जब जुर्म करते पकड़े गए तो तबके की रियायत मांगी

5 दिसंबर 2014
संपादकीय
केन्द्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति को लेकर चल रहा विवाद जारी है, और उस मुद्दे पर हम यहां दुबारा लिखते हुए बातों को दुहराना नहीं चाहते, बस इतना चाहते हैं कि आज साध्वी को बचाने के लिए एक केन्द्रीय मंत्री ने यह तर्क दिया है कि चूंकि साध्वी दलित हैं, इसलिए उन पर हमले हो रहे हैं। यह बचाव बहुत ही लचर, अनैतिक, और राजनीतिक बचकानेपन का है। जो साध्वी हिन्दू धर्म की ऐसी जानकार होकर, भगवा पोशाक में एक आक्रामक भाषण दे रही है, और जिसकी तमाम सोच ब्राम्हणवादी-सनातनी हिन्दू सोच है, उसके दलित होने का तर्क देकर उसे बचाना बहस को पटरी से उतारने जैसा है। किसी के दलित होने का फायदा उसे तभी दिया जा सकता है, जब उसकी सोच दलित-कल्याण की सोच हो, और यह भगवा-मंत्री तो जिस सोच को सोच-समझकर सामने रख रही है, वह तो हिन्दू समाज के उसी तबके की सोच है जिसकी वजह से दलितों को हिन्दू धर्म छोड़कर कहीं बौद्ध बनना पड़ा, कहीं मुस्लिम बनना पड़ा। इसी बहस में एक जानकारी यह भी आई है कि केन्द्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने जो बचाव सामने रखा है, वह सही नहीं है, और यह साध्वी दलित न होकर ओबीसी तबके की है। लेकिन हम अभी इस विवाद में नहीं जा रहे, और हम सिर्फ इस सोच पर लिख रहे हैं। 
एक बहुत पुरानी बात है जब क्रिकेट खिलाड़ी मो. अजहरूद्दीन के खिलाफ क्रिकेट की मैच फिक्सिंग या सट्टेबाजी का एक केस सामने आया था, और अजहर ने अपने बचाव में यह कहा था कि वे मुस्लिम हैं इसलिए उनके खिलाफ दुर्भावना से केस दर्ज किया गया है। हमने कुछ हफ्ते पहले ही इसी जगह जाति और धर्म के आधार पर, रंग और नस्ल के आधार पर भारत से लेकर अमरीका तक भेदभाव पर लिखा था, लेकिन वह भेदभाव इन तबकों के कमजोर लोगों पर लागू होता है, इन तबकों के संपन्न और ताकतवर लोगों पर नहीं। ताकतवर लोग तो ऐसे भेदभाव के खिलाफ अदालत तक जाकर लडऩे की ताकत रखते हैं जैसे कि आज के इस मामले में यह साध्वी-मंत्री रखती है। 
अब सवाल यह है कि पूरे देश पर हमला करने के लिए जो साध्वी संविधान के खिलाफ जाकर, सज्जनता के खिलाफ जाकर, घोर साम्प्रदायिक हिंसा की बात न सिर्फ मंच और माईक से कहती है, बल्कि बाद में टीवी कैमरों के सामने भी कहती है, और आखिर में घिर जाने पर संसद में बिना मन से और आधी जुबान से माफी मांग लेती है, वह आज अचानक दलित होने की रियायत की हकदार कैसे हो सकती है? ऐसे हमलावर लोग चाहे जिस तबके के हों, अपने तबकों को बदनाम ही करते हैं। खासकर जब किसी का तबका किसी रियायत का हकदार होता है, तब अगर वैसे लोग कोई जुर्म करते हैं, हिंसक और अश्लील बात करते हैं, तो अपने पूरे के पूरे तबके को बदनाम करते हैं, और आरक्षण का फायदा पाने का हकदार समझा जाने वाला तबका ऐसे कुछ गिने-चुने हिंसक लोगों के जुर्म से बदनाम होता है। हमारा यह मानना है कि भारत की सामाजिक व्यवस्था में आरक्षित तबकों के खिलाफ गैरआरक्षित तबकों का सदियों पुराना एक पूर्वाग्रह चले आ रहा है, और ऐसे पूर्वाग्रह के चलते सवर्ण तबका हर वक्त यह साबित करने के फेर में रहता है कि आरक्षित तबके के लोग हक के लायक नहीं हैं, लीडरशिप के लायक नहीं हैं। ऐसे में इन तबकों को अपने वर्गहित में, अपने समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए दूसरे लोगों के मुकाबले अधिक समझदारी और जिम्मेदारी से काम करना चाहिए। 
कल नरेन्द्र मोदी ने संसद से अपील की थी कि वे इस साध्वी मंत्री के माफीनामे को मान ले और संसदीय काम को आगे चलने दे। ऐसे में उन्हीं के एक दूसरे मंत्री आज जब एक दलित तर्क को लेकर  विपक्ष पर पूर्वाग्रह का आरोप लगा रहे हैं, तो वे साध्वी के जुर्म को तो कम नहीं कर रहे, अपने प्रधानमंत्री की अपील के वजन को जरूर खत्म कर रहे हैं। सार्वजनिक जीवन में जो लोग जिम्मेदारियों की कुर्सियों पर बैठे हैं, उन्हें इस तरह की वर्ग, जाति, धर्म, नस्ल, और रंग आधारित रियायत नहीं दी जा सकती। और यह साध्वी मंत्री अपने कई दूसरे मंत्री साथियों की हिंसक और साम्प्रदायिक बातों को लगातार दुहराने वाली रही हैं, और उनके बचाव में एक दलित तर्क का इस्तेमाल सारे दलित तबके का अपमान है। अब इस बहस को हम तथ्यों के लिए छोड़ देते हैं कि वे दलित हैं, या ओबीसी हैं। और भारत में ऐसे तमाम तबकों के गैरराजनीतिक नेताओं को भी चाहिए कि वे अपने तबकों का ऐसा इस्तेमाल होने पर उसके खिलाफ आवाज उठाएं कि मुजरिम इन तबकों को अपनी ढाल की तरह इस्तेमाल न करें। 

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