ऑपरेशन घरवापिसी से भी अधिक जरूरी एक वापिसी

30 दिसंबर 2014
संपादकीय
जब पूरा हिंदुस्तान तरह-तरह की नकारात्मक और निराशाजनक खबरों से घिरा हुआ है, तब दिल्ली से एक अच्छी खबर यह आती है कि शिक्षकों का एक संगठन स्कूल छोड़ चुके बच्चों की स्कूलवापिसी का अभियान शुरू करने जा रहा है। इसके बिना देश में ऐसा अंधकार छाया हुआ है कि लोग तरह-तरह से धर्म बदलवाकर घरवापिसी का अभियान चला रहे हैं, और पिछले सैकड़ों-हजारों बरसों के इतिहास को इस तरह वापिस घुमा देना चाहते हैं मानो दुनिया की जिंदगी एक दीवालघड़ी हो और उसके कांटों को घुमाकर हजार बरस पहले ले जाया जा सकता है। लोग कुदरत की विविधता से कुछ सीखना नहीं चाहते, और हर फूल को एक ही रंग का, एक ही आकार का देखना चाहते हैं। घरवापिसी के ऐसे तनाव भरे साम्प्रदायिक अभियान के बीच जब कोई भी तबका कोई छोटी सी भी अच्छी बात करता है, तो वह बहुत अधिक सुहानी लगने लगती है। जिन लोगों को धर्म बदलकर, या किसी शहरी-संगठित धर्म को पहली बार अपनाने वाले आदिवासियों को हिंदू बनाने के अभियान में किसी भी दर्जे की आक्रामकता जायज लगती है, उन लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि धर्म से अधिक जरूरी, जिंदा रहने के लिए रोटी, कपड़ा, और मकान, पढ़ाई और इलाज, जैसे कई हकों की तरफ लोगों की वापिसी कैसे करवाई जा सकती है? 
जिस वक्त के धर्म और धर्म बदलने की बात की जा रही है, उस वक्त लोगों के हक क्या थे, उस वक्त के आम लोग आज किस तरह आर्थिक और सामाजिक शोषण का शिकार होकर गरीब और भुखमरी के शिकार हो चुके हैं, और उनकी उनके हकों की तरफ वापिसी कैसे हो सकती है,  इस सोच को धर्म और जाति व्यवस्था कभी आगे बढ़ाना नहीं चाहेंगे। धर्म और जाति का सारा कारोबार लोगों को दबा-कुचला बनाए रखने के हिसाब से बनाया गया है, और ऐसे में ऑपरेशन स्कूलवापिसी से तो इस कारोबार को एक बड़ा खतरा खड़ा हो सकता है। अगर लोग पढ़-लिख गए, तो हो सकता है कि वे धर्म और जाति की पकड़ के बाहर हो जाएं। इसलिए इंसाफ की तरफ वापिसी, इंसान की तरफ वापिसी, कुदरत के दिए हुए बराबरी के हक की तरफ वापिसी की बात भी कोई नहीं करता। कुल मिलाकर कुछ सौ बरस पहले के एक कैलेंडर पर ले जाकर घड़ी को रोक देना चाहते हैं, और उससे अधिक पीछे तक की वापिसी कोई नहीं चाहते, कोई यह नहीं चाहते कि लोग इंसानियत तक वापिस चले जाएं, लोग धर्म के पहले तक वापिस चले जाएं।
देश में किसी भी विचारधारा के लोग अगर स्कूल और हकवापिसी के अभियान चलाते हैं, तो उसको बढ़ावा मिलना चाहिए। हम दिल्ली से परे बाकी जगहों पर भी सरकार के स्कूल दाखिला वाले सालाना अभियान से परे भी समाज की तरफ से ऐसे अभियान की राह देख रहे हैं जो कि धर्मों से परे बच्चों को पढऩा-लिखना सिखाए, और फिर बड़े होकर वे अपनी मर्जी का धर्म खुद तय कर सकें, या बिना धर्म के नास्तिक रहना तय कर सकें।

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