भारत रत्न से जुड़े मुद्दे

24 दिसंबर 2014
संपादकीय
जैसी कि पहले से घोषणा की जा चुकी थी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने नए चुनाव क्षेत्र बनारस के सबसे बड़े नेता पं. मदन मोहन मालवीय और भाजपा के सबसे बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न देने का फैसला लिया है। मालवीयजी पूरी जिंदगी कांग्रेस के सबसे बड़े नेताओं में से रहे, उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना भी की, और वे गांधी के समकालीन होने के साथ-साथ कुछ बार कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे। उनकी मौत के आधी-पौन सदी बाद उनको यह राष्ट्रीय सम्मान भाजपा के प्रधानमंत्री की ओर से दिया गया, और कांग्रेस पार्टी ने अपनी सरकारों के चलते यह फैसला नहीं लिया था। लेकिन खैर आज कांग्रेस सरकार के पिछले फैसलों के बारे में, लिए गए फैसलों के बारे में भी और न लिए गए फैसलों के बारे में भी, अधिक सोच-विचार की कोई जरूरत नहीं बची है। 
अब अगले साढ़े चार बरस भाजपा के पास पांच-दस और लोगों को भारत रत्न देने की संभावना बची हुई है, और देश का यह सबसे बड़ा सम्मान चुनावी राजनीति से लेकर धर्म और जाति तक, प्रदेशों के संतुलन तक, और सत्तारूढ़ पार्टी की रीति-नीति से प्रभावित रहता है। वैसे तो हर बरस केन्द्र सरकार द्वारा दिए जाने वाले पद्म सम्मानों को लेकर भी ये ही तमाम बातें सामने आती हैं, और हमारा तो हमेशा से यह कहना रहा है कि सरकारों को ऐसे सम्मान नहीं देने चाहिए। लोग अपने कामकाज से समाज के भीतर पर्याप्त सम्मान पाते हैं, और अक्सर सम्मानों की लंबी फेहरिस्त में कई नामों पर लोगों को हैरानी होती है, और उनके मुकाबले अधिक महत्वपूर्ण कई नामों को लिस्ट में न पाकर भी लोगों को सदमा लगता है। जब तक सरकारों के पास कोई ऐसे पैमाने न हों, कि जिनके आधार पर सरकार से परे का कोई निर्णायक मंडल पुरस्कार या सम्मान के ऐसे नाम तय कर सके, तब तक सरकार को ऐसे काम से बचना चाहिए। हम तो पत्रकारिता के भी ऐसे तमाम पुरस्कारों और सम्मानों के खिलाफ हैं, जो कि बिना किसी सार्वजनिक रूप से घोषित पैमानों के, बिना निर्णायक मंडल के, और बिना सबको खुला मौका दिए हुए तय हो जाते हैं, और दे दिए जाते हैं। 
दुनिया के सामने नोबल पुरस्कार तय करने के लिए जिस तरह की एक कमेटी रहती है, जिस तरह से नामांकन होते हैं, जिस तरह से नामों पर विचार होता है, उस तरह की एक प्रक्रिया सम्मान और पुरस्कार के लिए होनी चाहिए। हालांकि नोबल के इतिहास पर भी यह एक धब्बा लगा हुआ है कि उसके पैमानों पर गांधी को किसी बरस इस सम्मान के लायक नहीं पाया गया, लेकिन खुद नोबल कमेटी ने अपनी इस ऐतिहासिक गलती को कुबूल किया है। भारत में जब सरकार ऐसे सम्मान-पुरस्कार हर बरस तय करती है, तो उसे खुद अपनी राजनीतिक पसंद-नापसंद को परे रखना चाहिए। हमारे पाठकों को याद होगा कि कुछ बरस पहले जब यूपीए सरकार की पद्मभूषण या पद्मविभूषण की लिस्ट में उसके खुद के मंत्री प्रणब मुखर्जी का नाम था, तब भी हमने उसका विरोध किया था। आज देश भर में बहुत से तबकों में, बहुत से प्रदेशों में यह उम्मीद जागेगी कि उनके भी किसी महान व्यक्ति को भारत रत्न दिया जाए। अब देखना यह होगा कि अपने बाकी कार्यकाल में मोदी सरकार किस तरह के नामों को तय करती है। 

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