मिसाइल की कामयाबी नहीं मिसाल की कामयाबी हो...

संपादकीय
31 जनवरी 2015

भारत में आज एक ऐसी मिसाइल कामयाबी से दागी है जो कि पांच हजार किलोमीटर दूर तक जाकर मार कर सकती है। अब हिन्दुस्तान की सरहद से पांच हजार किलोमीटर की दूरी नापें, तो शायद आधी दुनिया ही इसकी मार में आ जाएगी। और यह मिसाइल एक टन का परमाणु बम लेकर जा सकती है। इन तमाम जानकारियों के साथ आज की सुबह शुरू हुई, और देश के बहुत से लोगों को इस पर गर्व हुआ कि भारत ने यह कामयाबी हासिल की है। अब कुछ दिनों के बाद चीन या पाकिस्तान की तरफ से इसी किस्म की कोई दूसरी खबर आएगी। 
अब सवाल यह है कि जंग का यह मुकाबला दुनिया के मुल्कों के बीच किस हद तक जाएगा? इसके बाद इससे दुगुनी दूरी तक मार करने वाली मिसाइल बनेगी, और वह शायद इतना बड़ा परमाणु हथियार लेकर जा सकेगी कि वह किसी एक पूरे देश को खत्म कर सके। दो-चार दिन पहले ही हमने एक समझदार की कही हुई एक लाईन छापी थी कि परमाणु हथियारों का मुकाबला कुछ इस किस्म का है कि पेट्रोल में कमर तक डूबे हुए दो लोग खड़े हैं, और एक के हाथ में माचिस की तीन तीलियां हैं, और दूसरे के हाथ में पांच। 
गांधी ने एक बार कहा था कि आंख के जवाब में आंख निकाल लेने से एक दिन पूरी दुनिया ही अंधी हो जाएगी। आज हो यही रहा है, देशों के बीच जंग का मुकाबला, फौज का मुकाबला बढ़ते चल रहा है। और अपनी सरहदों के भीतर के गरीब, भूखे, बेघर, बीमार, और कुपोषण के शिकार लोगों की फिक्र करने के बजाय देश यह फिक्र करने में लगे हैं कि उनकी मिसाइलें सरहद से बाहर के किन मुल्कों के कौन-कौन से ठिकानों तक जाकर मार कर सकेंगी। और दूसरी तरफ बचाव का एक दूसरा मुकाबला भी चल रहा है कि अपनी ओर आती हुई ऐसी मिसाइलों को हवा में ही खत्म कर देने के लिए कैसी मिसाइल बनाई जाए, और वैसी मिसाइलें भी बनती चली जा रही हैं। 
यह तमाम काम उस गरीब जनता के पैसों पर हो रहा है जिसके भीतर कहीं किसी धर्म के नाम पर, कहीं देशभक्ति और राष्ट्रवाद के नाम पर, और कहीं राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर एक दहशत या नफरत फैलाई जाती है, और उसे यह एहसास कराया जाता है कि उसकी भूख से अधिक जरूरी हथियारों के सौदागरों के कारखानों की भूख है। और देश के नाम पर, धर्म के नाम पर लोग ऐसे झांसे में जीने भी लगते हैं, और एक युद्धोन्माद के शिकार हो जाते हैं। दरअसल दुनिया में हथियारों का कारोबार इतना बड़ा है कि उसकी खासी दिलचस्पी देशों के बीच जंग छिड़वाने में, आतंकियों को खड़ा करवाने में, और जगह-जगह हथियारबंद लड़ाई पैदा करवाने में रहती है। जिस तरह कुछ लोगों की रोजी-रोटी दूसरों की मौत से जुड़ी रहती है, उसी तरह हथियारों के कारोबार की जिंदगी दुनिया में तनाव खड़े होने और बड़े होने से जुड़ी रहती है। ऐसे कारोबार अमरीका जैसे बड़े देश में भी राष्ट्रपति बनाने और बिगाडऩे में दखल रखते हैं, और छोटे-छोटे तो बहुत से देश इनकी जेब में रहते हैं। आज दुनिया के दर्जनों देशों में बागियों के पास, आतंकियों के पास वे तमाम हथियार पहुंचते कैसे हैं, जिनकी एक-एक की बिक्री कहीं न कहीं दर्ज होनी चाहिए। 
इसलिए आज चाहे किसी देश की सरकार खुद कोई हथियार बनाए, या कोई कारखानेदार इसे बनाकर सरकार या बागियों को बेचे, इन सबको कम करने की तरफ बढऩा चाहिए। भारत की बड़ी कामयाबी ऐसी मिसाइल बनाने में नहीं हो सकती, जो कई देशों को पार करके भी आगे जाकर मार कर सके। भारत की कामयाबी ऐसी मिसाल बनाने में ही हो सकती है कि पड़ोसियों के साथ उसका फौजी मुकाबला कैसे कम हो सकता है। हिन्द महासागर के इस इलाके में भारत ही सबसे बड़ा देश है, और भारत का ही इतिहास इस मामले में एक वक्त बेहतर रहते आया है। इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा के फौजी इंतजाम बढ़ाते चलने के बजाय, राष्ट्र को कम फौजी इंतजामों से भी सुरक्षित रखने की तरकीब ढूंढना लोकतंत्र की एक अधिक बड़ी कामयाबी होगी, और भारत का बड़प्पन भी उसी से कायम हो सकेगा। आज कारगिल के मोर्चे पर रात-दिन बर्फ पर डटे हुए दर्जनों सैनिक सरहद के दोनों तरफ हर बरस बिना गोलियों के भी बर्फ से मारे जाते हैं। तनाव की ऐसी नौबत घटानी चाहिए। दोनों देशों को एक-दूसरे को दुश्मन की तरह देखना बंद करके दोस्तों की तरह रहकर, आपसी कारोबार बढ़ाकर, दोनों तरफ की गरीबी घटाकर, हवा से नफरत घटानी चाहिए। 

कांग्रेस संगठन के लिए अब राहुल से परे सोचने का वक्त

संपादकीय
30 जनवरी 2015
मनमोहन सरकार में पर्यावरण मंत्री रहीं जयंती नटराजन ने एक विस्फोट किया है, और राहुल गांधी पर सरकारी कामकाज में दखल का आरोप लगाते हुए कांग्रेस पार्टी छोड़ दी है। उन्होंने दर्जन भर दूसरे आरोप भी लगाए हैं कि किस तरह राहुल गांधी का दफ्तर उनको (जयंती) को बदनाम करने का काम करता था, सोनिया और राहुल उनकी बातों का जवाब नहीं देते थे, मिलने का वक्त नहीं देते थे। देश के बड़े-बड़े कारखानेदारों के लिए कांग्रेस और सोनिया-राहुल की पसंद-नापसंद से जयंती नटराजन को कैसे हुक्म मिलते थे, और किस तरह उन्हें देश के उद्योगों के बीच एक खलनायिका की तरह पेश किया गया था। आज सुबह से ही टीवी पर ऐसी खबरें आ रही थीं कि जयंती नटराजन ने सोनिया गांधी को एक चि_ी लिखी है जिसमें राहुल गांधी पर दखल के आरोप लगाए हैं। और उसी वक्त से ये खबरें भी आ रही थीं कि दोपहर वे एक प्रेस कांफ्रेंस लेकर कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे सकती हैं। 
कांग्रेस के लिए यह एक बड़ा सदमा और झटका है क्योंकि इस बार आरोप सीधे राहुल गांधी पर है, सोनिया गांधी पर है, और देश के बड़े-बड़े कारखानेदारों के मामले में अपनी पसंद या नापसंद सरकार पर थोपने के आरोप हैं। जयंती नटराजन की बातों को लेकर लोगों का ऐसा सोचना अब जायज है कि कांग्रेस के मालिकान सरकारी कुर्सियों से दूर रहते हुए भी सरकार को अपनी मर्जी से हांकते थे। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि राहुल गांधी के काम के तौर-तरीकों के चलते कांग्रेस जिस रफ्तार से गड्ढे में जा रही है, उसे देखते हुए राहुल के खिलाफ एक बगावत अब टल नहीं सकती, और जयंती ने एक किस्म से एक शुरुआत की है, जो कि आगे बढ़ेगी।
यूपीए सरकार के वक्त सरकार के बाहर के किसी भी व्यक्ति, चाहे राहुल गांधी ही सही, के कहे हुए अगर सरकार के मंत्रियों ने कोई फैसला प्रभावित किया है, तो इसके लिए वे मंत्री ही जिम्मेदार हैं। आज मोदी सरकार के सबसे बड़े मंत्रियों में से एक अरूण जेटली ने जयंती नटराजन के इस बयान के बाद तुरंत ही यूपीए सरकार के पर्यावरण-फैसलों को फिर से परखने की घोषणा की है। वह एक अलग मुद्दा है, लेकिन आज कांग्रेस को अपने संगठन, अपने नेता, अपने भविष्य, और अगर इनके बाद उसके पास वक्त बचता है तो देश के बारे में सोचना चाहिए। पिछले दस बरस मनमोहन सिंह की सरकार के चलते सोनिया-राहुल पर किसी तरह की आंच नहीं आ पाई, और मौनी बाबा होने की तोहमत झेलते हुए भी मनमोहन सिंह ने किसी बात की जिम्मेदारी सोनिया-राहुल पर नहीं डाली। लेकिन आज जब कांग्रेस कुएं में गिरे हुए हाथी की तरह हो गई है, तो तमाम नाराज लोगों को यह मौका मिल रहा है कि वे कूद-कूदकर लात मारें। 
हम इस बात को आज पहली बार नहीं लिख रहे हैं कि कांग्रेस को अगर अपने भविष्य को देखना है, तो उसे सोनिया-राहुल से परे एक लीडरशिप के बारे में सोचना होगा। आज हाल यह दिखता है कि सोनिया-राहुल की लीडरशिप के एकाधिकार को बचाते हुए कांग्रेस के चापलूस नेता पूरी पार्टी को ही खत्म हो जाने दे रहे हैं। राहुल गांधी में लीडरशिप की संभावनाएं सीमित दिखती हैं, और जिस भाजपा से उसका मुकाबला है, उसके मुकाबले राहुल की लीडरशिप कहीं नहीं टिक पा रही है। बाजार के व्यापारी के तराजू की जुबान में बात करें, तो मोदी के मुकाबले राहुल पासंग पर भी नहीं बैठते हैं। और यही वजह रही कि जैसे-जैसे पिछले आम चुनाव में इन दो लोगों को एक-दूसरे के मुकाबले खड़ा किया गया, पाया गया, वैसे-वैसे कांग्रेस की संभावनाएं खत्म होती चली गईं। यह हो सकता है कि जिस तरह संजय गांधी की दुर्घटना-मौत के बाद अचानक राजीव गांधी को अपनी घरेलू पार्टी की लीडरशिप सम्हालनी पड़ी थी, और इंदिराजी की हत्या के बाद सरकार को सम्हालना पड़ा था, उसी तरह राहुल गांधी को अपनी घरेलू पार्टी को सम्हालना पड़ा है। उनकी क्षमता और उनकी सोच इस जिम्मेदारी के लायक दिखती नहीं है, और इसके साथ-साथ सोनिया-राहुल की सक्रिय राजनीति में दिलचस्पी भी बहुत सीमित दिखती है। एक काबिल मैनेजर रखकर उन्होंने दस बरस यूपीए सरकार तो चलवा ली, लेकिन खुरदुरी जमीन की चुनावी राजनीति मैनेजरों से नहीं चलती, लीडरों से चलती है। देश के आम चुनाव में जिन नेताओं के नाम और चेहरे पर वोट मांगे जाते हैं, वे कार की पिछली सीट पर बैठकर जुबानी हुक्म से कार चलवाने वाले नहीं हो सकते। इसलिए हम आने वाले बहुत से बरस तक आज के सोनिया-राहुल को मोदी-भाजपा के मुकाबले कहीं कामयाब होते नहीं देखते हैं। 
यह कांग्रेस पार्टी का अंदरूनी मामला है कि वह किसे अपना अध्यक्ष बनाए, लेकिन देश के लोकतंत्र के लिए एक मजबूत विपक्ष जरूरी है, और कांग्रेस के गड्ढे में जाने से लोकतंत्र का एक बड़ा नुकसान हो रहा है। इस पार्टी की फिक्र किए बिना, महज लोकतंत्र की फिक्र करते हुए हम इस बात को आज फिर दुहराते हैं कि कांग्रेस को राहुल गांधी से परे सोचना होगा, वरना राहुल की संभावनाओं को बचाते-बचाते यह पार्टी अपनी खुद की संभावनाओं को डुबा बैठेगी। 

केजरीवाल और किरण बेदी, खामियों के बावजूद नया झोंका

29 जनवरी 2015
संपादकीय

दिल्ली के विधानसभा चुनाव एक बड़ी अजीब बात लेकर सामने आए हैं। मुख्यमंत्री पद के दोनों बड़े दावेदार, और संभावित विजेता अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी अभी दो बरस पहले तक, या महीने भर पहले तक राजनीति में नहीं थे। दोनों ही सरकारी नौकरी से निकलकर आए हैं, दोनों ही कांग्रेस और भाजपा की राजनीति के खिलाफ अन्ना हजारे के साथ सड़क का आंदोलन करते रहे, और दोनों ही कभी किसी राजनीतिक दल के सदस्य नहीं थे। केजरीवाल ने कोई दो बरस पहले आम आदमी पार्टी बनाई, और किरण बेदी एक पैराट्रुपर की तरह भाजपा में आसमान से उतरीं, और दिल्ली भाजपा के आधा दर्जन दिग्गज नेताओं के कंधों पर मुख्यमंत्री-उम्मीदवार बनकर खड़ी हो गईं। अब तक जितने चुनावी सर्वे आए हैं उनके मुताबिक कांग्रेस पार्टी के इस चुनाव के मुखिया, और पिछली कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे अजय माकन की चुनावी नतीजों में कोई जगह नहीं दिख रही है।
देश की सबसे बड़ी पार्टी दिल्ली में भी हाशिए पर चली गई है, और कुछ समय पहले तक देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी रही भाजपा आज चुनाव के कुछ हफ्ते पहले एक गैरराजनेता को आयात करके मुख्यमंत्री का दावेदार बना रही है। मतलब यह कि दिल्ली की करीब पौन सदी की राजनीति पूरी की पूरी धरी रह गई, दो बड़ी पार्टियां एक भी दावेदार पैदा नहीं कर सकीं, और एक पार्टी राजनीति में विदेशी मूल की किरण बेदी के सहारे चुनावी नदी पार करने पर मजबूर हुई है, और दूसरी पार्टी किसी किनारे पहुंचते दिख नहीं रही है। धूमकेतु की तरह अचानक राजनीति में आए अरविंद केजरीवाल आज दिल्ली में सबसे पसंदीदा मुख्यमंत्री-प्रत्याशी माने जा रहे हैं, और उन्होंने स्थापित राजनीतिक दलों के स्थापित तौर-तरीकों को दिल्ली में तो चौपट कर ही दिया है।
अब अगर हम बाकी देश की बात सोचें, तो आन्ध्रप्रदेश में जयप्रकाश नाम के एक बुजुर्ग और वरिष्ठ आईएएस अफसर ने ईमानदारी के मुद्दे पर ही एक पार्टी बनाई थी, लेकिन वह चल नहीं पाई। आज अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी दिल्ली से परे भी भारतीय चुनावी राजनीति, भारतीय संसदीय राजनीति, भारतीय लोकतंत्र, और भारतीय जनजीवन में एक नए किस्म की संभावना पेश करते हैं। इनके भीतर भी उसी तरह के कई विरोधाभास हो सकते हैं, और हैं, जैसे कि किसी भी दूसरे नेता में हो सकते हैं, किसी भी दूसरी पार्टी में हो सकते हैं। लेकिन अगर स्थापित पार्टियों के चौथाई-चौथाई सदी से घिस रहे नेताओं से अलग दो नए चेहरे देश की राजधानी में अगर चुनावी मुकाबला कर रहे हैं, तो यह पूरे देश के लिए, राजनीति से नफरत न करने वाले भले लोगों के लिए एक अलग किस्म की संभावना है। यह एक अलग बात है कि बड़ी-बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां दिल्ली में इस तरह की दीवालिया क्यों साबित हो रही हैं कि एक को किरण बेदी नाम के तिनके का सहारा ढूंढना पड़ रहा है, और दूसरी पार्टी को किसी किनारे तक लग जाने के लिए कोई तरीका नहीं सूझ रहा है। दिल्ली में किरण बेदी को सिर पर बिठाकर भाजपा ने यही साबित किया है कि उसका इस राज्य का नेतृत्व, यहां के नेता, पार्टी की यहां की नौबत केजरीवाल नाम के एक नौजवान के मुकाबले खतरे में पड़ी हुई है। और केजरीवाल में सुर्खाब के ऐसे कोई पर नहीं लगे हुए हैं जो कि देश में दूसरी जगहों पर कुछ और लोगों के सिर पर न मिलें।
इसे देखते हुए अलग-अलग प्रदेशों में, लोगों को पंचायत से लेकर वार्ड तक, और विधानसभाओं से लेकर लोकसभाओं तक, चुनावों में बेहतर लोगों को लाने और बढ़ाने का काम करना चाहिए। ऐसा होने पर स्थापित और संगठित पुरानी पार्टियों का एकाधिकार टूटेगा, और उनका चाल-चलन भी सुधरेगा। आज एक अकेले केजरीवाल ने भारतीय राजनीति में कई तरह की चुनौतियां खड़ी की हैं, वे एक व्यक्ति के रूप में नाकामयाब हो सकते हैं, लेकिन एक मिसाल के रूप में उनका योगदान हो सकता है कि जगह-जगह भले लोग हौसला जुटाकर सामने आएं, और जीत-हार की फिक्र किए बिना चुनाव में उतरें। इससे राजनीति की गंदगी दूर होगी, राजनीति के बदन में नया खून आएगा, नई सोच आएगी। और कोई अगर यह सोचे कि कोई पार्टी अपने लोगों को भला बना देगी, तो यह गलत उम्मीद होगी। भले लोग आकर किसी बुरी पार्टी को भी भला बनाने की संभावना रखते हैं। किरण बेदी और केजरीवाल अपनी तमाम खामियों के बाद भी राजनीति में एक नया झोंका हैं, और देश भर में ऐसी छोटी-छोटी कोशिशें होनी चाहिए।

छात्रा के गर्भवती होने से उठे कई सवाल

28 जनवरी 2015
संपादकीय

छत्तीसगढ़ के सरगुजा में एक आदिवासी कन्या छात्रावास की नाबालिग लड़की अपने ही करीबी रिश्तेदार से संबंधों के चलते गर्भवती हो गई, और उसे इसका अहसास ही नहीं हुआ। छात्रावास के पखाने में जब उसे एक बच्ची हुई, तो उसे मालूम पड़ा, और वह बच्ची तुरंत चल भी बसी। इसके बाद इस सरकारी छात्रावास की अधीक्षिका ने अपने पति के साथ मिलकर एंबुलेंस से इस छात्रा को रातों-रात उसके गांव, घर पहुंचाया, और अपनी उसकी मौजूदगी में ही परिवार के लोगों ने मिलकर नवजात शिशु की लाश को दफन किया। 
यह पूरा सिलसिला बहुत तकलीफदेह है, क्योंकि आदिवासी इलाकों में गांव की, गरीब परिवार की छात्रा किसी तरह पढऩे पहुंचती है, और नासमझी में ऐसे असुरक्षित देह-संबंध बना बैठती है जो कि उसे मां बनाकर छोड़ता है। इसके बाद देह की समझ उसकी इतनी सीमित है कि वह गर्भ को नहीं समझ पाती, और जन्म के बाद अपने बच्चे को नहीं बचा पाती। इसके बाद इस हादसे को छुपाते हुए सरकारी कर्मचारी भी कफन-दफन में शामिल हो जाते हैं, और जनचर्चा के फैलते-फैलते सरकार मजबूरी में इसकी जांच कराती है, और अब परिवार के कई लोगों सहित ये कर्मचारी पुलिस मामले में फंस गए हैं। 
हम इस पूरे हादसे की शिकार इस नाबालिग लड़की के बारे में सोचते हैं, तो लगता है कि न सिर्फ जंगल के बीच गांव और हॉस्टल की इस लड़की की सेक्स और सेहत की समझ बहुत सीमित थी, बल्कि अपनी जान पर आए खतरे से बचने की समझ भी उसे नहीं थी। भारत के बहुत से इलाकों में एक धार्मिक और सांस्कृतिक शुद्धता नाम के पाखंड का झंडा उठाकर चल रहे लोग स्कूलों में किशारोवस्था के लोगों को भी स्वास्थ्य शिक्षा देने के खिलाफ हैं। यहां तक कि जब लड़कियों के स्कूल में सेनेटरी नैपकिन्स की जानकारी दी जाती है, तो भी ऐसे सांस्कृतिक गुंडे उसके खिलाफ प्रदर्शन करने लगते हैं। दूसरी तरफ इसी देश की संस्कृति को बचाने के नाम पर जब बड़े-बड़े धार्मिक और राजनीतिक नेता एक-एक हिंदू औरत को दस-दस बच्चे पैदा करने के लिए उकसाते हैं, तो यह जाहिर है कि ऐसे लोगों की नजर में महिला को किसी सेक्स शिक्षा का कोई हक होना भी नहीं चाहिए। 
यह पूरा का पूरा मामला अपने शरीर और सेक्स के प्रति जानकारी न होने का मामला है। और वह बढ़ते-बढ़ते एक ऐसे अपराध में तब्दील हो गया जिसमें शायद आधा दर्जन लोग बरसों तक अदालत में धक्के खाएंगे, और शायद उनके कई बरस जेल में गुजरेंगे। हम इतने से लोगों की फिक्र में इस मुद्दे पर नहीं लिख रहे हैं। लेकिन पूरे छत्तीसगढ़ में जगह-जगह आदिवासी इलाकों में लड़कियों के हॉस्टल में जिस तरह से उनका देहशोषण हो रहा है, उसे देखते हुए यह जरूरी है कि सभी बच्चों को यौनशोषण के खिलाफ जागरूक किया जाए। एक पाखंडी संस्कृति का नाम लेकर बच्चों को अज्ञान में डुबाकर रखना एक जुर्म है, और ऐसे लोगों के दबाव में राज्य या केंद्र की सरकार को नहीं आना चाहिए। किशोरावस्था शुरू होने के साथ-साथ बच्चों को उनके शरीर को लेकर हर किस्म की जानकारी दी जानी चाहिए, और उन्हें दूसरों से कैसे खतरे हो सकते हैं, इस बारे में उनको चौकन्ना भी करना चाहिए। इस न्यूनतम सामाजिक जिम्मेदारी का विरोध करने वाले लोग उसी तरह के हैं, जिस तरह के लोग पाकिस्तान में पोलियो ड्रॉप्स का विरोध करते हुए सरकारी कर्मचारियों का कत्ल कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ सरकार को तुरंत ही प्रदेश के तमाम किशोरों की जागरूकता का अभियान छेडऩा चाहिए।

धर्म के आधार पर देशद्रोह तय करते लोग देशद्रोही

संपादकीय
27 जनवरी 2015
हाल के महीनों में भारत का साम्प्रदायिक सद्भाव किस कदर बिगड़ा है, और नफरत किस तरह सिर चढ़कर बोल रही है इसकी एक मिसाल कल सामने आई जब भारतीय राष्ट्रपति गणतंत्र दिवस पर सलामी ले रहे थे, और उनके बगले में खड़े हुए उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी शांत खड़े थे। उन्होंने सलामी के लिए हाथ नहीं उठाया, तो साम्प्रदायिक लोगों ने ट्विटर और फेसबुक जैसी सोशल वेबसाइटों पर उन्हें देशद्रोही, दगाबाज, और पता नहीं क्या-क्या लिखना शुरू कर दिया। कुछ जानकार समाचार वेबसाइटों ने ऐसी हमलावर बातों के जवाब में यह साफ किया कि नियमों और परंपराओं के तहत गणतंत्र दिवस पर सिर्फ राष्ट्रपति ही सलामी लेते हैं, और सलामी का जवाब देते हैं। इसलिए उपराष्ट्रपति एकदम सही थे कि वे सलामी गारद का जवाब न देकर चुप खड़े थे। साम्प्रदायिक ताकतों ने उनके मुस्लिम होने से जोड़कर अपनी तमाम नफरत निकाल दी। हामिद अंसारी एक बहुत ही जानकार, विद्वान, और सम्माननीय व्यक्ति हैं, और वे सतही और ओछी राजनीति से हमेशा ही परे रहते आए हैं। ऐसे व्यक्ति को जब साम्प्रदायिक और नफरतजीवी ताकतों के ऐसे हिंसक हमले झेलने पड़ते हैं, तो इसकी तोहमत सिर्फ इन लोगों पर नहीं मढ़ी जा सकती, बल्कि देश के माहौल को गंदा करने में जिन लोगों ने भी हाथ बंटाया है, वे तमाम लोग ऐसी नफरत के जिम्मेदार हैं। 
एक तरफ तो तीन दिन के लिए भारत के दौरे पर आए हुए अमरीकी राष्ट्रपति ने बहुत सी सकारात्मक बातें कीं। उन्होंने ऐसा समाज बनाने की बात कही, जहां लिंग, जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं हो। ओबामा ने कहा कि समाज में महिलाओं का विशिष्ट स्थान होने पर ही तरक्की निर्भर करता है। उन्होंने कहा कि धर्म की आड़ लेकर भी महिलाओं के साथ भेदभाव होता है। और ओबामा का यह भाषण आज सुबह चल ही रहा था और हामिद अंसारी के खिलाफ नफरत का अभियान भी जोरों पर था। भारत में आज यह एक दिक्कत खड़ी हुई है कि एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दुनिया की अर्थव्यवस्था के बीच भारत को आगे बढ़ाने के लिए मेक इन इंडिया की बात कर रहे हैं, दूसरी तरफ उनकी पार्टी और उनके सहयोगियों के आसपास के बहुत से लोगों का अभियान आक्रामक हिंदुत्व को बढ़ावा देने का चल रहा है, और इससे देश की उत्पादकता पीछे धकेल दी जा रही है, देश की संभावनाएं गड्ढे में गिरा दी जा रही हैं, और इस देश को एक बहुत ही धर्मान्ध और कट्टरपंथी लबादा पहना दिया जा रहा है। आर्थिक प्रगति और इस परले दर्जे की अभूतपूर्व धर्मान्धता एक साथ नहीं चल सकते। 
अमरीका की मेजबानी करके नरेन्द्र मोदी ने जो सुर्खियां बंटोरी हैं, उनके साथ-साथ उन्हें ऐसी सुर्खियों को भी देखना होगा जो कि देश की एक बहुत ही तंगदिल और आक्रामक विचारधारा रात-दिन पा रही है। बीच-बीच में मोदी के एक सबसे करीबी मंत्री अरूण जेटली जैसे कुछ लोग सार्वजनिक बयानों में भी यह बात मानते हैं कि हिन्दुत्व के नाम पर जो साम्प्रदायिक-आक्रामकता फैलाई जा रही है, उसकी वजह से सरकार के अच्छे काम भी खबरों में नहीं आ पा रहे, और सरकार का नुकसान हो रहा है। लेकिन नफरत फैलाने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। भारत को यह भी याद रखना चाहिए कि धर्मान्धता पर खड़ी हुई नफरत ने पड़ोस के पाकिस्तान का क्या नुकसान किया है। भारत के बहुत से मामलों में उसकी पहली तुलना पाकिस्तान के साथ होती है, और इस एक मामले में भी भारत को कट्टरता बढऩे से होने वाले नुकसान का ध्यान रखना पड़ेगा। 
हम एक बार फिर हामिद अंसारी पर लौटें, तो हिन्दुस्तान किसी एक धर्म के लोगों की जागीर नहीं है। यहां बसे हुए हर धर्म के लोग इस जमीन और देश के लिए वफादार हैं, और जहां तक देशद्रोही और गद्दार होने की बात है, तो वह इस देश में गोडसे से लेकर आज तक बहुत से धर्मों के लोग रहते आए हैं, और गद्दारी पर किसी धर्म का एकाधिकार नहीं है। इसलिए धर्म के आधार पर जो लोग इस देश में देशप्रेम तय कर रहे हैं, वे लोग तो सबसे पहले देशद्रोही हैं ही। 

ओबामा का भारत आना, दोनों देशों की जरूरत

25 जनवरी 2015
संपादकीय 

भारत के गणतंत्र दिवस पर पहली बार अमरीकी राष्ट्रपति का आना हो रहा है। बराक ओबामा के आने का समाचार-महत्व इसलिए भी अधिक है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस ओहदे पर आने के पहले तक लगातार अमरीकी वीजा मनाही झेलते रहे थे और यह अहमियत इसलिए भी अधिक है, क्योंकि बराक ओबामा और नरेन्द्र मोदी दोनों के बचपन एक ही किस्म की गरीबी, एक ही किस्म के अभाव वाले रहे, और इन दोनों की ऐसी तुलना भी आम लोगों का ध्यान खींचती है। 
वैसे तो भारत और अमरीका के रिश्ते मोदी के आने के पहले मनमोहन सिंह के 10 वर्षों में सबसे अधिक गहरे रहे। यह गहराई झूठ की हद तक चली गई थी, जब दुनिया के सबसे बड़े हमलावर जॉर्ज बुश से भारतीय प्रधानमंत्री ने कहा था कि भारत की जनता उनको बहुत प्यार करती है। हकीकत तो यह है कि भारत की एक फीसदी से भी कम जनता का अमरीका से कोई सीधा वास्ता पड़ता है, और वैसे सम्पन्न तबके को छोड़ दें, तो अधिकतर आबादी का अमरीका से कोई लेना-देना नहीं है। भारत की आबादी में 10 फीसदी से अधिक मुस्लिमों के पास अमरीका से नफरत करने की ठोस वजहें हैं, और भारत के समझदार तबके में भी अमरीका की नीतियों के खिलाफ भारी हिकारत है। इसीलिए मनमोहन सिंह पूरी तरह झूठा एक सर्टिफिकेट भारतीय जनता की तरफ से अमरीकी राष्ट्रपति को दे आए थे, और तब और अब में फर्क महज यही है कि मनमोहन सिंह के गंभीर व्यक्तित्व के मुकाबले मोदी का दमदार व्यक्तित्व सिर चढ़कर बोलता है। 
खैर, अमरीका दुनिया की एक हकीकत है, और दुनिया का आने वाला कल अमरीका के और अधिक कब्जे में रहना भी तय है। भारत की सरहदों पर जो खतरे हैं, उनको देखते हुए अमरीका से गहरे रिश्तों की जरूरत को अनदेखा भी नहीं किया जा सकता। इसके अलावा भारत की अर्थव्यवस्था, भारत का परमाणु कार्यक्रम, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की जरूरतें, ऐसी अनगिनत बातें हैं, जिनकी वजह से अमरीकी राष्ट्रपति भारत के लिए दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति है। ऐसे में मोदी और ओबामा के बीच सुर्खियों में छाई हुई एक अलग दर्जे की दोस्ती की चर्चा हकीकत से कुछ अधिक होती है। इसकी एक वजह भी है। गुजरात दंगों के बाद से मोदी को अमरीकी वीजा न देकर अमरीका ने उनके लिए जो रूख दिखाया था, वह मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस ओहदे की वजह से अपने आप ही बदल गया, और बरसों से इन दो देशों के बीच टंगा हुआ यह तनाव खत्म हुआ, तो एकदम गले मिलने में तब्दील हो गया। 
नरेन्द्र मोदी की सरकार की आर्थिक नीतियां, भारत की आज की कारोबारी जरूरतें, इनकी वजह से ही बराक ओबामा का भारत आना बहुत महत्व रखता है। और इन दो देशों के नेताओं के बीच व्यक्तिगत पसंद से, या की दोनों देशों के आपसी मजबूरियों के चलते, जिस वजह से भी रिश्ते गहरे हैं, वे अच्छी बात ही हैं। नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद जिस रफ्तार से विदेशी संबंधों के मोर्चे पर सरगर्मी दिखाई, वह पूरी दुनिया के लिए चौंकाने वाली बात थी। गुजरात का मुख्यमंत्री रहने के अलावा नरेन्द्र मोदी का केंद्र सरकार के कामकाज से, अंतरराष्ट्रीय संबंधों से कभी कोई लेना-देना नहीं था। ऐसेे में मोदी ने जिस तरह दुनिया के देशों और नेताओं के बीच भारतीय प्रधानमंत्री और भारत की एक नई तस्वीर बनाई है, बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारतीय कानूनों का एक नर्म और रंगीन गुलदस्ता पेश किया है, उसके चलते मोदी इन महीनों में दुनिया के चहेते प्रधानमंत्री भी बने हैं, और यही वजह है कि ओबामा सहित दूसरे बहुत से विश्व नेता उनको गंभीरता से ले रहे हैं, उनके बारे में अच्छी बातें कह रहे हैं। फिर हिंद महासागर के इस इलाके में चीन के पड़ोस में, पाकिस्तान के पड़ोस में, दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश होने की वजह से, अमरीकी बाजार का एक सबसे बड़ा ग्राहक होने की वजह से, अमरीका के लिए भी भारत की बड़ी अहमियत है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान में अगर अमरीका को आतंक पर हमला बोलना है, तो पड़ोस के भारत से अच्छे रिश्ते बताकर ही वह पाकिस्तान पर एक दबाव बना सकता है। अंतरराष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय संबंधों में ऐसा बहुत सा शक्ति संतुलन चलता है, और भारत के लिए अमरीका का सकारात्मक रूख उसकी ऐसी जरूरतों पर भी टिका हुआ है। 
आने वाले दो-चार दिन ओबामा की भारत यात्रा को लेकर बहुत सी खबरों के रहेंगे, और उनके बारे में फिर लिखने का मौका रहेगा। आज हम सिर्फ ओबामा के इस प्रवास के इस संदर्भ पर बात पूरी कर रहे हैं। 
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भारत तो राष्ट्रीय शोक मना रहा है लेकिन जनता सऊदी राजा को समझे

संपादकीय
24 जनवरी 2015
सऊदी अरब के कट्टरपंथी राजा की मौत के बाद पूरी दुनिया में सरकारों की तरफ से जैसी फर्जी जुबान में इस दकियानूसी आदमी को श्रद्धांजलि दी जा रही है, वह देखने लायक है। यूरोप और पश्चिम के वे तमाम विकसित और स्वघोषित संवेदनशील देश झंडे झुकाकर खड़े हैं जो कि भारत और बांग्लादेश में बने हुए सामानों का बहिष्कार करते हैं क्योंकि उनमें बाल मजदूरी का इस्तेमाल होता है। ऐसे देश इस बात को अनदेखा कर रहे हैं कि सऊदी अरब में इसी राजा की तानाशाही के चलते हुए महिलाओं को कार चलाने की इजाजत नहीं है, और अगर किसी महिला के साथ बलात्कार होता है, तो उसे कोड़े लगाने का इंतजाम इसी राजा ने किया था। लेकिन दुनिया का रिवाज यह है कि मरे हुए के बारे में कोई कड़वी बात बोलनी नहीं चाहिए, और दूसरी बात यह कि जिसके हाथ में दौलत की ताकत होती है, उसके सामने सब लोग झुककर खड़े रहते हैं। दुनिया में सबसे अधिक पेट्रोलियम पैदा करने वाले सऊदी अरब की दौलत के चलते संवेदनशील होने का दावा करने वाले देश भी वहां की तमाम ज्यादतियों को अनदेखा करना पसंद करते हैं। फिर यह भी है कि मध्य पूर्व के देशों के बीच में अमरीका और ब्रिटेन जैसे देशों को ईरान के मुकाबले सऊदी अरब एक ऐसा ठिकाना मिला है जो कि मुस्लिम भी है, और ईरान विरोधी भी है, और जिसे पश्चिम की यारी पसंद भी है। 
दरअसल, अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कुछ भी नैतिक नहीं होता। हर चीज तुलना की होती है कि अपने देश के अधिक फायदे का क्या है। नैतिकता के पैमाने, सिद्धांतों के पैमाने तभी तक इस्तेमाल होते हैं, जब तक वे उस देश के निजी हितों के खिलाफ नहीं जाते। एक तरफ तो तीसरी दुनिया के गरीब देशों में मजदूरी के पैमानों को लादकर विकसित देश वहां बने सामानों का बहिष्कार करवाते हैं, और अभी चार दिन पहले ही अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने वहां की संसद के सामने राष्ट्र के नाम दिए संदेश में यह खुलकर माना कि वहां प्रताडऩा के लिए कुख्यात जेल का वे क्या करने जा रहे हैं। इसलिए एक तरफ तो अपने देश के भीतर परले दर्जे की प्रताडऩा भी ठीक है, दूसरी तरफ बाकी दुनिया पर लोकतंत्र को अमरीका और उसके साथी देश हवाई जहाजों से बमों के साथ बरसाते हैं, और बेकसूर गरीब लोगों को लाखों की संख्या में मारते हैं। 
आज जिस सऊदी राजा की मौत पर भारत में झंडे आधे उतरे हुए हैं, उसी सऊदी राजा ने पड़ोस के देशों पर बरसती हुई अमरीकी मौतों पर कभी मुंह नहीं खोला था, कभी उसने फिलीस्तीन पर इजराइली हमले के खिलाफ कुछ नहीं कहा, और न कभी अमरीका को कहा कि वह इजराइल को गोद में न बिठाए। बल्कि इस राजा ने अमरीका से यह कहा था कि ईरान एक सांप है और अमरीका को हमला करके उसका सिर काट देना चाहिए। यह बात खुद अमरीकी कूटनीतिक संदेशों में थी, जिसे कि विकीपीडिया ने उजागर किया था। इस तरह एक घोर अमरीकापरस्त, गरीब मुस्लिम देशों और बाकी मुस्लिमों का विरोधी यह राजा आज पश्चिम के साथ-साथ भारत जैसे देश की श्रद्धांजलि पा रहा है, वाहवाही पा रहा है। यह तमाम तारीफ उस इंसान की नहीं है, उसकी जमीन के नीचे तेल के खजाने की है, और अमरीका की उस इलाके में फौजी जरूरत की है। 
इसलिए कभी भी सरकारों को बहुत नैतिक नहीं मानना चाहिए। भारत में भी जनता को अगर पूरी जानकारी होती तो इस राजा को कोई श्रद्धांजलि नहीं मिलती, और जनता तो जितनी थोड़ी बहुत जानकारी उसे थी उसके मुताबिक सऊदी अरब के कट्टरपंथ के खिलाफ सुनते और बोलते आई भी है। आज वहां कोई लोकतंत्र नहीं है, और न ही अमरीका को यह हड़बड़ी है कि वह सऊदी अरब पर भी लड़ाकू विमानों से लोकतंत्र बरसाए। जो राजा पहले से पश्चिम की जेब में है, उसे अमरीकी लड़ाकू विमानों का कोई खतरा भी नहीं है। दुनिया के देशों के मुखिया आते-जाते रहते हैं, लेकिन उनके इतिहास को समझने के बाद ही उनकी मौत पर गम मनाना चाहिए। भारत की सरकार इस बात को अनदेखा कर रही है कि विकीलीक्स पर आए दस्तावेज के मुताबिक इसी किंग अब्दुल्ला ने हर बरस करीब सौ मिलियन डॉलर पाकिस्तान में आतंकी ट्रेनिंग पर खर्च किए थे। दुनिया में इस राजा ने समाज के लिए कुछ अच्छा किया हो, इसकी कोई मिसालें नहीं हैं। 

पड़ोस की मौतों को अनदेखा करने वालों के लिए दो बातें

संपादकीय
23 जनवरी 2015
पिछले कुछ महीनों में ताकतवर लोगों के मामलों पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कई तरह के रूख दिखाए। एक तरफ तो सहारा कम्पनी के मालिक को जमानत के लिए हजारों करोड़ की शर्त रखी, और उसका इंतजाम न होने पर महीनों से सुब्रत राय जेल में है। दूसरी तरफ एक अभूतपूर्व इंतजाम की इजाजत देते हुए भारत की सर्वोच्च अदालत ने एक किस्म से जेल में सुब्रत राय को एक दफ्तर चलाने का इंतजाम दिया ताकि वे अपनी जायदाद बेचकर जमानत की रकम जुटा सकें। दूसरी तरफ सजा के खिलाफ सलमान खान जैसे अरबपति-अभिनेता का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। और आज सुप्रीम कोर्ट सहित दिल्ली की अदालतें बंद हैं क्योंकि अमरीकी राष्ट्रपति के लिए दिल्ली शहर सुरक्षा तैयारी कर रहा है। कुछ और मामले भी बड़े लोगों के ऐसे रहे जिन पर अदालती रूख लोगों को समझ नहीं आया। महाराष्ट्र की एक छोटी अदालत ने जिस तरह पुलिस और सरकार की सिफारिश पर बार-बार संजय दत्त को जेल से घर जाने की छूट दी, वह भी आम लोगों को हक्का-बक्का करने वाली थी। 
लोकतंत्र के भीतर आम और खास का फर्क बहुत ही जाहिर रहता है। ताकतवर लोगों के लिए तरह-तरह की छूट के इंतजाम हो जाते हैं, और गरीब अपनी सजा पूरी हो जाने के बाद भी जेल से रिहा नहीं हो पाते। सड़क किनारे से गरीबों की गुमटियां हटा दी जाती हैं, और ताकतवर लोग वक्त पूरा होने के बाद भी बरसों तक सरकारी बंगलों पर काबिज रहते हैं। आम और खास के ऐसे फर्क के खिलाफ ही भारत में कई राज्यों में नक्सल हिंसा को जगह मिली, और आज छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र सरहद पर जब नक्सली अमरीकी राष्ट्रपति के भारत आगमन के खिलाफ गाडिय़ां जला रहे हैं, तो वे आर्थिक असमानता पर टिके हुए समाज की हिंसा का मुद्दा ही उठा रहे हैं, जो कि देश के भीतर भी है, और दुनिया के देशों के बीच भी है। 
ऐसे माहौल में कुछ दिनों में जब अमरीकी राष्ट्रपति भारतीय रेडियो पर बोलने वाले हैं, और भारतीय प्रधानमंत्री ने जनता से सवाल मांगे हैं कि वह ओबामा से क्या पूछना चाहती है, तो देश के लोगों को इस मौके का इस्तेमाल करके दुनिया के इस सबसे बड़े दादा से सवाल पूछने चाहिए। भारत की सरकार को अपनी आर्थिक नीतियों के चलते हुए, और फौजी जरूरतों को देखते हुए इस बात को एक बड़ी कामयाबी मान रही है कि भारतीय इतिहास में पहली बार गणतंत्र दिवस पर बराक ओबामा भारत आ रहे हैं। लेकिन जब वे भारत की जनता के पूछे गए सवालों को देखने वाले हैं, तो भारत के जागरूक लोगों को ट्विटर और दूसरे तरीके से अमरीकी राष्ट्रपति से वे तमाम सवाल करने चाहिए जो कि अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, और दूसरे देशों की कब्रों से नहीं उठ सकते। पिछले एक दशक में अमरीकी हमलों ने बिना कोई फर्क किए हुए जिस तरह से बेकसूर आम जनता को हवाई हमलों में थोक में मारा है, उन्हें लेकर दुनिया के इस सबसे ताकतवर आदमी से सवाल करने चाहिए। 
आज का वक्त ऐसा है कि लोग बिना वजह कोई सवाल भी नहीं करना चाहते। लोग कड़वी बातें कहना भी नहीं चाहते। लेकिन हमारा मानना है कि सरकारें तो हो सकता है कि अमरीकापरस्त हो जाएं, लेकिन जनता के बीच तो ऐसा तबका है ही जो कि अमरीकी हिंसा और उसके साम्राज्यवादी विस्तार के खिलाफ है। अमरीकी राष्ट्रपति के आने का विरोध करने, और मुद्दे उठाने का जिम्मा अकेले नक्सलियों पर छोड़ देने से यह भारतीय लोकतंत्र की नाकामयाबी होगी। आज भी इस देश में और इंटरनेट पर ऐसे बहुत से जनमंच खुले हुए हैं जहां पर लोग बराक ओबामा के लिए सवाल उछाल सकते हैं, उठा सकते हैं, और उन सबको अमरीकी सरकार की ताकत भी मिटा नहीं सकती। आज अगर हिन्दुस्तानी यह सोचकर अमरीकी सरकार के जुर्मों को अनदेखा करेंगे कि ये हमले हिन्दुस्तानियों पर नहीं हो रहे, तो ऐसे हमले भारत से बहुत दूर भी नहीं हैं। अमरीका से अगर भारत का जागरूक तबका भी सवाल नहीं करेगा, तो यह इस देश की राजनीतिक चेतना की बेइज्जती होगी। 
हम सुप्रीम कोर्ट में बड़े लोगों के साथ हो रहे अलग किस्म के बर्ताव से लेकर दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह के साथ हो रहे अलग किस्म के रियायती बर्ताव को एक साथ मिलाकर इसलिए लिख रहे हैं कि दुनिया में ताकतवर और कमजोर लोगों के बीच एक बहुत बड़ा फासला बन चुका है, और इसके खिलाफ आवाज उठाने की जरूरत है। अपने आरामदेह घरों में चैन से बैठे हुए लोग पड़ोस की मौतों को अनदेखा करते हुए, अपने लिए मौत को न्यौता ही देते हैं। 

जो खूबियां गिनाने से परहेज करे उसकी गिनाई खामियों की विश्वसनीयता नहीं होती

22 जनवरी 2015

संपादकीय

आम आदमी पार्टी के संस्थापकों में से एक देश के भूतपूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण ने किरण बेदी की तारीफ में कसीदे पढ़ते हुए उनमें एक अच्छे मुख्यमंत्री की संभावनाएं गिनाई हैं। अरविंद केजरीवाल के लिए मतदान के पहले इससे अधिक नुकसानदेह और शायद कुछ भी नहीं हो सकता था कि उनकी नींव की एक चट्टान खिसककर किरण बेदी की प्रतिमा के लिए चबूतरा बनते दिख रही हो। कल की ही एक दूसरी बात और है जिसे लेकर आज हम यहां इस मुद्दे पर लिख रहे हैं, कांग्रेस के सबसे वजनदार लोगों में से एक जनार्दन द्विवेदी ने मोदी की तारीफ में काफी कुछ कहा है, और लोग इसे हक्का-बक्का होकर देख रहे हैं कि क्या कृष्णा तीरथ के बाद जनार्दन द्विवेदी भी? लेकिन मोदी की ऐसी तारीफ करने वाले कुछ और कांग्रेस नेताओं में शशि थरूर भी रहे हैं, और उसे थरूर की कानूनी दिक्कतों से जुड़कर देखा गया कि क्या वे मोदी की रहम पाने के लिए उनकी तारीफ कर रहे थे? 
भारत की राजनीति में बड़ेदिल की गुंजाइश कम दिखती है। लोग अगर एक बयान किसी की तारीफ में देते हैं, तो उसे दल-बदल का एक आसार मान लिया जाता है। लोग अगर किसी के खिलाफ एक बयान देते हैं, तो वह बगावत मान लिया जाता है। इसके साथ-साथ अगर हम संसद के भीतर मतदान के पहले की बहस को देखें, मतदान को देखें, तो उसे दल-बदल कानून से जोड़ दिया गया है, मतलब यह कि लोग अपनी पार्टी की नीति के खिलाफ वोट नहीं डाल सकते। नतीजा यह होता है कि देश की सबसे बड़ी पंचायत में देश की सबसे महत्वपूर्ण बहस में दिल और दिमाग का खुलकर इस्तेमाल करने की कोई संभावना नहीं बचती। लोग अपनी पार्टी के दायरे के भीतर बंधे रहने को बेबस होते हैं, और देश के कुछ सबसे अच्छे दिमाग अपनी कुछ सबसे महत्वपूर्ण सोच सामने रख ही नहीं पाते। 
राजनीतिक दलों में जाने के साथ यह एक दिक्कत जुड़ी होती है। मनमोहन सिंह जैसे विख्यात अर्थशास्त्री से लेकर किरण बेदी जैसी अफसर तक, जिंदगी के कई दायरों के काबिल लोग राजनीति में जा तो सकते हैं, लेकिन फिर अपने-आपको उस पार्टी की नीतियों के भीतर कैद करके रखना पड़ता है, जिस पार्टी के चुनाव चिन्ह को वे ढोते हैं।  अब आज अगर आम आदमी पार्टी के एक सबसे बड़े संस्थापक शांति भूषण अगर खुलकर किरण बेदी की संभावनाओं को गिना रहे हैं, तो यह दिल्ली के इस चुनाव में एक राजनीतिक भूचाल गिना जा रहा है। 
लोकतंत्र में चुनावी इस्तेमाल से परे भी लोगों को मुंह खोलने का साहस रहना चाहिए, और सच को एक बोझ नहीं मानना चाहिए। जब तक लोग एक-दूसरे की खूबियों को मानने से मना करते रहेंगे, तब तक उनकी गिनाई गई खामियों का कोई वजन नहीं रहेगा। लोग ऐसे लोगों की बातों पर अधिक भरोसा करते हैं जो कि एकतरफा बातें नहीं करते, और सच को मानते हैं, सच कहते हैं। सच का वजन अधिक होता है, और इसे छोडऩा नहीं चाहिए। विरोधी की हर बात को बुरा कहने वाले लोगों की बातों पर जनता गौर करना भी छोड़ देती है।

टीवी पर बेहतर कार्यक्रमों की जगह है, और जरूरत भी

21 जनवरी 2015

संपादकीय

भारतीय हिंदी टीवी मनोरंजन को देखें, तो अचानक यह लगता है कि लोगों में हास्यबोध एकदम से बढ़ गया है। लोग कॉमेडी के कार्यक्रम का इंतजार करने लगे हैं, और फिल्म-टीवी अवार्ड समारोह में कॉमेडी सबसे अधिक हावी मनोरंजन दिख रहा है। एक सबसे लोकप्रिय कॉमेडी कलाकार कपिल शर्मा के बारे में यह खबर है कि हफ्ते में दो दिन आने वाला उनका कार्यक्रम अब घटाकर एक दिन करना पड़ रहा है क्योंकि उनके पास फिल्मों का इतना काम आ गया है कि वे टीवी कार्यक्रम को उतना समय नहीं दे पा रहे हैं। हिंदी मनोरंजन टीवी पर आमतौर पर जो सीरियल चलते हैं, उनके लिए गाली की तरह सास-बहू सीरियल शब्द का इस्तेमाल होता है, और हमको भी यही लगता है कि हिंदी दर्शकों की मानसिक स्थिति को खराब करने में ऐसे सीरियलों का ही सबसे बड़ा योगदान है। ऐसे में अगर हंसने और हंसाने को एक जगह मिल रही है, तो वह रोने और रूलाने के मुकाबले बहुत बेहतर नौबत है।
टीवी के मनोरंजन को कम आंकना ठीक नहीं है। लोग रोने से लेकर डराने तक को मनोरंजन मानते हैं, और हर किस्म के शो टीवी पर चलते हैं। इनका लोगों की सोच पर बड़ा असर होता है, और नकारात्मक, हिंसक, तनावपूर्ण, और नफरत की बातों को देख-देखकर लोगों की सोच भी ऐसी होने लगती है, मानो चारों तरफ समाज में सब बुरा ही बुरा है। ऐसे में जब हंसी के कुछ कार्यक्रम अच्छे बनते हैं, और वे लोगों को बांध लेते हैं, तो यह समझ आता है कि लोग अब भी हंसने पर कितना यकीन रखते हैं। 
अब यहां हम भारत के सरकारी टीवी चैनलों की अगर बात करें, तो एक स्वायत्तशासी प्रसार भारती के तहत आने के बावजूद दूरदर्शन सरकार की नीतियों से बंधा हुआ है, और वहां पर अब भी अच्छे कार्यक्रम बनते हैं, प्रसारित होते हैं, और उनकी संभावनाएं भी हैं। केंद्र सरकार को यह सोचना चाहिए कि जनता के बीच लोकप्रिय हो सकने वाले ऐसे कौन से चैनल लाए जा सकते हैं जिनसे कि लोगों को एक बेहतर मनोरंजन का विकल्प मिल सके। कॉमेडी के कार्यक्रमों ने तो यह साबित कर ही दिया है कि लोग एकता कपूर ब्रांड के पारिवारिक दुष्टता के सीरियलों से परे भी कुछ देखना चाहते हैं, और क्राईम पेट्रोल से परे भी। अब सरकार को यह सोचना चाहिए कि वह सिर्फ खबरों और संसद प्रसारण, या शास्त्रीय संगीत के प्रसारण तक अपने को सीमित न रखे, और सकारात्मक मनोरंजन की तरफ भी आगे बढ़े। 
इसी सिलसिले में हम यह भी कहना चाहेंगे कि छत्तीसगढ़ सहित देश के राज्यों को भी चाहिए कि वे अपने टीवी चैनल शुरू करें। आज भारत सरकार की नीति के तहत राजनीतिक दल भी अपने सेटेलाइट चैनल चला रहे हैं, तो ऐसा कोई कानून नहीं हो सकता जो कि किसी राज्य सरकार को अपना टीवी चैनल शुरू करने से रोके। राज्य के स्तर पर भी अच्छी सामग्री, अच्छी खबरें, जरूरत की जानकारी, और बेहतर मनोरंजन के साथ अगर स्थानीय संस्कृति और कला को बढ़ावा मिलेगा, तो इससे राज्य के दर्शकों का भला भी होगा। राज्य सरकारों को अपने बंधे-बंधाए दायरों से बाहर निकलकर अपने टीवी चैनलों के बारे में सोचना चाहिए, ताकि जनता को बेहतर कार्यक्रम मिल सकें।

भारतीय चुनावी राजनीति में टीवी और अखबार का फर्क

संपादकीय
20 जनवरी 2015
दिल्ली के चुनाव में किरण बेदी को अरविंद केजरीवाल ने सार्वजनिक बहस की चुनौती दी, तो उन्होंने कहा कि वे विधानसभा के भीतर बहस करेंगी। जो लोग बहस करने में माहिर हैं, उनको इस तरह की चुनौतियां पेश करने में मजा आता है, और जनता भी यह उम्मीद करती है कि कुछ गरमागर्म बहस देखने मिले। लेकिन हर पार्टी के हर नेता का बहस में उतरना जरूरी नहीं होता है, और पार्टियों के पिछले कामकाज, उनके ताजा घोषणा पत्र, और उसके बाकी नेताओं के भाषण या बयान इसके लिए काफी माने जा सकते हैं। दिल्ली में चूंकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का बसेरा है, इसलिए वहां ऐसी कोशिश अधिक होती है, और घर-घर तक टीवी चैनलों की गाडिय़ां पहुंचकर बहस आगे बढ़ाती हैं। 
ऐसे में प्रिंट मीडिया की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने मिजाज के मुताबिक, और अपनी तकनीकी सीमाओं के मुताबिक दर्शक और श्रोता का ध्यान कुछ मिनट से अधिक नहीं खींच पाता। शब्द हवा में घुल जाते हैं, और लोगों के पास किसी एक बात को दुबारा ध्यान से सुनने की गुंजाइश नहीं रहती। ऐसे में लोगों की बातों के बड़े छोटे-छोटे टुकड़े टीवी पर दिखाकर खबरों की जो दुकान चलाई जाती है, वह दर्शकों को किसी गंभीर नतीजे तक पहुंचने में मदद नहीं करतीं। बल्कि इससे लोगों को गलतफहमियां अधिक होती हैं। दूसरी तरफ छपे हुए अखबार में गंभीरता की संभावनाएं अब भी हैं, और आगे भी रहेंगी। इसलिए चुनावों के मौके पर अखबारों को यह चाहिए कि वे पार्टियों और उम्मीदवारों के बीच मुकाबले को सनसनी की तरह पेश करने के बजाय एक गंभीर विश्लेषण के रूप में छापकर जनता का राजनीतिक शिक्षण करने की अपनी जिम्मेदारी पूरी करें। 
दिल्ली जिस तरह की धुंध से घिरी हुई है, वह मौसम से परे भी देश की राजनीति में धुंध फैलाते दिख रही है। कल तक नरेन्द्र मोदी की जिस लहर की चर्चा देश भर में करते हुए भाजपा थक नहीं रही थी, आज उसने अचानक बाहर से किरण बेदी को आयात करके मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया है, और इसके साथ-साथ पिछली सरकार में कांग्रेस की केन्द्रीय मंत्री रही कृष्णा तीरथ को भी पार्टी में लाकर एक सनसनी फैलाई है। इससे हो सकता है कि भाजपा के हाथ दिल्ली में कुछ मजबूत हों, लेकिन एक बड़ा सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या इतने बरसों से दिल्ली में ताकतवर राजनीति कर रही भाजपा के पास किरण बेदी के पहले तक एक भी ऐसा असरदार चेहरा नहीं था जिसे कि मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया जा सके? और वहां मौजूद उसके बड़े-बड़े नेता आज ताजा-ताजा आई हुई किरण बेदी के मुकाबले हाशिए पर क्यों धकेल दिए गए? खैर, चुनाव प्रचार के बीच में ऐसी बहुत सी घटनाएं होती हैं, जिनसे एक-एक, दो-दो फीसदी वोटों का फर्क होने की उम्मीद की जाती है, और कुछ ऐसी ही उम्मीद किरण बेदी को लेकर भाजपा की दिख रही है। 
टीवी चैनलों के टुकड़ा-टुकड़ा काम से परे प्रिंट मीडिया को चीजों का व्यापक विश्लेषण करना चाहिए, और दिल्ली के चुनाव के बहाने हम यह चर्चा कर रहे हैं। आने वाले दिन बताएंगे कि दिल्ली की राजनीति में मीडिया का कैसा दखल या असर रहा, लेकिन यह बात तय है कि एक गंभीर असर के लिए राजनीति को आज भी दो-चार रूपए दाम वाले सस्ते अखबारों की जरूरत पड़ती है, और इन्हीं अखबारों के सहारे लोकतंत्र और राजनीति में एक गंभीर पत्रकारिता की गुंजाइश बची हुई है। 

देश भर के भाजपा नेताओं के लिए किरण बेदी नाम का संदेश

19 जनवरी 2015
भारतीय राजनीति में मोदी की आंधी के बाद अभी दल-बदल और तोडफ़ोड़ से पार्टियों और नेताओं के बीच जमीन उसी तरह करवट ले रही है, जैसे कि भूकंप के बाद जमीन के भीतर की चट्टानें दुबारा जमते हुए सतह की मिट्टी तक को हिला देती हैं, और कई बड़े इमारतें गिर जाती हैं, कई इमारतें झुक जाती हैं। खासकर दिल्ली के चुनाव में आज जिस तरह भाजपा के खिलाफ चलने वाले आम आदमी पार्टी के, या अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़े हुए नेता भाजपा में जा रहे हैं, उससे न सिर्फ बाकी पार्टियों को अपनी जमीन हिलते दिख रही है, बल्कि दिल्ली में भाजपा के पुराने नेताओं को भी अपनी नई जगह समझ नहीं आ रही है। कल तक जो दिल्ली में भाजपा के मुख्यमंत्री बनने की संभावना वाले दिख रहे थे, वे आज किरण बेदी को लेकर ऐसी चर्चाओं से सहमे हुए हैं, और बेजुबान से हो गए हैं। दिल्ली में भाजपा के उम्मीदवारों और नेताओं की ताजा फेहरिस्त देखें, तो उसमें आम आदमी पार्टी छोड़कर आए हुए कई नेता दिख रहे हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह की महाराष्ट्र में कांग्रेस सांसद रहते हुए टोल नाके पर गुंडागर्दी करने वाले नेता को भाजपा ने वहां अपना सांसद बनाकर छोड़ा। 
भारतीय राजनीति में यह एक संक्रमण काल चल रहा है जिसमें लोग अपनी नई संभावनाओं को तलाशते हुए विचारधारा, जाति, और धर्म से परे पार्टियों में जा रहे हैं, पार्टियां छोड़ रहे हैं। इस दौर की अकेली वजह पूरे देश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा को मिली एक अभूतपूर्व लोकप्रियता है, जिससे यह पार्टी आज कश्मीर की सरकार में भी भागीदार रहने के करीब है, और दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी के मंत्री और सांसद भी भाजपा में जाते हुए दिख रहे हैं। यूपीए की केन्द्र सरकार, और उसके पहले दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार में बाल विकास मंत्री रही कृष्णा तीरथ इन पंक्तियों के लिखने के बीच में ही भाजपा में शामिल हो गई हैं, और कांग्रेस की दिल्ली में चल रही प्रेस कांफ्रेंस में मीडिया के उठाए सवाल पर पता लगा कि यह जानकारी कांग्रेस को इस पल तक नहीं थी। यह नौबत गैरभाजपाई पार्टियों के लिए दहशत की है, और भारतीय राजनीति में यह एक अलग किस्म का ध्रुवीकरण चल रहा है, क्योंकि गैरभाजपा दलों की संभावनाएं मजबूत नहीं दिख रही हैं। 
लेकिन इस बढ़ती हुई ताकत और लोकप्रियता के चलते भाजपा ने एक दूसरा काम यह भी किया है कि अपने पुराने और परंपरागत साथियों को उसने उनकी औकात दिखा दी है। महाराष्ट्र में शिवसेना गठबंधन सरकार में किस तरह घिसटते हुए आकर शामिल हुई है, यह सबने देखा है, और शिवसेना का दहाड़ता हुआ शेर भाजपा के सामने भीगी बिल्ली बन गया। अब इसके बाद पंजाब में अकाली दल के सामने इसी तरह का एक खतरा दिख रहा है। हो सकता है कि आगे चलकर दूसरे कुछ राज्यों में भी भाजपा के सहयोगी दलों, और एनडीए के भागीदारों को ऐसा नुकसान झेलना पड़े। लेकिन एनडीए के बाहर के लोग सीधे-सीधे भाजपा में शामिल होकर अपने राजनीतिक अस्तित्व को जिस तरह बचाने में लगे हैं, उससे ऐसा लगता है कि भारतीय राजनीति में नीति-सिद्धांत और विचारधारा अस्थाई रूप से निलंबित हैं, और भूकंप में जमीन के भीतर की चट्टानें हिलने के बाद अब तक बाहर की जमीन पूरी तरह थम नहीं पाई है। 
यह मौका बाकी पार्टियों के लिए भी अपने घर सम्हालने का भी है, और अपने काम के तौर-तरीकों को सुधारने का भी है। जिस तरह आपातकाल के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस ने अपनी जिंदगी की सबसे बुरी नौबत देख ली थी, उसी तरह 2014 के चुनाव में भी एक बार फिर गैरभाजपा, गैरएनडीए पार्टियों में अपनी जगह देख ली है। इसके बाद वे यहां से आगे बढ़ते हुए, ऊपर उठते हुए अपने को मजबूत भी बना सकती हैं। भाजपा की इस ऐतिहासिक और आक्रामक ताकत के मुकाबले ही जनता परिवार नाम से समाजवादी पार्टियों की एकजुटता की एक कोशिश चल रही है, और इंदिरा गांधी के मुकाबले 1977 के चुनाव में जनता पार्टी नाम का एक मोर्चा बना ही था, और कामयाब भी हुआ था। 
लेकिन एक बार फिर दिल्ली चुनाव की चर्चा करें, तो जिस तरह किरण बेदी भाजपा और इस चुनाव में पैराशूट से उतरी हैं, उससे भाजपा का स्थापित और परंपरागत ढांचा हिल गया है, बड़े-बड़े नेता सहम गए हैं, और ऐसे नेताओं के निजी नुकसान की कीमत पर भी एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में भाजपा फायदा पाने की कोशिश कर रही है। आने वाले दिनों में देश के दूसरे प्रदेशों में भी, या किसी लोकसभा या विधानसभा सीट पर गैरभाजपाई नेता, या गैरराजनीतिक लोग इस तरह आ सकते हैं, और दिल्ली की यह ताजा हलचल देश भर में अगर भाजपा के नेताओं को चौकन्ना नहीं करती है, तो यह उन नेताओं की लापरवाही और अदूरदर्शिता होगी, और वे किसी भी दिन खतरे में भी रहेंगे। यह किसी पार्टी के लिए एक बड़ा औजार है कि वह अपने मौजूदा नेताओं से परे भी किसी के बारे में रातोंरात सोच सकती है। इस किस्म के फैसले से हो सकता है कि भाजपा पूरे देश में अपने नेताओं को बिना कहे सावधान भी कर सके। 

मीडिया-अध्ययन के पैमाने तय करने की पहल समझदारी

संपादकीय
18 जनवरी 2015
केन्द्र सरकार ने अभी यह तैयारी शुरू की है कि भारत में मीडिया की पढ़ाई के पैमाने तय किए जाएं। इसके लिए ऐसी खबर है कि कुछ पुराने मीडिया कर्मियों की एक कमेटी बनाई गई है जो कि भारत में इंजीनियरिंग, मेडिकल, कानून जैसे पाठ्यक्रमों की तरह मीडिया का पाठ्यक्रम और उसकी तकनीकी जरूरतें तय करेगी, और उसके मुताबिक देश के विश्वविद्यालयों से एक स्तर की पढ़ाई की उम्मीद की जाएगी। मोदी सरकार के आलोचकों ने इसे मीडिया पर काबू करने की एक कोशिश माना है, जबकि यह बात पिछली सरकार के समय से चल रही थी और सार्वजनिक रूप से यूपीए के सूचना-प्रसारण मंत्री ने इसके बारे में कई बार कहा था। 
आज भारत में मीडिया के कामकाज को देखें, तो विचारधारा से परे, राजनीतिक पसंद और नापसंद से परे, समाचारों और विचारों को लिखने, खबरों को सजाने और दिखाने जैसे मीडिया के हर पहलू में सुधार की असीमित गुंजाइश दिखती है। आज बिना किसी मीडिया-संबंधित पढ़ाई-लिखाई या प्रशिक्षण के लोग अखबारों और टीवी चैनलों, समाचार-वेबसाइटों और दूसरे किस्म के मीडिया संस्थानों में काम करने लगते हैं। और पाठकों-दर्शकों का एक बड़ा तबका ऐसा रहता है जो कि मीडिया की कही बातों को जरूरत से कुछ अधिक गंभीरता से लेता है और अब इंटरनेट-टेलीफोन के चलते मीडिया के काम को आम लोग भी तेजी से फैलाते चलते हैं, जो कि एक दशक पहले तक सिर्फ मीडिया का जिम्मा और एकाधिकार था। ऐसेे में मीडिया के काम में उत्कृष्टता के पैमाने ऊंचे करने के लिए यह जरूरी है कि उसमें काम करने वाले लोग एक बुनियादी सीख लेकर आएं। 
इसके खिलाफ तर्क कई तरह के दिए जा सकते हैं कि स्कूल और कॉलेज, विश्वविद्यालय या प्रशिक्षण संस्थान पत्रकार पैदा नहीं कर सकते, और दुनिया के कुछ सबसे अच्छे पत्रकार बिना किसी मीडिया-डिग्री वाले रहे हैं। दरअसल एक वक्त ऐसा था कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी नहीं होती थी, और उस वक्त काम के तजुर्बे से ही लोग बड़ी-बड़ी इमारतें बना लेते थे। एक वक्त जिसने ताजमहल डिजाइन किया होगा, उसके पास डिग्री-डिप्लोमा कुछ नहीं रहा होगा, लेकिन उसने दुनिया की सबसे हैरतअंगेज इमारतों में से एक को बनाया था। भारत के बहुत से पुराने मंदिर सिर्फ अनुभव के आधार पर बनाए गए थे, और आज तो छोटे इंजीनियरों को उतनी बड़ी इमारत बिना विशेषज्ञ ढांचा-इंजीनियर की मदद के बिना बनाने की इजाजत भी नहीं है। इसलिए जो पहले से चले आ रहा है, वही सबसे अच्छा है यह सोच ठीक नहीं है। आज तो समाज सेवा के काम में भी पोस्ट ग्रेजुएट की डिग्री रहती है, और वह आमतौर पर मददगार पाई भी जाती है। अब कोई यह कहे कि क्या मदर टेरेसा, या बाबा आमटे ने समाज सेवा में कोई डिग्री ली थी, तो यह कुतर्क होगा। आमतौर पर काम को बेहतर बनाने वाली शिक्षा पाने में हिचक नहीं होनी चाहिए। 
हम मीडिया के काम में रोजाना इतनी खामियां देखते हैं कि उसमें सुधार की जरूरतें कदम-कदम पर दिखती हैं। इनमें से बहुत सी खामियां मीडिया की अच्छी पढ़ाई से, और उस ज्ञान-जानकारी के इस्तेमाल से दूर हो सकती हैं। फिर मीडिया का काम सीधे किसी आलमारी में बंद नहीं होता, वह हर घंटे या हर दिन जनता के बहुत बड़े तबके तक पहुंचता है, और उसकी खामियां भी बहुत से लोगों की जानकारी को गलत करते चलती हैं। मीडिया को अधिक असरदार, अधिक उत्पादक, और अधिक रचनात्मक बनाने के लिए इसकी एक अच्छी पढ़ाई में कोई बुराई नहीं है। और आज मोदी सरकार की इस पहल को मीडिया पर काबू पाने की पहल मानना उतना ही गलत होगा, जितना कि यह मानना कि गुजरात में कांग्रेस सरकार के रहते हुए प्रवीण तोगडिय़ा नाम का एक डॉक्टर बनाया गया था, और आज वह जो भी कर रहा है वह कांग्रेस का किया हुआ है। पेशेवर विषयों की पढ़ाई अपने आपमें राजनीतिक विचारधारा से परे की बनाई जा सकती है, और जब तक मीडिया पाठ्यक्रम में कोई भगवाकरण न दिखे, तब तक उससे दहशत खाने की जरूरत नहीं है। जिस तरह चिकित्सा, इंजीनियरिंग, और कानून की पढ़ाई के राष्ट्रीय पैमाने तय किए गए हैं, वैसे पैमाने मीडिया-अध्ययन के लिए तय करना एक अच्छी बात होगी। 

पूरी दुनिया की तरह भारत में भी सहनशीलता कसौटी पर

17 जनवरी 2015
संपादकीय
सोनिया गांधी पर लिखी गई एक कल्पनापूर्ण जीवनी बाजार में आने को है। खबरें बताती हैं कि यूपीए सरकार के रहते हुए भारत में इसका प्रकाशन रोका गया था, और अब इसके प्रकाशन का सही समय दिख रहा है इसलिए लेखक-प्रकाशक उत्साह में हैं। इसके लेखक का कहना है कि जब यह किताब प्रकाशित होने को थी तो कांगे्रस के एक बड़े नेता ने प्रकाशकों को खूब डराया था और इसे अंगे्रजी में आने से रोक दिया था। यह किताब स्पेनिश में छपी है, और अब शायद जल्द ही यह भारत में अंगे्रजी में, और शायद हिन्दी में भी आ जाए।
यह मुद्दा अपने-आपमें संपादकीय लिखने का नहीं है, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर लेखक-रचनाकार और कलाकार की आजादी तक जिस तरह पूरी दुनिया में खबरों में है, उसे देखते हुए इस मुद्दे को भी हम आज यहां छू रहे हैं। सार्वजनिक जीवन में जो लोग भी ऊंचे ओहदों पर, या महत्व की जगहों पर पहुंचते हैं, उनको सार्वजनिक छानबीन के लिए खुला रहना ही पड़ता है। गांधी और नेहरू तक ऐसी जांच पड़ताल से परे नहीं रहे, और उन पर लिखी गई किताबों में उनके सेक्स जीवन से लेकर पे्रम प्रसंगों तक सभी बातों पर लिखा गया। इतिहास के शिवाजी जैसे लोगों पर भी इतिहासकारों ने जो लिखा, उसका भी जमकर राजनीतिक और क्षेत्रीय विरोध हुआ, और किताब को रोक देना पड़ा। कभी मुस्लिम कट्टरपंथी तसलीमा नसरीन की किताबों को रोकते हैं, तो कभी हिंदूवादी दीनानाथ बत्रा हिंदुत्व पर लिखी गई एक गंभीर किताब को छपने के बाद लुग्दी बनाने पर मजबूर कर देते हैं। अभी तमिल के एक लेखक खबरों में हैं, जिनके लिखे हुए के खिलाफ एक अभियान छेडऩे से उन्होंने अपने-आपको लेखक के रूप में मार डालने की मुनादी खुद ही की, और कहा कि बची जिंदगी वे अपने इस पहलू से परे रहेंगे। 
भारत से परे दुनिया के के दूसरे देशों को देखें, तो वहां भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक नए सिरे से परिभाषित की जा रही है। एक मुस्लिम बहुल देश टर्की में दो दिन पहले ही वहां के सबसे बड़े अखबार पर सरकार ने एक जुर्म कायम किया कि उसने पेरिस की व्यंग्य पत्रिका शार्ली एब्दो से लेकर इस्लाम पर कार्टून अपने अखबार में छापे। भारत की आज की खबर है कि हैदराबाद में पुलिस में एक रिपोर्ट दर्ज हुई है कि जी न्यूज ने अपने चैनल पर ये कार्टून दिखाए। जर्मनी में इन कार्टूनों को छापने वाले अखबार पर हमले हुए, और वहां पर एक बड़ा इस्लाम विरोधी उग्र आंदोलन सड़कों पर है, और एक मुस्लिम नौजवान को मार डाला गया है। 
आज जब दुनिया में कट्टरता बढ़ती चल रही है, भारत की जुबान में साम्प्रदायिकता, और पश्चिम की जुबान में रंगभेद, संस्कृति-भेद, और धर्म-भेद बढ़ते चल रहा है, तब धर्म की आस्थावादी सोच और लोकतंत्र की उदारवादी सोच के बीच टकराव कम होने का आसार नहीं है। और ऐसे में भारत में भी सहनशीलता का इम्तिहान चल रहा है। ऐसे में सोनिया गांधी पर आने वाली किताब तो एक छोटा मुद्दा है, और जिस स्पेन में यह किताब पहले छपी है, और जिस अंगे्रजी में इस किताब के छपने की घोषणा हुई है, उन भाषाओं वाले देश में लोगों की निजी जिंदगी में बड़े गहरे तक दखल की परंपरा है, संस्कृति है, और इसके लिए बर्दाश्त भी है। अब देखना यह है कि भारत के मौजूदा कानूनों के तहत सोनिया पर जीवनी का सिलसिला आगे चलकर कितने नेताओं की जीवनी तक पहुंचता है, और उससे समकालीन इतिहास लेखन को कैसी नई शक्ल मिलती है। लोकतंत्र में कानून बहुत बातों की इजाजत देता है, लेकिन हर देश का अपना-अपना लोकतंत्र अलग-अलग है, हर देश में परंपराएं भी अलग-अलग हैं, और सहनशीलता भी। भारत में भी बाकी दुनिया की तरह यह सब आज कसौटी पर है।

राज्यों के बीच अनुभवों की अदला-बदली के फायदे

16 जनवरी 2015
संपादकीय
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कई राज्यों के अधिकारी एकजुट होकर सार्वजनिक कार्यक्रमों में नवाचार पर विचार-विमर्श कर रहे हैं। यह मुद्दा सरकार की जनकल्याण और जनउपयोग की, जनसुविधाओं की योजनाओं में अलग-अलग राज्यों में हुई मौलिक पहल को आपस में बांटना है, ताकि एक जगह की कामयाबी का दूसरी जगह भी फायदा उठाया जा सके। भारत जैसे संघीय लोकतंत्र में बहुत सी योजनाएं केन्द्र सरकार की तरफ से बारीकी तक तैयार करके राज्यों को भेजी जाती हैं, लेकिन बहुत सी योजनाएं राज्य अपने स्तर पर तैयार करते हैं, और कहीं पर मंत्रियों की मौलिक सोच काम आती है, तो कहीं पर अधिकारियों की किसी अनोखी पहल से जनता तक फायदा अधिक पहुंचता है। लोगों को याद होगा कि कुछ दशक पहले महाराष्ट्र में एक नए कलेक्टर ने जिला कार्यालय में एक नई प्रणाली शुरू की थी, जो अहमदनगर प्रणाली के नाम से पूरे देश में चर्चित हुई थी। खुद छत्तीसगढ़ में पिछले दस बरसों में राशन वितरण की पीडीएस कही जाने वाली योजना चर्चा में रही है, और देश-विदेश से लोग इसको देखने के लिए आए हैं। इसलिए अनुभव और कामयाबी को आपस में बांटने का यह काम सिर्फ सरकार के लिए जरूरी और उपयोगी नहीं है, यह सभी लोगों के काम का है और समाज के बाकी दायरे भी समय-समय पर अलग-अलग एकजुट होकर ऐसी चर्चा करते हैं।
सरकार में एक दूसरी बात पर भी चर्चा होनी चाहिए कि किस तरह केन्द्र की योजनाओं और राज्यों की योजनाओं में बेईमानी होती है, चोरी और भ्रष्टाचार को जगह मिलती है। यह बात इसलिए जरूरी है कि इस किस्म के जुर्म का तरीका अधिकतर राज्यों मेें एक जैसा हो सकता है, और एक जगह की गड़बड़ी से बाकी जगहों पर नसीहत की गुंजाइश बहुत रहती है। राज्यों को एक-दूसरे से यह सीखना चाहिए, और आर्थिक अपराधों को रोकने के लिए यह एक कारगर तरीका हो सकता है। अब मिसाल के लिए छत्तीसगढ़ में इन दिनों सिंचाई विभाग में बड़े भ्रष्टाचार की बड़ी कमाई की जब्ती चर्चा में है। अब अगर इन तमाम राज्यों के सिंचाई विभागों के लोग एक साथ जुटें, और सरकार के आर्थिक अपराधों की जांच करने वाले उनके साथ बैठें, तो हो सकता है कि लोगों को भ्रष्टाचार के तरीके, और उसको रोकने का, या पकडऩे का तरीका भी समझ में आए। एक खतरा यह भी हो सकता है कि जहां पर भ्रष्टाचार अभी तक उतना संगठित नहीं हो पाया है, वह भी होने लगे, लेकिन जांच एजेंसियों के साथ मिलकर जब ऐसी चर्चा होगी, तो शायद एक जागरूकता आएगी, और बाकी राज्य अपने इलाके में, अपने कामकाज में इसे रोकने की सोच सकेंगे। 
नवाचार का मतलब नई पहल, नई सोच, और नए तरीके हैं। इनके लिए यह भी जरूरी है कि सरकार के लोगों का निजी क्षेत्र के लोगों के साथ संपर्क बढ़े, मीडिया के साथ उठना-बैठना हो, और ज्ञान-अनुभव का ऐसा मेल-मिलाप लोगों को नए और संपन्न अनुभव दे जाता है। हमारा मानना है कि सरकार को अपने आपको अपने घर तक सीमित नहीं रखना चाहिए, और समय-समय पर दूसरे तबकों के साथ भी उठना-बैठना चाहिए, ताकि सरकार से उनके साबके के जो तजुर्बे हैं, उनका भी पता सरकार को लग सके। केन्द्र सरकार के बजट और राज्यों के बजट से जनता तक इतनी योजनाएं और इतनी सुविधाएं पहुंचती हैं कि उनसे जनता की जिंदगी बदल सकती है। लेकिन उनमें चोरी, बेईमानी, और लापरवाही से उनके बेअसर होने से यह नौबत नहीं आ पाती। भारत में सरकार ही सबसे बड़ी और सबसे ताकतवर संस्था है। और अगर इसके सुधार की कोई गुंजाइश निकल सकती है, तो उससे देश की उत्पादकता बहुत बढ़ सकती है। 

स्थानीय संस्थाओं से पार्टियों का टकराव दूर रखा जाए...

15 जनवरी 2015
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के कोरबा में आज नगर निगम महापौर और पार्षदों के शपथ ग्रहण समारोह में वहां के सांसद और केन्द्रीय मंत्री रहे चरणदास महंत ने मंच और माईक से सबको यह नसीहत दी कि अब उन्हें किसी भी तरह के राजनीतिक या किसी दूसरे भेदभाव से परे काम करना चाहिए। यह अपने किस्म की अकेली राजनीतिक बात है जो कि खुलकर सार्वजनिक रूप से कही गई है। हमारे पाठकों को याद होगा कि हम पिछले कुछ दिनों में इसी जगह इस बारे में लिख चुके हैं कि राजनीतिक तनातनी से परे, पार्टीबाजी और गुटबाजी से परे लोगों को चुनाव के बाद अब स्थानीय संस्थाओं में मिलकर काम करना चाहिए, क्योंकि स्थानीय जिम्मेदारियों का राजनीतिक नीतियों से बहुत अधिक लेना-देना नहीं होता है, बल्कि मेहनत और ईमानदारी से काम करने की जरूरत रहती है। प्रदेश के बहुत से नगर निगमों और नगरपालिकाओं में ऐसी स्थिति आई है कि महापौर और अध्यक्ष तो कांग्रेस के बने हैं, लेकिन सभापति या दूसरे पदों पर भाजपा के पार्षदों की अधिक संख्या के आधार पर भाजपा के कोई नेता रहेंगे। इसके अलावा राज्य सरकार की तरफ से निगम और पालिकाओं में जो अधिकारी नियुक्त होते हैं, उनके बारे में यह माना जाता है कि वे राज्य सरकार के नियंत्रण में काम करते हैं, और वहां पर प्रदेश की भाजपा सरकार के मार्फत म्युनिसिपल की भाजपा एक दबाव डलवा सकती है। यह सिलसिला भी शुरू नहीं होना चाहिए, क्योंकि हमने राजधानी रायपुर के नगर निगम में ही पिछले पांच बरसों में कांग्रेस की महापौर और भाजपा के बहुमत के बीच टकराव देखा है, और उसमें अफसरों से लेकर मंत्रियों तक के नाम बीच में आते थे। यह बात प्रदेश में नहीं होनी चाहिए, और चरणदास महंत ने जो कहा है, उसी तरह बाकी बड़े नेताओं को, पार्टियों को, और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को काम करना चाहिए। रायपुर में कांग्रेस के निर्वाचित महापौर ने सबसे पहले जाकर प्रदेश के भाजपाई मुख्यमंत्री से मुलाकात की और उनकी शुभकामनाएं लीं, इस पर कांग्रेस के भीतर कुछ नाराजगी हुई, लेकिन हम इस स्वस्थ परंपरा को शहर के लिए बेहतर मानते हैं, और पूरे प्रदेश के लिए इसको एक मिसाल मानते हैं।
स्थानीय संस्थाओं के अधिकार भी असीमित रहते हैं, और उनकी संभावनाएं भी असीमित रहती हैं। राजनीतिक टकराव के चलते इनका नुकसान नहीं किया जाना चाहिए। आज भी छत्तीसगढ़ में कहने के लिए तो स्थानीय संस्थाएं अधिकारसंपन्न हैं, लेकिन दूसरी तरफ वे हर बात के लिए राज्य सरकार की मोहताज भी रहती हैं। ऐसे में यह याद रखना चाहिए कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने दस बरस केन्द्र की यूपीए सरकार से बिना किसी टकराव के किस तरह राज्य के काम करवाए, और कांग्रेस-भाजपा का देशव्यापी टकराव राज्य के विकास में आड़े नहीं आने दिया। म्युनिसिपलों के भीतर भी महापौर-अध्यक्ष और सभापति अलग-अलग पार्टियों के होने पर भी उन्हें लड़ाई छोड़कर शहर के हित में काम करना चाहिए, इसके बिना जनता के बीच उनकी खुद की छवि भी बहुत खराब बनेगी। 

संचार और सोशल मीडिया स्कूल-कॉलेज में सिखाएं

संपादकीय
14 जनवरी 2015
भारत में प्रधानमंत्री के स्तर से लेकर गांव-देहात अनपढ़ लोगों तक सोशल मीडिया की चर्चा है। केन्द्र सरकार के मंत्रियों, और विभागों को लगातार कहा जा रहा है कि वे ट्विटर और फेसबुक जैसी लोकप्रिय सामाजिक वेबसाइटों के माध्यम से सरकार की नीतियों, कार्यक्रमों, और उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाएं। छत्तीसगढ़ में भी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की तरफ से रोजाना ट्विटर पर कुछ न कुछ पोस्ट किया जाता है। भारत के दसियों करोड़ लोग इंटरनेट पर सोशल वेबसाइटों से जुड़े हुए हैं, और उनके बीच आपस में भी बहुत से मुद्दों पर बातचीत होती है। दूसरी तरफ अब करीब-करीब हर हिन्दुस्तानी हाथ तक मोबाइल फोन पहुंचने को हैं, और उन पर वॉट्सऐप जैसी मुफ्त की सेवा पर लोग बहुत से वीडियो, तस्वीरें और संदेश एक-दूसरे को भेजते हैं। आपसी संबंधों का, संपर्क का, और प्रचार का यह एक बिल्कुल नया माध्यम है, जो कि पिछले कुछ बरसों में भारत की जिंदगी का एक बड़ा सक्रिय हिस्सा बन गया है। लेकिन आम लोगों को न तो इसकी संभावनाओं का ठीक से अंदाज है, और न ही इसके खतरों का। 
इंटरनेट और टेलीफोन से आज लोग काम का सच और बेकाम का झूठ बात की बात में चारों तरफ फैला सकते हैं, और आज अगर कोई गणेश के दूध पीने की अफवाह फैलाए, तो वह जंगल की आग की तरह फैल सकती है। ऐसे में स्कूल-कॉलेज जैसी संगठित जगहों पर किशोर और नौजवान पीढ़ी के सक्रिय लड़के-लड़कियों को सोशल मीडिया के बारे में सिखाने की एक बड़ी संभावना है, और जरूरत भी है। आज हिन्दुस्तान के बहुत से अधेड़ लोग भी अपने छोटे बच्चों से फोन और इंटरनेट की तकनीक सीखते या समझते हैं, और फिर खुद उनका खुलकर इस्तेमाल भी करते हैं। लोगों के बीच हंसी-मजाक से लेकर अश्लील और फूहड़ लतीफों और तस्वीरों तक, सेक्स की वीडियो क्लिप तक इतने किस्म की बातें की आवाजाही होती है, कि जिसकी कल्पना भी कुछ बरस पहले किसी ने नहीं की थी। कुल मिलाकर यह एक ऐसा औजार भारतीय समाज में इस्तेमाल होने लगा है, जिसे कोई बिना धार का औजार समझ रहे हैं, तो कोई इसे जानलेवा हथियार समझ रहे हैं। जरूरत इनके बीच इस बात की है कि लोगों को इस नई तकनीक और जीवन शैली से परिचित कराया जाए, और उनको इसकी सकारात्मक संभावनाओं के बारे में बताया जाए। 
जैसा कि जिंदगी के हर दायरे में होता है, सनसनीखेज और बुरी बातें तेजी से फैलती हैं। एक पुरानी कहावत है कि जब तक भला अपने जूते बांधता है, तब तक बुरा गांव का चक्कर लगाकर आ जाता है। ऐसे समाज में, और ऐसे मानवीय स्वभाव के बीच जरूरत है सोशल मीडिया की संभावनाओं से लोगों को रूबरू कराने की। लोग इसका इस्तेमाल तो कर रहे हैं, लेकिन न तो इस नए औजार के लिए जरूरी जिम्मेदारी की समझ अधिक लोगों में है, और न ही इसके उत्पादक उपयोग की। कई किस्म के झूठ, गढ़ी गई तस्वीरें, अपमान और आपत्ति की बातें लोग एक-दूसरे को इतनी रफ्तार से आगे बढ़ा देते हैं, कि कुछ मिनटों में ही यह बात खो जाती है कि गलत बात भेजना किसने शुरू किया। कम्प्यूटर और फोन की तकनीक कॉपी और पेस्ट की ऐसी सहूलियत देती है कि लोग बिना किसी स्रोत का जिक्र किए, अपने ही अकाउंट से भली-बुरी सभी किस्म की बातें आगे बढ़ाते हैं। 
ऐसे में आज जरूरत है कि स्कूल और कॉलेज में आधुनिक संचार तकनीक और सोशल मीडिया की संभावनाओं और खतरों पर कुछ घंटों की एक ट्रेनिंग अनिवार्य की जाए। और फिर वहां से निकलकर बच्चे अपने घरों में मां-बाप को भी यह बात बता और सिखा सकते हैं। संचार तकनीक और सोशल मीडिया को अनदेखा करने से इसके खतरे तो कम नहीं हो सकते, इसकी संभावनाएं जरूर धरी रह जाएंगी। इसलिए इस हकीकत की मौजूदगी को मानना जरूरी है, और उसे सीखना जरूरी है। यह समाज के बहुत अच्छे काम भी आ सकती है, इसको महज बुरा कहना एक लापरवाही होगी।

देश को योग की जरूरत तो है, हिंदू योग की नहीं

संपादकीय
13 जनवरी 2015

मध्यप्रदेश के स्कूलों में योग शिक्षा सूर्य नमस्कार के साथ शुरू की गई है। कुछ गैरहिंदू समुदायों ने इसका विरोध किया है जिनके धर्म में सूर्य की उपासना की जगह नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर संयुक्त राष्ट्र में एक अभूतपूर्व समर्थन के साथ अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने का फैसला लिया गया और उसकी घोषणा हुई। दुनिया भर के 170 से अधिक देशों ने इसका समर्थन किया और इसके लिए इक्कीस जून की तारीख तय की गई। अब यह जाहिर है कि इतने देश कोई हिंदू राष्ट्र तो हो नहीं सकते, इनमें अलग-अलग धर्मों को मानने वाले लोग होंगे, और अगर भारत या कोई भी इस पर अड़ेंगे कि इस योग का मतलब हिंदू योग है, तो जाहिर है कि योग को बढ़ावा देने का मकसद ही परास्त हो जाएगा, और ऐसी जीत से हिंदू धर्म को कुछ भी हासिल नहीं होगा। अगर भारतीय योग पद्धति को हिंदू धर्म की किसी पद्धति के रूप में बढ़ावा दिया जाएगा, तो जाहिर है कि भारत के ही बहुत से दूसरे समाज जिनकी उपासना पद्धति हिंदू उपासना पद्धति से अलग है, उनके लोग इस योग से परे रहेंगे। 
जब नरेन्द्र मोदी ने दुनिया में योग दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा, तो जाहिर तौर पर वह किसी धर्म से परे था। भारत के हिंदू समाज में भी योग का मकसद धार्मिक उपासना न होकर तन और मन की सेहत रहता है। ऐसे फायदेमंद योग पर हिंदू धर्म की कुछ बातों को लादकर देश का नुकसान किया जा रहा है। होना तो यह चाहिए कि योग की अलग-अलग प्रचलित पद्धतियों में से भी केंद्र और राज्य सरकारों को भी धर्मनिरपेक्ष पद्धतियां छांटनी चाहिए, और किसी धर्म की सेहत सुधारने के बजाय देश की सेहत सुधारना चाहिए। खासकर सरकारों को अपने-आपको धार्मिक रीति-रिवाजों से, धर्म-स्थानों से, धार्मिक-कार्यक्रमों से परे रखना चाहिए वरना ऐसी सरकार जनता के सभी तबकों का विश्वास भी नहीं जीत सकतीं, और जिस भारतीय संविधान की शपथ लेकर सरकारें बनती हैं, वह संविधान ही सरकार को धार्मिक पक्षपात की इजाजत नहीं देता। 
लेकिन सरकारें मध्यप्रदेश से परे भी आज कुछ और राज्यों में एक दकियानूसी सोच को बढ़ावा दे रही हैं। मप्र की तरह ही गोवा में भी भाजपा की सरकार है, और वहां के युवक और खेल मंत्री का बयान सामने आया है कि सरकार समलैंगिक और किन्नर (एलजीबीटी) युवाओं का इलाज कराने के लिए केंद्रों की स्थापना पर विचार कर रही है ताकि उन्हें 'सामान्यÓ बनाया जा सके। यह बात अपने-आपमें ऐसी भयानक नासमझी की अवैज्ञानिक बात है कि इस पर उस पूरी दुनिया की एक नापसंदगी भारत को झेलनी पड़ सकती है जहां पर नरेन्द्र मोदी जाकर पूंजी निवेश जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। आज जब देश में तीसरे जेंडर को कानूनी मान्यता दी जा रही है, तो गोवा का यह मंत्री लगातार कभी समुद्रतट के छोटे कपड़ों के खिलाफ बयान देता है, तो कभी शराब के खिलाफ। इस तरह की शुद्धता का दुराग्रह लोगों पर लादने से मोदी सरकार और भाजपा की एक कट्टरवादी और दकियानूसी छवि बनती और बढ़ती जा रही है। 
आज ही की एक दूसरी खबर है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी पार्टी के सांसद साक्षी महाराज को उनके अवांछित बयानों पर एक नोटिस जारी किया है। साक्षी महाराज लगातार हिंदू महिलाओं से चार-चार बच्चे पैदा करवाने में लगे हुए हैं, ताकि उनके मुताबिक मुस्लिम आबादी जिस तरह बढ़ती है, उसी तरह हिंदू आबादी को भी बढ़ाया जाए। भाजपा को देश भर में अपने सांसदों, मंत्रियों, और नेताओं के बयानों से उसे खुद को हो रहे नुकसान के बारे में सोचना चाहिए। हमारा यह मानना है कि भाजपा का नुकसान देश के लिए महत्वहीन हो सकता है, लेकिन देश की वैज्ञानिक सोच और देश के साम्प्रदायिक सद्भाव को जो नुकसान ऐसे नाजायज बयानों से, या सरकारों के गैरधर्मनिरपेक्ष फैसलों से हो रहा है, वह नुकसान मोदी सरकार का कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद भी बना रहेगा। मोदी और शाह को इस बारे में सोचने की जरूरत है।

धर्म को आंकने की जरूरत

12 जनवरी 2015
पेरिस में एक व्यंग्य पत्रिका शार्ली एब्दो पर हुए हमले के बाद फ्रांस में इस्लाम के नाम पर आतंकी हमले करने वालों के जो नाम सामने आ रहे हैं, उनमें वहां की एक नौजवान महिला का नाम और चेहरा भी है, और उसके बारे में बताया गया है कि वह फ्रांस से टर्की होते हुए इस्लामी जेहाद में शामिल होने सीरिया जा चुकी है। पूरी दुनिया में शायद फ्रांस से ही ऐसे सबसे अधिक लोग आईएसआईएस जैसे मोर्चों पर गए हैं, और इसकी वजह फ्रांस में अधिक मुस्लिमों का होना भी है, और वहां पर आधुनिक लोकतांत्रिक जीवनशैली के साथ मुस्लिमों का चले आ रहा सांस्कृतिक टकराव भी है। भारत में कांगे्रस के नेता मणिशंकर अय्यर ने अपने एक बयान में इस बारे में कहा भी है कि फ्रांस में बुर्कों पर लगाई गई रोक की वजह से भी वहां एक मुस्लिम प्रतिक्रिया हो रही है। 
लेकिन यह आज लिखने का मुद्दा नहीं है। दरअसल जिस महिला का जिक्र ऊपर के पैरा में किया है उसकी दो तस्वीरें अभी विदेशी मीडिया में आई है। एक में वह महज नाम के लिए डोरी जैसी एक बिकिनी पहने हुए अपने पुरूष साथी से लिपटी हुई है, और दूसरी तस्वीर में वह उसी आदमी के साथ बुर्के में दिख रही है, सिर्फ आंखें दिखती हैं, और हाथ में निशाना लगाते हुए एक पिस्तौल है। ऐसी बहुत सी लड़कियां या महिलाएं योरप के विकसित और आधुनिक देशों से निकलकर इस्लामी जेहाद के मोर्चो पर जा रही हैं और उनमें से कुछ तो इस इरादे से जा रही हैं कि वे जिहादियों से शादी करके एक शहीद की बेवा की जिंदगी अधिक पसंद करेंगी। 
धर्म का यह असर देखने लायक है। सबसे अधिक विकसित और उदार देशों में रहने वाले लोग जब धार्मिक मान्यताओं के चलते अपनी सारी लोकतांत्रिक समझ को किनारे रखकर एक हिंसक और आतंकी जिंदगी के लिए चले जाते हैं, अनगिनत लोगों को मारते हुए उनको हिचक नहीं होती, तो धर्म की किताबों में दर्ज नसीहतें रखी रह जाती हैं, और वे लोगों को हिंसा से नहीं रोक पातीं। और यह बात सिर्फ इस्लाम के साथ नहीं है, यह बात हिंदुओं के बीच भी देखने में आ रही है, सिखों के बीच भी इतिहास में दर्ज है, और कुछ सदी पहले का भारत का इतिहास देखें तो उसमें भी हिंदुओं के नाम अनगिनत हत्याएं दर्ज हैं। आज खबरों को देखकर कुछ लोग यह गिनती जरूर कर सकते हैं कि किस धर्म के लोग आतंक और हिंसा में सबसे अधिक शामिल निकल रहे हैं, लेकिन भारत में पहले हिंदुओं की हिंसा का भी लंबा इतिहास दर्ज है। कई सदी पहले से भारत में हिंदू धर्म के अलग-अलग सम्प्रदायों की अपनी-अपनी हथियारबंद फौज होने और उनकी हिंसा सदियों के इतिहास में दर्ज है। एक वक्त ऐसा भी था जब हिंदुओं ने बौद्धों की बड़े पैमाने पर हत्या की थी, और वे देश भर में जगह-जगह छुपकर रहने पर मजबूर भी हुए थे। 
एक किताब के अनुसार- पुष्यमित्र शुंग सम्राट प्राचीन वैदिक धर्म के अनुयायी थे। उनके समय में बौद्ध और जैन धर्मों का ह्रास होकर वैदिक धर्म का पुनरुत्थान प्रारम्भ हुआ। दिव्यावदान (बौद्ध कथाओं का ग्रंथ)में पुष्यमित्र शुंग को मौर्य वंश का अन्तिम शासक बतलाया गया है।  जिसके अनुसार पुष्यमित्र बौद्धों से द्वेष करता था, और उसने बहुत-से स्तूपों का ध्वंस करवाया था, और बहुत-से बौद्ध-श्रमणों की हत्या करायी थी। दिव्यावदान ने तो यहाँ तक लिखा है, कि साकल (सियालकोट) में जाकर उसने घोषणा की थी, कि कोई किसी श्रमण का सिर लाकर देगा, तो उसे मैं सौ दीनार पारितोषिक दूँगा। सम्भव है, बौद्ध ग्रंथ के इस कथन में अत्युक्ति हो, पर इसमें सन्देह नहीं कि पुष्यमित्र के समय में यज्ञप्रधान वैदिक धर्म का पुनरुत्थान शुरू हो गया था। उस द्वारा किए गए अश्वमेध यज्ञ ही इसके प्रमाण हैं।
इसलिए आज एक तरफ तो इस्लाम के नाम पर दुनिया भर में हिंसक आतंक जारी है, दूसरी तरफ भारत में हिंदुओं के भीतर भी एक धार्मिक उकसावे की कोशिश चल रही है, जो कि देश और दुनिया की आज की जरूरत के मुताबिक पूरी तरह से गैरजरूरी और नाजयाज है। जीवन में धर्म की जितनी जगह और जितनी अहमियत होनी चाहिए, उससे परे ले जाकर उसे सबसे ऊपर स्थापित करने, दूसरों के हक के ऊपर ले जाने, देश के कानून और लोकतंत्र के ऊपर ले जाने का काम आज किया जा रहा है।
हम पेरिस से लेकर भारत तक के संदर्भ में एक बड़ी सरल बात करना चाहते हैं कि धर्म का मिजाज न्याय और लोकतंत्र के मिजाज से बिल्कुल अलग है। और जब आस्था की बात आती है तो लोग अपनी आस्था को सबसे ऊपर मानने लगते हैं। आज दुनिया के जिन देशों में इस्लामी आतंकियों ने देश और जिंदगी को कब्जे में कर लिया है, कुछ बरस पहले तो वहां पर भी धार्मिक उन्माद अपने शुरूआती दिनों में था, और अभी पांच बरस पहले तक किसने सोचा था कि सीरिया या इराक में मजहबी जिहादियों का राज हो जाएगा? किसने सोचा था कि योरप जैसे इलाके से आधुनिक लोग निकलकर ऐसे धर्मयुद्ध में हिस्सा लेने चले जाएंगे? और फिर एक आधुनिक और उदारवादी जीवनशैली को छोड़कर अगर एक कट्टर, दकियानूसी, औरत से भेदभाव करने वाली, चारों तरफ लहू बहाने वाली, आतंकी-संस्कृति में जाने में भी अगर लोगों को कुछ गलत नहीं लग रहा है, और कैमरों के सामने लोगों के सिर काटना सही लग रहा है, तो धर्म का ऐसा असर अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।
कहने के लिए तो एक आम बात सभी धर्मों के बारे में अक्सर कह दी जाती है कि सभी धर्म शांति सिखाते हैं। लेकिन जब जमीन पर हम हकीकत देखते हैं तो यह दिख जाता है कि जिन्हें वह शांति सिखाते हैं वे किस तरह चुप्पी मारकर घर में शांत बैठने वाले बन जाते हैं। और जिनको धर्म शांति नहीं सिखा पाते, और जो धर्म का नाम लेकर चारों तरफ लहू फैलाते हैं, थोक में सौ-डेढ़ सौ मासूम बच्चों को एक साथ मार डालते हैं, धर्म और ईश्वर उनका बाल भी बांका नहीं कर सकते। ऐसे माहौल में धर्म के बारे में अच्छी बातें सिखाने और अमन-मोहब्बत सिखाने की कल्पना, कल्पना ही है। धर्म का असर बहुत खूनी हो रहा है।
इसलिए जिन देशों में आज यह उन्माद छोटा खतरा लग रहा है, या खतरा ही नहीं लग रहा है, वहां भी यह कल के दिन अधिक बड़ा और बेकाबू खतरा हो सकता है। इसलिए लोगों को अपने मन और अपने घर के भीतर की निजी आस्था से परे धर्म की सार्वजनिक और सामाजिक भूमिका के बारे में सोचना चाहिए, और दुनिया की जिंदगी में धर्म के महत्व के अनुपात को भी दुबारा आंकना चाहिए।

हमको मालूम है आंकड़ों की हकीकत लेकिन...

12 जनवरी 2015
संपादकीय
देश भर में किस प्रदेश में कितने शौचालय बने हैं, इसके आंकड़े केंद्र सरकार से जारी हुए हैं। इसमें पता लगता है कि कौन सा राज्य सबसे आगे है, और कौन सा पीछे है। लेकिन सरकारी आंकड़े अपने-आपमें कब तक झांसा देने वाले होते हैं, जब तक तर्क के साथ उनका विश्लेषण न किया जाए। अब दस करोड़ आबादी वाले राज्य में जितने शौचालय बने हैं उनकी तुलना अगर दो करोड़ आबादी वाले राज्य से होगी तो यह लगेगा कि छोटा राज्य एकदम पिछड़ा हुआ है। सरकार के आंकड़े तो नासमझ होते हैं, लेकिन उनके आधार पर खबरें बनाने वाले बड़े-बड़े अखबार भी उसी दर्जे की नासमझी जाहिर करते हैं। लेकिन यह बात सिर्फ सरकार के साथ नहीं है, यह बात आंकड़ों से खेलने वाले हर किसी के साथ है जो कि अंकों को अंतिम सत्य मान लेते हैं। 
अभी पिछले कुछ महीनों में दो-चार विमान दुर्घटनाएं हुईं तो लोगों ने यह मान लिया कि यह पूरा बरस बुरी हवाई दुर्घटनाओं का रहा। बहुतों को लगा कि हवाईयात्रा सुरक्षित नहीं रह गई है और बड़ी संख्या में लोग मर रहे हैं। लेकिन दुर्घटनाओं में मौतों के आंकड़े अगर इन आंकड़ों के बिना देखें जाएं कि पिछले बरसों में हवाई मुसाफिर कितने बढ़े हैं, और हवाई सफर कितना बढ़ा है, और उस अनुपात में ही अगर मौतों के आंकड़ों को परखा जाए, तो ही सही तस्वीर सामने आएगी। 
जिंदगी में हर आम इंसान के पास न तो इतना वक्त होता कि वे आंकड़ों का विश्लेषण कर सकें, और न ही हर किसी की इतनी समझ होती। ऐसे में सरकार या सरकार से परे के जो लोग किसी तरह के तथ्य और विश्लेषण सामने रखते हैं, उनको सामाजिक हकीकत बताने के लिए, अर्थव्यवस्था और आबादी के आंकड़े बताने के लिए कुछ मेहनत करनी चाहिए। अब छत्तीसगढ़ के बस्तर को ही लें, तो वहां पर एनएमडीसी की लोहा खदानों से हर बरस होने वाली दसियों हजार करोड़ की कमाई के चलते खदान वाले जिले में हर व्यक्ति की औसत आय को पूरे छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक गिन लिया गया था। अब अगर सिर्फ उसी आधार पर सरकार वहां के लोगों को अधिक मदद का हकदार नहीं मानती, तो फिर उनके साथ बेइंसाफी होती। इसी तरह छत्तीसगढ़ का ही एक दूसरा मामला है किसानों की आत्महत्या का। अभी दो बरस पहले तक इस राज्य में हर बरस सैकड़ों किसानों की आत्महत्या दर्ज होती थी। राज्य सरकार का तर्क यह था कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के चार्ट में किसी भी आत्महत्या करने वाले का पेशा किसान डालने पर उसका एक विश्लेषण किसान की आत्महत्या गिन लिया जाता था। पिछले दो बरस में छत्तीसगढ़ में एक भी किसान की आत्महत्या दर्ज नहीं हुई है। लेकिन किसानी की तस्वीर न तो पहले उतनी भयानक थी, और न ही एकदम से अब इतनी शानदार हो गई है। राज्य के अफसरों ने आत्महत्या के आंकड़े दर्ज करते समय किसान लिखना बंद कर दिया, और अब देश में जो लोग विश्लेषण करते हैं, उनको छत्तीसगढ़ में ऐसा कोई मामला मिलता ही नहीं। पहले जब ऐसी सैकड़ों आत्महत्याएं दर्ज होती थीं, तब भी किसानी-आत्महत्या के वैसे मामले होते नहीं थे। और आज भी असल तस्वीर ऐसी नहीं है कि एक भी किसानी-आत्महत्या न होती हो। 
इसलिए हमारा यह मानना है कि आंकड़ों के आधार पर निष्कर्ष निकालने के लिए सिर्फ कैलकुलेटर काफी नहीं होता, एक सामान्य समझ-बूझ और तर्कों का इस्तेमाल भी करना चाहिए, और अगल-बगल की तस्वीर के साथ जोड़कर ही किसी छोटी तस्वीर को देखना चाहिए।

कोई समाज बच्चों के साथ बलात्कार करके भविष्य नहीं बना सकता...

संपादकीय
11 जनवरी 2015
नाइजीरिया में इस्लामी आतंकियों ने दस बरस की एक बच्ची के बदन पर बम बांधकर उसे आत्मघाती मानव बम बना दिया, और उसका विस्फोट करके डेढ़ दर्जन लोगों की और मौत करवा दी। पिछले कुछ दिनों में इस किस्म के कुछ और मामले भी सामने आए हैं, और ऐसी एक बच्ची ने सुरक्षा दस्तों के पास पहुंचकर अपनी जान बचाई, और आतंकियों की साजिश और तकनीक बतलाई। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के बस्तर जैसे इलाके में नक्सली लगातार बच्चों का इस्तेमाल कर रहे हैं, और कुछ बरस पहले के एक बहुत बड़े हमले के बाद जब दर्जनों सुरक्षा कर्मचारी मारे गए थे, तो उनके हथियार बीनने के लिए उन्होंने बच्चों का इस्तेमाल किया था, और उसका वीडियो भी बनाया था जो बाद में सामने आया। नक्सलियों के बारे में यह भी खबर लगती है कि वे सुरक्षा दस्तों का मुकाबला करने के लिए गांव के औरत-बच्चों को ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं, और उनको सामने रखकर पुलिस से मुकाबला करते हैं। सीरिया और इराक जैसे कई देशों से ऐसी भयानक तस्वीरें आती हैं जिनमें छोटे-छोटे बच्चे बहुत बड़े-बड़े हथियार लिए हुए आतंकी या बागी मोर्चों पर लड़ाई लड़ रहे हैं। जो अमरीका मानवाधिकार और बच्चों के हक को लेकर दुनिया में मुखिया बना रहता है, उसी अमरीका की एक सबसे बड़ी समाचार एजेंसी ने ऐसे एक मोर्चे से एक किशोर फोटोग्राफर को भुगतान करके उससे फोटोग्राफी करवाई थी, और हथियारबंद लड़ाई की वैसी फोटोग्राफी में ही वह लड़का मारा भी गया। 
अब हम भारत जैसी जगह पर एक दूसरा मोर्चा देखें तो छत्तीसगढ़ के आदिवासी बस्तर के स्कूली बच्चियों के आश्रम में उनके साथ बलात्कार के दर्जनों मामले सामने आए हैं, कुछ आश्रम-कर्मचारी गिरफ्तार हुए हैं, बस्तर के बाहर भी ऐसे मामले हुए हैं, और गिरफ्तारी के बाद भी जगह-जगह ऐसे मामले सामने आ रहे हैं। मतलब यह कि सरकार का काबू अपने ही संगठित संस्थानों पर नहीं रह गया है, वहां कोई निगरानी नहीं है, और वहां पर शिकायतें बड़ी मुश्किल से दर्ज की जा रही हैं। और यह जाहिर है कि ऐसी हर शिकायत के मुकाबले दर्जनों शिकायतें दबा दी जाती होंगी। इसके अलावा हम दूर बेंगलुरू को देखें, तो देश के इस सबसे विकसित महानगरों में से एक, कर्नाटक की यह राजधानी ऐसी है जहां शहर के बीच के स्कूलों में हर कुछ हफ्तों में स्कूल शिक्षक या कर्मचारी बच्चों से बलात्कार के मामलों में पकड़ा रहे हैं, और बच्चों के मां-बाप स्कूलों में प्रदर्शन कर रहे हैं, स्कूलों में तोडफ़ोड़ कर रहे हैं। एक दूसरा मुद्दा है पूरे देश से बच्चों की तस्करी का। महानगरों में बंधुआ मजदूरी के लिए कई प्रदेशों से बच्चों को दलाल ले जाते हैं, और फिर इनमें से ही अनगिनत बच्चे देह के धंधे में उतार दिए जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे गायब बच्चों पर जवाब मांगने के लिए हर प्रदेश के मुख्य सचिव और पुलिस प्रमुख को निजी रूप से जिम्मेदार माना है, और इसके बाद छत्तीसगढ़ सहित कई प्रदेशों में ऐसे बच्चों की बरामदगी हो रही है। 
ऐसे और भी कई किस्म के मामले हैं, लेकिन हम जिस मुद्दे पर आज यहां बात करना चाहते हैं, वह है कि हम देश में या दुनिया में किस तरह की अगली पीढ़ी तैयार कर रहे हैं? एक तरफ तो संपन्न और विकसित देशों में बच्चों के मनोवैज्ञानिक और मनोविश्लेषक सबसे अधिक व्यस्त और सबसे अधिक कमाऊ माने जाते हैं, क्योंकि वहां बच्चों के मन की छोटी-छोटी उलझनों को सुलझाने के लिए सरकार और समाज बहुत ही चौकन्ना रहते हैं। दूसरी तरफ अफ्रीका के देशों से लेकर खाड़ी के देशों तक, और पाकिस्तान से लेकर भारत तक, बच्चों से बलात्कार, बच्चों से देह का धंधा, बच्चों से बंधुआ मजदूरी का कोई अंत ही नहीं है। यह समझने के लिए मनोविज्ञान में पीएचडी की जरूरत नहीं है कि बचपन से जो बच्चे ऐसे जख्मी होकर बड़े होते हैं, उनकी दिमागी सेहत का हाल बाकी समाज के लिए कितना नकारात्मक, हिंसक, या नुकसान का हो सकता है। दुनिया के सभ्य देश अपने बच्चों को फूल और गुलदस्ते की तरह रखते हैं, लेकिन भारत सहित जिन देशों की यहां चर्चा की गई है, वहां पर सरकार और समाज इन दोनों की हिंसक-अनदेखी से पीढ़ी-दर-पीढ़ी घायल होते चल रही हैं, और इन बच्चों को ढूंढने के लिए, बचाने के लिए, देश की सबसे बड़ी अदालत को, राज्यों के सबसे बड़े दो अफसरों को कटघरे में खड़ा करना पड़ रहा है। कोई समाज अपने बच्चों के साथ बलात्कार करके भविष्य नहीं बना सकता।

स्मारकों के बजाय उत्पादक उपयोग के संस्थान बनें...

संपादकीय
10 जनवरी 2015

महाराष्ट्र भाजपा ने केन्द्र सरकार से मांग की है कि वह लंदन का बिकने जा रहा वह मकान खरीदे जहां कि डॉ. बाबा साहब आंबेडकर रहे थे। पिछले कुछ महीनों से इस मकान की तस्वीरों के साथ यह खबर आ रही है कि यह बिकने जा रहा है, और इसका बाजार भाव करीब 40 करोड़ रूपए है। 
भारत के दलितों के सबसे बड़े नेता आंबेडकर का मामला राजनीतिक रूप से नाजुक है, और इससे करोड़ों लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं। लेकिन ऐसे मामले केन्द्र और राज्य सरकारों के सामने कई बार आते हैं जिनमें जनता के पैसों से किसी एक धरोहर या विरासत को बचाने की मांग आती है, किसी सरकारी जमीन या इमारत को किसी स्मारक के लिए देने की मांग सामने आती है। और बहुत से ऐसे मौके रहते हैं जब सरकारी पैसे से किसी स्मारक को बनाया जाता है। लोगों को उत्तरप्रदेश का मामला अब तक सुप्रीम कोर्ट में चलते दिख रहा है जिसमें मायावती के मुख्यमंत्री रहते हुए सैकड़ों करोड़ की लागत से हजारों करोड़ दाम की सरकारी जमीन पर मायावती के नेता कांशीराम, आंबेडकर, खुद मायावती, और उनकी पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी की प्रतिमाएं बनाई गई थीं। उत्तरप्रदेश की राजधानी में इन प्रतिमाओं को खेत में धान की तरह रोप दिया गया था, और जनता का पैसा ऐसे राजनीतिक महिमामंडन पर खर्च करने पर सुप्रीम कोर्ट आज सुनवाई कर रहा है। दूसरी तरफ गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी ने सरदार पटेल की प्रतिमा बनाने की जो घोषणा की थी, वह शुरू तो हुई थी देश भर से हर किसान से कुछ लोहे का दान लेकर बनाने की, लेकिन अब सरकारी बजट में उसके लिए तीन हजार करोड़ रूपए रखे गए हैं। 
लोगों को यह भी याद होगा कि कुछ महीने पहले भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री अजीत सिंह अपने पिता चौधरी चरण सिंह के वक्त से अपने कब्जे में चले आ रहे एक विशाल बंगले को अपने पिता के स्मारक के लिए लेना चाहते थे, और उसके लिए उन्होंने जमीन-आसमान एक कर दिया था, और अपने प्रभाव क्षेत्र की जनता को सड़कों पर भी झोंक दिया था। ऐसी ही मांग लाल बहादुर शास्त्री के परिवार ने की थी, और कुछ और नेताओं के लिए भी ऐसे स्मारक मांगे गए थे, और शायद बाबू जगजीवन राम की याद में उनकी लोकसभा अध्यक्ष-बेटी मीरा कुमार को यूपीए सरकार ने जाते-जाते एक बंगला, स्मारक के लिए दे भी दिया था। अभी-अभी आई संजय बारू की लिखी हुई मनमोहन सिंह पर किताब में इस बात का लंबा-चौड़ा जिक्र है कि नरसिंह राव के गुजरने के बाद किस तरह सोनिया गांधी की ओर से यह कोशिश हुई कि उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में न हो, और शव को हैदराबाद ले जाया जाए। ऐसा इसलिए कि दिल्ली में ऐसा होने पर एक और समाधि स्थल बनाया जाता, और कांग्रेस के आपसी टकराव की वजह से सोनिया ऐसा नहीं चाहती थीं। लोगों को यह भी याद होगा कि संजय गांधी के किसी भी संवैधानिक पद पर न रहते हुए भी उनकी विमान-हादसे में मौत के बाद उनके लिए वैसी ही समाधि बनाई गई, जैसी कि गांधी, नेहरू की बनाई गई थी। यह सब कुछ जनता के पैसों से, और जनता की जमीन पर हुआ था, और संजय गांधी का तो देश के लिए कोई योगदान भी नहीं था। 
हम किसी भी धार्मिक व्यक्ति, राजनेता, सामाजिक नेता, या किसी और प्रमुख व्यक्ति के लिए जनता के पैसों से किसी भी तरह के स्मारक के खिलाफ हैं। जिनका विवादों से परे देश के लिए योगदान रहा, वह पूरी पीढ़ी ही अब खत्म हो चुकी है। अब किसी के लिए भी जनता पर बोझ नहीं डालना चाहिए। ऐसा न होने पर इस गरीब देश की कुपोषण की शिकार जनता का पेट काट-काटकर स्मारक खड़े करना जारी रहेगा, जिनका कि कोई सामाजिक योगदान नहीं रहता। आंबेडकर का योगदान इस देश के लिए बहुत रहा, उनके लिए देश भर में जगह-जगह सरकारी और गैरसरकारी स्मारक बहुत से बने हुए हैं। उनके लिए लंदन में पहले तो चालीस करोड़ से एक मकान खरीदना, और फिर वहां कोई संस्था चलाने के लिए और सरकारी खर्च करना ठीक नहीं होगा। कल के दिन गांधी के रहने वाली कुछ इमारतें सामने आएंगी, कहीं दक्षिण अफ्रीका का कोई आश्रम सामने आ जाएगा, कहीं कोई सरदार पटेल की प्रतिमा से दोगुना ऊंची प्रतिमा किसी और नेता की बनाने की बात करने लगेगा, और यह सिलसिला देखादेखी में और बढ़ते चले जाएगा। इसलिए जनता के पैसों पर स्मारक बनाना एक खतरनाक शुरूआत होती है, जो कि बढ़ते ही चलती है। किसी के नाम पर कुछ बनाना भी हो, तो ऐसे अस्पताल, ऐसे स्कूल-कॉलेज, बाग-बगीचे, बनाने चाहिए, जहां पर उनके नाम का सम्मान तो हो, लेकिन सरकारी लागत का उत्पादक उपयोग भी हो।

लाल फीता लाल कालीन में कहां पर बदला है?

9 जनवरी 2015
संपादकीय
प्रवासी भारतीयों के सम्मेलन में कल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि एक समय हिंदुस्तानी संभावनाओं को तलाशने के लिए दूसरे देशों में जाते थे, अब संभावनाएं भारत में ही मौजूद हैं, और लोगों को अब भारत आकर यहां काम करना चाहिए। उन्होंने पासपोर्ट और वीजा जैसी कुछ सहूलियतों का जिक्र किया जो कि पिछले महीने में लागू की गई हैं। वे इस तरह की बातें अमरीका और ऑस्ट्रेलिया में भी प्रवासी भारतीयों के बीच बोल चुके हैं, लेकिन भारत में बसे हुए लोग यह जानते हैं कि हकीकत इससे काफी अलग है। भारत में काम करने की ऐसी संभावनाएं रहें, जिनकी वजह से भारत के लोग दूसरे देशों में जाकर काम करने के बजाय यहां काम करना पसंद करें, या बाहर से भारत लौटकर यहां काम आगे बढ़ाएं, ये बातें मोदी की भावनाएं तो हो सकती हैं, लेकिन देश में आज के हालात इस तरह के हैं नहीं।
भाषणों और घोषणापत्रों से परे, भारत के सरकारी दफ्तरों में कामकाज का ढर्रा, यहां पर सरकार के भीतर कदम-कदम पर भयंकर भ्रष्टाचार, यहां अदालतों की धीमी रफ्तार, और सड़कों जैसी सार्वजनिक जगहों पर सत्ता पर काबिज लोगों का सामंती कब्जा, देखने लायक है। आज दूसरे देशों में जो लोग काम कर चुके हैं, वे यह देखकर हक्का-बक्का रह जाते हैं कि भारत में नेता और अफसर, जज और संवैधानिक कुर्सियों पर बैठे हुए तथाकथित-स्वघोषित वीवीआईपी लोग किस तरह आम जनता की जिंदगी को कुचलते हुए अपनी हर राह को राजपथ बनाने पर उतारू रहते हैं। दुनिया के किसी भी सभ्य देश में ऐसा नहीं होता।
दूसरी तरफ देश से लेकर छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश तक यह चर्चा ही चर्चा चल रही है कि गैरजरूरी कानूनों और नियमों को बदला जाए। यह देश आजाद हुए पौन सदी होने को है, और छत्तीसगढ़ को राज्य बने पन्द्रह बरस हो जाएंगे। ऐसे में सरकारों को अब तक किसने रोका था कि वे गैरजरूरी और मुर्दा कानूनों को अंग्रेजों की विरासत के टोकरे की तरह ढोना बंद करें, और इन्हें खत्म करें। लेकिन कई तरह के आयोग और कई तरह की कमेटियां देश-प्रदेश में बनती रहती हैं, बनते आई हैं, लेकिन उनकी सिफारिशों के बाद भी सरकारी कामकाज आसान करने की कोशिश नहीं हुई। दरअसल सरकारी जटिलताएं जितनी अधिक रहती हैं, उतनी ही गुंजाइश रिश्वत की रहती है। 
कहने को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यह नारा अब जरूर लगा रहे हैं कि उन्होंने हिंदुस्तानी अफसरशाही की कुख्यात लालफीताशाही के लाल फीते से लाल कालीन बुन दिया है जो कि कारोबारियों के स्वागत के लिए बिछा है। लेकिन सरकारी कामकाज से जिनका वास्ता पड़ता है, वे जानते हैं कि पटवारी से लेकर ऊपर तक कदम-कदम पर अडंगा ही अडंगा देखते हैं। छत्तीसगढ़ में पिछले बरसों में जमीनों के मामले में तहसीलदार के स्तर पर इस तरह के नए-नए नियम जोड़े गए हैं जिनका मकसद सिवाय वसूली-उगाही के और कुछ नहीं हो सकता। एक तरफ तो सरकार गैरजरूरी नियम-कानून खत्म करने की बात करती है, दूसरी तरफ उसके कामकाज में लोगों के लिए ऐसे रोड़े बिछाना बढ़ाया जा रहा है कि आम जनता की जिंदगी इतनी मुश्किल हो जाए कि वह हजारों-लाखों की रिश्वत देने पर मजबूर हो। 
हो सकता है कि प्रधानमंत्री के स्तर पर केंद्र सरकार और उनके कहे हुए राज्य सरकारें बड़े-बड़े लोगों के लिए कानूनों को लचीला बना दें, जैसा कि अभी जमीन अधिग्रहण कानून के मामले में किया गया है, लेकिन आम जनता की जिंदगी को नर्क बना देने वाला सरकारी इंतजाम देश की निन्यानवे फीसदी जनता के लिए बदलते नहीं दिख रहा है।

फ्रांस के हमले को देखकर भारत को सबक लेना चाहिए

8 जनवरी 2015
संपादकीय
फ्रांस की एक व्यंग्य पत्रिका शर्ली एब्डो पर कल इस्लामी आतंकियों ने हमला किया और दर्जन भर लोगों को मार डाला। इसमें पत्रिका के संपादक सहित फ्रांस के चार सबसे बड़े कार्टूनिस्ट भी थे जो कि फ्रेंच समाज को रोजाना झकझोरने का काम करते थे। यह पत्रिका अपने बुलंद हौसले के लिए जानी जाती थी, और धार्मिक पाखंड और कट्टरता जैसे कई मुद्दों के खिलाफ यह लगातार लिखती थी और कार्टून छापती थी। दो-तीन बरस पहले भी पैगम्बर मोहम्मद के कुछ कार्टून छापने के बाद इस पत्रिका पर पेट्रोल बम से हमला किया गया था, और इस पर मजहबी आतंक का खतरा माना जाता था। ऐसे में जब इसकी एक बैठक में ये तमाम कार्टूनिस्ट एक साथ इक_ा थे, तब एक फौजी तैयारी के साथ ठीक उसी बैठक पर हमला किया गया, और यह नारा भी लगाया गया कि इसके कार्टून ने आईएसआईएस के आतंकी मुखिया की बेइज्जती की थी, और उसका बदला लिया जा रहा है। एक हमलावर पकड़ा गया है और दो की शिनाख्त के बाद उनकी तलाश चल रही है। इसके पीछे किसी शक से परे सीधे-सीधे इस्लामी आतंकियों का हाथ है, और यह आतंकियों के कब्जे के देशों से परे का अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अपने किस्म का सबसे बड़ा हमला है। 
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर हमने कई बार यहां लिखा है। दुनिया के अलग-अलग देशों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैमाने अलग-अलग हैं। उन देशों की स्थितियां अलग हैं, वहां की संस्कृति अलग है, और वहां लोकतंत्र की परिपक्वता, कानून के राज का असर भी अलग-अलग हैं। अमरीका में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कुछ अलग किस्म की है, वहां पहले से मुनादी करके एक ईसाई चर्च का पादरी कुरान के पन्ने भी जला सकता है। भारत इन मामलों में एक मिले-जुले दर्जे का देश है, यहां पर कई मामलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, और कई मामलों में लोगों का बर्दाश्त बिल्कुल भी नहीं है, और अपने आपको घायल बताकर कुछ लोग, कुछ तबके, कुछ धर्म और कुछ जातियां दूसरों पर हमला करने को भारतीय कानून के तहत उनको दिया गया हक मानती हैं। भारत में धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाना एक ऐसा लचर कानून है जिसके तहत कोई भी रिपोर्ट लिखा सकते हैं, और एक थानेदार उस पर गिरफ्तारी कर सकता है। ऐसा जगह-जगह होता भी है। फिर कई मौकों पर राजनीतिक दल अतिसक्रिय होकर कुछ मुद्दों को उठाते हैं, और आग लगाना शुरू कर देते हैं। 
कल भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फ्रांस में हुए इस हमले पर अफसोस जाहिर किया है, लेकिन उन्हीं की पार्टी के लोग, उन्हीं के गठबंधन के लोग, उन्हीं के सहयोगी संगठन लगातार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले करते आए हैं। जिस देश में देवी-देवताओं की नग्न प्रतिमाओं का हजारों बरस का इतिहास रहा है, वहां पर ऐसी पेंटिंग बनाने पर मकबूल फिदा हुसैन को देश ही छोड़कर जाना पड़ा था, और फिर उन्होंने परदेस में ही आखिरी सांसें लीं। लोगों को अच्छे से याद होगा कि किस तरह पुणे के भंडारकर शोध संस्थान पर कई बरस पहले हिन्दू संगठनों ने बुरा हमला किया था, क्योंकि इस इंस्टीट्यूट में एक अमरीकी लेखक को शोध कार्य में मदद की थी, और उस लेखक की एक किताब में शिवाजी के बारे में लिखी गई बातों पर इन संगठनों को आपत्ति थी। इन्होंने वहां घुसकर सारे प्राचीन रिकॉर्ड, पांडुलिपियां, तस्वीरें, और प्राचीन वस्तुएं नष्ट कर दी थीं, और वहां भारी तबाही की थी। अभी ताजा बात अगर देखें, तो दीनानाथ बत्रा नाम के एक हिन्दूवादी शिक्षा शास्त्री ने एक अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन संस्थान को कानूनी कार्रवाई की धमकी देकर, उस पर दबाव डालकर हिन्दू धर्म पर लिखी गई एक किताब को बाजार से वापिस बुलाने पर मजबूर किया, और उसे खत्म करवा दिया। 
दूसरी तरफ हिन्दूवादियों से परे बंगाल में ममता बैनर्जी जैसे लोग हैं जो कि कार्टून बनाने वाले लोगों को जेल में डालते हैं। दो बरस पहले असीम त्रिवेदी नाम के एक कार्टूनिस्ट को एक कार्टून पर राजद्रोह के आरोप में मुम्बई में कांग्रेस की राज्य सरकार ने गिरफ्तार किया था, जिस पर बहुत से लोगों ने विरोध किया था और अदालत तक ने इसका नोटिस लिया था। अब लगे हाथों यहां पर बंगाल की वामपंथी सरकारों का भी जिक्र कर लेना ठीक होगा जिन्होंने राज्य में तस्लीमा नसरीन की किताबों पर प्रतिबंध लगाकर रखा, और तस्लीमा को वहां घुसने भी नहीं दिया। अब ममता बैनर्जी के राज में भी तस्लीमा पर यह रोक जारी है। सलमान रूश्दी की किताब पर भारत में उस समय रोक लगा दी गई थी, जब दुनिया के किसी इस्लामी या मुस्लिम देश में भी उस पर रोक नहीं लगी थी। 
आज अगर भारत के प्रधानमंत्री फ्रांस में इस हमले का विरोध करते हैं, लेकिन पिछले दस-बीस बरस में भारत के भीतर साम्प्रदायिक ताकतों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जितने हमले किए थे, उनमें से किसी पर भी वे कुछ नहीं कहते, तो यह अपने आपमें एक सैद्धांतिक विरोधाभास है, और इसका खुलासा होना चाहिए। भारत में छोटी-छोटी जगहों पर जिस तरह से साम्प्रदायिकता बढ़ाई जा रही है, उससे यह देश भी एक हिंसा की तरफ बढ़ रहा है, और हिंसा की प्रतिक्रिया में और हिंसा पैदा होना तय रहता है, इसलिए भारत को आज फ्रांस को देखकर सबक  लेना चाहिए, और किसी भी धर्म की साम्प्रदायिकता, कट्टरता को बढऩे से कड़ाई से रोकना चाहिए। हम भारत में आज फ्रांस या योरप की तरह की, या अमरीका की तरह की अभिव्यक्ति की आजादी की संभावना नहीं देखते, और न ही उस दर्जे की आजादी की आज वकालत करते, लेकिन भारत में जिस रफ्तार से साजिश के तहत बर्दाश्त को खत्म किया जा रहा है, उससे हम अभिव्यक्ति की एक अधिक आजादी की तरफ नहीं बढ़ रहे, एक अधिक हिंसा की तरफ बढ़ रहे हैं। इस देश को इस नौबत से बचना चाहिए, वरना हम आज आईएसआईएस की हिंसा का हाल देख ही रहे हैं, भारत में तो एक से अधिक धर्म हिंसा की ऐसी ऊंचाई तक पहुंच सकते हैं।