छत्तीसगढ़ कांग्रेस में भीतरघात, कांग्रेस हाईकमान का बर्दाश्त परले दर्जे की राष्ट्रीय मिसाल

संपादकीय
31 दिसंबर 2015
छत्तीसगढ़ के एक उपचुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी को बिठाने के लिए करोड़ों की सौदेबाजी के सुबूत सामने आने में कुछ वक्त लग सकता है, लेकिन लोगों को बिना सुबूत यह भरोसा तो हमेशा से था कि इस प्रदेश में कांग्रेस की संभावनाओं को बरसों से बेचा जा रहा था। अब पहली बार ऐसी पुख्ता टेलीफोन रिकॉर्डिंग सामने आई है जिससे कांग्रेस की भयानक नौबत उजागर होती है। अभी हम किसी पर खरीदी-बिक्री का मामला साबित होने तक कोई तोहमत तो नहीं लगाते, लेकिन यह नौबत बताती है कि कांग्रेस की राष्ट्रीय लीडरशिप को छत्तीसगढ़ की कितनी परवाह है। चुनाव आयोग को, या अदालत को, या सरकार को किसी कार्रवाई के लिए सुबूतों का शक से परे साबित होना जरूरी होता है, लेकिन पार्टी के भीतर के फैसलों के लिए तो किसी फोरेंसिक जांच की जरूरत नहीं पड़ती है। कांग्रेस में अगर समझदारी होती, तो इस राज्य में उसकी सरकार शायद पहले भी बन गई होती, लोकसभा में उसके लोग अधिक पहुंचते, और म्युनिसिपलों से लेकर पंचायतों तक कांग्रेस के लोग अधिक जीतते। लेकिन इस पार्टी में भीतरघात की नौबत इतनी भयानक है कि भाजपा के कई लोगों को अपनी पार्टी की क्षमता से अधिक कांग्रेस के भीतरघातियों पर भरोसा रहते आया है, और आज जब कांग्रेस के भीतर की साजिशें उजागर होते दिख रही हैं, तो भाजपा सबसे अधिक निराश है। 
कोई राष्ट्रीय पार्टी परंपरागत रूप से कांग्रेस समर्थक रहे हुए राज्य में अपनी संभावनाओं को किस कदर तबाह कर सकती है, यह देखना हो तो छत्तीसगढ़ से बड़ी मिसाल शायद ही कहीं मिले। इस राज्य में कांग्रेसी उम्मीदवारों को हराने की जैसी खुली साजिश कांग्रेस के ही नेता करते आए हैं, उससे देश में एक रहस्यमय सवाल बरसों से खड़ा है कि कांग्रेसाध्यक्ष सोनिया गांधी ऐसे भीतरघात पर, साजिशों के ऐसे सिलसिले पर कभी कोई कार्रवाई क्यों नहीं करतीं? कांग्रेस के बड़े नेताओं के बीच इस रहस्य पर आमतौर पर चुप्पी रहती है, और फिर कुछ लोग अगर बंद कमरे में दबी जुबान से कुछ कहने को तैयार होते हैं, तो उन बातों से कांग्रेस हाईकमान का कोई सम्मान नहीं बढ़ता। इस प्रदेश में कांग्रेस को देखकर ऐसा लगता है कि यहां कांग्रेस संगठन के मुकाबले कांग्रेस हाईकमान खुद ही एक बी-टीम को ऐसे खड़ा करके रखता है कि कहीं पार्टी राज्य में जीत न जाए। यह रूख ऐसा है कि कांग्रेस के कुछ लोगों को अपने ही गोल पोस्ट में गोल दागने के लिए तैनात किया गया है। 
जहां तक राज्य में कांग्रेस उम्मीदवारों की खरीद-बिक्री का मामला है, तो यह बात महज कांग्रेस तक सीमित नहीं है। राज्य के पहले तीन बरसों में भाजपा के दर्जन भर विधायक जिस तरह कांग्रेसी मुख्यमंत्री के हाथों बिके थे, वह मामला बेमिसाल था। और शायद अगले विधानसभा चुनाव में उन 13 में से कुल 2 विधायक विधानसभा पहुंच पाए थे। लेकिन फिर भी ये मामले तो खबरों में इसलिए रहे कि यह दलबदल इतिहास में दर्ज है, कदम-कदम पर, हर चुनाव में होता हुआ भीतरघात सुबूतों के साथ तो इतिहास में दर्ज नहीं हो सकता, खबरों में हमेशा बने रहता है। देश के एक बड़े अखबार, इंडियन एक्सप्रेस की जिस ताजा रिपोर्ट से कांग्रेस की संभावनाओं को बेचने की टेलीफोन रिकॉर्डिंग सामने आई है, वह रिपोर्ट दिल्ली में कांग्रेस हाईकमान ने जरूर देखी होगी, और उस पर अगर अगले दस बरस भी कोई कार्रवाई नहीं होगी, तो भी कांग्रेस के लोगों को हैरानी नहीं होगी। 
छत्तीसगढ़ की कांग्रेस में भीतरघात की आजादी देश की किसी भी पार्टी में सबसे बड़ी आजादी है। और कांग्रेस पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर सहिष्णुता की बात करते हुए अपनी इस सहिष्णुता को एक सुबूत की तरह दिखा सकती है कि भीतरघात पर उसका बर्दाश्त किस परले दर्जे का है। जिस पार्टी के अपने घर को सम्हालने का होश नहीं है, वह सत्ता पर आने की हकदार भी नहीं रह सकती, लेकिन छत्तीसगढ़ के मौजूदा कांग्रेस-संगठन नेता पता नहीं क्यों एक दमदार विपक्ष का काम कर रहे हैं, और सत्ता में आने की संभावनाओं को पुख्ता कर रहे हैं, तब तक के लिए, जब तक कि कांग्रेस हाईकमान की बेमिसाल बर्दाश्त के तहत भीतरघात का अगला दौर संभावनाओं को बहाकर न ले जाए।

सोशल मीडिया पर बेचेहरा रिश्तों से जासूसी के जाल तक

संपादकीय
30 दिसंबर 2015

पाकिस्तान के लिए जासूसी के आरोप में भारतीय एयरफोर्स के अफसर एक अफसर को गिरफ्तार किया गया है जो कि फेसबुक पर एक महिला से दोस्ती करके  उसके जाल में फंस गया था, और उससे बातचीत के दौरान उसने वायुसेना की गोपनीय जानकारी उसको देना शुरू कर दिया। यह मामला भारतीय खुफिया एजेंसियों ने पकड़ा, और इस अफसर को बर्खास्त कर दिया गया है, और अब उसे अदालत में पेश किया गया है। यहां पर दो बातें निकलकर सामने आती हैं, एक तो यह कि सोशल मीडिया पर अपनी या सरकार की संवेदनशील बातों को पोस्ट करने, या चर्चा करने का क्या बुरा नतीजा हो सकता है। दूसरी बात यह कि सोशल मीडिया लोगों को बेचेहरा रिश्ते बनाने का सामान है, और लोग न सिर्फ जासूसी में, बल्कि ब्लैकमेलिंग में भी फंस सकते हैं। पूरी दुनिया में ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिनमें जीवनसाथी भी एक-दूसरे के किसी नकली मुखौटे के चलते हुए उन्हें पहचान नहीं पाते, और शादी से परे प्रेम संबंध में फंसकर अपनी हकीकत उजागर कर बैठते हैं, और रिश्ते टूटने की नौबत आ जाती है। 
भारत में भी फेसबुक जैसी सोशल वेबसाइट को लेकर रोज ही शायद कहीं न कहीं पुलिस में एक रिपोर्ट दर्ज होती है कि किस तरह वहां पर संबंध बनाकर धोखा दिया गया। दरअसल इंटरनेट और डिजिटल जमाना इतनी रफ्तार से आया है कि लोग उस संस्कृति के लिए अपने आपको तैयार नहीं कर पाए, और कई तरह की जालसाजी में फंस रहे हैं, अपने निजी जीवन के राज बांट रहे हैं, और किसी भी दिन उनके वीडियो, उनकी तस्वीरें, उनकी गोपनीय समझी जाने वाली बातें पोस्टर बनकर दीवारों पर चिपकी दिख सकती हैं। लोगों को नए जमाने की नई तकनीक के हिसाब से एक नई सावधानी सीखने की जरूरत है, और लोग उसके लायक तैयार नहीं हो पाए हैं। दरअसल भारत के लोगों को, यहां के अधिकतर लोगों को सामाजिक संबंधों की कोई आजादी पहले नहीं थी, और इंटरनेट के सोशल मीडिया ने उनको एक अभूतपूर्व उदार सामाजिक-संबंधों की संभावना जुटा दी है जिसकी वजह से लोग उसी तरह फिसल रहे हैं जिस तरह बर्फ पर पहली बार चलने वाले लोग पांव जमाकर चलना नहीं जानते, और फिसलते हैं। 
अब कम उम्र के लोग भी सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं, बेरोजगार भी सक्रिय हैं, और सरकारी नौकरी के लोग भी। इन सबको लेकर एक तरह की सामाजिक सीख की जरूरत है। बेरोजगारों को यह समझना चाहिए कि उनको किसी नौकरी के पहले आज कंपनियां सोशल मीडिया पर उनके चाल-चलन को खंगाल डालती हैं, और ऐसे में अगर उनका चाल-चलन गड़बड़ रहा, उनकी विचारधारा आपत्तिजनक रही, उनके दोस्तों का दायरा गड़बड़ रहा, तो उनको काम मिलने की संभावना भी गड़बड़ा जाती है। इसी तरह सरकारी नौकरी के बहुत से लोग हैं जिनको कि नौकरी की सेवा शर्तों के खिलाफ जाकर सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने की सजा भुगतनी पड़ती है। आज भारत में लोगों को सावधानी सीखने की जरूरत है, और इंटरनेट पर हैकिंग नाम की एक आसान और प्रचलित घुसपैठ कभी भी लोगों के तौलियों के भीतर झांककर दुनिया को तस्वीरें दिखा सकती है। 

मजदूर-कर्मचारी कल्याण नियमों के साथ दिक्कत यह है कि...

29 दिसंबर 2015
संपादकीय

केंद्रीय महिला-बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने कहा है कि निजी कंपनियों में काम करने वाली महिलाओं के लिए प्रसूति अवकाश बारह हफ्ते से बढ़ाकर 26 हफ्ते करने की तैयारी चल रही है। इसके लिए श्रम मंत्रालय से की गई पहल पर ऐसे कानून को बदलने पर विचार चल रहा है। दूसरी तरफ देश के श्रम कानूनों के तहत बहुत से ऐसे उद्योग हैं जिनके लिए केंद्र सरकार ने वेतनमान तय किए हुए हैं, जिनमें मीडिया भी एक है, और पत्रकार-गैरपत्रकार कर्मचारियों की तनख्वाह एक वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर घोषित की गई है। इसके अलावा देश में मजदूर कानून, या औद्योगिक सुरक्षा के कानून बहुत से हैं, पर्यावरण से जुड़े हुए कानून बहुत से हैं, और इन सबको देखें तो लगता है कि भारत के संगठित कर्मचारी और कामगार बड़ी अच्छी हालत में हैं। लेकिन हकीकत यह है कि सरकारें अपनी जिम्मेदारी कागजों पर नियम-कानून बनाकर, और कागजों पर वेतनमान तय करके पूरी कर लेते हैं, उन पर अमल का कोई ठिकाना नहीं रहता। 
जब मीडिया के लिए वेजबोर्ड लागू किया गया, तो बड़े-बड़े बहुत से अखबारों ने लोगों की अघोषित छंटनी कर दी, और उनको निकालने के बजाय, उनको इतने दूर-दूर तबादले पर भेज दिया, कि उनका नौकरी छोड़ देना तय सा था। वैसे भी कम्प्यूटर और इंटरनेट के बढ़ते इस्तेमाल के चलते मीडिया के लिए कम लोगों से अधिक काम निपटा लेना आसान हो गया है, और वेतन आयोग की सिफारिशों से अखबारों का एक बड़ा हिस्सा आर्थिक रूप से जर्जर हो जाने की नौबत आ गई। नतीजा यह हुआ कि नई नौकरियां निकलना कम हो गईं, और मीडिया लोगों को ठेके पर रखने लगा।
जब कभी किसी देश में मजदूर कानून वहां की बाजार की हकीकत को देखे बिना, और अमल की सरकार की ताकत और नीयत को आंके बिना बनाए जाते हैं, तो उनसे कभी कोई फायदा भी हो सकता है, और कभी कोई नुकसान भी हो सकता है। जब महिला कर्मचारियों को पुरूष कर्मचारियों के मुकाबले कई गुना अधिक चिकित्सकीय या प्रसूति अवकाश देना पड़ेगा, तो फिर हो सकता है कि निजी उद्योग और कारोबार महिला कर्मचारियों को रखने से कतराने लगें। आज निजी क्षेत्र में महिलाओं के लिए किसी तरह कोई आरक्षण नहीं है। ऐसे में निजी मैनेजर या देखेंगे कि महिलाओं की उत्पादकता अगर कम मिल रही है, तो उनको अधिक संख्या में क्यों रखा जाए? ऐसी कई तरह की दिक्कतें आ सकती हैं, जिनसे नफे के बजाय नुकसान अधिक हो सकता है।
हम कहीं भी महिला कर्मचारियों के हक के खिलाफ बात नहीं कर रहे, लेकिन अगर महिलाओं को नौकरी मिलना कम हो गया, तो फिर प्रसूति अवकाश अधिक मिलने से उनका क्या फायदा होगा? भारत अभी उन विकसित देशों जैसी अर्थव्यवस्था नहीं बन पाया है यहां पर कर्मचारियों को ऐसे और इतने हक दिए जा सकें। सरकार ऐसे नियम तो बना सकती है, लेकिन शायद बाजार उनसे बचने के रास्ते निकाल ले, और एक आसान रास्ता यही रहेगा कि महिलाओं को काम पर रखने से ही बचा जाए। आज बाजार में बहुत से कारोबार मंदी का रोना रो रहे हैं, ऐसे में हो सकता है कि मजदूर कल्याण की योजनाएं लागू न हो सकें। सरकार तो मौजूदा नियम-कायदों को भी जरा भी लागू नहीं करवा पाती है, और किसी मजदूर-विवाद पर अदालतों के फैसले भी बरसों तक नहीं आ पाते हैं। इसलिए नियमों-योजनाओं और उन पर अमल के बीच एक तालमेल बिठाना जरूरी है।

ऐतिहासिक गलतियों पर माफी मांगना बड़े दिल वाले ही कर...

संपादकीय
28 दिसंबर 2015

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कोरिया की लाखों महिलाओं को सेक्स-गुलाम बनाकर रखने वाले जापान ने तय किया है कि अपने इस ऐतिहासिक अपराध के लिए वह कोरिया से माफी मांगेगा। युद्ध के दौरान सैनिकों के सुख के लिए न सिर्फ जापान में, बल्कि दुनिया के कुछ और देशों ने भी ऐसे जुर्म सरकारी फैसलों के तहत किए हुए हैं। अब अगर ऐसी माफी मांगी जाती है, तो उससे इतिहास में दर्ज एक जख्म का दर्द कुछ हल्का हो सकता है। हिटलर ने जो यहूदियों के साथ किया, अमरीका ने जो जापान पर बम गिराकर किया, वियतनाम में पूरी एक पीढ़ी को खत्म करके किया, और अफगानिस्तान से लेकर इराक तक जो किया, अमरीका के माफीनामे की लिस्ट दुनिया की सबसे लंबी हो सकती है। लेकिन बात सिर्फ एक देश की दूसरे देश पर हिंसा की नहीं है। देश के भीतर भी ऐतिहासिक जुर्म होते हैं, और उनके लिए लोगों को, पार्टियों को, संगठनों को, जातियों और धर्मों को माफी मांगने की दरियादिली दिखानी चाहिए। ऑस्ट्रेलिया की एक मिसाल सामने है जहां पर शहरी गोरे ईसाईयों ने वहां के जंगलों के मूल निवासियों के बच्चों को सभ्य और शिक्षित बनाने के नाम पर उनसे छीनकर शहरों में लाकर रखा था, और अभी कुछ बरस पहले आदिवासियों के प्रतिनिधियों को संसद में बुलाकर पूरी संसद में उनसे ऐसी चुराई-हुई-पीढ़ी के लिए माफी मांगी। 
अब हम भारत के भीतर अगर देखें, तो गांधी की हत्या के लिए कुछ संगठनों को माफी मांगनी चाहिए, जिनके लोग जाहिर तौर पर हत्यारे थे, और हत्या के समर्थक थे। इसके बाद आपातकाल के लिए कांग्रेस को खुलकर माफी मांगनी चाहिए, 1984 के दंगों के लिए फिर कांग्रेस को माफी मांगनी चाहिए, इंदिरा गांधी की हत्या के लिए खालिस्तान-समर्थक संगठनों को बढ़ावा देने वाले लोगों को माफी मांगनी चाहिए, बाबरी मस्जिद गिराने के लिए भाजपा को और संघ परिवार के बाकी संगठनों को माफी मांगनी चाहिए, गोधरा में ट्रेन जलाने के लिए मुस्लिम समाज को माफी मांगनी चाहिए, और उसके बाद के दंगों के लिए नरेन्द्र मोदी और विश्व हिन्दू परिषद जैसे लोगों और संगठनों को माफी मांगनी चाहिए। इस देश के दलितों से सवर्ण जातियों को माफी मांगनी चाहिए कि हजारों बरस से वे किस तरह एक जाति व्यवस्था को लादकर हिंसा करते चले आ रहे हैं। और मुस्लिम समाज के मर्दों को औरतों से माफी मांगनी चाहिए कि किस तरह एक शहबानो के हक छीनने का काम उन्होंने किया। इसी तरह शाहबानो को कुचलने के लिए कांग्रेस पार्टी को भी माफी मांगनी चाहिए जिसने कि संसद में कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटा। 
दरअसल सभ्य लोग ही माफी मांग सकते हैं। माफी मंागना अपनी बेइज्जती नहीं होती है, बल्कि अपने अपराधबोध से उबरकर, दूसरों के जख्मों पर मरहम रखने का काम होता है। दुनिया के कई धर्मों में क्षमायाचना करने, या जुर्म करने वालों को माफ करने की सोच होती है, लेकिन ऐसे धर्मों को मानने वाले लोग भी रीति-रिवाज तक तो इसमें भरोसा रखते हैं, असल जिंदगी में इससे परे रहते हैं। लेकिन नए साल के करीब आने के मौके पर हमने अभी-अभी यहां पर लिखा था कि लोग कौन से संकल्प ले सकते हैं। इसमें आज की हमारी यह चर्चा भी जुड़ सकती है क्योंकि बीती जिंदगी की गलतियों और गलत कामों से अगर उबरना है, एक बेहतर इंसान बनना है, तो उन गलत कामों को मानकर, उनके लिए माफी मांगे बिना दूसरा कोई रास्ता नहीं है।

नए साल के मौके पर चर्चा करें खामियों से आजादी पाने और खूबियों को हासिल करने की

संपादकीय
27 दिसंबर 2015
नया साल दो-चार दिन में ही दरवाजा खटखटाते आने वाला है, और नववर्ष की पूर्वसंध्या पर लोग यह तय करने लगेंगे कि आने वाले बरस में वे क्या-क्या करेंगे, और क्या-क्या नहीं करेंगे। यह मौका बहुत से सपनों को देखने का होता है, और अपने आपके लिए तरह-तरह के झांसे खड़े करने का भी होता है। लेकिन बेहतर यह है कि लोग अपने इस बीत रहे बरस पर एक नजर डालें, यह याद करें कि पिछले बरस इस हफ्ते में उन्होंने क्या-क्या तय किया था, और खुद से किए गए उन वायदों का साल भर में क्या हुआ, वैसा क्यों हुआ, और उसके बाद इस बरस के बारे में सोचना चाहिए। लेकिन नए साल का यह मौका नए कैलेंडर, नई डायरी, और नए संकल्पों का रहता है, और इसका इस्तेमाल भी करना चाहिए। 
दुनिया में भला ऐसे कौन से इंसान हो सकते हैं जिनमें कोई खामियां न हों, और जिनको अपने आपको बेहतर बनाने की कोई संभावनाएं न सूझ सकें। लोगों को अगले दो-तीन इस बारे में सोचना चाहिए कि नए साल की पहली सुबह से वे कौन से बुरे काम छोड़ सकते हैं, और कौन से अच्छे काम शुरू कर सकते हैं। हमने शायद पिछले बरस भी ऐसे ही मौके पर इन्हीं बातों को लिखा था, और हर बरस इसकी जरूरत भी है। आगे हम जो लिखने जा रहे हैं, वे बहुत से लोगों को कुछ अधिक मामूली बातें लग सकती हैं, लेकिन हमारे पाठकों के शुभचिंतक होने की वजह से हमको यह लगता है कि इन बातों को लिखना जरूरी है ताकि पढऩे वाले सभी लोग आसपास भी इसकी चर्चा कर सकें, और परिवार के सारे लोग, दोस्तों की सारी टोली, दफ्तरों के सारे लोग कुछ बेहतर कर सकें। 
आज जो सबसे जरूरी बात लगती है वह दुपहिया चलाने वालों के हेलमेट लगाने की है, और कार चलाने वालों के सीट बेल्ट लगाने की है। चलाने वालों के साथ-साथ बैठने वालों के लिए भी यह बात उतनी ही जरूरी है। अभी जो लोग ऐसा नहीं कर रहे हैं उन्हें एक तारीख का इंतजार करने के पहले ही इसे पढ़ते ही ऐसा करना चाहिए, क्योंकि इन शब्दों के छपने से लेकर एक तारीख के बीच बहुत सी जिंदगियां खत्म होने जा रही हैं, जो कि हेलमेट या सीट बेल्ट की सावधानी नहीं बरतेंगी। 
दूसरी बात जो इस पहली बात की तरह ही हर किसी को मालूम है, लेकिन लोग अपने आपको उस खतरे से भी परे मानकर चलते हैं, वह है तम्बाकू की। सिगरेट से लेकर गुटखा तक, हिन्दुस्तान में मुंह, गले, और फेफड़े के कैंसर के सबसे बड़े जिम्मेदार सामान हैं। शायद ही कोई इंसान हो जिसे यह जानकारी न हो, लेकिन फिर भी लोग अपनी इस खतरनाक आदत को छोड़ते नहीं हैं, और अपने घरवालों के कंधों पर अपनी लाश के बोझ की तस्वीर साफ-साफ देखते हुए भी उसे अनदेखा करते चलते हैं। यह मौका पूरे परिवार और तमाम दोस्तों के यह तय करने का भी है कि वे खुद भी इस आदत को छोड़ें, और आसपास के तमाम लोगों से इसे छुड़वाने की कोशिश भी करें। तम्बाकू और कैंसर का जन्मजात रिश्ता है, और इसे सामने आने में वक्त लग सकता है, लेकिन ऐसी मौत से बचाव नहीं हो सकता। और जितने पैसे लोग इस लत पर खर्च करते हैं, उतने पैसों में वे रोज कम से कम एक-दो भूखे लोगों के पेट भर सकते हैं। 
एक बात यहां पर यह भी याद दिलाना ठीक है कि आज मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के जमाने में लोग अर्जी-फर्जी तस्वीरों और बातों को, एक-दूसरे के बारे में या किसी नेता, किसी चर्चित इंसान के बारे में लिखी गई गंदी बातों को तेजी से आगे बढ़ाते चलते हैं। इस नए साल में लोगों को इस बारे में भी सोचना चाहिए कि कल को अगर उनके परिवार की किसी लड़की या महिला के बारे में वैसी बातें फैलने लगें, तो उनके दिल पर क्या गुजरेगी, और वे उसे कैसे रोक सकेंगे? सच या झूठ किसी भी तरह की ऐसी बात, जिससे भला किसी का नहीं है, लेकिन निजी जिंदगी की निजता जिससे खत्म होती हो, ऐसी बातों को फैलाने वाले दूसरों की इज्जत तो कम बिगाड़ते हैं, अपनी खुद की इज्जत अधिक बिगाड़ते हैं कि वे किस तरह की बातें फैलाने वाले गैरजिम्मेदार या मुजरिम किस्म के लोग हैं। लोगों को यह तय करना चाहिए कि वे नफरत फैलाने वाली बातें, हिंसा फैलाने वाली बातें, किसी की निजी जिंदगी में ताकझांक करके निकाली गई बातें आगे बढ़ाने के पहले पल भर को यह सोचेंगे कि यही सब अगर उनके परिवार के साथ होगा तो उनको कैसा लगेगा। 
इसी तरह सार्वजनिक जीवन में लोगों को अपने बर्ताव के बारे में सोचना चाहिए कि गंदगी फैलाने, गालियां बकने, लोगों के साथ बदसलूकी करने, सड़कों पर अपनी गाडिय़ां अड़ाने जैसे काम करके वे अपनी खुद की बेइज्जती अधिक करते हैं, दूसरों के लिए दिक्कत कम खड़ी होती है। आज कदम-कदम पर लोग कैमरों और वीडियो कैमरों से लैस हैं, आपकी हर हरकत की कोई वीडियो रिकॉर्डिंग कर सकते हैं, और बात की बात में वैसी क्लिप इंटरनेट पर, मोबाइल फोन फैल सकती है। ऐसी गंदगी फैलाने वाले लोग अपनी खुद की एक बड़ी बदनामी करा सकते हैं। इसलिए गालियां देने के पहले भी यह सोच लें कि अपने मां-बाप के सामने, अपने बच्चों के सामने वे कौन-कौन सी गालियां दे सकते हैं, क्योंकि फैला हुआ वीडियो तो उनके अपने घर तक भी पहुंच ही सकता है। 
हम इस लिस्ट को अखबार के कई पन्नों तक फैला सकते हैं, लेकिन हम इस चर्चा को शुरू करके लोगों के लिए छोड़ रहे हैं, और उम्मीद करते हैं कि हमारे पाठक अपने-अपने घर-बाहर के दायरों में इस पर चर्चा करेंगे, और अपने-अपने हिसाब से तय करेंगे कि वे इस अगले बरस में कौन-कौन सी खामियों से आजादी पाएंगे, और कौन-कौन सी खूबियों को हासिल करेंगे। जो लोग अपने आपको बेहतर नहीं बना पाएंगे, वे दुनिया में बेहतर बनने वाले बाकी लोगों के मुकाबले वैसे भी पिछड़ जाएंगे, और उनके मुकाबले वैसे भी खराब दिखने लगेंगे। इसलिए जिंदगी के आने वाले दिन बेहतर बनाने की कोशिश करना हर जिम्मेदार की जिम्मेदारी है। 

डॉक्टर-इंजीनियर बनाने के दबाव में बनते मुर्दे और शिक्षा से जुड़ी कुछ और बातें

संपादकीय
26 दिसंबर 2015

राजस्थान के कोटा में देश भर से पहुंचे छात्र-छात्राओं को आईआईटी, आईआईएम, और मेडिकल कॉलेजों जैसी जगहों पर दाखिले के लिए तैयार करने के कई कारखाने चल रहे हैं। एक-एक बच्चे पर लाखों रूपये साल खर्च होते हैं, और उनको स्कूली पढ़ाई के घंटों से बचाने के लिए इस उद्योग के शहर में यही कोचिंग सेंटर फर्जी स्कूलें भी चलाते हैं ताकि वहां गए बिना, पढ़े बिना बच्चों को हाजिरी मिलती रहे, और वे पूरी ताकत बड़े कॉलेजों के दाखिला-इम्तिहान की तैयारी में लगा सकें। यह एक सैकड़ों या हजारों करोड़ साल का कारोबार हो गया है, और इसने भारत की शिक्षा व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी की है। आज इस पर लिखने की जरूरत इसलिए आ पड़ी है कि कोटा के ऐसे बच्चों में कल एक लड़के ने खुदकुशी कर ली, और वह इस बरस का 29वां ऐसा बच्चा है। मां-बाप के लिए वह लिख छोड़ गया है कि उन्होंने उस पर बहुत खर्च किया है, और अब वह उनसे अगले जन्म में मिलेगा। 
क्या भारत की सबसे बड़ी शैक्षणिक संस्थाएं दाखिले के एक ऐसे तरीके पर निर्भर हैं जिसे मोटी रकम खर्च करके, जिम में बहाए हुए पसीने की तरह दिमागी पसीना बहाकर जीता जा सकता है? अगर आंकड़े सही हैं, तो इससे पता लगता है कि आईआईटी और आईआईएम की बहुत सी सीटें कोटा जैसे कारखाने से निकले बच्चों से भर जाती हैं, या ऐसे ही कुछ कम मशहूर दूसरे शहरों के ऐसे ही प्रशिक्षण संस्थानों के रास्ते भर जाती हैं। तो ऐसे में एक सवाल यह उठता है कि जिनके पास ऐसे महंगे कारखानों में दाखिले के लिए लाखों रूपये नहीं हैं, क्या वे लोग ऐसी प्रतिष्ठित और ऊंची पढ़ाई का हक खो बैठते हैं, और यह किस तरह की सामाजिक बराबरी है जो अमीरों और गरीबों के बीच मौकों का इतना बड़ा फासला पैदा कर देती है? यह कैसा लोकतंत्र है जिसमें पढऩे का हक कोटा जैसी महंगी दुकानों के कोटे बंट जाता है? 
अब इस मुद्दे का एक दूसरा पहलू यह है कि पढ़ाई में जिसे जहां चाहे दाखिला मिले, या न मिले, क्या ऐसी अस्वाभाविक तैयारी में बच्चों को इस तरह झोंक देना मां-बाप की समझदारी है जिसमें बच्चे जान दे देने को बेबस होते हैं? और यह तो हम इस बरस की उन 29 आत्महत्याओं की बात कर रहे हैं जो कि पुलिस रिकॉर्ड में आ चुकी है। उन हजारों बच्चों की बात तो सामने आ भी नहीं पाती जो मरने से एक कदम पीछे टंगे हुए हैं, और भारी मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं। मां-बाप अपने बच्चों को अपनी खुद की हसरतों को पूरा करने के लिए इस कदर झोंक देते हैं कि वे बच्चे न तो अपनी पसंद की पढ़ाई कर पाते, और न ही अपनी क्षमता की। मां-बाप की उम्मीदों को पूरा करने, उन पर खरा उतरने का दबाव इतना बड़ा रहता है कि भारत में मां-बाप की इज्जत करने वाले लाखों-करोड़ों स्कूली बच्चे अपनी हसरतों को कुचलते हुए मां-बाप द्वारा छांटी गई पढ़ाई को करने को बेबस रहते हैं। ऐसे तरीकों से कोई बच्चे बड़े कॉलेजों में चाहे पहुंच जाएं, यह उनकी जिंदगी को बेहतर बनाने का तरीका नहीं है। और भारत में सामाजिक स्तर पर मां-बाप के लिए ऐसे व्यापक परामर्श की जरूरत है जो कि अपने बच्चों को उनकी हसरतों के मुताबिक आगे बढऩे का मौका देने की समझ दे। 
दुनिया के विकसित और सभ्य देश इस बात की मिसाल हैं कि बच्चे अपनी जिंदगी में सबसे आगे उन्हीं दायरों में बढ़ते हैं जो उनकी पसंद के होते हैं। उनकी प्रतिभा और उनका हुनर उन्हीं क्षेत्रों में उन्हें सबसे आगे ले जाता है जो उन्हें पसंद होते हैं। भारत में एक किस्म से ऐसी बेअक्ल दौड़ चलती रहती है जिसके सामने गिनी-चुनी चार-पांच मंजिलें रहती हैं। यह पूरा सिलसिला एक ऐसी बाजार व्यवस्था को माकूल बैठता है जो कि ऐसे गिने-चुने कॉलेज चलाती है, और कॉलेजों के भी पहले तैयारी की ऐसे कारखाने चलाती है। यह तो हम सिर्फ दो पहलुओं पर बात कर रहे हैं। इनसे थोड़ा सा परे हटें, तो देश में बाकी किस्म के लाखों ऐसे निजी कॉलेज हैं जो कि नाम के लिए तो किसी शिक्षा समिति के चलाए हुए हैं, लेकिन वहां पर कैपिटेशन फीस की ऐसी बड़ी दुकानें चलती हैं, जिनकी पहुंच देश के सबसे बड़े नेताओं तक होती हैं। ऐसे में देश अपनी तमाम संभावनाओं को एक पैसे वाले तबके के हाथों बेच रहा है, पढऩे की संभावनाओं को भी, और नौकरी की संभावनाओं को भी। और यह सिलसिला न थमते दिखता है, न बंद होते दिखता है, और न ही वापिस लौटते दिखता है। ऐसे में गरीब के पास क्या बगावत के अलावा और कोई रास्ता बचता है? 
भारत की शिक्षा से जुड़े हुए ऐसे मुद्दों पर देश भर में सामाजिक चर्चा की जरूरत है, लेकिन शिक्षा के कारखानेदार शायद ही समाज के लोगों को ऐसी चर्चा के लिए एकजुट होने दें। बाजार का कारोबार मीडिया को भी फायदा पहुंचाता है, और ताकत की कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों को भी, ऐसी दुधारू गाय को कोई क्यों छेड़ेंगे?






















































मोदी और नवाज शरीफ एक बहुत ही ऐतिहासिक मोड़ पर

संपादकीय
25 दिसंबर 2015

भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बहुत ही खतरनाक रफ्तार की विदेश नीति सामने रख रहे हैं। अभी-अभी कुछ मिनट पहले अफगानिस्तान के संसद भवन का उद्घाटन करने के साथ-साथ उनकी ट्वीट से यह खबर आई कि वे काबुल से दिल्ली लौटते हुए लाहौर में रूकेंगे, और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को उनके जन्मदिन की सालगिरह की बधाई देते हुए आएंगे। विदेश नीति पर बारीकी से नजर रखने वाले लोग एकदम हक्का-बक्का हैं कि जिस पाकिस्तान के साथ सरहद से लेकर राजधानियों तक अभी कुछ हफ्ते पहले तक इतनी तनातनी चल रही थी कि दोनों देशों के बीच क्रिकेट तक के आसार नहीं बन पाए हैं, उन दोनों देशों के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की एक बैठक एक तीसरे देश में अघोषित और अचानक हुई। उसके तुरंत बाद भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को मोदी सरकार में पहली बार इतना महत्वपूर्ण काम करने मिला, और वे बिना प्रधानमंत्री अकेले पाकिस्तान जाकर सबसे मिलकर आईं। और आज मोदी पाकिस्तान होते हुए भारत लौट रहे हैं, इन दोनों देशों के बीच ऐसा पहली बार हो रहा है। अभी तक कोई प्रधानमंत्री दूसरे को जन्मदिन की बधाई देने उसके देश नहीं गया था, और हम हैरान होने के साथ-साथ इस सद्भावना के हिमायती भी हैं। सवाल यही है कि मोदी की ऐसी पहल, या पाकिस्तान की ऐसी गर्मजोशी के बाद अगर तनाव के कोई हालात सामने आए तो क्या होगा? लेकिन हम आशंकाओं से डरकर पहल न करने के खिलाफ हैं, और इन दोनों देशों के बीच खुले दिल से बातचीत की जो नई पहल हो रही है, उसे खतरों के बीच भी एक बहुत ही सकारात्मक बात मान रहे हैं। 
कुछ लोगों का यह भी अंदाज है कि मोदी और नवाज शरीफ एक ऐसी नौबत लाना चाहते हैं जब अगले बरस का नोबल शांति पुरस्कार तय हो रहा हो, और दुनिया के सामने शांति की एक बड़ी मिसाल पेश करने के नाम पर, पेश करने के लिए इन दोनों प्रधानमंत्रियों को संयुक्त रूप से यह पुरस्कार मिल जाए। ऐसा होना इन दोनों नेताओंं के इतिहास में तो पहली बार होगा ही, यह इन दोनों देशों के इतिहास में भी पहली बार होगा। भारत और पाकिस्तान के तनाव और फौजी-आतंकी टकराव का आधी सदी से अधिक का इतिहास है। और ऐसे में सरहद से लेकर देश के भीतर दुश्मन के आतंकी हमलों से चौकसी तक के काम दोनों देशों पर इतने महंगे पड़ रहे हैं कि गरीबों के मुंह का निवाला छीनकर फौजी सामान खरीदे जा रहे हैं, जासूसी और निगरानी रखने की मशीनें खरीदी जा रही हैं। 
सरहद के दोनों तरफ हिन्दुओं और मुस्लिमों, और सिखों की रिश्तेदारियां, दोनों के तीर्थ, दोनों के सांस्कृतिक केन्द्र इस तरह बिखरे हुए हैं कि मानो एक बदन के भीतर दिल और दिमाग के बीच कोई दीवार खड़ी कर दी गई हो। दोनों देशों के संगीतकार, कलाकार, खिलाड़ी, और फिल्मकार लगातार अमन की कोशिश करते हैं, और दोनों देशों की जनता के बीच एक-दूसरे के लिए तब तक कोई नफरत खड़ी नहीं होती है, जब तक कि कोई धार्मिक, साम्प्रदायिक, या राजनीतिक नेता, या कोई फौजी वर्दी नफरत की बातें नहीं भड़काती हैं। ऐसे में भाजपा के चुनाव प्रचारक के रूप में नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान के खिलाफ चाहे जो कुछ कहा हो, आज अगर वे भारतीय प्रधानमंत्री की हैसियत से पाकिस्तान के साथ दोस्ती को नई ऊंचाईयों पर ले जाना चाह रहे हैं, और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ खुलकर इसमें उनके साथ हैं, तो हम भी ऐसी पहल के हिमायती हैं। हम भारत और पाकिस्तान के राजनीतिक विपक्ष से यह भी उम्मीद करेंगे कि इन दोनों नेताओं, या इनकी पार्टियों द्वारा पहले की गई भड़काऊ बातें याद न दिलाएं, और इन दोनों देशों के इतिहास में एक बेहतर दिन आने की संभावना में अपना योगदान दें। पिछले कुछ हफ्तों में भारत में कांग्रेस पार्टी ने बड़ी गैरजिम्मेदारी से बीते दिनों की भड़काऊ बातों को याद दिलाया था, और मोदी पर ताना कसा था कि उन्होंने पाकिस्तान को सबक सिखाने की कौन-कौन सी बातें कही थीं। हम ऐसे भड़कावे के खिलाफ हैं। राजनीतिक विरोध के दूसरे घरेलू मोर्चे हो सकते हैं, लेकिन भारत और पाकिस्तान के बीच हथियारों की जगह बच्चों का खाना, उनकी दवा, उनकी किताबें खरीदी जाएं, तो किसी राजनीतिक पार्टी को ऐसी संभावना का विरोध नहीं करना चाहिए। मोदी और नवाज शरीफ एक बहुत ही ऐतिहासिक मोड़ पर हैं, और उनको अपने-अपने घरेलू विरोधों को अनदेखा करते हुए दुनिया का एक नया इतिहास रचना चाहिए। 

सत्ता के असर में भाजपा का चाल-चलन भी कांग्रेस जैसा

संपादकीय
24 दिसंबर 2015

भाजपा के भीतर वित्त मंत्री अरूण जेटली के क्रिकेट मामलों को लेकर जो बखेड़ा खड़ा हुआ है, वह पार्टी के लिए एक बड़ी बेचैनी की वजह बन गया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की चेतावनी के बावजूद सांसद कीर्ति आजाद ने जेटली के खिलाफ मोर्चा जारी रखा है, और भाजपा के भीतर-बाहर रहते आए दो और बड़बोले जेटली-विरोधी नेता, राम जेठमलानी, और सुब्रमण्यम स्वामी भी कीर्ति आजाद के साथ, या जेटली के खिलाफ जुट गए हैं। हालांकि किसी भी इतनी बड़ी पार्टी में ऐसी बगावत न कोई बड़ी बात है, और न ही नई, लेकिन फिर भी भाजपा के सामने आज अपनी छवि का सवाल है कि उसके एक सबसे दिग्गज माने जाने वाले नेता, वित्त मंत्री अरूण जेटली क्रिकेट संघ के अपने कार्यकाल के बड़े भ्रष्टाचार का आरोप झेल रहे हैं, और पार्टी के ही सांसद याद दिला रहे हैं कि मोदी ने कहा था कि न खाऊंगा, न खाने दूंगा। 
चूंकि यह मामला दिल्ली से जुड़ा हुआ है इसलिए इसे मीडिया का अनुपातहीन अधिक कवरेज मिलता है, और भाजपा के भीतर जो लोग मोदी, शाह, या जेटली के आलोचक हैं, या उनसे असहमत हैं, उनको भी इस मोर्चे से एक मौका मिल रहा है। फिर एक बात यह भी है कि जेटली पंजाब भाजपा से आए हैं, वहां राज्य विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं, जेटली लोकसभा का चुनाव वहां से बुरी तरह हारे हुए हैं, और आज वहां भाजपा की भागीदार, सत्तारूढ़ अकाली दल से भी जनता की भारी नाराजगी दिख रही है। ऐसे में पंजाब में जेटली की वजह से छोटे या बड़े कैसे भी एक और नुकसान की वजह बन सकती है। 
कीर्ति आजाद को निलंबित करना भाजपा के लिए जरूरी था क्योंकि पार्टी के निर्देश के खिलाफ लगातार अभियान चलाना, पार्टी में और लोगों को भी उकसाने वाला हो सकता था। फिर हर पार्टी की यह जिम्मेदारी भी होती है कि वह सही या गलत कुछ भी होने पर भी अपने बड़े लोगों को बचाने का काम करे। जेटली चाहे इस मामले में गलत भी हों, पार्टी उन्हें बचाते दिख रही है, यह एक अलग बात है कि भाजपा संसदीय दल की बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिन शब्दों में जेटली का बचाव किया है, वह बचाव अधिक है या उन पर हमला अधिक है, यह लोगों को समझ नहीं आ रहा है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से हवाला मामले से लालकृष्ण अडवानी पाक-साफ निकलकर आए थे, उसी तरह इस मामले से जेटली बाहर निकलकर आएंगे। अब उस वक्त तो हवाला आरोपों के आते ही अडवानी को इस्तीफा देना पड़ा था, तो क्या आज यह जेटली के लिए भी एक इशारा है? 
अभी जब हम यह लिख ही रहे हैं, उसी वक्त खबर आ रही है कि भाजपा के वृद्धाश्रम, मार्गदर्शक-मंडल की एक बैठक हो रही है जिसमें कीर्ति आजाद के मामले पर विचार किया जाएगा। यह मार्गदर्शक मंडल पहले भी बिहार-चुनाव जैसे मामले पर विचार कर चुका है, और अपनी बेचैनी जाहिर कर चुका है, लेकिन उसका नतीजा कुछ नहीं निकला। जिस तरह एक वक्त कांग्रेस पार्टी पर अकेली इंदिरा गांधी का राज चलता था, उसी तरह आज भाजपा के भीतर नरेन्द्र मोदी का राज चल रहा है, और उनसे असहमति पूरी तरह से महत्वहीन दिख रही है। इक्का-दुक्का आजाद, स्वामी, जेठमलानी एक बड़े से पेट के भीतर जमालघोटा के बीज की तरह असहमति वाले लोग हैं, और यह असहमति कोई असर डालने लायक ताकत नहीं रखती है। आज मोदी-अमित शाह का जो एकाधिकार केन्द्र सरकार और भाजपा पर है, वह अभूतपूर्व है, और उसकी कोई काट किसी के पास नहीं है। 
दूसरी बात यह भी कि ईमानदारी जैसे मुद्दे पर पिछले महीनों में मोदी सरकार ने जिस किस्म की बर्दाश्त दिखाई है, उससे अब यह भी मुद्दा नहीं रह गया कि भ्रष्टाचार सामने आने पर सरकार की सेहत पर कोई फर्क पड़ेगा। भाजपा का कुल रूख केन्द्र से लेकर उसकी सरकारों वाले राज्यों तक अब वैसा ही रह गया है जैसा कि कांग्रेस के भ्रष्टाचार के दिनों में रहता था। यह सब देखकर लगता है कि सत्ता का अपना एक ऐसा असर होता है जो लोगों की धार को खत्म कर देता है, नैतिकता के सारे दावों को फीका कर देता है, और पक्ष-विपक्ष के चाल-चलन में फर्क मिटा देता है।

दौलतमंद मुजरिम से वसूलना चाहिए जांच-मुकदमे का खर्च और मोटा मुआवजा भी

संपादकीय
23 दिसंबर 2015

देश में इन दिनों ऐसे चर्चित जुर्म छाए हुए हैं जिनके पीछे करोड़पति-अरबपति लोग पकड़ाए हैं। बड़े लोगों के शामिल होने से खबरें भी बड़ी बन जाती हैं, और पुलिस थाने से लेकर अस्पताल या अदालत तक ऐसे लोगों की हिफाजत के लिए, भीड़ को दूर रखने के लिए पुलिस को खासी मशक्कत करनी पड़ती है। जो बड़े लोग छूट जाते हैं, उनके बारे में हमको कुछ नहीं कहना है, लेकिन जो बड़े लोग मुजरिम साबित होते हैं, उनसे सरकार को जांच और मुकदमे का खर्च वसूलना चाहिए। ऐसे लोग अपने पीछे जमीन-जायदाद छोड़ जाते हैं, और देश के कानून में यह फर्क करने की जरूरत है कि संपन्न अपराधी को सजा दिलवाने में सरकार गरीबों के हक का पैसा खर्च न करे। कुछ लोगों को यह सलाह अटपटी लग सकती है क्योंकि न्याय की नजर में गरीब और अमीर का फर्क नहीं रखा गया है, लेकिन हमारी यह सलाह बहुत ही न्यायसंगत इसलिए है क्योंकि देश की जांच और मुकदमे की क्षमता बड़ी सीमित है, और लाखों बेकसूर बिना सुनवाई, अधूरी जांच, और अदालतों की बाकी किस्म की लेटलतीफी के चलते जेलों में बंद हैं, और अदालतें आधी सदी से अपनी क्षमता बढ़ाने की मांग करती चल रही है। यह आए दिन होता है कि पुलिस अदालत में किसी अभियुक्त को पेशी पर न लाने के लिए अर्जी दाखिल करती है कि पुलिस-बल न होने की वजह से पेश नहीं किया जा रहा, और अगली तारीख दी जाए। 
अब हम कुछ मामलों को देखें, जैसे संजय दत्त का मामला, मनु शर्मा का मामला, इंद्राणी मुखर्जी का मामला, या सुब्रत राय सहारा से लेकर विजय माल्या जैसे लोगों के अभी चल रहे मामले, इनमें से जो भी और जब भी मुजरिम साबित हों, उनसे जांच और मुकदमे की पूरी लागत सरकार को वसूल करना चाहिए। किसी गरीब से तो यह लागत नहीं ली जा सकती, और संपन्न अपराधी पर सरकार ऐसा खर्च नहीं कर सकती। हम ऐसे ताकतवर लोगों के पैसों से उनकी जांच या उनके मुकदमे तेज करने, या उनके पक्ष में कोई फैसला करने, या सजा में रियायत की बात नहीं कर रहे। हम महज सजा हो जाने के बाद इस जुर्म पर हुए सरकारी खर्च को इन लोगों की दौलत से वसूलने की बात कर रहे हैं। जिस तरह दुपहिए पर थोड़ा जुर्माना लगता है, और बड़ी गाड़ी पर अधिक जुर्माना लगता है, वैसा ही बड़े लोगों के जुर्म पर भी होना चाहिए। एक अपराधी की छोड़ी हुई दौलत का इस्तेमाल उसका परिवार करे, और जांच का बोझ देश उठाए, ये ठीक नहीं है। 
भारत के कानून में अमरीकी अंदाज में एक और फेरबदल करने की बात बहस में बनी हुई है जिसे अमरीकी कानूनी-जुबान में प्ली-बार्गेन कहते हैं। इसमें मुजरिम और शिकार परिवार के बीच कुछ तरह के मामलों में कुछ तरह का समझौता अदालत से परे भी हो सकता है जिसे अदालत मंजूर करती है, और जांच एजेंसी के साथ भी मुजरिम का ऐसा समझौता हो सकता है जिसे अदालत मानती है। भारत में जो लोग संपन्न लोगों के जुर्म के शिकार होते हैं, उन्हें मुजरिम को सजा से कुछ भी हासिल नहीं होता। ऐसे मामलों में भी हमने यह लिखा है कि जब यह साबित हो जाए कि मुजरिम संपन्न हैं, और उसके जुर्म के शिकार कमजोर तबके के हैं, तब मुजरिम की संपत्ति से जुर्म के शिकार लोगों को एक बड़ा मुआवजा देने का प्रावधान कानून में करना चाहिए। अब यह प्ली-बार्गेन जैसे किसी रास्ते हो सकता है, या उसके बिना भी कानून बनाकर हो सकता है, यह जानकार लोगों के बीच विचार-विमर्श का मुद्दा है। हमारी राय यहीं तक सीमित है कि मुजरिम की संपत्ति का इस्तेमाल उसके जुर्म की जांच पर भी खर्च होना चाहिए, और उसके जुर्म के शिकार को मुआवजा देने में भी।

संसद जनता की संतुष्टि के बजाय समझदार कानून बनाने का हौसला दिखाए

संपादकीय
22 दिसंबर 2015

दिल्ली में हुए देश के सबसे चर्चित बलात्कार केस में एक नाबालिग किशोर की कू्ररता के बाद से लगातार देश में यह बहस चल रही है कि हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर मामलों में अगर किशोर उम्र के लोग शामिल रहते हैं, तो उनको नाबालिग होने की रियायत दी जाए, या फिर उनकी सजा भी बालिग मुजरिमों की तरह रहे। इसके साथ-साथ यह पिछला पूरा हफ्ता इसलिए निर्भया को लेकर खबरों में रहा कि उसके मां-बाप दिल्ली में लगातार यह सार्वजनिक अभियान चलाते रहे कि छोटी सजा पूरी करने के बाद सुधारगृह से निकल रहा अब नौजवान हो चुका निर्भया का किशोर-बलात्कारी न छोड़ा जाए। इसके लिए दिल्ली महिला आयोग ने भी आखिरी रात, आधी रात के बाद तक सुप्रीम कोर्ट को जगाया, लेकिन अदालत ने ऐसे किसी कानून के न होने की बात कहते हुए इस रिहाई को रोकने से मना कर दिया। देश में चारों तरफ सोशल मीडिया सहित मीडिया में भी लगातार यह अभियान चल रहा है कि इस नौजवान को सजा के बाद भी न छोड़ा जाए। संसद अभी ऐसे एक कानून को बनाने पर विचार कर ही रहा है जिसके तहत ऐसे गंभीर अपराधों में किशोरावस्था के अपराधियों को भी आज के मुकाबले अधिक कड़ी सजा दी जा सके।
दिक्कत यह है कि भारत में किसी एक मामले को लेकर जब जनभावनाएं बहुत भड़कती हैं, तो उनको शांत करने के लिए एक नए कानून को दमकल की तरह इस्तेमाल किया जाता है। यह सोचने की तकलीफ अधिक मुश्किल होती है कि मौजूदा कानूनों का बेहतर इस्तेमाल क्यों नहीं हो पाया, किसी किशोर अपराधी की सोच को समय रहते सुधारने का जिम्मा सरकार और समाज क्यों नहीं कर पाए, और सजा के दौरान अपराधियों की सोच को सुधारना किसी कैद के मुकाबले अधिक जरूरी क्यों है? इन तमाम बातों को सोचने और करने के लिए बहुत से तथ्यों और तर्कों की जरूरत पड़ती है। उसके बजाय सजा को अधिक बड़ा या कड़ा कर देना एक आसान और लुभावना नारा रहता है, और जब जनदबाव अधिक पड़ता है तो सरकारें और राजनीतिक दल इसी शॉटकट का इस्तेमाल करते हैं। नतीजा यह होता है कि अक्सर कोई अधकचरा कानून बन जाता है, जिससे नफे के बजाय नुकसान अधिक होने लगता है, या फिर उसमें छूट के रास्ते निकालना आसान होता है। यह भी होता है कि जब किसी दिक्कत की जड़ कहीं और होती है, तब पत्तों को पानी से धोकर पेड़ को चकाचक दिखा दिया जाता है।
जनदबाव के सामने ऐसा दबने और झुकने की नौबत तब आती है जब सरकारें समय रहते अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करती हैं। और जब भड़की हुई भावनाएं मीडिया में लपटों के साथ दिखती हैं, और मीडिया उनको हवा देने का काम और करता है, तब संसद के पास भी समझदारी से बहस करने की गुंजाइश नहीं बचती, और वक्त भी नहीं बचता। ऐसे में बनने वाले कानून फिर कुछ बरसों में संशोधन की जरूरत के साथ खड़े हो जाते हैं, और तब तक उन कानूनों का इस्तेमाल कई बेकसूरों पर मार की तरह पड़ता है।
हम किसी बदले की भावना से बनाए गए कानूनों के खिलाफ हैं। किसी एक मुजरिम को देखते हुए बनाया गया कानून भी बड़ा नुकसानदेह हो सकता है, और उसमें सुधार की भावना के बजाय बदले की भावना हावी रहती है। निर्भया नाम के इस दिल दहलाने वाले केस को लेकर विचलित भावनाओं के साथ जनदबाव में जो कानून बन रहा है, उसमें हो सकता है कि समाजशास्त्रियों, और मनोवैज्ञानिकों, परामर्शदाताओं की राय को जगह न मिल पाई हो। इस मुद्दे पर देश इतना विचलित है कि इस पर सार्वजनिक बहस आसान भी नहीं है। ऐसे में संसद को जनता की संतुष्टि के बजाय एक समझदार कानून बनाने का हौसला भी दिखाना चाहिए।

महिलाओं का शोषण रोकने और बराबरी का हक दिलाने एक मजबूत आंदोलन जरूरी

संपादकीय
21 दिसंबर 2015

ब्रिटेन की एक महिला सांसद ने मांग की है कि वे गर्भावस्था की छुट्टी पर हैं, और इस दौरान संसद मतदान होने पर उनको घर या अस्पताल से वोट डालने का हक मिलना चाहिए। ब्रिटेन की तरह ही भारत में वही संसदीय प्रणाली चल रही है जिसमें जेल में बंद सांसद-विधायक या अस्पताल में भर्ती सांसद-विधायक को स्ट्रेचर पर सदन में लाकर उनसे वोट डलवाया जाता है, और अगर वे आने की हालत में नहीं है, तो उनको वोट डालने का हक नहीं मिलता। दुनिया में रोजाना महिलाओं से जुड़े हुए मुद्दों पर नए-नए सवाल उठ रहे हैं, और सदियों से चली आ रही महिला-विरोधी, और पुरूष प्रधान व्यवस्था में फेरबदल के लिए मांग उठती हैं। दुनिया की भाषा में बदलाव लाना पड़ रहा है, और महिलाओं के खिलाफ जो देश सबसे अधिक कट्टर और भेदभाव वाला है, उस सऊदी अरब में भी महिलाओं को पहली बार चुनाव लडऩे का मौका मिला, वोट डालने का मौका मिला, और महिलाएं जीतकर आईं भी। भारत में भी म्युनिसिपलों और पंचायतों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित होने के बाद स्थानीय संस्थाओं में उनकी लीडरशिप लगातार बढ़ रही है, और वे तजुर्बा भी हासिल कर रही हैं। 
दुनिया की कुछ बड़ी कंपनियां अपने पुरूष कर्मचारियों को भी पिता बनने के मौके पर गर्भावस्था से जुड़े कामकाज के लिए छुट्टी देनी की व्यवस्था बढ़ाते चल रहे हैं, और कुछ विकसित, सभ्य देशों में महिलाओं के बराबरी की ही छुट्टी पुरूष को भी मिलने लगी है। लेकिन भारत महिलाओं की हालत कानूनी रूप से बराबर होने के बावजूद उन्हें बराबरी का हक मिलने में अभी पता नहीं कितनी सदियां और लगेंगी। इसकी एक वजह यह है कि संसद में दशकों से चले आ रहे महिला आरक्षण विधेयक को पास करवाने में किसी पार्टी की दिलचस्पी नहीं दिख रही है, और अगर कांग्रेस-भाजपा जैसी दो पार्टियां मिलकर इस आरक्षण के लिए कोशिश करतीं तो यह कबका कानून बन चुका होता। लेकिन अलग-अलग तो ये दोनों पार्टियां महिला आरक्षण की बात करती हैं, इसे कानून बनवाने के लिए एक साथ बैठने को जब ये तैयार नहीं होतीं, तो अब तो धीरे-धीरे करके महिला आरक्षण विधेयक नाम के शब्द भी हवा से खो गए हैं। 
देश में अगर महिलाओं को बराबरी का दर्जा देना है, तो यह एक बहुत जरूरी कानून था, और जिस तरह अभी के बरसों में निर्भया के मुद्दे को लेकर सरकार को आनन-फानन एक कानून बनाना पड़ा, उसी तरह का एक आंदोलन महिला आरक्षण के लिए भी चलाया जाना जरूरी है। जब देश की आधी आबादी अपने हक के लिए एक साथ उठ-खड़ी होगी तो कोई भी पार्टी एक सीमा से अधिक उसे टाल नहीं सकेगी। इसके साथ-साथ कुछ और मुद्दे ऐसे हैं जिन पर केन्द्र और राज्य सरकारों को, सरकारों से परे निजी क्षेत्र को काम करने की जरूरत है। कामकाज की जगहों पर महिलाओं के शोषण की घटनाएं आमतौर पर दबी रह जाती हैं, क्योंकि इन तमाम जगहों पर ताकत की कुर्सियों पर आदमी बैठे रहते हैं, और सदियों की उनकी मर्दाना सोच यह समझ भी नहीं पाती कि कौन-कौन सी बातें महिला के शोषण के दायरे में आती हैं। यह सिलसिला थमना चाहिए। एक तरफ तो मौजूदा कानूनों का इस्तेमाल न करने पर सरकारी और गैरसरकारी संस्थानों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। आज हालत यह है कि किसी महिला कर्मचारी-अधिकारी को एक रिपोर्ट लिखाने के लिए भी थाने के बाद अदालत के चक्कर लगाने पड़ते हैं, और सारी व्यवस्था महिला को कुचलने में जुटी हुई दिखती है। 
भारत को एक मजबूत महिला आंदोलन की जरूरत है, और ऐसे आंदोलनकारियों को चाहिए कि वे राजनीतिक दलों में, सरकार और न्यायपालिका में बैठी हुई महिलाओं को घेरकर उनसे उनकी जिम्मेदारी पर सवाल करें, और अगर महिला मुद्दों पर उनका साथ नहीं मिले, तो उनका भांडाफोड़ भी करें। यह सिलसिला एक आक्रामक तरीके से चलना जरूरी है, और यह नामुमकिन भी नहीं दिखता है। इसके लिए बस महिलाओं को उठ-खड़ा होना होगा। 

देश की सबसे बड़ी पंचायत सजावट की अलमारी नहीं

संपादकीय
20 दिसंबर 2015

राज्यसभा में केन्द्र सरकार या राष्ट्रपति की तरफ से दस ऐसे लोगों को मनोनीत किया जाता है जो कि राजनीति से परे जिंदगी के अलग-अलग दायरों में कामयाबी हासिल कर चुके खास लोग होते हैं, और जिस तरह पुराने जमाने के किसी राजा के दरबार में नवरत्न हुआ करते थे, उसी तरह आज भी ऐसे रत्नों को वहां रखकर सदन की शोभा बढ़ाने का काम होता है। हालांकि इसका एक कागजी मतलब यह भी होता है कि अलग-अलग दायरे से आए हुए लोगों के अनुभव, और उनके ज्ञान का फायदा संसद को मिल सके। 
लेकिन पिछली आधी सदी का इसका अनुभव बहुत ही खराब रहा है। इन लोगों में से गिने-चुने ही ऐसे रहे जिन्होंने अपने पेशे या अपने दायरे के तजुर्बे का फायदा सदन को दिया हो। आमतौर पर ये गुपचुप बैठे रहते हैं, या कि कभी-कभी जया बच्चन की तरह अपनी पार्टी की नीतियों को लेकर बात करते हैं। लेकिन संसद में मनोनयन से लाए जाने वाले लोगों की खूबियों का फायदा भारतीय लोकतंत्र को मिला हो ऐसा देखने में नहीं आता। हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने देश की इस सबसे बड़ी पंचायत में सजावट के लिए ऐसे लोगों को बिठाने के खिलाफ पहले भी लिखा है। और अब अगर देखें तो संसद से निकली हुई जानकारी हमारे विरोध को जायज करार देती है। अभी जो दस लोग राज्यसभा में हैं उनमें से एक मणिशंकर अय्यर कांग्रेस के पुराने नेता हैं और पेशेवर राजनेता हैं। उनको भी एक लेखक बताकर इस दर्जे में राज्यसभा में लाना परले दर्जे का नाजायज काम था, लेकिन यूपीए सरकार ने अपने रहते वह किया था। दूसरी तरफ भारत रत्न सचिन तेंदुलकर से लेकर, फिल्मी अभिनेत्री रेखा तक, और एक बहुत ही जागरूक फिल्मकार, लेखक और शायर जावेद अख्तर भी राज्यसभा में मनोनीत किए गए थे, जिनका कार्यकाल अभी जारी है। अब राज्यसभा में इनकी हाजिरी देखें, तो सचिन और रेखा कुल पांच फीसदी हाजिरी वाले लोग हैं। लेकिन जो लोग हाजिर हुए भी हैं उनको अगर देखें, तो जावेद अख्तर ने अब तक संसद में एक भी सवाल नहीं पूछा, यही हाल एक उद्योगपति अनु आगा का है, यही हाल रेखा का है, और यही हाल के. पाराशरण का है जो कि यूपीए सरकार के समय भारत के अटार्नी जनरल थे, सुप्रीम कोर्ट में हर दिन बहस करने का उनका पेशा ही था, लेकिन संसद में उन्होंने एक भी सवाल नहीं पूछे। इसके बाद के आंकड़े देखें कि कौन लोगों ने कितनी बहसों में हिस्सा लिया तो रेखा और सचिन के नाम के साथ फिर एक बड़ा सा शून्य लिखा दिखता है।
देश की संसद अभी तो पिछली कुछ बरसों से काम न करते दिख रही है, और सांसदों को देश की जनता मुफ्तखोर मानती है। बोलचाल की जुबान में लोग मुफ्तखोर की जगह उर्दू का एक अधिक अपमानजनक शब्द, हरामखोर, इस्तेमाल करते हैं, जिसका मतलब है काम पूरा न करके भी खाने वाले लोग। अब हमारी इस भाषा को संसद खारिज कर सकती है, और इसके खिलाफ विशेषाधिकार हनन भी ला सकती है, लेकिन उससे देश की जनता की सोच नहीं बदली जा सकती। जिस सचिन तेंदुलकर को देश ने सबसे बड़ा सम्मान दे दिया है, उसके बाद न तो सचिन का कोई सम्मान बढ़ाया जा सकता था, और न ही संसद का सम्मान ऐसे लोगों से बढ़ सकता जो कि संसद की कार्रवाई में कुछ जोड़ सकें। लोगों को याद होगा कि कुछ लोगों के मनोनयन के पीछे सरकार की बदनीयत की चर्चा भी होती है। अब जिस तरह से समाजवादी पार्टी की तरफ से जया बच्चन को राज्यसभा में मनोनीत करने के तुरंत बाद कांग्रेस पार्टी ने एक दूसरी अभिनेत्री रेखा को वहीं ले जाकर बिठा दिया, और यह बात जगजाहिर थी कि इन दोनों अभिनेत्रियों के संबंध अपने निजी जीवन को लेकर बहुत ही खराब हैं, और दोनों में अनबोला है। ऐसे में बिना किसी राष्ट्रीय योगदान के किसी अभिनेत्री को संसद में ला बिठाना, उससे बेहतर यह होता कि नसीरुद्दीन शाह जैसे किसी अभिनेता को वहां लाया जाता जो कि संसद के बाहर भी जागरूक होकर देश के मुद्दों पर हौसले के साथ खुलकर बोलते हैं। लेकिन राजनीतिक दल बहुत ही तंगदिली से ऐसी कुर्सियों पर लोगों को लाकर बिठाते हैं, और इसलिए भी राष्ट्रपति के नाम पर होने वाला यह मनोनयन खत्म होना चाहिए। वैसे भी राजनीतिक दल अपने सांसद-विधायकों की संख्या के अनुपात में अपने पसंदीदा लोगों को राज्यसभा में लाते हैं, और उसमें भी ऐसी सीटों की बिक्री और नीलामी की खुली चर्चा हमेशा से होती आई है। पूरी की पूरी राज्यसभा के इस ढांचे को बदलना तो एक मुश्किल बात होगी, लेकिन खिलाड़ी-कलाकार जैसे कोटे से लोगों को लाकर संसद की सीट को बर्बाद करने के बजाय राष्ट्रपति ऐसे नवरत्नों की एक कमेटी अलग से बना ले, और समय-समय पर उनकी बैठक करके, उनकी राय लेकर, सरकार को सुझाव भेज दे। आज संसद में जितनी घटिया बातें होती हैं, और जितनी खराब नीयत से वहां काम होता है, हो सकता है कि उस स्तर पर जाकर ये भले लोग मुंह न खोल पाते हों। जो भी हो, देश की सबसे बड़ी पंचायत को हम सजावट की अलमारी नहीं मानते। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। 

सोनिया-राहुल एक अभूतपूर्व मोड़ पर

संपादकीय
19 दिसंबर 2015

कांग्रेस पार्टी के लिए आज एक बड़ा और ऐतिहासिक दिन है। पार्टी के दो मुखिया, सोनिया और राहुल गांधी, पार्टी का वर्तमान और भविष्य, पहली बार अदालती कटघरे में खड़े हो रहे हैं, और यह पहला मौका है जब सरकार के किसी पद पर रहे बिना कांग्रेस अध्यक्ष-उपाध्यक्ष अदालत जा रहे हैं। इसके पहले इंदिरा और संजय गांधी भी अदालत और जांच आयोग का सामना कर चुके हैं, लेकिन इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री रह चुकी थीं, और संजय गांधी आपातकाल में सरकारी मशीनरी के बेजा इस्तेमाल, और जनता पर जुल्म के बहुत से आरोप लगे थे। सोनिया और राहुल एक बिल्कुल अलग किस्म के मामले में अदालत में हैं, जो कि एक नागरिक की हैसियत से सुब्रमण्यम स्वामी नाम के वर्तमान भाजपा नेता ने दायर किया हुआ है, और यह कांग्रेस पार्टी, नेशनल हेराल्ड प्रकाशित करने वाली कंपनी की जमीन-जायदाद, शेयर, और फंड-कर्ज से जुड़े हुए कंपनी-कानून तोडऩे के आरोप वाला एक मामला है। यह एक जटिल तकनीकी मामला है, और जनता की नजर में इसमें अधिक भ्रष्टाचार कुछ नहीं दिखता, क्योंकि देश के लोग यह मानकर चलते हैं कि कांग्रेस पार्टी सोनिया-राहुल की सम्पत्ति है, और सोनिया-राहुल ही कांग्रेस पार्टी की अकेली सम्पत्ति हैं। ऐसे में इन दोनों पक्षों में से कौन किसका क्या इस्तेमाल करता है, यह आम लोगों की नजर में जुर्म नहीं बनता, यह एक अलग बात है कि कंपनी-कानून नेशनल हेराल्ड के मामले में टूटा है या नहीं। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर पिछले कई दिन से संसद को चलने नहीं दिया, और उसने यह माहौल बनाने की कोशिश की कि सुब्रमण्यम स्वामी के पीछे मोदी सरकार है, और सोनिया-राहुल को प्रधानमंत्री की पहल पर निशाना बनाया जा रहा है। लेकिन देश में राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले सभी लोग इस बात को जानते हैं कि सुब्रमण्यम स्वामी भाजपा में हमेशा से नहीं रहे, और वे अटल बिहारी से लेकर अरूण जेटली तक बहुत से भाजपा नेताओं के खिलाफ सार्वजनिक अभियान चलाने वाले रहे हैं। वे इसके पहले भी जयललिता से लेकर कांग्रेस की सरकारों तक के खिलाफ बहुत से अदालती मामले लड़ चुके हैं, और जीत भी चुके हैं। इसलिए यह आरोप निहायत बेबुनियाद है कि वे भाजपा की ओर से सोनिया-राहुल पर हमला कर रहे हैं। सुब्रमण्यम स्वामी दरअसल एक ऐसा पिन निकला हुआ हथगोला हैं, जो कि जिस हाथ में रहे, उस हाथ को भी विस्फोट में टुकड़ा-टुकड़ा कर सकता है। 
लेकिन इस अदालती कार्रवाई से परे, अपने तमाम राजनीतिक जीवन में सोनिया और राहुल पहली बार सड़क और अदालत की लड़ाई में उतरे हैं, और अब वे घर पर आराम से बैठकर राजनीति करने वाले नहीं रहकर, सार्वजनिक राजनीति की अग्नि परीक्षा से गुजर रहे हैं। कांग्रेस ने यह समझदारी दिखाई है कि दिल्ली में उसने सड़कों पर नौटंकी नहीं करना तय किया, हालांकि यह एक अलग बात है कि सोनिया-राहुल का साथ देते हुए दिखने के लिए देश भर में कांग्रेस के लोग आज प्रदर्शन कर रहे हैं।  पिछले दस बरस के यूपीए राज में सोनिया-राहुल ने बहुत सावधानी से अपने आपको सरकार के हर फैसले से अलग रखा था, और कागजों पर कहीं भी उनका नाम नहीं था। मनमोहन सिंह नाम का एक वफादार ड्राइवर रखकर सोनिया-राहुल पीछे की सीट पर बैठे सरकार चला रहे थे, और स्टियरिंग पर कहीं भी उनकी उंगलियों के निशान नहीं थे। इसलिए यूपीए सरकार के दस बरसों के अनगिनत और अंतहीन अपराधों में उनकी कोई भागीदारी अदालत के लायक नहीं रही, लेकिन वे एक बिल्कुल ही लगभग घरेलू मामले में उलझ गए हैं। एक ही कमरे में बैठे कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा इस पूरे नेशनल हेराल्ड के मामले में मानो अपनी ही जैकेट की एक जेब से निकालकर कांग्रेस की जायदाद दूसरी जेब में रख रहे थे, और दूसरी जेब से निकालकर तीसरी जेब में रख रहे थे, और इस बीच शायद कांग्रेस के दिग्गज वकीलों को भी यह अंदाज नहीं था कि कोई कानून टूट सकता है। इस पूरे घरेलू लेन-देन में दिक्कत केवल यही रही कि एक कंपनी, एक राजनीतिक दल, और दूसरी कंपनी के लेन-देन देश के कुछ कानूनों के तहत सही ठहराए जाते हैं, या नहीं।
इस मामले के नतीजे पर जाने की अभी जल्दबाजी नहीं करना चाहिए क्योंकि निचली अदालत से शुरू होकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचते हुए इसमें बरसों लगना तय है, और मोदी सरकार के सोनिया-परिवार से संबंध चाहे जैसे हों, यह मामला दायर करने वाले सरकार से परे के एक बेकाबू सुब्रमण्यम स्वामी हैं जो कि आए दिन सुप्रीम कोर्ट पहुंचते ही रहते हैं। इसलिए कानूनी कार्रवाई से परे एक राजनीतिक लड़ाई कांग्रेस की इन दिनों सुस्त चल रही जिंदगी में शुरू हुई है, और लोग यह तुलना किए बिना नहीं रह पा रहे हैं कि आज ही के दिन 1978 में इंदिरा गांधी गिरफ्तार हुई थीं। खुद सोनिया गांधी ने लोगों को ऐसी तुलना करने के लिए उकसाया है, यह कहकर कि वे इंदिरा की बहू हैं, और किसी से नहीं डरती हैं। यह उनका अभूतपूर्व राजनीतिक तेवर है, और भारत की चुनावी राजनीति जिन तेवरों से प्रभावित होती है, उनमें यह पार्टी के फायदे का तेवर भी हो सकता है। कांग्रेस पार्टी को अपनी वर्तमान और अपनी भावी लीडरशिप के इर्द-गिर्द जुटने का यह एक बड़ा मौका मिल रहा है, और पार्टी विपक्ष की राजनीति के तेवर दिखाते दिख भी रही है। देश की जनता दिलचस्पी के साथ यह देखेगी कि आज अदालत में भी नौबत आने पर सोनिया-राहुल जमानत की अर्जी देंगे, या जेल जाना पसंद करेंगे। दूसरी तरफ दिल्ली की राजनीति के इस भारी उथल-पुथल ने भाजपा के भी चेहरे पर शिकन डाली है, और उसे कांग्रेस का रूख भांपते हुए चलना पड़ेगा। 

सूदखोरी और देह शोषण का एक नया तरीका आन्ध्र में

संपादकीय
18 दिसंबर 2015

आंध्र की विधानसभा में इस वक्त बड़ा हंगामा हो रहा है। वहां पर एक से अधिक राजनीतिक दलों के विधायकों से जुड़ी साहूकारी कंपनियों ने महिलाओं को छोटे-छोटे कर्ज दिए, और जब वे चुका नहीं पाईं, तो उन्हें सेक्स-रैकेट में धकेल दिया। पिछले कुछ दिनों से इसे लेकर प्रदेश में बड़ी गिरफ्तारियां हो रही थीं, और आज विधानसभा में आरोपों और हंगामे का दिन रहा। विधानसभा या संसद में हंगामे में लिखने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि इन जगहों पर यह आम बात है। लेकिन सूदखोरी और देह शोषण के जो नए-नए अंदाज दुनिया में सामने आते हैं वे देखते ही बनते हैं। लोगों को याद होगा कि हिन्दी की पुरानी फिल्मों में जिस तरह जीवन नाम का एक अभिनेता सूदखोर के किरदार करता था, और कभी बच्चों को बंधुआ मजदूर बनाता था, कभी महिलाओं का शोषण करता था, और कभी घर-जमीन पर कब्जा करता था। यह सिलसिला अलग-अलग कई तरह की शक्लों में आज भी जारी है। 
एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश भर में जन-धन योजना लागू करके हर गरीब का खाता खुलवाने का काम कर रहे हैं, और लोगों को छोटे-छोटे कर्ज कम कागजी खानापूरी पर भी देने की योजना शुरू कर चुके हैं, और दूसरी तरफ इस अंदाज की सूदखोरी देश के विकसित राज्यों में से एक, आन्ध्र में चल रही है। लेकिन एक तरफ तो सूदखोरी का यह अंदाज चल रहा है, और दूसरी तरफ देश भर में बहुत से प्रदेशों में चिटफंड कंपनियां लोगों को धोखा देकर लाखों करोड़ रूपए जमा करवा चुकी हैं, और लूटकर भाग चुकी हैं। इनमें छत्तीसगढ़ जैसे गरीब प्रदेश भी हैं, जहां लोगों ने अपनी जमीन बेचकर भी ऐसी कंपनियों में पैसा लगा दिया था, और ये कंपनियां रातों-रात दफ्तर बंद करके भाग गईं। 
पैसा देने के नाम पर, और पैसा लेने के नाम पर जब कभी धोखाधड़ी होती है, वह स्थानीय अफसरों और पुलिस की जानकारी के बिना नहीं होती। और जब ऐसे सिलसिले के कई महीने गुजर जाते हैं, तब जाकर बहुत सी शिकायतों के बाद सरकार की आंख खुलने का नाटक करती है, और जब तक लोगों की तलाश शुरू होती है, तब तक वे सब खा-पीकर भाग चुके रहते हैं, और उनके स्थानीय एजेंट ही पकड़ में आते हैं। यह सिलसिला सत्ता की मेहरबानी के बिना नहीं चलता, और पश्चिम बंगाल जैसा जागरूक राज्य यह देख चुका है कि किस तरह मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी की पार्टी के मंत्री ऐसी जालसाज कंपनी में शामिल थे, और आज जेल में हैं। 
हम पहले भी इसी जगह यह लिख चुके हैं कि देश और अलग-अलग प्रदेशों में केन्द्र और राज्य सरकारों को आर्थिक अपराधों को लेकर खुफिया एजेंसी बनाने की जरूरत है जो कि अपराध शुरू होते ही उस पर नजर रखे, और लूट अधिक बढ़ सके, उसके पहले ही अपराधियों को दबोच सके। जब पूरा खेत खाली हो जाता है, तब कीड़ों को मारने के लिए जहर लेकर पहुंचने का कोई फायदा नहीं होता। हर राज्य को दूसरे राज्य के जालसाजी के उजागर हो चुके मामलों से सबक लेना चाहिए। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि मुजरिमों के लिए राज्यों की सरहद कोई मायने नहीं रखती, और वे एक जगह कामयाब होने के बाद बाकी जगहों पर जाकर भी वही तरीका इस्तेमाल करते हैं। 
आन्ध्र में सूदखोरी की आड़ में गरीब कर्जदार महिलाओं के देह शोषण का सिलसिला बहुत भयानक है। और जैसी कि खबर आ रही है इसमें सत्ता और विपक्ष से जुड़े हुए लोग शामिल हैं। तो ऐसे मामले में मुख्यमंत्री को बिना देर किए हुए इस मामले को सीबीआई के हवाले करना चाहिए क्योंकि जहां राजनीति के बाहुबली मुजरिमों के सरदार हों, वहां पर स्थानीय जांच मुमकिन नहीं हो सकती। 

किसानों की जान बचाना मुमकिन तो है, लेकिन...

संपादकीय
17 दिसंबर 2015

छत्तीसगढ़ मेंं किसानों की आत्महत्या पर एक तरफ तो सरकार की कमजोरी जाहिर होती है कि वह धान का बोनस नहीं दे पाई, धान खरीदी में कई तरह की गड़बडिय़ां हुईं, सरकार की तैयारी सूखे के हिसाब से बांध के पानी की नहीं थी, और दूसरी तरफ कल विधानसभा में इस पर चर्चा के दौरान पंचायत मंत्री अजय चंद्राकर ने जिस लहजे में आत्महत्या करने वाले किसानों को श्रद्धांजलि दी, उससे एक नई कड़वाहट पैदा हो गई। मंत्री का यह कहना कि उनको नहीं मालूम कि खुदकुशी करने वाले किसान थे या नहीं, मरने वाले, खुद जान देने वाले किसानों के परिवारों के जख्मों पर नमक सरीखा है। खुद सत्तारूढ़ भाजपा के लोग इस बात पर हैरान थे कि एक वरिष्ठ और अनुभवी मंत्री किस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। खैर, यह भाजपा की अपनी सोच है कि वह अपनी मंत्रियों के बारे में क्या सोचती है, हम तो किसानी से जुड़े हुए मुद्दों पर बात करना चाहते हैं जिस पर आज छत्तीसगढ़ की विधानसभा भी इसी वक्त बात कर रही है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह अभी विधानसभा में कई तरह की राहतों की घोषणा की है, लेकिन उनका फायदा लोगों को मिलने तक पता नहीं और कितने किसान जान दे चुके होंगे। इसलिए इन फायदों से परे यह समझने की जरूरत है कि किसानी की ऐसी बदहाली भविष्य में न रहे इसलिए जो किया जा सकता है, उस पर सरकार को विचार करना चाहिए। 
छत्तीसगढ़ धान पर टिका राज्य होने की वजह से गरीबी और फटेहाली से गुजरती ही रहता है। ऐसे में राज्य सरकार को किसानों की अर्थव्यवस्था को धान से परे भी ले जाने की कोशिश करनी चाहिए। कई ऐसी फसलें हैं, जो धान के मुकाबले अधिक कमाई देती हैं, लेकिन किसान उतना हौसला नहीं जुटा पाते क्योंकि नए बीज, नई तकनीक, और नए खतरे झेलने की उसकी ताकत नहीं है। दूसरी तरफ ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि के साथ-साथ कुछ दूसरी बातों को भी जोडऩा बहुत जरूरी है। ग्रामोद्योग के तहत एक लंबी लिस्ट आती है कि किस तरह ग्रामीण रोजगार बढ़ सकते हैं। इसमें लोग हस्तशिल्प से लेकर हाथकरघा तक का काम कर सकते हैं, वनोपज पर आधारित काम हो सकता है, बागवानी के काम हो सकते हैं, मधुमक्खी पालन और मशरूम उगाने जैसे काम हो सकते हैं, सिल्क और लाख से जुड़े काम हो सकते हैं, डेयरी का काम हो सकता है, और इनसे न सिर्फ लाखों रोजगार पैदा होंगे, बल्कि किसान किसी सूखे या अकाल की नौबत आने पर भूखों नहीं मरेगा, खुदकुशी नहीं करेगा। 
लेकिन सरकार की आम सोच के चलते ऐसी व्यापक ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर काम नामुमकिन दिखता है। यह काम धान खरीदी के मुकाबले बहुत अधिक मुश्किल और बिखरा हुआ होगा, और इसके लिए सरकार को अपने आम भ्रष्टाचार से बाहर निकलकर, कल्पनाशीलता और स्थानीय जरूरतों के मुताबिक ऐसे काम बढ़ाने पड़ेंगे, तब जाकर किसानों की मौत थम सकेगी, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुधर सकेगी। गांवों के पास किसानी के बाद भी खासा वक्त बचे रहता है, और इसके इस्तेमाल के लिए न तो कोई बड़ी तकनीक लगती है, और न ही बिजली लगती है। ऐसे कामों के बारे में भारत का अनुभव भी बहुत लंबा है। लेकिन सरकार को शहरी सोच से आजाद होकर ग्रामीण स्वरोजगार के इस देश के अनुभव का उपयोग करना पड़ेगा, तब जाकर लोगों की जिंदगी बच पाएगी। 

दिल्ली-प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई से जागने की जरूरत

संपादकीय
16 दिसंबर 2015
दिल्ली के प्रदूषण से दहशत में आकर सुप्रीम कोर्ट कई तरह के अभूतपूर्व फैसले ले रहा है। उधर दिल्ली सरकार अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर कई तरह की कोशिशें कर रही है, और केन्द्र सरकार के सीधे करने का इस मौके पर कुछ दिख नहीं रहा है। देश के पर्यावरण को लेकर बनाई गई एक संवैधानिक संस्था, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल, ने दिल्ली में गाडिय़ों को लेकर, खरीद-बिक्री, आवाजाही, डीजल-पेट्रोल के मुद्दों पर कई तरह के आदेश दिए हैं। और दिल्ली में प्रदूषण के स्तर से इन तमाम संस्थाओं की प्रतिक्रिया वैसी ही है कि नींद से जागकर कोई देखे कि घर में आग लगी हुई है। पिछले कई बरसों से सुप्रीम कोर्ट और केन्द्र-राज्य सरकारें दिल्ली के प्रदूषण को देखते आ रही हैं, लेकिन अब तक जो फैसले लिए गए, उनके बाद आज हड़बड़ाकर आग बुझाने जैसा काम करना पड़ रहा है। 
लेकिन खैर यह तो दिल्ली है जहां कि देश की सबसे बड़ी अदालत बसती है, जहां देश की संसद चलती है, और जहां से देश की सरकार काम करती है। लेकिन इससे परे हिन्दुस्तान के सैकड़ों ऐसे शहर हैं जो कि इसी तरह प्रदूषित हैं, और जहां कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। फिर यह प्रदूषण सिर्फ हवा का नहीं है, पानी का भी है, शोर का भी है, और कारखानों की चिमनी से निकलकर खेतों की मिट्टी पर फैला हुआ भी है। इस मोर्चे पर देश भर में सरकारों की हालत बहुत ही खराब है। भोपाल में अभी पिछले हफ्ते ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की क्षेत्रीय शाखा ने शादी-ब्याह और दूसरे मौकों पर कान फोडऩे वाले डीजे बजाने को लेकर कहा कि राज्य के मुख्य सचिव के बंगले पर जाकर रात भर डीजे बजाया जाए, तो ट्रिब्यूनल उसकी इजाजत दे देगा, इसके बाद छत्तीसगढ़ में भी शासन ने इस कोलाहल के खिलाफ आदेश निकाला, लेकिन उस आदेश को पाते ही जिले के अफसरों ने उसे कूड़ेदान में फेंक दिया, और राजधानी रायपुर रात-दिन इसका सुबूत देख रही है। 
हमारा मानना है कि राजधानियों का हाल तो सरकारी और अदालती आतंक के चलते हुए बाकी शहरों के मुकाबले कुछ बेहतर हो सकता है, लेकिन बाकी शहरों में तो न मंत्री बसते, न राजभवन होते, न अफसर रहते, और न ही जज रहते। इसलिए हर राज्य के ऐसे एक-दो शहरों को छोड़कर बाकी के कोई माई-बाप नहीं होते। नतीजा यह है कि जिसके पास कारखाना चलाने का पैसा है, उसको मानो हवा में, पानी में जहर घोलने का हक मिला हुआ है। जिसके पास लाउडस्पीकरों की फौज को भाड़े पर लेने का पैसा है, उसको आम लोगों की जिंदगी हराम करने का लायसेंस मिला हुआ है। और जिन लोगों के पास गाड़ी रखने को जगह भी नहीं है, उन तमाम लोगों को सरकारी जमीन पर गाडिय़ां खड़ी करने का हक है, और उस बूते गाडिय़ां बढ़ाते चलने का भी हक है। हम छत्तीसगढ़ की राजधानी में ही रात-दिन सड़क-चौराहों पर धुआं उगलती हुई गाडिय़ां देखते हैं, ऐसी गाडिय़ां जिनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तो दिल्ली में तरह-तरह के प्रतिबंध लगा रहा है, लेकिन उनकी यहां जांच तक नहीं होती। सरकार के जो विभाग इसके लिए जिम्मेदार हैं, वे किसी के लिए जवाबदेह नहीं हैं। और सत्ता या ताकत के अलग-अलग भागीदार अपने-अपने घर-दफ्तर, अपने-अपने इलाकों को सभी तरह के प्रदूषणों से मुक्त रखकर मानो प्रदेश को प्रदूषण से मुक्त समझ बैठते हैं। 
दिल्ली की हालत को देखकर आज सुप्रीम कोर्ट और बाकी तमाम संवैधानिक संस्थाएं जिस तरह हड़बड़ाए हैं, उनसे हर राज्य को सबक लेना चाहिए। छत्तीसगढ़ में बड़े अफसरों को सड़कों पर खड़े रहकर गाडिय़ों का धुआं देखना चाहिए, कारखानों के इलाकों में जाकर उनकी चिमनियों का हाल देखना चाहिए। दरअसल प्रदूषण से मौत इतने धीमे-धीमे होती है कि वह खबर नहीं बन पाती। जिस तरह दिल्ली में मशहूर डॉक्टर नरेश त्रेहन ने दिल्ली की गर्द जमे हुए फेंफड़े की तस्वीर जारी की है, रायपुर के औद्योगिक क्षेत्र के फेंफड़ों का हाल उससे कई गुना बदतर होगा। नमूने के लिए उस इलाके के किसी बाशिंदे के मरने पर परिवार से इजाजत लेकर पोस्टमार्टम से उसका फेंफड़ा निकालकर देखना चाहिए, और उसे एक जार में रखकर शहर के चौराहे पर रखना चाहिए। ऐसे नजारों से कम किसी और बात से भारत के शहर, भारत के प्रदेश, जागते हुए नहीं दिख रहे हैं। इसका दूसरा तरीका यह हो सकता है कि सत्ता के तमाम लोगों पर कारों की खिड़कियां खोलकर चलने की शर्त लगाई जाए, और चौराहों पर, लालबत्तियों पर रूकने की शर्त भी। कुछ दिनों के भीतर ही प्रदूषण घटाने के लिए क्रांतिकारी कार्रवाई शुरू हो जाएगी। 

केजरीवाल का भ्रष्टाचार-विरोध कहां हवा हो गया?

संपादकीय 
15 दिसंबर 2015
दिल्ली सरकार में मुख्यमंत्री सचिवालय में तैनात एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के खिलाफ कुछ दिन पहले से शिकायत चल रही थी, और भ्रष्टाचार के मामले में सीबीआई ने आज उस अफसर के दफ्तर पर छापा मारा। यह दफ्तर मुख्यालय सचिवालय में है, और अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया है कि इस छापे के बहाने सीबीआई उनके दफ्तर की फाइलों को भी देख रही है। उन्होंने इस कार्रवाई के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कायर और मनोरोगी करार दिया है, और सोशल मीडिया पर केन्द्र सरकार के खिलाफ हमला बोल दिया है। सोशल मीडिया अपने आम मिजाज के तहत मोदी के पक्ष या विपक्ष में, केजरीवाल के पक्ष या विपक्ष में अपने पूर्वाग्रह के साथ सक्रिय हो गया है। लेकिन इस कार्रवाई और उस पर केजरीवाल की प्रतिक्रिया से कुछ सवाल खड़े होते हैं। 
केन्द्र और राज्य सरकार के अधिकारों के दायरों का एक बड़ा टकराव दिल्ली में केजरीवाल सरकार के पहले दिन से चले आ रहा है। बात-बात पर आए दिन दोनों ने कानूनी नोटिस चलते रहे, और आज की कार्रवाई को उस सिलसिले की एक कड़ी भी देखा जा रहा है। केजरीवाल दिल्ली में ही मौजूद सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी कार्रवाई करने में सक्षम हैं, इसलिए इस मामले की वैधानिकता को लेकर हम अभी तकनीकी बारीकियों में जाना नहीं चाहते, लेकिन यह बात जाहिर है कि केजरीवाल के साथ काम कर रहे अफसर पर छापा मारने के पहले केजरीवाल से इजाजत लेने का मतलब तो सीबीआई की कार्रवाई को नाकामयाब कर देना होता। इसलिए इसमें हमको कोई बुराई नहीं लग रही है कि सीबीआई ने केजरीवाल को खबर नहीं की, और अफसर पर सीधे कार्रवाई की। वैधानिकता से परे हम नैतिकता की बात करें, तो खुद केजरीवाल की पूरी राजनीतिक जिंदगी भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन करते हुए बनी है, और वे जब मुंह खोलते थे, किसी न किसी को भ्रष्ट साबित करते थे। अब ऐसे में अगर देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी किसी अफसर की जांच कर रही है, तो उसमें ऐसा क्या है कि केजरीवाल उसके लिए प्रधानमंत्री को गालियां देने लगें? भ्रष्टाचार के आरोप पर अगर कार्रवाई हो रही है, तो वह तो केजरीवाल की सोच के मुताबिक ही हो रही है, और उनको तो चाहिए कि कुछ दिन जंतर-मंतर पर बैठकर सरकार चला लें और सीबीआई को जांच करने दें। हम इस बात पर जरा भी भरोसा नहीं करते कि हर जांच के वक्त यह तर्क दिया जाए कि एजेंसी चलाने वाली सरकार राजनीतिक विरोध से, बदले की भावना से कार्रवाई कर रही है। भारत जैसी बहुदलीय व्यवस्था में, यहां के संघीय ढांचे में राजनीतिक विरोध तो कभी खत्म हो भी नहीं सकेगा, तो क्या ऐसे में कोई भी पार्टी अपनी विपक्षी पार्टियों के नेताओं या उनकी सरकारों के खिलाफ कोई कार्रवाई ही न करे? यह सिलसिला ठीक नहीं है। और केजरीवाल को यह बात याद रखना चाहिए कि सीबीआई दर्जनों मामलों में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के सामने जांच और छानबीन के घेरे में रहती है। कोई भी गलत काम करने के पहले सीबीआई को याद रखना पड़ेगा कि केजरीवाल हर अदालत तक जाने में सक्षम हैं। ऐसे में नैतिकता की राजनीति करने का दावा करने वाले केजरीवाल को जांच एजेंसी के खिलाफ, या उसकी आड़ में प्रधानमंत्री के खिलाफ हमला नहीं बोलना चाहिए।

जनसंघ-भाजपा की सारी नीति खारिज, मोदी जम्मू-कश्मीर पर भी पाक से बात करेंगे

संपादकीय
14 दिसंबर 2015
पिछले एक पखवाड़े में भारत और पाकिस्तान के बीच भारतीय पहल से जिस रफ्तार से विदेश मंत्रियों की बातचीत हुई, वह इन दो देशों के बीच रिश्तों को देखते आ रहे लोगों को हक्का-बक्का कर गई है। जिस तरह एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच 120 सेकेंड की बातचीत हुई, और उसके बाद जिस तरह एक तीसरे देश में दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों ने बंद और गोपनीय बैठक की, वह सब कुछ बहुत चौंकाने वाला रहा। इसके बाद आनन-फानन भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जिस तरह पाकिस्तान पहुंचीं, वहां विदेश मंत्री से बात की, प्रधानमंत्री से मुलाकात की, वह भी एक अस्वाभाविक रफ्तार से हुआ काम था। लेकिन आज भारतीय संसद में सुषमा स्वराज ने जो बयान दिया है, उस बयान को बारीकी से देखने की जरूरत है, और उसके कुछ घंटे बाद तक अभी हमें भारतीय विपक्षी दलों की वह प्रतिक्रिया देखने नहीं मिल रही है, जो कि इस बयान के बाद तुरंत सामने आनी चाहिए थी। 
यहां पर यह खुलासा कर देना जरूरी है कि हम इन दोनों देशों के बीच हर हालत में बातचीत जारी रखने के हिमायती हैं, चाहे सरहद पर तनाव चलता रहे, चाहे आतंकी हमले होते रहें, इनके बीच भी बातचीत जारी रहनी चाहिए, खेल और कला, फिल्म और संगीत जारी रहने चाहिए। लेकिन सुषमा स्वराज के आज के बयान में एक बहुत ही चौंकाने वाली बात है, जिसके खिलाफ न होते हुए भी हम उस तरफ लोगों को ध्यान खींचना चाहते हैं। आज उन्होंने अपने पाकिस्तान प्रवास के बारे में संसद में बयान दिया जिसमें उन्होंने बाकी बातों के साथ-साथ यह भी कहा कि 2016 में मोदी सार्क सम्मलेन में पाकिस्तान जाएंगे। भारत और पाकिस्तान शांति, सुरक्षा, जम्मू-कश्मीर सहित सभी मुद्दों पर समग्र वार्ता करेंगे। 
यहां पर गौर करने की बात यह है कि भाजपा की अगुवाई वाली इस सरकार ने पाकिस्तान के साथ जम्मू-कश्मीर पर भी बात करना मंजूर किया है। जहां तक हमें याद पड़ता है, पिछले दस बरस के यूपीए राज में मनमोहन-सरकार ने जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान से कोई बात नहीं की थी। तमाम द्विपक्षीय बातचीत में कश्मीर के के अक्षर को बड़ा ही अवांछित माना जाता रहा है, और पाकिस्तान अपने हर बयान में कश्मीर का जिक्र करते आया है, और भारत में इसे जिक्र से परे का मानते हुए इस पर बरसों से कोई चर्चा नहीं की है, इस पर इसी बातचीत के लिए भारत बरसों से कभी सहमत भी नहीं हुआ है। अब यह भी याद रखने की जरूरत है कि जनसंघ के दिनों से भाजपा कश्मीर को चर्चा से परे का मुद्दा मानती रही है, और उसके औपचारिक नारों में यह भी रहते आया है कि दूध मांगोगे तो खीर देंगे, कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे। अब ेऐसे नारे पर चढ़कर सत्ता, और भारत सरकार की मुखिया बनने वाली भाजपा अचानक कश्मीर पर पाकिस्तान से बातचीत की एक ऐसी बात को मानने की घोषणा कर रही है, जिससे कि भाजपा की अब तक की पाकिस्तान नीति कूड़ेदान में चली जाती है। 
कुछ लोगों का यह मानना है कि मोदी इस किस्म की दरियादिली दिखाकर कुछ बरस बाद एक नोबल शांति पुरस्कार पाने की कोशिश में हैं। कुछ लोगों का यह मानना है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री रहते हुए पाकिस्तान के साथ शांति बहाली में जितनी कोशिशें की थीं, मोदी उनसे भी आगे जाना चाहते हैं, और इतिहास में नाम लिखाना चाहते हैं। हम यह भी नहीं मानते कि जनसंघ और भाजपा की जो नीति चली आ रही थी, उसे कभी बदलना अनैतिक होगा। वक्त और दुनिया की जरूरत के हिसाब से लोगों को लचीला रहना भी चाहिए, और अपनी नीतियों के मुकाबले दुनिया के व्यापक भले को अधिक महत्वपूर्ण मानना चाहिए। इसलिए अगर मोदी या उनकी पार्टी पाकिस्तान के साथ एक अभूतपूर्व लचीलापन दिखा रहे हैं, तो हम उसके खिलाफ नहीं हैं और उसके आलोचक नहीं हैं। मोदी चाहे मजबूरी में, जम्मू-कश्मीर में राज्य सरकार में भागीदारी के लिए जनसंघ के वक्त की मांगों को वैसे भी खारिज कर चुके हैं। धारा 370 खत्म करने की बात ही अब खत्म हो गई है। और जिस मुफ्ती की पीडीपी को अलगाववादी, या आतंकियों की हिमायती कहने के मोदी के वीडियो हवा में तैर रहे हैं, उसी मुफ्ती के साथ मोदी की पार्टी की सरकार आज जम्मू-कश्मीर में हैं। लेकिन आखिर में हम इस बात पर अपनी हैरानी जाहिर करना चाहते हैं कि सुषमा स्वराज ने आज संसद में जब यह कहा कि जम्मू-कश्मीर पर भी पाकिस्तान से बात होगी, तो यह बात भारत सरकार के दायरे से भी बाहर की है। पाकिस्तान के साथ कश्मीर पर तो बात हो सकती है, लेकिन जम्मू पर पाकिस्तान से क्या बात होगी? जम्मू पर तो पाकिस्तान का कोई दावा बनता भी नहीं है, जम्मू का हिस्सा विवाद से परे का भी है, और पाकिस्तान जिस जमीन पर कब्जा चाहता है, वह तो कश्मीर वाले हिस्से की जमीन है। ऐसे में भारत के एक राज्य, जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान से भला कैसे और क्यों चर्चा हो सकती है? 
दुनिया के बड़े-बड़े पर्यटन केन्द्रों पर रोलरकास्टर रहते हैं, जो कि उसमें बैठे लोगों को मशीन की रफ्तार से कभी आसमान तक ले जाते हैं, कभी सीधे जमीन की तरफ गिराकर लाते हैं, और उनको देखकर भी बहुत से लोगों को चक्कर आ जाता है। पाकिस्तान के साथ भारत की मोदी-नीति ऐसे ही एक रोलरकास्टर पर सवार दिखती है। हम मोदी को उनके चुनावी भाषणों में से निकालकर मियां नवाज को बिरयानी जैसे नारे सुनाना नहीं चाहते, क्योंकि सरकार में आने के बाद अगर वे कट्टरता छोड़ रहे हैं, तो इसे लेकर उनकी आलोचना नहीं होनी चाहिए, लेकिन पाकिस्तान के साथ रिश्तों की रफ्तार न सिर्फ अभूतपूर्व है, बल्कि कुछ मायनों में खतरनाक भी लगती है। आने वाले दिन ही बताएंगे कि मोदी सरहद पर तनाव कितना घटा सकते हैं, और अगर पाकिस्तान के साथ फौजी खर्च वाला तनाव, आतंकी खतरा भारत घटा सकता है, तो वह मोदी की छोटी कामयाबी नहीं होगी। फिलहाल मोदी सरकार आने का बाद पहली बार सुषमा स्वराज विदेश मंत्री जैसी दिख रही हैं, और यह एक मजेदार बदलाव भी है।

रमन सरकार के बारह बरस जलसा फिर कभी होगा, आत्ममंथन तो आज ही हो

विशेष संपादकीय
12 दिसंबर 2015
सुनील कुमार

छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह सरकार के बारह बरस पूरे होने के मौके पर दो बातों को साथ-साथ करने की जरूरत है। एक तो एक ही पार्टी की सरकार और एक ही मुख्यमंत्री के चलते हुए राज्य के इतने विकास को लेकर, और दर्जन भर दूसरी अच्छी बातों को लेकर एक समारोह की जरूरत, लेकिन इसके  साथ-साथ इतना ही महत्वपूर्ण है इस सरकार का आत्ममंथन, जो कि शायद समारोह जितना मीठा न हो पाए। लेकिन जैसा कि सरकार ने एक सही फैसला लिया है कि सूखे चलते राज्य के किसान बदहाली में हैं, और लगातार आत्महत्याओं जैसी नौबत बनी हुई है, और उसे देखते हुए कोई जश्न-जलसा न किया जाए। लेकिन हम जिस आत्ममंथन की बात सुझाना चाहते हैं, वह तो वैसे भी बंद कमरे में होनी है, और सरकार को चाहिए कि अपने अलग-अलग स्तर पर, अलग-अलग समूहों में बैठकर यह सोचे कि इन बरसों में क्या-क्या गलत हुआ जो कि नहीं होना चाहिए था, और क्या-क्या ऐसा सही होना चाहिए था, जो कि किन्हीं वजहों से नहीं हो पाया। 
रमन सिंह सरकार के बारह बरस अगर बहुत गंभीरता से देखें, तो इसके तीन पहलू एक-दूसरे से जमकर मुकाबला करते दिखते हैं, और यह समझ नहीं पड़ता है कि इनमें से कौन सा पहलू किस पर भारी पड़ रहा है। एक पहलू है इन बरसों में राज्य जहां से जहां तक पहुंच पाया है, उसने राज्य के ढांचे का जितना विकास किया है, आर्थिक मोर्चे पर जो कामयाबी पाई है, और सामाजिक जनकल्याण के जो नए पैमाने खड़े किए हैं, वह पहलू वाहवाही के लायक है। दूसरा पहलू यह है कि इन बारह बरसों में ऐसी कौन-कौन सी गलतियां और गलत काम हुए हैं, जो कि रोके जाने लायक थे, और सरकार जिन पर काबू नहीं कर पाई। तीसरा पहलू यह है कि राज्य के विकास की ऐसी कौन सी संभावनाएं हैं जिन पर बारह बरस का लंबा वक्त मिलने के बाद भी इस सरकार ने काम नहीं किया। यह बात कुछ कड़वी जरूर है, लेकिन अभी तीन बरस का वक्त इस सरकार के पास बचा है, और इसका इस्तेमाल इन अनछुई संभावनाओं  पर काम करने में भी लगाना चाहिए। 
छत्तीसगढ़ को कुछ राज्यों के साथ तुलना करके ही देखा जा सकता है, आदर्श के किसी पैमाने पर भारतीय लोकतंत्र के किसी एक राज्य को अलग से आंकना एक बेमानी बात होगी। पन्द्रह बरस पहले जो तीन नए राज्य बने, उनमें अगर तुलना करें, तो छत्तीसगढ़ के मुकाबले बाकी दोनों राज्य कहीं नहीं टिकते। जिस अविभाजित मध्यप्रदेश से अलग होकर यह राज्य बना है, उससे भी अगर तुलना करें, तो नया राज्य होने के बावजूद छत्तीसगढ़ ने बहुत अच्छा काम किया है, और एक ऐसी कामयाबी पाई है जो कि मध्यप्रदेश का हिस्सा रहते हुए इस इलाके को कभी नहीं मिल सकती थी। फिर देश के इस आकार के, ऐसी भौगोलिक स्थिति वाले राज्यों के साथ तुलना करें, तो भी छत्तीसगढ़ खासा कामयाब रहा है। यह एक अलग बात है कि पिछले कुछ बरसों की आर्थिक मंदी के चलते हुए जिस तरह पूरा देश औद्योगिक हाहाकार देख रहा है, कुछ वैसा ही छत्तीसगढ़ में भी हो रहा है। लेकिन इस राज्य ने न सिर्फ अपने-आपको चौबीसों घंटे रौशन किया, बल्कि बाकी देश का अंधकार मिटाने के लिए भी बिजली भेजी है, और ऐसी बिजली की वजह से लाखों-करोड़ों रोजगार बढ़ते हैं।
अब हम उस दूसरे पहलू पर आएं जो कि गलत कामों और गलतियों का है। तो इन बारह बरसों में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने पार्टी के भीतर से, या पार्टी के बाहर से कोई चुनौती न रहने पर भी, सरकार की बड़ी-बड़ी खामियों को बहुत हद तक बर्दाश्त करने का जो काम किया है, उससे उनको बचना चाहिए था। और राज्य सरकार के, और भाजपा के मुखिया के रूप में जब बारह बरस की कामयाबी वाला हिस्सा उनके नाम लिखा जा रहा है, तो सरकार की खामियां भी किसी और के नाम नहीं लिखी जा सकतीं। अपनी सरकार के मंत्रियों, अफसरों और नीचे के कर्मचारियों के भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए उनको जो करना था, वे नहीं कर पाए, या अपने मिजाज के मुताबिक उन्होंने कड़ाई से ऐसा कुछ नहीं किया। नतीजा यह निकला कि सरकार का बड़ा हिस्सा लोगों को भ्रष्टाचार में फंसा दिखता है, और शायद अगले तीन बरस में इसे तेजी से कम करना मुमकिन भी नहीं होगा। हमारा मानना है कि सरकार को अपने आत्ममंथन का सबसे बड़ा हिस्सा इसी पर खर्च करना चाहिए कि सरकार के अपने भीतर का इतना व्यापक और गंभीर भ्रष्टाचार कैसे काबू में किया जाए। लेकिन यहां पर हम फिर देश के दूसरे राज्यों से तुलना किए बिना अकेले छत्तीसगढ़ को बहुत बड़ा मुजरिम साबित करना नहीं चाहते। देश में वामपंथी पार्टियों की सरकारों को छोड़ दें,  तो देश के बाकी तमाम राज्यों में जिस बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े घोटाले सामने आए हैं, उनके मुकाबले छत्तीसगढ़ शायद कम बुरा ही दिखेगा। यहां भी कुछ चर्चित घोटाले हुए हैं, लेकिन यहां का भ्रष्टाचार सरकार की पूरी मशीनरी में व्यापक स्तर पर बिखरा हुआ अधिक है, किसी गठान वाले कैंसर की तरह एक जगह पर इक_ा कम हैं। लेकिन हम इसको इन बारह बरसों की सबसे बड़ी नाकामयाबी मानते हैं। अपनी सरकार के ग्यारहवें बरस में उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का नारा दिया है, और उनको इस पर कुछ हद तक तो खरा उतरने की कोशिश करनी चाहिए। प्रदेश में चिकित्सा और स्कूल शिक्षा, आदिवासियों और दलितों की योजनाओं की जो बदहाली है, और सिर्फ भ्रष्टाचार की वजह से है, वह उनसे अनदेखी तो है नहीं। आत्ममंथन का एक मुद्दा यह भी होना चाहिए कि जिस तरह हजारों करोड़ की लागत से एक नया रायपुर बनाया गया, और जिस तरह सैकड़ों करोड़ साल के खर्च से उसे चलाया जा रहा है, क्या यह विकराल ताजमहलीय आकार भूखे गरीब लोगों के राज्य के काम और फायदे का है?
अब एक पहलू जो रह जाता है, वह है अनछुई संभावनाओं का। आज भी छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था मोटेतौर पर प्रकृति की दी हुई खदानों, और जंगलों पर टिकी हुई है। यहां की खेती की अर्थव्यवस्था भी बड़ी है, लेकिन खेती से राज्य की कमाई शायद कम है, और खेती या उपज पर सरकार की तरह-तरह की सब्सिडी उस कमाई से अधिक है। इसी तरह जंगलों से होने वाली कमाई, और उन इलाकों पर होने वाले खर्च के अनुपात को देखें, तो वहां से भी सरकार को कमाई नहीं पाती। कुल मिलाकर यह राज्य खनिजों पर टिका और जिंदा है। कोयले से बिजली, लाईम स्टोन से सीमेंट, और लौह अयस्क से लोहा, इतना बनाने से ही सरकार की कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा जुटता है। लेकिन इन तीनों ही मामलों में सरकार प्राइमरी प्रोडक्ट बनाने के बाद उसमें कोई वेल्यू एडीशन नहीं कर पाई है। मोटे तौर पर यह राज्य कुदरत की दी हुई रोटी खा रहा है। यह एक ऐसी संभावना थी, जिस पर अधिक काम किया जाना था, और हो सकता है कि सरकार अपने बाकी वक्त में कुछ कर भी सके। लेकिन अगर तीसरे कार्यकाल के खत्म होने पर भी ऐसा कुछ नहीं होता, तो वह संभावनाओं का अंत कहलाएगा। उद्योगों से परे छत्तीसगढ़ के कामगारों के हुनर, उनकी पढ़ाई, उनके प्रशिक्षण में जो वेल्यू एडीशन होना चाहिए था, और उनको जिस तरह प्रदेश के बाहर एक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुकाबले के लिए तैयार करना था, उसमें भी यह राज्य अपने डेढ़ दशक में अधिक कुछ नहीं कर पाया। उच्च शिक्षा के कुछ बड़े केन्द्र छत्तीसगढ़ में शुरू जरूर हुए हैं जिनसे कि देश-विदेश में जाने-पहचाने नाम यहां के नक्शे में जुड़े हैं, लेकिन राज्य के दसियों लाख नौजवान ऐसे हैं जो कि बहुत औसत पढ़ाई पाकर औसत दर्जे के बेरोजगार से अधिक कुछ नहीं बन पा रहे। हमारा यह मानना है कि इन बारह बरसों में राज्य सरकार में कल्पनाशीलता और योजना में एक कमी रही है जिससे कि शिक्षकों और नर्सों जैसे आम काम के लिए भी राज्य के बाहर के लोगों को लाना पड़ रहा है। यह अंदाज लगाना सरकार की एक आम जिम्मेदारी थी कि किस हुनर के कितने लोगों की जरूरत होगी, और यह जाहिर है कि जब राज्य में ही ऐसी काबिलीयत के लोग नहीं मिल रहे, तो यहां से ऐसी काबिलीयत पाकर दूसरे राज्यों में उनके जाने का तो सवाल ही नहीं उठता। राज्य की मानव-संसाधन संभावनाओं पर सरकार को इससे कई गुना अधिक मेहनत करनी थी, लेकिन चूंकि इससे राज्य की कमाई के आंकड़े तुरंत नहीं बदलते, इसलिए शायद इस तरफ ध्यान नहीं दिया गया। आज दुनिया में कोई भी देश अपने लोगों की कामकाज की संभावनाओं को पूरी तरह बढ़ाए बिना किसी मुकाबले में नहीं टिक सकता। छत्तीसगढ़ को अब भी यह बात समझनी चाहिए। 
अब इन तीन पहलुओं के अलावा इस राज्य की चर्चा जिस बात के लिए जरूरी है वह है राज्य का सामाजिक सद्भाव। बारह बरस से भाजपा का बिना गठबंधन वाला मजबूत राज चलने के बाद भी यह राज्य उन तमाम धार्मिक उन्मादों, और साम्प्रदायिक भड़कावे से परे रहने में कामयाब रहा है, जिसे देश भर में भाजपा के कई नेता, और उनके कई सहयोगी संगठन लगातार बढ़ा रहे हैं। हम इस बात को कम महत्वपूर्ण नहीं मानते कि पिछले तीन विधानसभा चुनाव, तीन लोकसभा चुनाव, और तस्थानीय संस्थाओं के तीन चुनाव में जीत पाते हुए भी मुख्यमंत्री रमन सिंह ने एक भी भड़काऊ या उन्मादी मुद्दे को छुआ भी नहीं, और राज्य में मोटे तौर पर साम्प्रदायिक सद्भाव बनाकर रखा है। यही वजह है कि देश भर में भाजपा के जितने भी राष्ट्रीय या प्रादेशिक नेता हैं, उनमें शायद डॉ. रमन सिंह सबसे अधिक सौम्य चेहरा दिखते हैं, और एक समय जिस तरह अटल बिहारी वाजपेयी एक आक्रामक पार्टी के उदार मुखौटे माने जाते थे, आज रमन सिंह को भाजपा के भीतर एक उदार चेहरा पाया जा रहा है। उनकी अगुवाई में प्रदेश में समाज के सबसे कमजोर तबके को जिंदा रहने और जीने में मदद की जो योजनाएं शुरू हुई हैं, वे तमाम भ्रष्टाचार के बाद भी लोगों को भुखमरी से बाहर निकाल पाई हैं, जननी और शिशु मृत्यु घटा पाई हैं। सरकार के एक मुखिया के रूप में वे देश भर के मुख्यमंत्रियों में सबसे निर्विवाद भी हैं। लेकिन हम सालगिरह को जलसे के बजाय, तारीफ के बजाय, आत्ममंथन की तरफ मोडऩा अधिक जरूरी समझते हैं, उसी से राज्य का भला होगा, और राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी, उसके नेताओं के भले के लिए भी यह जरूरी है। 

सलमान के बरी होने से देश में उठे कई सवाल

संपादकीय
11 दिसंबर 2015

फिल्म अभिनेता सलमान खान को निचली अदालत से पांच बरस की कैद के बाद बाम्बे हाईकोर्ट ने उन्हें पूरी तरह से बरी कर दिया है। इसके साथ ही देश भर के मीडिया और सोशल मीडिया पर एक बहस ने जोर पकड़ लिया है, कि क्या ताकतवर को इस देश में कभी कोई सजा हो सकती है? सलमान का मामला तेरह बरस पहले मुंबई की सड़क पर नशे में गाड़ी फुटपाथ पर चढ़ाकर लोगों को कुचल मारने का था। इसके गवाह भी थे, और सुबूत भी थे। इनके आधार पर निचली अदालत ने कैद सुनाई थी, और कुछ महीनों के भीतर ही हाईकोर्ट ने फैसले को पलटते हुए सुबूतों और गवाहों को, पुलिस की कार्रवाई को नाकाफी ठहराते हुए सलमान को बरी कर दिया। देश के बड़े-बड़े वकील कल शाम से ही टीवी पर यह बहस करते दिख रहे थे कि जिस बाम्बे हाईकोर्ट में हजारों केस बरसों से लगे हुए हैं, और निचली अदालतों से सजा पाने वाले लोगों को जमानत भी नहीं मिली है, और वे जेलों में ही कैद हैं, फिर भी उनके मामलों की सुनवाई की बारी हाईकोर्ट में नहीं आ रही, और सलमान के मामले में अदालत को आनन-फानन सुनवाई और फैसले का वक्त क्यों और कैसे मिला? लेकिन यह अकेला मामला नहीं है, पिछले कुछ बरस से एक दूसरे फिल्म अभिनेता संजय दत्त का मामला ऐसा ही चले आ रहा है जब उनकी सुनवाई के लिए अदालतें मानो इंतजार करते बैठी थीं, और सजा मिलने के बाद भी बार-बार पैरोल पर संजय दत्त को घर जाकर रहने मिला। 
अभी हम अदालतों की नीयत पर कोई शक नहीं कर रहे, लेकिन लोगों का शक भारत की न्याय व्यवस्था पर इस आधार पर गहराते चल रहा है कि यहां बड़े-बड़े वकील लगाकर इंसाफ को उनसे पिटवाया जा सकता है। पैसों की बड़ी-बड़ी ताकत से जांच पर असर डाला जा सकता है, गवाह खरीदे जा सकते हैं, लोगों की याददाश्त खत्म की जा सकती है, सुबूत मिटाए जा सकते हैं, और बहुत से मामलों में सरकारी वकील या जज भी खरीदे जा सकते हैं। जब लोग ऐसी बातें बार-बार देखते हैं तो लोगों का भरोसा न सिर्फ न्यायपालिका से उठता है बल्कि भारतीय लोकतंत्र से भी उठ जाता है। फिर लोगों को लगता है कि इंसाफ दिलाने के लिए बंदूकें जरूरी हैं। 
कहने के लिए भारत में कुछ ऐसे गिने-चुने मामले लोग गिनाते हैं जिनमें अरबपति भी जेल गए हुए हैं, लेकिन ऐसे नमूने किसी भी मामले में पक्ष और विपक्ष दोनों में गिनाए जा सकते हैं। अधिकतर मामले तो ऐसे हैं जिनमें ताकतवर को कोई सजा नहीं हो सकती। सलमान के मामले में ही एक बात गौर करने लायक है, कि जिस अदालत में उनको सजा होने का खतरा था, वैसी निचली अदालत में उनका मामला बारह बरस चलते रहा। और जब सजा हो गई, तो कुछ महीनों के भीतर हाईकोर्ट से उनका फैसला आ गया जिसमें कि वे बरी हो गए। यह सिलसिला अदालतें तकनीकी आधार पर सही ठहरा सकती हैं कि वे तो उनके सामने पेश किए गए सुबूतों और गवाहों के आधार पर ही फैसला देती हैं, लेकिन जज अकेला ही न्यायपालिका नहीं होता, जांच एजेंसी से लेकर गवाह और सुबूत, दोनों तरफ के वकील, और जज ये सब मिलकर न्याय की प्रक्रिया रहते हैं, और इन सबमें गरीबों के लिए कोई सुनवाई नहीं है। 
इस फैसले से हो सकता है एक बेकसूर सलमान छूट गए हों, या एक कुसूरवार सलमान सजा से बच गए हों, लेकिन एक व्यक्ति यहां पर मुद्दा नहीं है, देश की जनता में न्यायपालिका को लेकर ऐसा भयानक अविश्वास बैठा हुआ है कि वह जांच एजेंसी से लेकर गवाह और जज तक के बीच में कोई फर्क नहीं कर पाती। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। और हमारा यह भी मानना है कि ऐसे तमाम मामलों में जिनमें बहुत पैसे वाले लोग किसी तरह से भी जिम्मेदार होते हैं, और गरीब हादसों या जुर्म के शिकार होते हैं, उनमें एक कानून बनाकर एक लंबी-चौड़ी भरपाई जरूरी करनी चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक देश के गरीबों के मन में लोकतंत्र के लिए कोई भरोसा नहीं रहेगा, और ताकतवर तबके के लिए जनता के मन में हिकारत भरी रहेगी। हमारा यह भी मानना है कि ऐसे तमाम मामलों में जिनमें ताकतवर लोग शामिल हैं, चाहे वे सलमान खान हों, चाहे गुजरात की मंत्री माया कोडवानी हों, या कि कोई और, हर ताकतवर की रिहाई के बाद ऊपर की अदालत में सरकार को अनिवार्य रूप से जाना चाहिए, इसके बिना लोगों के मन में सरकार के लिए भी नफरत पैदा होती है। सलमान के ही मामले में उनके खिलाफ गवाही देने वाले उनके साथ तैनात एक पुलिस सिपाही की जैसी बुरी मौत हुई है, उसे देखकर भी लोगों के मन में एक सामाजिक नफरत भरी हुई है। अदालत के पास हर बुराई का कोई इलाज नहीं होता, लेकिन लोकतंत्र के पास तो हर बुराई का इलाज होना ही चाहिए, वरना वह लोकतंत्र खारिज कर दिए जाने लायक है। 

कोलाहल की गुंडागर्दी बंद करवानी चाहिए

संपादकीय
10 दिसंबर 2015

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के भोपाल दफ्तर में जिस तरह से मध्यप्रदेश में शादी-ब्याह और सड़कों पर बजने वाले डीजे पर कड़ाई से रोक लगाई, उसे देखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार को जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, और न सिर्फ इस ट्रिब्यूनल, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के भी कई आदेशों को मानने की अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए। आज छत्तीसगढ़ के गांव-शहरों का हाल यह है कि यहां कोई कानून मानो बच ही नहीं गया है, और जिसकी जितनी ताकत हो, वे उतना शोर कर सकते हैं, कर रहे हैं। राजधानी रायपुर का हाल यह है कि यहां पर कानून शायद डीजे और लाउडस्पीकर चलाने वाले लोग तय कर रहे हैं, और सरकार ने सिर्फ मुख्यमंत्री निवास, राजभवन, ऐसी चुनिंदा कुछ जगहों पर जिला दंडाधिकारी के आदेश से लाउडस्पीकर पर रोक लगा दी है, और बाकी प्रदेश को मरने के लिए छोड़ दिया है। हो सकता है कि बिलासपुर में जिस इलाके में हाईकोर्ट के जज रहते हैं, या हाईकोर्ट के आसपास भी ऐसा आदेश लागू किया गया हो, और चुनिंदा लोगों को सुख से जीने की सहूलियत देकर सरकार मस्त है। 
लोगों को सुख-चैन से अपने घर पर जीने, बीमार को अस्पताल में इलाज करवाने, दुकान-दफ्तर के लोगों को काम करने, और सड़क से गुजरते लोगों को तकलीफ पाए बिना रास्ता पार करने का जो बुनियादी हक है, उसकी फिक्र छत्तीसगढ़ में किसी अफसर को नहीं है। यहां पर लोग घंटों तक सड़कों पर ट्रैफिक जाम करते हुए नाचते-गाते हैं, और साथ में बड़ी-बड़ी गाडिय़ों पर दर्जनों लाउडस्पीकर चलते हैं, जो कि पूरे इलाके का जीना हराम कर देते हैं। ऐसे शोर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के बड़े कड़े कई आदेश बरसों से लागू हैं, लेकिन जहां भीड़ की गुंडागर्दी शादियों से लेकर धार्मिक और सामाजिक जुलूसों तक हावी रहती है, वहां पर आम लोगों का यह हौसला नहीं रह जाता कि बेपरवाह अफसरों तक जाकर कानून की याद दिलाएं। हमारा ख्याल है कि कुछ सक्रिय और जागरूक लोगों को ऐसे शोरगुल की वीडियो रिकॉर्डिंग करके सुप्रीम कोर्ट को भेजना भी चाहिए कि उसके हुक्म की कैसी धज्जी उड़ रही है, आम जनता के कानों की धज्जी तो उड़ ही रही है। 
यह एक बड़ी भयानक नौबत है कि भोपाल में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को यह कहने को मजबूर होना पड़ रहा है कि लोग चाहें तो जाकर इतना शोरगुल राज्य के मुख्य सचिव के बंगले पर पूरी रात करें, और ट्रिब्यूनल इसकी इजाजत देगा। यह बात जाहिर करती है कि देश की संवैधानिक संस्थाएं सरकारों के कामकाज से, उनकी लापरवाही से किस कदर निराश हैं, और छत्तीसगढ़ का हाल इस मामले में मध्यप्रदेश से जरा भी बेहतर नहीं है। हमारा ख्याल है कि इस तरह के मामले में जितने कानूनी आदेश न्यायिक संस्थाओं से जारी होते हैं, वे बाकी प्रदेशों पर भी मोटे तौर पर लागू होते हैं, और छत्तीसगढ़ को तुरंत इससे सबक लेना चाहिए। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश दोनों नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की भोपाल शाखा के तहत आते हैं, और इस मामले में दोनों प्रदेशों पर यह आदेश बराबरी से लागू होता है।
यह बात हैरान करने वाली है कि बड़े-बड़े अफसर जो अपने लिए बड़ी-बड़ी सहूलियतें जुटा लेते हैं, वे सड़कों पर रात-दिन चलने वाली ऐसी गुंडागर्दी पर हाथ भी धरने से कतराते हैं। जो काम करना सरकार की खुद की जिम्मेदारी है, उसके बारे में यह सफाई दी जाती है कि कोई शिकायत आती है तो सरकार कार्रवाई करती है। हमारा अनुभव यह है कि कोई शिकायत आती है, तो अफसर सबसे पहले गुंडों को यह बताते हैं कि शिकायत किसने की है, और किसकी शिकायत पर उनको मजबूर होकर आना पड़ रहा है। इसी राजधानी रायपुर में एक वरिष्ठ पत्रकार रमेश नैयर ने एक मंदिर के रात-दिन के शोरगुल के चलते अदालत तक जाकर उसके खिलाफ आदेश हासिल किया, और वहां के लाउडस्पीकर बंद करवाए। लेकिन इससे कोई सबक लेने के बजाय अफसरों ने बाकी जगहों पर कोई कार्रवाई नहीं की, अब ऐसे कितने लोग हो सकते हैं जो संगठित समुदायों के खिलाफ, भीड़ के खिलाफ, धार्मिक उन्माद के खिलाफ, अराजक बारात के खिलाफ अदालत तक जाएं? 
राज्य सरकार को हमारी सलाह है कि इसके पहले कि कोई कानूनी कार्रवाई उसके खिलाफ हो, अपने नागरिकों के प्रति उसे अपनी न्यूनतम जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, और कोलाहल की गुंडागर्दी बंद करवानी चाहिए। 

सोनिया-राहुल पर कोर्ट केस पर संसद में हंगामा क्यों ?

संपादकीय
9 दिसंबर 2015

कांग्रेस पार्टी के अखबार नेशनल हेराल्ड की प्रकाशक कंपनी के शेयरों को एक नई कंपनी बनाकर उसमें डालने के मामले में भाजपा के नेता सुब्रमण्यम स्वामी सोनिया-राहुल सहित कांग्रेस पार्टी के खिलाफ अदालत गए हुए हैं, और यह पहला मौका है जब सोनिया गांधी किसी अदालती कटघरे में खड़ी होने जा रही हैं। हालांकि यह मामला कंपनी कानूनों के तहत एक जटिल मामला है, और इसके गुण-दोष पर हम कुछ कहना नहीं चाहते, लेकिन इस अदालती मामले को लेकर कांग्रेस पार्टी ने संसद के भीतर जिस तरह का बर्ताव किया है, वह भारी गैरजिम्मेदारी का है। अगर देश में सांसदों के खिलाफ चल रहे तमाम अदालती मामलों को लेकर संसद के भीतर ऐसा हंगामा होने लगे, तो साल में 365 दिन और चौबीसों घंटे चलने वाली संसद में भी समय का टोटा पड़ेगा। ऐसा करके कांग्रेस ने पता नहीं अपनी घबराहट उजागर की है, या खीझ जताई है, उसकी चाहे जो भी नीयत हो, यह काम उसके खिलाफ जा रहा है। 
सार्वजनिक जीवन में लोगों को दो तरह की अदालतों का सामना करना पड़ता है। जनता की अदालत का, और कानून की अदालत का। जहां तक ईश्वर की अदालत का सवाल है, तो उसके बारे में आस्थावान लोग बता सकते हैं कि मरने के बाद लोगों को वहां खड़ा होना पड़ता है या नहीं, और वहां पर कोई हिसाब-किताब होता है नहीं। लेकिन जब जमीन पर कानून की अदालत कोई कार्रवाई कर रही है, तो उसके खिलाफ संसद के भीतर हंगामा खड़ा करके कांग्रेस पार्टी इस अदालत की तौहीन भी कर रही है, और संसद का वक्त भी बर्बाद कर रही है। कल के दिन संसद में कही बातों को लेकर लोग उसके खिलाफ अदालत जाने लगें, या अदालत में कही बातों को लेकर चुनावी सभाओं में जाने लगें, तो लोकतंत्र का मटियामेट ही हो जाएगा। यह मामला चूंकि कांग्रेस पार्टी के सर्वोच्च स्तर से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसके नेताओं को अपने बर्ताव को काबू में भी रखना था, और कानून की लड़ाई कानूनी औजारों से लडऩी थी। 
आज कांग्रेस ने यह मामला दायर करने वाले भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी को भाजपा का वरिष्ठ नेता करार देते हुए इस अदालती मामले को भाजपा का राजनीतिक बदनीयत का अभियान करार दिया है। पल भर के लिए यह मान भी लिया जाए कि सुब्रमण्यम स्वामी भाजपा की सहमति या अनुमति से यह मुकदमा चला रहे हैं, तो भी बात तो मुकदमे के गुण-दोष पर होनी चाहिए, न कि उसके पीछे की नीयत पर। और अब जब अदालत में इसकी सुनवाई तय हो चुकी है, तब अदालत के बाहर जुबानी जमा-खर्च से यही जाहिर होता है कि कांग्रेस कानूनी रूप से कहीं कमजोर है। ऐसा है या नहीं, यह तो अदालत और वकील जानें, लेकिन ऐसी आक्रामक कार्रवाई संसद के भीतर और मीडिया के बयानों में कांग्रेस का सम्मान नहीं बढ़ा रही। 
देश में अधिकतर पार्टियों के बहुत से नेताओं को बहुत सी अदालतों में जाना पड़ता है, और कांग्रेस पार्टी का यह रूख लोगों के गले नहीं उतरेगा कि उसके नेताओं के खिलाफ कोई व्यक्ति निजी हैसियत से भी मुकदमा न करें। सुब्रमण्यम स्वामी एक बहुत ही बड़बोले और लड़ाकू नेता हैं। वे लंबे समय से जयललिता, सोनिया, राहुल, इंदिरा, राजीव जैसे कई पसंदीदा निशानों पर हमले करते आए हैं। वे भाजपा में भी हमेशा नहीं रहे, पार्टी के भीतर आते-जाते रहे हैं। इसलिए उनके इस मुकदमे को भाजपा का मुकदमा समझना भाजपा के साथ ज्यादती होगी। दूसरी बात यह कि अगर मोदी सरकार का कोई विभाग या उसकी कोई जांच एजेंसी इस मामले में अलग से कार्रवाई करती, तो भी उसे हम खारिज करने के बजाय कांग्रेस और सोनिया परिवार से उसका जवाब देने की उम्मीद करते। सार्वजनिक जीवन में हर नेता को बहुत से मामलों में जवाब देने पड़ते हैं, और उनको सही जगह पर ही जवाब देना चाहिए। संसद, अदालत, मीडिया, और चुनावी सभा, ऐसे बहुत से अलग-अलग मंच लोकतंत्र में रहते हैं, और लोगों को एक जगह की बहस को दूसरी जगह नहीं ले जाना चाहिए, खासकर जब तक वे सही जगह पर पूरा जवाब न दे दें। नेशनल हेराल्ड के मामले में अदालत में कार्रवाई अभी शुरू ही हुई है, और कांग्रेस को इतनी जल्दी हड़बड़ाकर ऐसा जाहिर नहीं करना चाहिए कि उसके नेता या तो अदालतों से ऊपर हैं, या वे अदालतों में जाना नहीं चाहते हैं। सोनिया गांधी आमतौर पर विनम्रता की बात करती हैं, लेकिन कल की उनकी प्रतिक्रिया एक आक्रामक जवाबी हमला थी कि वे इंदिरा गांधी की बहू हैं, और किसी से डरती नहीं हैं। वे इंदिरा की बहू हैं, यह एक निर्विवाद तथ्य है, और जिसने कुछ गलत न किया हो, उसे अदालत से डरने की जरूरत नहीं है, यह भी एक निर्विवाद तथ्य है। इसलिए ऐसी पैनी राजनीतिक बात कहने का कोई मौका एक अदालती कार्रवाई के सिलसिले में नहीं था, और वे ऐसा कहने से बच भी सकती थीं। फिलहाल कांग्रेस को इस मामले में संसद और सड़क का वक्त बर्बाद नहीं करना चाहिए, और अदालत में उसके सामने सारे विकल्प खुले हुए हैं।