कोई समाज बच्चों के साथ बलात्कार करके भविष्य नहीं बना सकता...

संपादकीय
11 जनवरी 2015
नाइजीरिया में इस्लामी आतंकियों ने दस बरस की एक बच्ची के बदन पर बम बांधकर उसे आत्मघाती मानव बम बना दिया, और उसका विस्फोट करके डेढ़ दर्जन लोगों की और मौत करवा दी। पिछले कुछ दिनों में इस किस्म के कुछ और मामले भी सामने आए हैं, और ऐसी एक बच्ची ने सुरक्षा दस्तों के पास पहुंचकर अपनी जान बचाई, और आतंकियों की साजिश और तकनीक बतलाई। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के बस्तर जैसे इलाके में नक्सली लगातार बच्चों का इस्तेमाल कर रहे हैं, और कुछ बरस पहले के एक बहुत बड़े हमले के बाद जब दर्जनों सुरक्षा कर्मचारी मारे गए थे, तो उनके हथियार बीनने के लिए उन्होंने बच्चों का इस्तेमाल किया था, और उसका वीडियो भी बनाया था जो बाद में सामने आया। नक्सलियों के बारे में यह भी खबर लगती है कि वे सुरक्षा दस्तों का मुकाबला करने के लिए गांव के औरत-बच्चों को ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं, और उनको सामने रखकर पुलिस से मुकाबला करते हैं। सीरिया और इराक जैसे कई देशों से ऐसी भयानक तस्वीरें आती हैं जिनमें छोटे-छोटे बच्चे बहुत बड़े-बड़े हथियार लिए हुए आतंकी या बागी मोर्चों पर लड़ाई लड़ रहे हैं। जो अमरीका मानवाधिकार और बच्चों के हक को लेकर दुनिया में मुखिया बना रहता है, उसी अमरीका की एक सबसे बड़ी समाचार एजेंसी ने ऐसे एक मोर्चे से एक किशोर फोटोग्राफर को भुगतान करके उससे फोटोग्राफी करवाई थी, और हथियारबंद लड़ाई की वैसी फोटोग्राफी में ही वह लड़का मारा भी गया। 
अब हम भारत जैसी जगह पर एक दूसरा मोर्चा देखें तो छत्तीसगढ़ के आदिवासी बस्तर के स्कूली बच्चियों के आश्रम में उनके साथ बलात्कार के दर्जनों मामले सामने आए हैं, कुछ आश्रम-कर्मचारी गिरफ्तार हुए हैं, बस्तर के बाहर भी ऐसे मामले हुए हैं, और गिरफ्तारी के बाद भी जगह-जगह ऐसे मामले सामने आ रहे हैं। मतलब यह कि सरकार का काबू अपने ही संगठित संस्थानों पर नहीं रह गया है, वहां कोई निगरानी नहीं है, और वहां पर शिकायतें बड़ी मुश्किल से दर्ज की जा रही हैं। और यह जाहिर है कि ऐसी हर शिकायत के मुकाबले दर्जनों शिकायतें दबा दी जाती होंगी। इसके अलावा हम दूर बेंगलुरू को देखें, तो देश के इस सबसे विकसित महानगरों में से एक, कर्नाटक की यह राजधानी ऐसी है जहां शहर के बीच के स्कूलों में हर कुछ हफ्तों में स्कूल शिक्षक या कर्मचारी बच्चों से बलात्कार के मामलों में पकड़ा रहे हैं, और बच्चों के मां-बाप स्कूलों में प्रदर्शन कर रहे हैं, स्कूलों में तोडफ़ोड़ कर रहे हैं। एक दूसरा मुद्दा है पूरे देश से बच्चों की तस्करी का। महानगरों में बंधुआ मजदूरी के लिए कई प्रदेशों से बच्चों को दलाल ले जाते हैं, और फिर इनमें से ही अनगिनत बच्चे देह के धंधे में उतार दिए जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे गायब बच्चों पर जवाब मांगने के लिए हर प्रदेश के मुख्य सचिव और पुलिस प्रमुख को निजी रूप से जिम्मेदार माना है, और इसके बाद छत्तीसगढ़ सहित कई प्रदेशों में ऐसे बच्चों की बरामदगी हो रही है। 
ऐसे और भी कई किस्म के मामले हैं, लेकिन हम जिस मुद्दे पर आज यहां बात करना चाहते हैं, वह है कि हम देश में या दुनिया में किस तरह की अगली पीढ़ी तैयार कर रहे हैं? एक तरफ तो संपन्न और विकसित देशों में बच्चों के मनोवैज्ञानिक और मनोविश्लेषक सबसे अधिक व्यस्त और सबसे अधिक कमाऊ माने जाते हैं, क्योंकि वहां बच्चों के मन की छोटी-छोटी उलझनों को सुलझाने के लिए सरकार और समाज बहुत ही चौकन्ना रहते हैं। दूसरी तरफ अफ्रीका के देशों से लेकर खाड़ी के देशों तक, और पाकिस्तान से लेकर भारत तक, बच्चों से बलात्कार, बच्चों से देह का धंधा, बच्चों से बंधुआ मजदूरी का कोई अंत ही नहीं है। यह समझने के लिए मनोविज्ञान में पीएचडी की जरूरत नहीं है कि बचपन से जो बच्चे ऐसे जख्मी होकर बड़े होते हैं, उनकी दिमागी सेहत का हाल बाकी समाज के लिए कितना नकारात्मक, हिंसक, या नुकसान का हो सकता है। दुनिया के सभ्य देश अपने बच्चों को फूल और गुलदस्ते की तरह रखते हैं, लेकिन भारत सहित जिन देशों की यहां चर्चा की गई है, वहां पर सरकार और समाज इन दोनों की हिंसक-अनदेखी से पीढ़ी-दर-पीढ़ी घायल होते चल रही हैं, और इन बच्चों को ढूंढने के लिए, बचाने के लिए, देश की सबसे बड़ी अदालत को, राज्यों के सबसे बड़े दो अफसरों को कटघरे में खड़ा करना पड़ रहा है। कोई समाज अपने बच्चों के साथ बलात्कार करके भविष्य नहीं बना सकता।

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