेशों में गिना जाने लगा है, और एक बड़े संपादक विनोद मेहता ने हाल ही में अपनी किताब में लिखा है कि मीडिया से देश की जनता का आदर्श का मोह किस तरह भंग हो गया है। 
हमारा यह सोचना है कि लोकतंत्र में एक जुर्म दूसरे कई किस्म के जुर्मों को बढ़ावा देता है और ऐसे दो मामलों के बीच जरूरी नहीं है कि कोई रिश्ता दिखाई भी पड़े। जब छत्तीसगढ़ में किसी महिला को टोनही कहकर उसकी हत्या की जाती है, तो इससे उन मुजरिमों को भी बढ़ावा मिल सकता है जो कि किसी और महिला की दहेज प्रताडऩा करते हैं, या किसी और बच्ची के साथ बलात्कार करते हैं। जुर्म के लिए धड़क खुलना बड़ी बात होती है, और जब एक जुर्म बिना सजा रह जाता है, तो तमाम किस्म के दूसरे जुर्म के लिए लोगों का हौसला बढ़ता है। फिर जब देश में ऊंचे ओहदों पर बैठे हुए लोग मुजरिम साबित होते हैं, अदालत के रास्ते जेल पहुंचते हैं, या इन सबसे बचकर भी लोगों की नजरों में गिर जाते हैं, तो फिर लोगों के लिए कोई प्रेरणा नहीं बच जाती। लोगों को एक किस्म से यह नैतिक इजाजत मिल जाती है कि जब बड़े-बड़े लोग बड़े-बड़े गलत काम करते हैं, तो फिर छोटे-छोटे लोग छोटे-छोटे गलत काम क्यों नहीं कर सकते? 
और जब तरह-तरह के मुजरिम चुनाव जीतकर सत्ता में आ जाते हैं, और पुलिस के हाथ हथकडिय़ों के बजाय वे उन हाथों से सलामी पाने लगते हैं, तो फिर देश में नैतिकता के पैमाने और अच्छे चाल-चलन की प्रेरणा, इन दोनों का मटियामेट हो जाना तय रहता है, और भारत में वही हो रहा है। बड़े-बड़े ओहदे वाले लोग जब वीडियो कैमरों पर अफसरों को मां-बहन की गालियां देते कैद होते हैं, तो सार्वजनिक जीवन से शिष्टाचार और अच्छे चाल-चलन की संभावना घटने लगती हैं। भारत की आज की संस्कृति में सत्ता की मंजूरी से गहरे तक पैठ गई इन बातों का रातों-रात कोई इलाज भी नहीं हो सकता, लेकिन यह देश ऐसे माहौल में गड्ढे की तरफ बढ़ रहा है। कोई नासमझ लोग देश की आर्थिक तरक्की के आंकड़े गिनाकर यह साबित कर सकते हैं कि वह ऊपर जा रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि अगर कोई मामूली बेहतरी हुई भी है, तो वह देश की तरक्की की संभावनाओं के मुकाबले कहीं नहीं टिकती। यह देश बड़ी हिंसा की आदत वाला हो चुका है, और अब विचारों की हिंसा, सत्ता की बददिमागी की हिंसा, सरकारी ताकत की हिंसा, इन सबको लगातार बढ़ते देखना बहुत भयानक है। और इन तमाम बातों को जोड़कर एक खतरनाक तस्वीर सामने रखने की कोशिश भी नहीं हो रही है, क्योंकि ऐसी हिंसाओं के शिकार लोग महज अपने-अपने तबकों को बचाने की कोशिश करते हुए, बाकी के हक महत्वहीन मान लेते हैं। 

संसद सत्र संसद के बाहर की भड़काऊ साजिशों का शिकार

20 दिसंबर 2014
संपादकीय
भारतीय संसदीय लोकतंत्र सरकार बदलने के साथ-साथ कई तरह के विरोधाभास देखने लगता है। पूरे देश में एक जैसा टैक्स लगाकर सामानों के दाम एक करने के केंद्र सरकार के आज के प्रस्तावित विधेयक पर गैर एनडीए राज्य साथ नहीं दे रहे हैं। गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स को लेकर लंबे अरसे से कोशिश चल रही थी, अटल सरकार के समय इसकी शुरूआत हुई थी, और यूपीए के पूरे कार्यकाल में एनडीए के राज वाले प्रदेश लगातार इसका विरोध करते रहे, और छत्तीसगढ़ से भी ऐसा विरोध दिल्ली में लगातार दर्ज होते रहा। इस विरोध में मोदी का गुजरात बढ़-चढ़कर सबसे आगे था, और लोकतंत्र की विसंगति यह है कि आज उसी एनडीए के, मोदी के ही वित्त मंत्री अरूण जेटली इसे आजाद भारत का सबसे क्रांतिकारी टैक्स सुधार करार दे रहे हैं, लेकिन संसद में उसके पास होने का आसार नहीं है, और गैर एनडीए राज्य उसका साथ नहीं दे रहे। कल तक जो सत्ता थी, आज वह विपक्ष है, और कल का विपक्ष आज सत्ता में है, और इनके संसदीय टकराव के चलते इसका नुकसान देश झेल रहा है। 
दरअसल भारत जैसी संसदीय, और संघीय व्यवस्था एक अंधाधुंध टकराव के साथ जिंदा रहने लायक व्यवस्था नहीं है। इसमें सहमत से लेकर बहुमत तक की कोशिशें जरूरी होती हैं, और देश में गैर आर्थिक मुद्दों को लेकर भी, सामाजिक और साम्प्रदायिक मुद्दों पर सत्ता और विपक्ष के बीच, एनडीए और गैर एनडीए के बीच इतना बड़ा टकराव है कि संसदीय कामकाज पर सहमति के आसार नहीं बन पा रहे। और भाजपा के वित्त मंत्री की जुबान में आज अधिक दम इसलिए नहीं रह जाता कि कल तक उन्हीं की अगुवाई में एनडीए के मुख्यमंत्री, एनडीए के सांसद, यूपीए की जीएसटी की पहल का विरोध कर रहे थे।
आज चूंकि देश पर भाजपा का राज है, इसलिए संसद में सहमति और बहुमत की कोशिश की जिम्मेदारी भी उसी की है। आज इंटरनेट पर ऐसे कई वीडियो तैर रहे हैं जिनमें कल तक लोकसभा में विपक्ष की नेता रही सुषमा स्वराज सदन के बहिष्कार को लोकतंत्र का एक हिस्सा बताते दिख रही हैं। खराब परंपराएं शुरू करना आसान होता है, उनको खत्म करना नामुमकिन हो जाता है, क्योंकि वे मिसाल बनकर दूसरों के हाथ का हथियार भी बन जाती हैं। लेकिन हम यहां पर एक दूसरी बात भी कहना चाहते हैं, इस बार संसद में संसदीय काम न होने के पीछे, विपक्ष के हंगामे के पीछे जो वजहें हैं, उनके बारे में प्रधानमंत्री और एनडीए को सोचना चाहिए। एनडीए के मंत्रियों, सांसदों, नेताओं, और सहयोगी संगठनों ने देश के भीतर एक निहायत गैरजरूरी और नाजायज तनाव खड़ा किया है, और संसद के बाहर का यह तनाव संसद सत्र को खा गया। लोकतंत्र में संसद की इमारत के स्तंभ बाहर की आंधी के झोंकों को रोक नहीं सकते, और वहां का अंधड़ भीतर आकर काम चौपट कर जाता है। मोदी सरकार को यह अंदाज रहना चाहिए था कि जिस तरह का तनाव सोच-समझकर बाहर खड़ा किया गया, उसका शिकार सरकार के हिस्से का संसदीय कामकाज भी होगा। तो एक तरफ तो बहिष्कार की एनडीए की परंपरा आज उसके विरोधियों के हाथ का औजार या हथियार है, और दूसरी तरफ एक निहायत खतरनाक तनाव जो संसद सत्र के ठीक पहले देश भर में फैलाया गया, उसने सबसे अधिक नुकसान मुसलमानों या ईसाईयों का नहीं किया, उसने सबसे अधिक नुकसान नरेन्द्र मोदी का किया है, जो कि अपनी सरकार के विधेयकों को संसद में पास नहीं करवा पा रहे। चुनावी सभाओं के नारे अलग होते हैं, और सरकार चलाने की जिम्मेदारी अलग होती है, मोदी को अब भी आने वाले संसद-सत्रों के लिए अपनी टोली के तौर-तरीकों को बदलवाना होगा, वरना न सिर्फ संसद का समय इसी तरह खराब होते रहेगा, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था, देश की सद्भावना, और देश की साख भी खराब होते रहेगी। संसद के इस सत्र को संसद के बाहर की भड़काऊ बातों, और बाहर की साजिशों के शिकार के रूप में दर्ज किया जा चुका है।

हिन्दुस्तान में आज का वक्त मोदी के सोचने और करने की मांग कर रहा है

19 दिसंबर 2014
संपादकीय
राजस्थान के सत्तारूढ़ भाजपा विधायक ने जिले के चिकित्सा अधिकारी के साथ फोन पर अपने एक रिश्तेदार के तबादले को लेकर जिस तरह की गाली-गलौज की, जिस तरह की धमकियां दीं, उसके रिकॉर्डिंग इंटरनेट पर तैर जाने के बाद अब भाजपा शर्मिंदगी झेल रही है, और कहने के लिए इस विधायक ने भी अफसर से माफी मांगी है, लेकिन यह मामला एक सजा के लायक, और कैद के लायक जुर्म का मामला है, माफी का नहीं। और इस अफसर ने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया है, साथ ही पुलिस में रिपोर्ट भी कर दी है। राजस्थान का यह ताजा मामला देश में कई जगहों पर भाजपा के मंत्रियों, सांसदों-विधायकों, पदाधिकारियों, और संघ परिवार का हिस्सा कहे जाने वाले संगठनों के हमलावर तेवरों की एक ताजा कड़ी ही है। आज सुबह का टीवी शुरू करते ही एक हिन्दू संगठन का नेता कैमरे पर चीख-चीखकर गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की स्तुति कर रहा था, और गांधी को गालियां दे रहा था। दूसरी तरफ दिल्ली में ऐसे ही कुछ घोर साम्प्रदायिक हिन्दू संगठन लगातार यह कोशिश कर रहे हैं कि गोडसे को एक महान देशभक्त के रूप में स्थापित करके सार्वजनिक जगहों पर उसकी प्रतिमाएं लगाई जाएं। 
लोगों को याद होगा कि नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद सबसे पहले लालकिले के अपने भाषण में शौचालयों की जरूरत और सफाई अभियान के नारे लगाते हुए गांधी का जिक्र किया था, कि गांधी के सपनों को पूरा करने के लिए वे यह बीड़ा उठा रहे हैं। आजादी के सालगिरह के भाषण में इन बहुत आम लगते मुद्दों को उठाने के लिए नरेन्द्र मोदी ने अमरीका से ऑस्ट्रेलिया तक, और हिन्दुस्तान के कोने-कोने में मंच और माईक से अपनी ही तारीफ की, और बार-बार गांधी का नाम लिया। अब आज अगर उनके ही संगी-साथी गांधी के हत्यारे गोडसे को महिमामंडित करने में ओवरटाईम कर रहे हैं, और प्रधानमंत्री संसद में मौजूद रहते हुए भी इस मुद्दे पर बोलने से बच रहे हैं, और सरकार अपनी यह नीति घोषित कर रही है, कि इस पर सिर्फ गृहमंत्री ही जवाब देंगे, तो मोदी के गांधीप्रेम में एक बड़ा विरोधाभास दिख रहा है। यह नौबत इस देश के लिए बहुत खतरनाक है कि आज कट्टर साम्प्रदायिक ताकतें देश में एक बार फिर गांधी की हत्या जैसा जुनून खड़ा कर रही हैं, और भाजपा के करीबी संगठन इस तरह के भड़काऊ और देशद्रोही भाषण दे रहे हैं कि अगले कुछ बरसों में इस देश में किसी को ईसाई या मुसलमान नहीं रहने दिया जाएगा। 
यह मौका किसी गृहमंत्री के बयान के लायक नहीं है, और प्रधानमंत्री को खुद होकर संसद के भीतर और संसद के बाहर अपने मन की बात बोलनी चाहिए। वे रेडियो पर जनता से बात करते हुए जिंदगी के छोटे-छोटे पहलुओं पर अपने मन की बात बोलते रहें, और देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंक देने की जो बड़ी साजिशें उन्हीं के साथ के लोग कर रहे हैं, उस पर वे चुप रहें, तो इतिहास इसको भी दर्ज कर रहा है। हमने यूपीए सरकार के वक्त भी बार-बार यह लिखा था कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के जलते-सुलगते मुद्दों पर चुप रहना भारतीय प्रधानमंत्री का हक नहीं हो सकता। इस देश के प्रधानमंत्री को सार्वजनिक रूप से सार्वजनिक मुद्दों पर बोलना ही होगा, और आज नरेन्द्र मोदी संसद के भीतर, सवालों के कटघरों में मनमोहन सिंह की तरह चुप बने हुए हैं, और वे उसी भाजपा के प्रधानमंत्री हैं जो कि मनमोहन सिंह को मौनी बाबा कहते हुए थकती नहीं थी। 
देश की आज की नौबत बहुत ही भयानक है, और हमने पाकिस्तान के संदर्भ में लिखते हुए भारत को सचेत भी किया है कि साम्प्रदायिकता को बढ़ाना, धर्मान्धता को बढ़ाना, लोकतंत्र को किस तरह खत्म करता है, इसकी एक जलती हुई मिसाल सरहद के बगल में पाकिस्तान में दिख रही है। भारत में पिछली पौन सदी में गांधी ने अपनी जिंदगी भी देकर देश के भीतर साम्प्रदायिक एकता रखने की कोशिश की थी, और बहुत से दूसरे नेताओं ने, राजनीतिक दलों और संगठनों ने इसके लिए कुर्बानियां दी हैं। बहुत मुश्किल से विविधताओं से भरा हुआ यह देश एक साथ रहना सीख पाया था, और अब उसकी सीखी हुई गंगा-जमुनी सभ्यता को खत्म करने के लिए साम्प्रदायिक ताकतें ऐसा दिखा रही हैं कि मानो हैवानियत के अच्छे दिन आ गए हैं। 
यह मौका भारत के प्रधानमंत्री की चुप्पी का नहीं है, और हाथ पर हाथ धरे देश भर में साम्प्रदायिक हिंसा फैलाने की कोशिशों को चुपचाप देखते रहने का भी नहीं है। ऐसी चुप्पी भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत महंगी साबित हो रही है, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इतिहास में यह दर्ज भी हो रही है। उनको यह बात भी सोचनी चाहिए कि आर्थिक विकास से लेकर रोजगार तक, और सफाई से लेकर शौचालयों तक जितने किस्म की उनकी योजनाएं हैं, वे सब की सब इस हिंसा के बीच घूरे पर जा गिरी हैं। आज देश में कोई मोदी की सोच का नाम भी नहीं ले रहा, और देश के ऐसे बड़े-बड़े लेखक-पत्रकार, स्तंभकार और विचारक जो कि आम चुनाव के पहले से मोदी में संभावना देख रहे थे, और चुनाव के बाद मोदी में एक बड़ा नेता देख रहे थे, वे तमाम लोग आज घोर निराश होकर मोदी सरकार, मोदी की पार्टी, और मोदी के सहयोगी संगठनों के खिलाफ आलोचना से भरे लेख लिख रहे हैं। हिन्दुस्तान में आज का वक्त मोदी के सोचने और करने की मांग कर रहा है। पता नहीं क्यों वे संसद में मुंह भी नहीं खोल पा रहे हैं। 

साइबर-सेंधमारी से दुनिया को ब्लैकमेल करना इतना आसान?

18 दिसंबर 2014
संपादकीय
अमरीका की एक बड़ी फिल्म कंपनी सोनी के कम्प्यूटरों पर साइबर-सेंधमारों का हमला हुआ और उन्होंने वहां से फिल्में चुरा लीं, लोगों की चि_ियां चुरा लीं, और सोनी को धमकी दी कि उसने अगर अपनी एक फिल्म जारी की, तो ठीक नहीं होगा। द इंटरव्यू नाम की इस फिल्म में उत्तर कोरिया के तानाशाह-शासक की हत्या की कहानी है, और इन हैकरों के बारे में माना जा रहा है कि उनके पीछे उत्तर कोरिया की सरकार है, जिसका कि अमरीकी सरकार से लंबे समय से टकराव चले आ रहा है। यह फिल्म आने वाली क्रिसमस पर रिलीज होने वाली थी, लेकिन सेंधमारों ने यह धमकी भी दी है कि इस फिल्म को देखने जाने वाले लोग 11 सितंबर के न्यूयॉर्क के वल्र्ड ट्रेड सेंटर के हमलों को भी याद रखें। इसे देखते हुए पहले तो कुछ सिनेमाघरों ने फिल्म का प्रदर्शन रद्द कर दिया था, लेकिन अब खुद सोनी ने इसकी रिलीज रोक दी है। इसे अमरीका के इतिहास की सबसे बड़ी साइबर-धमकी माना जा रहा है, और कुछ विश्लेषकों का यह कहना है कि आज अगर मनोरंजन-कारोबार की एक काल्पनिक कहानी पर खफा होकर अमरीका की एक सबसे बड़ी कंपनी पर ऐसा हमला हो सकता है तो कल के दिन किसी समाचार टीवी या अखबार में छपी बातों से असहमत होकर उन पर भी ऐसे हमले हो सकते हैं।
अमरीकी सरकार ने इस मामले को बड़ी गंभीरता से लिया है क्योंकि यह एक दुश्मन देश, उत्तरी कोरिया, से जुड़ा हुआ मामला तो है ही, अमरीकी कारोबार की दुनिया पर भी यह दबाव का सबसे बड़ा हमला है। और जो कंपनी कम्प्यूटरों के ही कारोबार में है, उसके नेटवर्क पर इतनी बड़ी साइबर-सेंध लगाना, और उसकी आपसी चि_ियों को उजागर करके एक सार्वजनिक शर्मिंदगी पैदा करना, एक नए किस्म का आधुनिक हमला है। लेकिन इससे यह भी साबित होता है कि उत्तर कोरिया जैसा एक देश साइबर-हमले की अपनी ताकत से किस तरह किसी को झुका सकता है। उसके पास के परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की नौबत तो अभी नहीं आई है, लेकिन उसके साइबर-हथियार जरूर अपनी ताकत दिखा गए हैं।
जो लोग अमरीकी फिल्में देखते हैं, उनको यह मालूम है कि किस तरह कहानियों में साइबर-हमले दिखाकर पूरी अमरीका के ट्रैफिक को, बैंकों और जिंदगी के बाकी तमाम मामलों को सेंधमार कब्जे में कर सकते हैं, और किसी देश की व्यवस्था को कैसे पल भर में चौपट कर सकते हैं। हमारे पाठकों को यह याद होगा कि बरसों पहले हमने भारत को साइबर-सुरक्षा को लेकर आगाह किया था कि अगर भारत के बैंकों पर, ट्रेन और प्लेन के रिजर्वेशन पर, हवाई उड़ानों पर साइबर-हमले होते हैं, तो भारत उस तबाही से कैसे उबरेगा? आज अमरीका की सोनी कंपनी इस बात पर मजबूर हो गई है कि उसके कर्मचारी कागज और कलम लेकर बरसों पहले के अंदाज में काम कर रहे हैं, क्योंकि इस साइबर-सेंधमारी के हफ्ते भर बाद भी सोनी अपने कम्प्यूटरों को हमलों से बचा नहीं पाया है। कम्प्यूटरों के मामले में दुनिया के सबसे सुरक्षित देश की एक सबसे बड़ी कंपनी आज जिस तरह बेबस हो गई है, उससे यह बात साफ है कि गोला-बारूद से लेकर परमाणु हथियारों तक की जरूरत आने वाले दिनों में हो सकता है न पड़े, और हमलावर घर बैठे सेंधमारी करके किसी देश को पल भर में तबाह कर दें।
आने वाले दिन भारत के लिए ऐसी कोई तबाही ला सकते हैं, और वैसे हमलों से बचने के लिए इस देश को तैयार रहना चाहिए। आज जिंदगी की छोटी से छोटी जरूरतें जिस तरह कम्प्यूटरों और इंटरनेट की मोहताज होते जा रही हैं, उनको देखते हुए सरहद की लड़ाई अब पुराने फैशन की साबित होगी, और बिना बंदूक थामे लोग किसी देश की जिंदगी को मुर्दा कर देने की ताकत रखेंगे। भारत सरकार के बार-बार कहने के बाद भी इस देश के मंत्री, अफसर, और यहां के सांसद भी अपने ई-मेल खाते ऐसे सर्वरों पर रखे हुए हैं, जो कि दूसरे देश में हैं। भारत सरकार और भारत की संसद से, यहां की अदालत से, यहां की राज्य सरकारों से जुड़े हुए कामकाज भारत सरकार की ई-मेल सुविधाओं पर न रखने से तस्वीर कुछ ऐसी बनती हैं कि भारत की गोपनीयता अमरीका के फुटपाथों पर रखी हुई है। ऐसा भी नहीं कि भारत सरकार के अपने कम्प्यूटर विदेशी सेंधमारी से बचे हुए होंगे, लेकिन फिर भी वे देश के भीतर तो हैं।
उत्तर कोरिया सरकार की तरफ से, या उसकी हिमायत में सोनी पर हुआ यह हमला लोकतंत्र, सरकार, कारोबार, विदेशी संबंध, और कम्प्यूटरों के नाजुक होने के कई सवाल खड़े करता है, और लोगों को अपने-अपने घर बचाने की सोचना चाहिए। और इसके साथ-साथ एक सवाल यह भी है कि आज जिनके हाथ में साइबर-ताकत है, ऐसे लोग क्या दुनिया को अपनी शर्तों पर इस तरह झुकाते रहेंगे? कल के दिन और कौन-कौन से कारोबार, कौन-कौन सी सरकारें इस तरह की ब्लैकमेलिंग का शिकार रहेंगे?

दुनिया में पूरी हिफाजत तो कोई ताकत नहीं दे सकती

17 दिसंबर 2014
संपादकीय
पाकिस्तान में कल स्कूली हमले में इस्लामी होने का दावा करने वाले आतंकियों ने डेढ़ सौ लोगों को मार डाला, जिसमें अधिकतर बच्चे हैं, और इस हमले ने पूरी दुनिया को हक्का-बक्का कर दिया है। सदमे में डूबे हुए लोगों को आज सुबह से भारत का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया यह बताने में लगा है कि भारत के स्कूल कितने असुरक्षित हैं। कई स्कूलों में जाकर कैमरे बतला रहे हैं कि किस तरह वहां कोई भी जा सकते हैं। इंटरनेट पर कई पत्रकार यह लिख रहे हैं कि पाकिस्तान आतंकी हमलों को रोक क्यों नहीं पा रहा है।
अब सोचने और समझने की बात यह है कि क्या हर हमला रोकने लायक होता है? न सिर्फ पाकिस्तान या हिंदुस्तान में, बल्कि दुनिया के सबसे अधिक चौकस और तैयार देशों में भी स्कूल-कॉलेज पर हमले होते हैं, और अमरीका जैसे सबसे अधिक तैयार देश में तो बिना किसी मजहबी आतंक वाले हमले भी हर बरस दर्जन भर तो हो ही जाते हैं, और कोई एक अकेला बंदूकबाज ही जाकर बहुत से बच्चों को मार डालता है। इसलिए इस दुनिया में कोई अगर यह सोचे कि पुलिस और फौज की बंदूकों से हर जगह पर महफूज किया जा सकता है, तो वह निहायत ही नासमझी की बात होगी। दुनिया का बड़े से बड़ा इंतजाम भी हर स्कूल और हर कॉलेज को आत्मघाती हमलों से नहीं बचा सकता। जब कोई आतंकी या किसी दूसरी किस्म का हमलावर यह तय कर ले कि उसे अपने-आपको उड़ाकर भी दूसरों को मारना है, तो भीड़ भरी जगहों पर कहीं पर भी लोगों को बड़ी संख्या में मारा जा सकता है। जब हम अपनी साधारण समझ-बूझ से ऐसे हमलों की गुंजाइश के बारे में सोचते हैं, तो लगता है कि दुनिया की आबादी के अधिकतर लोग आज इसीलिए जिंदा हैं, कि किसी ने उनको मारना अब तक तय नहीं किया है। अगर सरकारी इंतजाम से किसी के जिंदा रहने की बात करें, तो हिंदुस्तान जैसे सवा करोड़ से अधिक आबादी के देश में दो-चार करोड़ से अधिक लोगों को बचा पाना मुमकिन नहीं होगा। 
इसलिए आज न सिर्फ पाकिस्तान या भारत, बल्कि दुनिया के तमाम देशों को यह सोचना होगा कि किस तरह इंसान और इंसान के बीच गैरबराबरी खत्म की जाए, किसी गरीब के हक छीनना कैसे खत्म किया जाए, किसी जाति या धर्म, किसी नस्ल या नागरिकता के लोगों को मारना किस तरह रोका जाए, ताकि बदले में जवाबी हमले में दूसरे लोग न मारे जाएं। कुल मिलाकर बात यह है कि जब तक दुनिया में आर्थिक और सामाजिक, धार्मिक और नस्लवादी भेदभाव खत्म नहीं होंगे, जब तक सामाजिक न्याय का सम्मान नहीं होगा, तब तक आतंक और हिंसा को खत्म करना मुमकिन भी नहीं होगा। और कल भी हमने इसी जगह भारत के उन लोगों को सावधान किया था जो कि आज यहां धार्मिक और सामाजिक उन्माद खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं, जो कि लोकतंत्र से ऊपर जाकर इस देश में कुछ तबकों के धार्मिक अधिकार खत्म करने की बात कर रहे हैं, कुछ लोग जो कि लोकतंत्र को खत्म करके एक धार्मिक-राज लाने की कोशिश कर रहे हैं। उनको यह समझ लेना चाहिए कि जब हिंसा और बेइंसाफी बढ़ते हैं, तो फिर बेकाबू मौतें भी होती हैं। और अगर हिंदुस्तान या किसी दूसरे देश को जिंदा रहना है तो उन्हें सामाजिक न्याय की तरफ बढऩा होगा। धर्म से परे भी समाज में आर्थिक न्याय जहां-जहां नहीं हुआ, भारत ऐसे तमाम इलाकों में आज नक्सल हिंसा से जूझ रहा है। इन इलाकों में सरकार के भ्रष्ट लोगों में गरीब आदिवासियों का जितना हक खाया होगा, आज सरकार नक्सल मोर्चे पर उससे हजार गुना गंवा रही है। हमारा हमेशा से यह मानना है कि सामाजिक न्याय देना, आतंक से जूझने के मुकाबले सस्ता पड़ता है, आसान रहता है, और जिंदगियां भी इसी तरह से बच सकती हैं। आज भारत में जिस तरह से एक सामाजिक अन्याय का माहौल खड़ा किया जा रहा है, उस बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अपने सांसदों को महज सुझाव देना काफी नहीं है। देश में एक न्यायपूर्ण वातावरण लाने की जरूरत है वरना सरहद पार एक मिसाल सामने है कि लोकतंत्र कमजोर और खत्म होने पर क्या हाल करता है।

पाकिस्तान की स्कूल पर आतंकी हमले के सबक

16 दिसंबर 2014
संपादकीय
रोज इस वक्त किसी मुद्दे की तलाश रहती है कि किस पर अपनी बात लिखी जाए। लेकिन आज कुछ घंटे पहले ही पाकिस्तान से खबर आने लगी कि वहां पेशावर में एक स्कूल पर तालिबानी आतंकियों ने हमला कर दिया। शुरू में कुछ गोलीबारी की खबर रही, लेकिन फिर यह खबर आने लगी कि गोलियों से मौतों के बाद एक हमलावर ने आत्मघाती धमाका किया, और शायद डेढ़ दर्जन लोग मारे गए हैं। ऐसे आसार हैं कि मौतें बढ़ सकती हैं, और अभी की खबरों के मुताबिक मरने वाले अधिकतर बच्चे हैं।
कल ही ऑस्ट्रेलिया में इस्लाम के नाम पर दहशत फैलाने की एक हथियारबंद हरकत में मजहब से जुड़े रहे एक आतंकी ने दर्जनों लोगों को कब्जे में ले लिया था, और वहां पुलिस ने एक कमांडो कार्रवाई करके उसे मारा, और दो बंधक भी इस दौरान मारे गए। इस्लाम के नाम पर दुनिया के बहुत से देशों में आतंकी हमले हो रहे हैं, और ऐसा करने वाले लोग अलग-अलग देशों के मुस्लिम लोग हैं, जो कि इस्लाम की तरह-तरह की व्याख्या करते अपनी हिंसा को जायज ठहरा रहे हैं। लेकिन ऑस्ट्रेलिया भारत से कुछ दूर है, और पाकिस्तान एकदम लगा हुआ है, और भारत पर पाकिस्तानी मामलों का असर अधिक होता है। इसलिए पाकिस्तान में इतनी बड़ी आतंकी कार्रवाई को लेकर हिंदुस्तान के लिए भी एक बड़ी फिक्र पैदा होती है।
दरअसल अधिकतर धर्मों का हाल यह है कि उनके मन में इंसानियत के लिए, इंसाफ के लिए, या कि लोकतंत्र के लिए किसी किस्म की जगह नहीं है। यह हम हिंदुस्तान में भी मुस्लिमों के बीच, हिंदुओं के बीच, सिखों के बीच, हिंसा पर यकीन रखने वाले लोगों में देखते हैं। धर्म के नाम पर जब आतंकी हमले होते हैं, और लोगों को मारा जाता है, सार्वजनिक जीवन पर बलपूर्वक कब्जा किया जाता है, जबर्दस्ती की जाती है, तो सरकारों के लिए यह आसान भी नहीं होता कि ऐसे मामलों में कोई कड़ी कार्रवाई की जाए। किसी भी धर्म के भीतर के कुछ गिनेचुने लोगों की हिंसा ही सामने आती है, और उस धर्म के बाकी तमाम लोग चुपचाप तब तक घर बैठे रहते हैं, जब तक कि सरकार उस धर्म के आतंकियों और हिंसकों पर कार्रवाई न करे। और जब सरकार कार्रवाई करती है, तो अपने लोगों की हिंसा पर चुप रहकर तमाशा देखने वाले लोग भी उठकर धर्म के नाम पर एकजुट हो जाते हैं। जब स्वर्ण मंदिर में लगातार भिंडरावाले के हत्यारे आतंकी इक_ा हो रहे थे, वहां पर गोला-बारूद इक_ा हो रहा था, तब इस धर्म के अधिकतर लोग चुप रहे। लेकिन जब ऐसे आतंकियों को मारने के लिए फौजी कार्रवाई की गई, तो उसके जवाब में इस धर्म के कुछ लोगों ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ही मार डाला। 
धर्म और लोकतंत्र का मिजाज बिल्कुल अलग-अलग होता है। जिस तरह इंसान के भीतर उसके दिल और दिमाग का तौर-तरीका अलग-अलग होता है, वैसा ही देश और समाज के भीतर भी होता है। लोग धर्म के मामले में तुरंत ही दिल और धार्मिक आस्था पर उतर आते हैं, लेकिन दूसरी तरफ जब लोकतंत्र की फिक्र करनी हो, तो दिमाग की जरूरत पड़ती है, जो कि धार्मिक और उन्मादी भीड़ के पास नहीं होता।
पाकिस्तान में आज जिस तरह का हमला हुआ है, वह बहुत तकलीफदेह है। लेकिन वहां की राजनीतिक ताकतों ने बीती आधी सदी में जिस तरह लोकतंत्र को कमजोर किया है, और जिस तरह फौजी तानाशाही या कि धर्मांधता को बढ़ाया है, जिस तरह धार्मिक आतंक को बढ़ाया है, यह उसी का नतीजा है कि आज वहां के हालात वहां की सरकार के काबू के बाहर हो गए हैं, और आज इतने बेकसूर और मासूम बच्चों की जिंदगी इस तरह से खत्म हुई है।
हम यह भी चाहते हैं कि पाकिस्तान से परे भी बाकी देश इस बात को समझ लें कि धर्मांधता, कट्टरता, साम्प्रदायिकता, को बढ़ावा देना इस कदर खतरनाक होता है कि एक दिन जाकर इस पर काबू करना भी नामुमकिन हो जाता है। खासकर आज पाकिस्तान के पड़ोस में बसे हुए हिंदुस्तान को यह बात समझना चाहिए जहां पर कि लगातार धर्मांधता को बढ़ाने की कोशिश हो रही है। तालिबानों को किसी भी धर्म में खड़ा करना आसान होता है, खत्म करना मुश्किल या नामुमकिन होता है। यह बात ओसामा बिन लादेन से लेकर भिंडरावाले तक जगह-जगह इतिहास में दर्ज है।

विधानसभाएं हों या संसद..., सदन को सड़क बनाना गलत

15 दिसंबर 14
संपादकीय
एक तरफ दिल्ली में संसद का सत्र चल रहा है, और उत्तरप्रदेश के धर्मांतरण से लेकर दिल्ली में एक साध्वी-मंत्री के बयानों तक, कई मुद्दों को लेकर काम ठप्प है, और विपक्ष पहले इन बातों पर चर्चा चाह रहा है। विपक्ष का एक हिस्सा, बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस वहां के घोटालों में अपने मंत्री और सांसदों की गिरफ्तारी के खिलाफ मोदी सरकार पर हमला बोलते काम रोक रही है। इधर छत्तीसगढ़ में नसबंदी मौतों से लेकर नक्सल मोर्चे पर मौतों तक बहुत से मुद्दे ऐसे हैं जिनको लेकर विधानसभा के आज से शुरू हुए सत्र में काम रूकना शुरू हो गया है, और इस छोटे से सत्र में कोई काम हो पाना मुश्किल दिख रहा है। देश में कुछ प्रदेशों में चल रहे विधानसभा चुनाव को लेकर जो आग हवा में बिखराई जा रही है, वह संसद को ठप्प करने के लिए काफी है, और उसी तरह छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने बहुत से ऐसी नौबतें विपक्ष को मुहैया कराई हैं, जिनको अगर विपक्ष न उठाए, तो वह गैरजिम्मेदार कहलाएगा। इसलिए आज विधानसभा सत्र शुरू होते ही विपक्ष का विरोध जायज था, लेकिन हम विधानसभा की कार्रवाई को बहिष्कार करने का पूरी तरह विरोध करते हैं, और उसी तरह संसद की कार्रवाई ठप्प करने का भी विरोध करते हैं। 
चाहे देश की कुछ विधानसभाओं के चुनाव हों, या फिर छत्तीसगढ़ के म्युनिसिपल के चुनाव हों, इन मुद्दों को अगर संसद और विधानसभा पर ऐसे हावी होने दिया जाता है कि उससे संसदीय काम ठप्प हो जाए, तो उससे राजनीतिक दल चुनावी फायदा पाने की कोशिश चाहे कर लें, उससे राज्य और देश का एक बहुत बड़ा नुकसान होता है। जितने संसदीय कार्य रहते हैं, उन विधेयकों पर, उन संशोधनों पर, उन प्रस्तावों पर चर्चा का वक्त हंगामे में खत्म हो जाता है, और जब नए कानून बनते हैं, या मौजूदा कानूनों में फेरबदल होता है, तो उन पर जो चर्चा होनी चाहिए, वह नहीं हो पाती। हमारा हमेशा से यह मानना रहा है कि सदन के समय का एक-एक पल का इस्तेमाल होना चाहिए, क्योंकि वह मौका रहता है जिसमें जनता के प्रतिनिधि के रूप में विपक्ष सरकार को घेर सकता है, और हर मुद्दों पर जवाब मांग सकता है। जहां तक विरोध-प्रदर्शन की बात है, तो हम यह सुझाएंगे कि विपक्ष को सदन के समय को और बढ़वाने की कोशिश करनी चाहिए, रोज शाम देर तक सदन की कार्रवाई चलाने पर सरकार को मजबूर करना चाहिए, हर मुद्दे पर सवाल पूछने चाहिए, और घेरना चाहिए। ऐसा करके ही विपक्ष अपनी जिम्मेदारी पूरी कर सकता है और सरकार के लिए परेशानी भी खड़ी कर सकता है। आज जिस तरह से संसद और विधानसभा में कार्रवाई ठप्प है, उससे सत्र के आखिर में जाकर सरकार के तमाम किस्म के प्रस्ताव, तमाम किस्म के संशोधन रफ्तार से आगे बढ़ा दिए जाएंगे, और बिना अक्ल के इस्तेमाल के नए कानून बन जाएंगे, कानून में फेरबदल हो जाएगा। 
संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष को यह समझने की जरूरत है कि सदन का उपयोग बहिष्कार और बहिर्गमन में बर्बाद करना सरकार के हाथ मजबूत करने जैसा है। इससे मीडिया में कुछ घंटों के लिए एक सुर्खी तो हासिल हो जाती है, लेकिन देश की जनता लुटी हुई सब देखते रह जाती है। सरकार को घेरने का यह तरीका संसदीय उत्पादकता को खत्म करने का है। हमारा मानना है कि सदन के समय का पल-पल इस्तेमाल करके, प्रदर्शन के लिए बाहर मौका ढूंढना चाहिए। संसद और विधानसभाओं में सब जगह गांधी की प्रतिमाएं लगी हुई हैं, और वहां बैठकर अनशन और उपवास करके सांसद और विधायक मीडिया से सीधे बात भी कर सकते हैं, जो कि सदन के भीतर नहीं कर सकते। सांसदों और विधायकों के ऐसे ही रूख के चलते जनता के मन में इन निर्वाचित और मनोनीत प्रतिनिधियों के लिए इज्जत घटती चली गई है, और हिकारत बढ़ती चली गई है। प्रदर्शन के लिए सड़क का इस्तेमाल हो सकता है, आमसभाओं के मैदान का इस्तेमाल हो सकता है, लेकिन सदन को सड़क बना देना पूरी तरह नाजायज है, और दिल्ली से लेकर रायपुर तक जनता के बीच ऐसे रूख के खिलाफ एक जागरूकता खड़ी होनी चाहिए। 

तू इधर-उधर की बात न कर, ये बता कि काफिला क्यों लुटा

14 दिसंबर 2014
संपादकीय
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज देश के नाम एक रेडियो संदेश में अपने मन की बातों की एक किस्त और कही। उन्होंने देश के नौजवानों में नशे के बढ़ते हुए खतरे के बारे में लोगों को आगाह किया, और इससे देश की हो रही तबाही के बारे में बड़े खुलासे से लोगों से अपने मन की बात कही। 
प्रधानमंत्री के मन की यह बात सही है और जरूरी है। देश पर नशे से एक बड़ा खतरा मंडरा रहा है। लेकिन भारत जैसे बड़े देश के प्रधानमंत्री, और खासकर नरेन्द्र मोदी की तरह अधिक घंटों तक काम करने वाले प्रधानमंत्री के मन में हर कुछ हफ्तों में रेडियो पर कही जाने वाली बातों से परे भी कुछ बातों की उम्मीद लोग करते हैं। और जब मोदी ऐसे तमाम मुद्दों पर अनजान बने रहते हैं, चुप रहते हैं, तो लोगों को यह समझ आ जाता है कि इन बातों पर उनके मन में जो है, वह शायद कहने लायक नहीं है, इसलिए वे उन पर कह नहीं रहे हैं। 
पिछले कई दिनों से लगातार गैरहिन्दुओं को हरामजादा कहने वाली उनकी मंत्री को लेकर उन्होंने संसद में सरकार के बुरी तरह और पूरी तरह घिर जाने पर सफाई के अंदाज में तो कुछ कहा, लेकिन वह संसद के लिए कही गई बात थी। साध्वी-मंत्री के बयान की वीडियो रिकॉर्डिंग टीवी समाचार चैनलों पर हजार बार दिखा दिए जाने के बाद भी नरेन्द्र मोदी उस पर कुछ नहीं कहा था। जिस तरह से उत्तरप्रदेश में हिन्दू संगठन हमलावर अंदाज में धर्मांतरण कर रहे हैं, उसे लेकर उनके मन की कोई बात सामने नहीं आई है। इधर छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी ऑपरेशन घर वापिसी के नाम पर अल्पसंख्यकों को ऑपरेशन से देश की मूल धारा से काटने का काम चल रहा है, और उस पर भी मोदी के मन की कोई बात सामने नहीं आई है। मनमोहन सिंह की तरह का कोई मौनी प्रधानमंत्री होता, तो उसकी चुप्पी भी नहीं खटकती। लेकिन रोज घंटों बोलने वाले प्रधानमंत्री के पास जब अपने साथियों, सहयोगियों और समविचारकों के साम्प्रदायिक और हिंसक कामों पर कहने के लिए कुछ नहीं रहता, तो देश के दूसरे आम या खास मुद्दों पर उनके कहे हुए का वजन घट जाता है। वे नशे से देश की नौजवान पीढ़ी को खतरा गिनाते हैं, और नशे की कमाई से आतंकियों के हाथ मजबूत होने का खतरा गिनाते हैं, तो देश के मन में यह एक सहज सवाल खड़ा होता है कि क्या यही देश में सबसे सुलगता हुआ खतरा है, या फिर देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को तहस-नहस करने की साजिशें इससे अधिक बड़ा खतरा हैं? 
हमारे सामने नवंबर 2011 में लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज का कहा हुआ एक दमदार और आक्रामक भाषण है, जिसमें उन्होंने कहा था- जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को किसी मामले की कोई जानकारी ही नहीं है, तो वह किस मर्ज की दवा हैं? और ऐसे प्रधानमंत्री की रहबरी पर हमें मलाल है। उन्होंने कहा- मैंने लोकसभा में प्रधानमंत्री से एक शेर के जरिए सवाल किया था- तू इधर-उधर की बात न कर, ये बता कि काफिला क्यों लुटा, मुझे रहजनों (लुटेरों) से गिला नहीं, तेरी रहबरी (साथ) का सवाल है। 
दरअसल यह बयान तब सामने आया जब हम मोदी के मन की कई बार की बातों को रेडियो पर सुनने के बाद हमारे मन में उठी फिराक की लिखी इस लाईन को इंटरनेट पर ढूंढ रहे थे, कि-तू इधर-उधर की बात न कर, ये बता कि काफिला क्यों लुटा। इसे ढूंढते-ढूंढते सुषमा स्वराज का यह बयान दिखा, और इस शेर की यह दूसरी लाईन दिखी जो कि आज मोदी पर भी लागू होती है। इधर-उधर की बहुत सारी बातें तो ठीक हैं, लेकिन आज देश का अमन-चैन जो लोग लूट रहे हैं, उनकी तरफ से मोदी की सार्वजनिक चुप्पी, और सार्वजनिक अनदेखी कुछ वैसी ही है जैसी मनमोहक-अनदेखी की सुषमा ने तीन बरस पहले संसद में खिंचाई की थी। 
प्रधानमंत्री को अपने पसंदीदा मुद्दों पर बोलने का तो पूरा हक है, उन्हें बोलना भी चाहिए, यह उनकी जिम्मेदारी भी है, लेकिन साथ-साथ उनकी यह भी जिम्मेदारी है कि वे दूसरे अधिक जलते-भभकते मुद्दों पर चुप्पी न रखें। नशा देश के लिए एक धीमा और लंबा खतरा है। लेकिन आज जो लोग देश को साम्प्रदायिकता में झोंककर नफरत से देश को बांटना चाह रहे हैं, उनके बारे में भी प्रधानमंत्री को बोलना चाहिए, उसके बिना उनके मन की मुकाबले में हल्की और कम अहमियत की बाकी बातों की विश्वसनीयता भी नहीं बनेगी। देश को आज जिस आग में झोंका जा रहा है, उसमें पेट्रोल छिड़कने से लेकर माचिस लगाने वाले लोगों तक, अपने ही साथियों के बारे में चुप रहने का अधिकार भारत के प्रधानमंत्री को नहीं दिया जा सकता। यही लोकसभा सुषमा स्वराज की प्रधानमंत्री पर कही गई बातों को दुबारा सुन सकती है, इस बार नरेन्द्र मोदी के लिए। 

म्युनिसिपल-पंचायत चुनावों से ईमानदारी शुरू होने की संभावना

13 दिसंबर 2014
संपादकीय

छत्तीसगढ़ में आज म्युनिसिपल चुनावों के लिए कांग्रेस और भाजपा के उम्मीदवारों की फेहरिस्तें आनी शुरू हो गई हैं, और कल भाजपा की अमित शाह की सभा से उसका चुनाव प्रचार शुरू हो गया है, और अपनी परंपरा के मुताबिक कांग्रेस ने भी कल राजधानी के कांग्रेस भवन में आधी रात गुटबाजी की मारपीट और गाली-गलौच से चुनाव प्रचार शुरू कर दिया है। कल ही एक खबर यह थी कि भाजपा की एक बैठक में इस बात पर फिक्र जाहिर की गई कि पिछले 11 बरस में भाजपा ने प्रदेश में हर चुनाव में जीत तो हासिल की है, लेकिन उसके वोटों का प्रतिशत गिरा है, और कांग्रेस से वोटों का उसका फासला पिछले विधानसभा चुनाव में कुल पौन फीसदी बच गया था। अब म्युनिसिपल के चुनाव वार्ड स्तर पर होते हैं, और वहां पर पांच-दस वोटों से भी जीत-हार दर्ज होती है। ऐसे में कांग्रेस पार्टी में अगर समझदारी होगी, और वह इसका इस्तेमाल करने की हालत में होगी, तो विधानसभा का पौन फीसदी का फासला पलट भी सकता है। लेकिन जिस तरह कहा जाता है कि उम्मीद पर दुनिया जिंदा रहती है, उसी तरह भाजपा भी कांग्रेस की घरेलू आग की उम्मीद में अपने ठंडे हाथ लिए बैठी है कि सेंकने का मौका आएगा ही आएगा। 
लेकिन आज म्युनिसिपल चुनावों पर लिखने का हमारा मकसद कांग्रेस पार्टी की फिक्र करना, या भाजपा को चौकन्ना करना नहीं है। हम आज से प्रदेश के हर शहरी मतदाता का सोचना शुरू करना चाहते हैं कि वे अपने वार्ड में किस तरह के जनप्रतिनिधि चाहते हैं। शहरी मतदाताओं को जो सबसे छोटे नेता चुनने होते हैं, वे पार्षद रहते हैं, और एक ही चुनाव में ऐसे मतदाताओं को महापौर या पालिका अध्यक्ष के लिए भी वोट डालना होता है। म्युनिसिपल के चुनाव अंग्रेजों के समय से लोग देखते आ रहे हैं, और लोगों ने अच्छे और बुरे, भ्रष्ट और ईमानदार, मेहनती और निकम्मे, सभी किस्म के पालिका अध्यक्ष, महापौर, या पार्षद देखे हुए हैं। हमारी सलाह महज इतनी है कि ऐसे लोगों को चुनें, जो कि भ्रष्ट न हों। जिन लोगों ने पिछले बरसों में अपने वार्ड में या अपने म्युनिसिपल में भ्रष्टाचार किया है, या भ्रष्टाचार को बचाया है, बढ़ावा दिया है, या किसी दूसरी सार्वजनिक संस्था या कुर्सी पर रहते हुए जिन लोगों ने भ्रष्टाचार किया है, उनको या उनके घरवालों के वोट न देकर शहरी मतदाता सार्वजनिक जीवन से, और स्थानीय शासन से गंदगी दूर कर सकते हैं। हमारा ऐसा मानना है कि म्युनिसिपल चुनाव में ईमानदारी को ही अगर पहला और सबसे बड़ा पैमाना मान लिया जाए, तो भी शायद आने वाले पांच बरस लोग अपने शहर में बेहतर काम होते देख सकते हैं। 
और पार्टियां समझौते करते हुए ऐसे लोगों को भी उम्मीदवार बना देती हैं, जो कि पहले किसी कुर्सी पर रहते हुए भ्रष्टाचार के लिए जाने जाते हैं, ऐसे उम्मीदवारों को हराकर जनता को पार्टियों को भी सबक सिखाना चाहिए। शहरी स्थानीय संस्थाओं में भ्रष्टाचार का मतलब आने वाले पांच बरस तक मुहल्ले का घूरा बन जाना, नलों से गंदा पानी आना, सड़कों का अंधेरा रहना तो होगा ही, इसके अलावा म्युनिसिपल की संपत्ति जिन जमीनों और इमारतों की शक्ल में हैं, वहां पर भी नेता-अफसर-ठेकेदार मिलकर सब लूट खाएंगे। इसलिए इस चुनाव में लोगों को पहला पैमाना ईमानदारी को ही रखना चाहिए। कई भ्रष्ट लोग अधिक सक्रिय दिख सकते हैं, क्योंकि उनके पास सक्रियता का खर्च उठाने के लिए बेईमानी का पैसा रहता है। कई लोग इस बार की उम्मीदवारी से परे की किसी दूसरी कुर्सी से, किसी दूसरी निर्वाचित या मनोनीत जगह से भ्रष्टाचार करके इस बार के चुनाव में उतरे हुए हो सकते हैं, लेकिन जनता को ऐसे लोगों को ठिकाने लगाना चाहिए। 
ईमानदारी सीधे विधानसभा और संसद में संभव नहीं भी हो सकती, क्योंकि ऐसे चुनावों में कई बार सारे प्रमुख उम्मीदवार भ्रष्ट होते हैं। लेकिन वार्ड के चुनाव इतने छोटे होते हैं कि कोई शरीफ, कोई ईमानदार, कोई अच्छी साख वाले लोग भी बिना किसी पार्टी टिकट के, बिना अधिक खर्च किए एक गंभीर चुनौती बन सकते हैं। और हमारा मानना है कि भले लोगों को मुहल्लों के इन चुनावों में जरूर हिस्सा लेना चाहिए, उनके जीतने की संभावना भी उनकी साख की वजह से हो सकती है, या कम से कम वे दुष्ट और भ्रष्ट लोगों की अक्ल ठिकाने ला सकते हैं। लोकतंत्र में म्युनिसिपल और पंचायत के चुनाव सबसे छोटे होते हैं, और यहीं से ईमानदारी खड़ी होने की गुंजाइश रहती है। लोगों को अपने आसपास इस मुद्दे पर चर्चा करके अपने मोहल्ले के उम्मीदवारों में से सबसे बेहतर को छांटना चाहिए, और तुरंत यह कोशिश भी करनी चाहिए कि अपने वार्ड से किसी बहुत अच्छे और ईमानदार का हौसला बढ़ाकर इस चुनाव में खड़ा भी करवाना चाहिए।

हम तो बरसों से योग की वकालत करते आ रहे थे, चलो अब सही...

12 दिसंबर 2014
संपादकीय

भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21 जून को पूरी दुनिया में विश्व योग दिवस मनाने की घोषणा की है। भारत हजारों बरस से योग का उपयोग करते आ रहा है, और भारतीय जीवन शैली में पूरे देश में योग प्रचलित भी है, हम अपने अखबार में कई बार इस बात को लिखते आए हैं कि योग और कसरत जैसी जीवन शैली से बीमारियों से बचा जा सकता है, सेहत को बेहतर रखा जा सकता है, और ऐसा होने पर सरकार का भी इलाज का खर्च घटेगा। 
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम विचारों की इसी कॉलम में पहले कई बार इस पर लिख चुके हैं और अभी हमारे सामने 31 मार्च 2012 का संपादकीय है जिसमें हमने लिखा था-'....हम समाज और सरकार दोनों के स्तर पर एक सेहतमंद जीवनशैली के लिए जागरूकता के एक बड़े अभियान को तुरंत शुरू करने की मांग करते हैं। इसके तहत हर शहर और कस्बे में लोगों के लिए साफ हवा में घूमने-फिरने, कसरत करने, बीमारियों से बचाव की जानकारी पाने, योग और प्राणायाम के विवादहीन तरीकों को बढ़ावा देने का इंतजाम करना चाहिए। एक योजना के तहत सरकार ही जिला स्तर से शुरू करके बाद में और नीचे के स्तर तक ऐसे प्राकृतिक केंद्र विकसित कर सकती है जिनमें पेड़ों के बीच साफ और खुली हवा में ऐसे तमाम काम चल सकते हों। यह बात हम पहले भी सरकार को सुझा चुके हैं। छत्तीसगढ़ में जहां पर कि एक आयुर्वेदिक डॉक्टर रमन सिंह मुख्यमंत्री हैं, और मंत्रिमंडल में बहुत से लोग गंभीर बीमारियों के शिकार हैं, वहां पर फिर ऐसी जरूरत के लिए जागरूकता आसानी से आनी चाहिए। समाज अपने-आपमें इतने बड़े प्राकृतिक स्वास्थ्य केंद्र खुद तो नहीं बना सकता, लेकिन वह सरकार को इसके लिए  तैयार जरूर कर सकता है...Ó
एक और अलग दिन हमने लिखा था-'....आज जब बगीचे और मैदान या तो घटते जा रहे हैं या फिर पैदल घूमने लायक सड़कें गंदगी से भरी हुई हैं, उनमें गाडिय़ों का धुआं छाए रहता है, गड्ढे, गोबर और धूल के चलते जहां चलना मुश्किल होता है, वहां पर सुबह-शाम लोग सैर कर सकें, योग या दूसरे किस्म की कसरत कर सकें, खेलकूद सकें ऐसा इंतजाम होना चाहिए। शहरी योजनाओं में कागजों पर तो ऐसा हो जाता है लेकिन जब हर इलाके के बीच ऐसी साफ-सुथरी और खुली हवा वाली जगह की बात करें तो ये घटती चल रही हैं। सरकार या समाज को एक बड़े पैमाने पर योग और साधारण कसरत की मुफ्त ट्रेनिंग देने का इंतजाम भी करना चाहिए ताकि लोग इस पर अमल करें और सेहतमंद रहें...Ó।
भारत में योग को एक स्वस्थ जीवन शैली के रूप में बढ़ावा देने की जरूरत है, लेकिन आज अगर कोई तबका योग को धर्म से जोडऩे लगेगा, उसमें धर्म के प्रतीकों का उपयोग करने लगेगा, तो उससे इस फायदेमंद प्राचीन शैली का नुकसान होगा, और लोगों को फायदा मिलने की संभावना भी घटेगी। योग को धर्म से अलग करके, विवाद और विवादास्पद लोगों से अलग करके हर स्कूल और कॉलेज तक पहुंचाने की जरूरत है। हमने तो बरसों पहले छत्तीसगढ़ सरकार से हर जिले में ऐसे केन्द्र विकसित करने की मांग की थी, और उससे हो सकने वाले फायदों को गिनाया भी था। हो सकता है कि अब प्रधानमंत्री मोदी की पहल, और संयुक्त राष्ट्र संघ के इस महत्वपूर्ण फैसले के बाद छत्तीसगढ़ सरकार भी जन स्वास्थ्य में ऐसा योगदान करने के बारे में सोचेगी। राज्य सरकार की नीति में स्कूल शिक्षकों को योग सिखाने की बात तो बरसों से की जा रही है, लेकिन उस पर कोई अमल हो नहीं रहा। और हम स्कूल-कॉलेज से परे भी सभी उम्र के लोगों के लिए मुफ्त योग शिक्षा इसलिए सुझा रहे हैं क्योंकि जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे सेहत के खतरे बढ़ते जाते हैं। स्कूल और कॉलेज की उम्र में तो सेहत ऐसी रहती है कि किसी को योग नहीं सूझता। और जब उसकी जरूरत रहती है तो सीखने की उम्र ढलने लगती है। छत्तीसगढ़ को एक सेहतमंद राज्य बनने के लिए बड़े पैमाने पर यह पहल करनी चाहिए, और इसके लिए न तो बिजली लगनी है, न कोई उपकरण लगने हैं, और न ही अधिक खर्च होना है। ऐसा होने पर सरकार का इलाज पर से खर्च घटते भी चले जाएगा।  

देश में इतनी साम्प्रदायिक और धार्मिक आक्रामकता ठीक नहीं

11 दिसंबर 2014
संपादकीय
भाजपा के एक सांसद साक्षी महाराज पहले भी अपने विवादास्पद बयानों से खबरों में रहे हैं, और आज उन्होंने यह कहकर घटिया बयानों का एक नया पैमाना सामने रखा है कि नाथूराम गोडसे वैसा ही देशभक्त था, जैसेे कि महात्मा गांधी थे। जिस समय वे संसद के बाहर यह बयान दे रहे थे, उस समय संसद के भीतर उन्हीं जैसे एक दूसरे भाजपा सांसद विनय कटियार यह कह रहे थे कि उमर अब्दुल्ला के पुरखे भी तो हिन्दू थे। इन पंक्तियों को लिखे जाने तक साक्षी महाराज का बयान भी खबरों में है, और उनकी सफाई भी इस पर आना शुरू हो गई है। लेकिन हम इसे एक मिसाल के तौर पर ले रहे हैं, और इस एक बयान के सही या गलत होने तक हमारी बात सीमित नहीं है।
दरअसल उत्तरप्रदेश में धर्मांतरण के कुछ ताजा मामलों के सामने आने के बाद देश का माहौल एकदम ही धार्मिक और साम्प्रदायिक उत्तेजना की खबरों से भर गया है। कल तक कौन किस धर्म में थे, और आज उनको किस धर्म में लाने के लिए कौन-कौन से तरीके जायज हैं, कौन-कौन से खर्च जायज हैं, इन बातों में संसद भी डूब गई है, और बाहर भी इसकी सरगर्मी फैली हुई है। अभी कुल मिलाकर जम्मू-कश्मीर, झारखंड और नई दिल्ली के चुनाव चल रहे हैं, ऐसे में मोदी सरकार की एक मंत्री ने रामजादा और हरामजादा का बखेड़ा खड़ा किया, और अब चारों तरफ इस किस्म के बयान या ऐसी हरकतें बढ़ रही हैं। 
यह सिलसिला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निजी बयानों, और उनके निजी सार्वजनिक रूख के खिलाफ है। आज जब भारत के आगे बढऩे को लेकर मोदी सरकार और दुनिया के बहुत से दूसरे देश भी बेहतर संभावनाओं की बात कर रहे हैं, तो धार्मिक और साम्प्रदायिक मुद्दों पर इतनी अधिक आक्रामकता का सैलाब ठीक नहीं है। आज पूरे देश में चुनाव नहीं हो रहे हैं, और ऐसे में किसी तरह के धार्मिक ध्रुवीकरण की जरूरत भी नहीं है। लेकिन अगर भाजपा अपने मंत्रियों, अपने सांसदों, और अपने नेताओं को ऐसे हमलावर तेवरों के साथ बयान देने से नहीं रोकेगी, तो इससे देश में जो एक अनावश्यक तनाव खड़ा होगा, वह देश की उत्पादकता, देश की आर्थिक स्थिति पर बहुत बुरा असर डाले बिना नहीं रहेगा। 
नरेन्द्र मोदी एक प्रधानमंत्री के रूप में, और भाजपा एक पार्टी के रूप में सीधे ऐसी आक्रामकता से निजी तौर पर तो बच रहे हैं, लेकिन उन्हीं के हिस्सेदार अपने निजी स्तर पर एक अभूतपूर्व आक्रामकता को दिखा रहे हैं, और यह बात देश की एकता के लिए तो घातक है ही, खुद नरेन्द्र मोदी की संभावनाओं के लिए घातक है। देश के आम चुनावों के मार्फत वे जब प्रधानमंत्री बन गए, और जब ऐसे ऐतिहासिक बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बन गए, तो उनके सामने अपने आपके कद को और बड़ा साबित करने की एक बड़ी संभावना है, और उनके साथियों की ऐसी हरकतों से वे संभावनाएं घट रही हैं। आज भी देश में सोचने-विचारने वाला तबका यह सोच रहा है कि नरेन्द्र मोदी जिस दरियादिली की बातें अपने भाषणों में करते हैं, उससे ठीक उल्टा चलने वाले अपने साथियों को वे क्यों नहीं रोक पा रहे हैं? संसद के भीतर उनको अपनी साध्वी-मंत्री के आपराधिक बयान पर अफसोस जाहिर करना पड़ा, और उसके बाद अब उनके दूसरे सांसद मानो उससे भी अधिक आक्रामक, और विविधता वाले बयान देकर अपनी हमलावर मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं। 
हमारा यह मानना है कि भारत की जनता के बहुमत का मिजाज ऐसा हमलावर नहीं है, और न ही ऐसी आक्रामकता को बर्दाश्त करने का है। ऐसी बातों को बर्दाश्त करने या बढ़ावा देने वाली पार्टी का नुकसान होगा। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को भी चाहिए कि महात्मा गांधी से गोडसे की तुलना करने वाले इस बयान पर वे कार्रवाई करें, इसके पहले साध्वी-मंत्री का बयान भी पार्टी की तरफ से कार्रवाई के लायक था। देश भर में अगर एक तनाव खड़ा होगा, तो उससे देश के संघीय ढांचे पर भी जोर पड़ेगा, और मोदी सरकार की तमाम आर्थिक अटकलों को भी नुकसान पहुंचेगा। 

हादसों के बाद हड़बड़ाकर जागने के बजाय सरकारें

10 दिसंबर 2014
संपादकीय
दिल्ली में हुए बलात्कार के एक मामले के बाद यह मांग तेजी से उठी कि जिस अमरीकी इंटरनेट टैक्सी-बुकिंग कंपनी, उबर, के टैक्सी ड्राइवर ने यह बलात्कार किया उस कंपनी पर रोक लगा दी जाए। आन्ध्र सहित कुछ दूसरी जगहों से ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि राज्य सरकार ने इस पर रोक लगा दी है। इस पर केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में बयान दिया कि उबर कंपनी पर दिल्ली में पाबंदी लगा दी गई है। साथ ही केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को यह निर्देश जारी किया है कि उन सभी कैब सर्विसेज पर पाबंदी लगाए जिनके खिलाफ ऐसे मामले दर्ज हैं या जिनके पास लाइसेंस नहीं हैं। लेकिन दूसरी तरफ इसी सरकार के शहरी विकास और परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि अगर रेलगाड़ी में बलात्कार होगा तो क्या रेलगाड़ी बंद कर दी जाएगी? हम नितिन गडकरी की बात से अधिक सहमत हैं, क्योंकि अपनी खुद की खामियों पर नजर डालने के बजाय दूसरों पर रोक लगाने का मिजाज सरकार में अधिक होता है। 
दरअसल चुनावों की दहशत में जीती हुई सरकारें किसी हादसे या मामले के बाद जिस तरह का बर्ताव आपाधापी में दिखाती हैं, उसके लिए अंग्रेजी में एक शब्द है, नी जर्क रिएक्शन। मतलब यह कि घुटने पर अचानक चोट लगी तो बदन ऐसा बर्ताव कर बैठा जिस पर कि उसका खुद का कोई काबू नहीं रह जाता। और यह बात महज सरकार तक सीमित नहीं है, पिछले दिनों मीडिया का बर्ताव भी लगातार इसी तरह का होते चल रहा है कि कोई मामला सामने आता है तो बिना उसकी जांच-पड़ताल किए, बिना खबरों के बुनियादी पैमानों पर उसे कसे हुए, सिर्फ कैमरे और माइक्रोफोन से एक ब्रेकिंग न्यूज बनाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया टूट पड़ता है। खबर की पहली खबर मीडिया के घुटनों पर चोट की तरह पड़ती है, और फिर मीडिया का तन-मन मानो बेकाबू हो जाता है। अखबार चूंकि हर घंटे नहीं छपते, इसलिए उनके पास सम्हलने का थोड़ा वक्त होता है। 
रोहतक में कॉलेज छात्रा दो बहनों ने एक बस में एक लड़के को बुरी तरह पीटा, और उसका वीडियो हाथ लगते ही देश भर के टीवी चैनल उसे परोसने में जुट गए। मीडिया के जिन लोगों की पहुंच रोहतक तक थी, बस वालों तक थी, उन्होंने भी इसकी जांच-पड़ताल करने की जहमत नहीं उठाई। नतीजा यह हुआ कि दो दिन बाद जब एक दूसरा वीडियो सामने आया, और आधा दर्जन लोगों के बयान सामने आए कि ये बहनें आदतन मारपीट करने वाली हैं, कुछ लोगों की ऐसी शिकायतें भी आईं कि इन्होंने झूठी रिपोर्ट लिखाकर रकम वसूली की, तब जाकर मीडिया को समझ आया कि खबर की जांच-पड़ताल की बुनियादी शर्त को उसने अलग रख दिया था। और फिर मीडिया में इस मामले की पहली खबर के आने से मानो हरियाणा सरकार के पहली बार मुख्यमंत्री बने मनोहर लाल खट्टर के घुटनों पर चोट पड़ी, और उनके तन-मन में बिलबिलाते हुए यह घोषणा कर दी कि इन बहनों का राज्य सरकार सम्मान करेगी, बाद में इस घोषणा को स्थगित किया गया। 
हम फिर से दिल्ली की टैक्सी सेवाओं पर लौटें, तो बात सिर्फ दिल्ली की नहीं है पूरे देश की है और सिर्फ टैक्सियों की नहीं है, स्कूल बसों की भी है, और लड़कियों, बच्चों और महिलाओं की तरह के जो नाजुक तबके हैं, उनके आसपास काम करने वाले और लोगों की भी है। आज एक अमरीकी कंपनी के मार्फत बुक की गई टैक्सी में बलात्कार होने से उस कंपनी को भारत में बंद कर देने की बात उठ रही है। लेकिन हम छत्तीसगढ़ में देखते हैं कि एक फीसदी टैक्सियां भी टैक्सी रजिस्ट्रेशन वाली नहीं है, और जब वे टैक्सी के रूप में दर्ज ही नहीं हैं, तो उनके मालक-चालक के बारे में पुलिस क्या पता लगाएगी? शायद ही किसी स्कूल बस के ड्राइवर-कंडक्टर की पुलिस जांच होती होगी। और दिल्ली में तो इस टैक्सी ड्राइवर की पुलिस जांच में भी उसे साफ-सुथरे चाल-चलन का सर्टिफिकेट दिया गया था। सरकार को, और न सिर्फ केन्द्र सरकार या दिल्ली सरकार को, बल्कि छत्तीसगढ़ जैसी सरकारों को भी सुरक्षा के अपने ढांचे खड़े करने चाहिए, और उन पर कड़ाई से अमल करना चाहिए। आज न ढांचे हैं, न अमल है, और न कड़ाई है। इसी का नतीजा है कि चारों तरफ सरकारी ढांचा चरमरा रहा है, देश भर में जगह-जगह ऐसे जुर्म हो रहे हैं जिनको कि एक सुरक्षा-ढांचा रहने पर रोक लिया जाना चाहिए था। लेकिन बचाव के ढांचे पर मेहनत लगती है, जुर्म हो जाने के बाद उस पर कार्रवाई कम मेहनत की होती है। 
दिल्ली की घटना से सबक लेते हुए हर राज्य सरकार को यह चाहिए कि वह ऐसी हिफाजत के लिए हर सावधानी का इंतजाम करे, जिसके न होने से दिल्ली में यह जुर्म हो पाया। एक दूसरी बात यह भी है कि सरकार के ढांचे में अगर एक हिस्सा कमजोर रहता है, और वह जुर्म की इजाजत देता है, तो सरकार के ढांचे के दूसरे हिस्सों में भी  ऐसे मुजरिम हाथ-पैर फैलाते हैं। आज जो बलात्कार कर सकते हैं, वे कल लूट सकते हैं, और उसके बाद वे नशे की तस्करी कर सकते हैं। जुर्म से हिचक और झिझक जब एक बार कम हो जाती है, तो फिर वह इसी तरह की बातों को बढ़ावा देती है। इसलिए सरकार को हादसों के बाद हड़बडिय़ा-प्रतिक्रिया के बजाय एक जिम्मेदार ढांचे के रूप में अपने आपको सुधारना चाहिए। 

लाशों के बीच जनमुद्दों और साहित्य पर चर्चा हो या नहीं?

विशेष संपादकीय
9 दिसंबर 2014
सुनील कुमार
छत्तीसगढ़ में सरकार इस बरस से पहली बार एक साहित्य महोत्सव शुरू कर रही है। देश में जगह-जगह साहित्या महोत्सवों का सिलसिला शुरू हुआ है, और उनमें से अधिकतर अंगे्रजी जुबान के अधिक हिस्से वाले होते हैं। उनमें से जयपुर का गैरसरकारी समारोह पिछले बरस आशीष नंदी जैसे विख्यात और सम्मानीय समाजशास्त्री के खिलाफ पुलिस कार्रवाई को लेकर खबरों में आया था, और एक दूसरा गैरसरकारी तहलका साहित्य समारोह गोवा में इसके आयोजक, अखबारनवीस तरूण तेजपाल पर लगे बलात्कार के आरोपों की वजह से महीनों तक खबरों में रहा। और फिर मानो विवाद से प्रचार पाने के लिए, टाईम्स ऑफ इंडिया ने अपने साहित्य समारोह में तरूण तेजपाल को बोलने के लिए न्यौता भेजकर ढेर सा प्रचार मुफ्त में पा लिया। 
अब साहित्य, कला, और वैचारिक लेखन ऐसे तो होते नहीं कि उन्हें लेकर मतभेद न हों और विवाद न हों। देश के इतिहास लेखन से लेकर वर्तमान लेखन तक, भविष्य लेखन से लेकर रचनात्मक साहित्य तक देश में वामपंथी या समाजवादी सोच के लोगों की भरमार हमेशा से रही है। और आज देश में भाजपा और मोदी सरकार के आने के बाद से दक्षिणपंथी सोच के, हिंदूवादी लेखकों और इतिहासकारों का एक नया सैलाब ऊंचाई तक लहरा रहा है। ऐसे में एक साहित्य समारोह, और खासकर तब जबकि वह सरकार का आयोजित किया जा रहा हो, और खासकर तब जबकि वह भारत के मध्य हिस्से की सबसे बड़ी जुबान हिंदी में हो, तब उसे लेकर उत्सुकता तो रहनी ही है, और उसे लेकर विवाद के खतरे भी होने ही थे। लेकिन अगर विवाद महज विवाद के मकसद से न हो, तो वह बुरा भी नहीं होता, वह वाद को यह मौका भी देता है कि वह अपनी बात को दुहरा सके।
छत्तीसगढ़ में विपक्षी दल कांगे्रस पार्टी ने यह एक बहुत सही मुद्दा उठाया है कि जब प्रदेश में नसबंदी ऑपरेशनों में मौतें दर्जन से दर्जनों की तरफ बढ़ रही हैं, जब बस्तर के नक्सल मोर्चे पर दर्जन भर से अधिक शहादतें अभी-अभी हुई हैं, और दर्जनों जख्मी अस्पतालों में हैं, तब देश भर से दर्जनों साहित्यकारों और दर्जनों लेखकों को बुलाकर रायपुर साहित्य महोत्सव किया जाना चाहिए, या नहीं? कांगे्रस ने विपक्ष की अपनी जिम्मेदारी के तहत दोनों मुद्दे ऐसे उठाए हैं जिन्हें लेकर छत्तीसगढ़ विचलित चल रहा है, और सरकार सवालों के घेरे में है। अब सवाल उठता है कि इस साहित्य समारोह का बहिष्कार का, जिसके लिए प्रदेश कांगे्रस के अध्यक्ष ने प्रमुख साहित्यकारों से फोन पर यह अपील की है कि वे इस समारोह का बहिष्कार करें। 
हम कांगे्रस के उठाए मुद्दों से सहमत हैं, लेकिन हम बहिष्कार से सहमत नहीं हैं। पिछले बरसों में हमारे पाठकों को यह याद होगा कि किसी भी पार्टी की सरकार रहे हमने विधानसभा और संसद, दोनों के बहिष्कार के खिलाफ लगातार लिखा है। इस बात पर हमारा एक मजबूत भरोसा है कि लोकतंत्र के भीतर विचार-विमर्श के, बहस और वाद-विवाद के किसी भी मौके को खोना नहीं चाहिए। क्योंकि यह लोकतंत्र ही तो है जो कि लोगों को असहमति सामने रखने का मौका देता है। और कोई भी बहिष्कार ऐसे मौके को खोने से कम कुछ नहीं होता। जब भी विधानसभा या संसद में विपक्ष सवाल उठाने या बहस करने के बजाय मौके को खोता है, तो वह देश या प्रदेश की जनता के हक की अनदेखी भी करता है। 
हम साहित्य या विचार के किसी भी ऐसे आयोजन को लेकर यह मानते हैं कि यह विचारधाराओं और राजनीतिक दर्शन की विविधता के मौके लेकर आते हैं, और उनका इस्तेमाल किया जाना चाहिए। हम कांगे्रस के विरोध की एक बात से और असहमत हैं कि यह एक जश्न है। वैचारिक आयोजन लाशों के बीच भी जश्न नहीं कहे जा सकते, बल्कि वे सामाजिक विसंगतियों और हथियारबंद हिंसा के खिलाफ एक राजनीतिक चेतना खड़ी करने का मौका हो सकते हैं। इस साहित्य समारोह के नामों पर एक नजर डालें, तो इसमें बहुत सी अलग-अलग विचारधाराओं के लोग पहुंच रहे हैं, और यह सरकार भाजपा की होने के बावजूद गजानन माधव मुक्तिबोध को सबसे अधिक महत्व देते दिख रही है जो कि पूरी जिंदगी न सिर्फ वामपंथी रहे, बल्कि जिनका सारा लेखन भाजपा और संघ परिवार की विचारधारा से असहमति का रहा। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने पिछले ग्यारह बरसों के अपने राज में जिस तरह मुक्तिबोध के सम्मान को सरकारी और सार्वजनिक स्तर पर बढ़ाया है, वैसा देश के किसी भी दूसरे राज्य में किसी वामपंथी लेखक के साथ शायद ही हुआ हो। और साहित्य समारोह का यह मौका छत्तीसगढ़ सरकार के कामकाज से लेकर देश की अलग-अलग विचारधाराओं से असहमति को भी सामने रखने का रहेगा, और लोगों को इसका इस्तेमाल करना चाहिए। 
हम शास्त्रीय कलाओं और शास्त्रीय साहित्य को जनसरोकारों से बिल्कुल ही कटा हुआ, और आभिजात्य तबके के ही काम का मानते हैं। ऐसे में उससे परे अगर जनसाहित्य, जनमुद्दों, जनकला, और जनसरोकारों पर कोई चर्चा हो रही है, होने जा रही है, तो वह जनता के काम की भी रहेगी। जहां तक सरकारी फिजूलखर्ची का सवाल है, तो जनता की नजरों में आए बिना भी सरकार की फिजूलखर्ची रात-दिन जारी रहती है। और अगर ऐसे में बिना किसी सरकारी नियंत्रण के, महज एक सरकारी मंच पर देश भर के लोग जुटते हैं, और प्रदेश के लोगों को इसमें भागीदारी मिलती है, तो हम इसे एक बेहतर और सार्थक फिजूलखर्ची मान सकते हैं। कुल मिलाकर हम इस आयोजन के बहिष्कार के बजाय इस आयोजन में अपनी-अपनी विचारधारा के मुद्दे उठाने की सलाह देंगे। कांगे्रस भी ऐसे बहुत से लेखक और रचनाकार पा सकती है जो कि उसकी विचारधारा से सहमति रखने वाले हों। बहिष्कार न संसद का होना चाहिए, न विधानसभा का, न म्युनिसिपल कौंसिल का, और न ही साहित्य समारोह का। इस पर होने वाला खर्च सत्तारूढ़ भाजपा की जेब से नहीं जा रहा है, यह प्रदेश की जनता का पैसा है। और विपक्षी दल कांगे्रस को इस मौके को आयोजन के पहले, आयोजन के बाहर रहते हुए, इसे अपनी सोच से प्रभावित करने की तरकीबें सोचनी चाहिए। 

पाखंड से उबरे बिना भारत में बलात्कार थमना संभव नहीं

8 दिसंबर 2014
संपादकीय
दिल्ली में हुए एक बलात्कार को लेकर एक बार फिर देश की राजधानी की सड़कें और देश का मीडिया उबल रहे हैं। और यह सिलसिला साल में दो-चार बार का हो गया है, और हम भी इस मुद्दे पर साल में दो-चार बार इस जगह पर लिख देते हैं। लेकिन सरकारी इंतजाम से परे कुछ और चीजों पर भी बात करने की जरूरत है जो कि हो नहीं पा रही है। 
भारत में महिलाओं की जो हालत है, उसे समाज में सुधारे बिना ये बलात्कार थमने वाले नहीं हैं। पुलिस हर बलात्कारी को पहचान कर जुर्म के पहले नहीं रोक सकती। और आज के कामकाजी जमाने में महानगरों में महिलाओं को काम करके देर रात लौटना पड़ता है, शहरी जिंदगी में पार्टियों से देर रात आवाजाही होती है, और शहरों से दूर गांव-जंगल में लड़कियों और महिलाओं को रात-बिरात अंधेरे में पखाने जाने के लिए गांव के बाहर सुनसान जगहों पर जाना पड़ता है। स्कूलों में लड़कियां और बच्चियां वहां के शिक्षकों और कर्मचारियों के हवाले रहती हैं, आते-जाते बस के ड्राइवर और कंडक्टर के साथ रहती हैं, और घर पर पड़ोसियों और रिश्तेदारों की पहुंच के भीतर रहती हैं। ऐसे में पूरी दुनिया की पुलिस मिलकर भी हिन्दुस्तान के बलात्कारों को नहीं रोक सकतीं। केवल एक ही चीज बलात्कारों को कम कर सकती है, वह यह कि भारतीय महिलाओं के अधिकार पुख्ता किए जाएं, समाज में उनको सम्मान दिया जाए। और यह काम किसी कानून को लागू करने के मुकाबले हजार गुना अधिक मुश्किल है, बल्कि नामुमकिन सा है। 
हम देखते हैं कि भाजपा और हिन्दू संगठनों के कई कट्टरपंथी भगवाधारी लोग महिलाओं के खिलाफ जिस तरह की अवैज्ञानिक बातें करते हैं, वैसी अवैज्ञानिक सोच देश के लोगों को महिला-सम्मान से परे ले जा रही हैं। लेकिन दूसरी तरफ हम ममता बैनर्जी जैसी पढ़ी-लिखी और आधुनिक-लड़ाकू महिला को देखते हैं तो वह भी बलात्कार के मामलों में महिला विरोधी बयान देती हैं, पश्चिम बंगाल के कई वामपंथी नेता भी दकियानूसी और कट्टरपंथी बयान देते हैं। महिला के सम्मान को लात मारते हुए जब बलात्कार के एक आरोपी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपना मंत्री बनाते हैं, तो देश भर में यह संदेश जाता है कि बलात्कार बुरा नहीं है, और उससे अधिक कोई नुकसान नहीं होता। यह नौबत बदलने के लिए देश के हर ताकतवर तबके और इंसान को समाज की जुबान, समाज की कहावतें, सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए सम्मान और अनुपात की जगह, ऐसे सैकड़ों काम करने पड़ेंगे। किसी औरत को हिन्दुस्तानी समाज में इज्जत दिलाना आसान काम नहीं है, जहां कि उसे पांव की जूती समझा जाता है, जहां उसे पैदा होने के पहले मार डालने लायक पाया जाता है, जहां उसे बचपन में शादी करके बिदा कर देने, कम दहेज लाने पर प्रताडि़त करने और मार डालने तक को जायज माना जाता है। 
हम बात को सिर्फ बलात्कार तक सीमित रखना नहीं चाहते और देश की सोच को वैज्ञानिक बनाने की तरफ बढ़ाने की वकालत करते हैं। आज भारत में जिस अंदाज में पौराणिक काल और वैदिक काल के नामौजूद विज्ञान को स्थापित करने की पाखंडी कोशिश चल रही है, उस तरह की भारत सरकार की कोशिशों के चलते हुए इस देश में महिलाओं का दर्जा वही बने रहेगा जो कि वैदिक काल में था। समाज में वैज्ञानिक और सुधारवादी सोच किस्तों और टुकड़ों में नहीं आती, वह एकमुश्त ही आती है। और भाजपा की अगुवाई वाली मोदी सरकार के बहुत से लोगों को यह गलतफहमी हो रही है कि वैदिक धर्मान्धता की पाखंडी बातों को करने से वोटर हिन्दुत्व के साथ जुड़े रहेंगे। आज हकीकत यह है कि देश के वोटरों का एक बड़ा हिस्सा शहरी जिंदगी के चलते हुए ऐसे पाखंड से बाहर आ चुका है, और भाजपा को पिछले आम चुनाव में अपनी जीत को ऐसे किसी पाखंड की वजह से हुई जीत नहीं मानना चाहिए। वह जीत यूपीए की बदहाली और उसके दीवालियापन की हार थी, उसे अपनी जीत मानकर अगर पूरे देश में कट्टरता और पाखंड का एक एजेंडा अगर बढ़ाया जाएगा, तो वह आगे जाकर भाजपा को चुनावी नुकसान भी देगा। आज देश में सभी को मिलकर पाखंड से उबरने की जरूरत है।