स्मारकों के बजाय उत्पादक उपयोग के संस्थान बनें...

संपादकीय
10 जनवरी 2015

महाराष्ट्र भाजपा ने केन्द्र सरकार से मांग की है कि वह लंदन का बिकने जा रहा वह मकान खरीदे जहां कि डॉ. बाबा साहब आंबेडकर रहे थे। पिछले कुछ महीनों से इस मकान की तस्वीरों के साथ यह खबर आ रही है कि यह बिकने जा रहा है, और इसका बाजार भाव करीब 40 करोड़ रूपए है। 
भारत के दलितों के सबसे बड़े नेता आंबेडकर का मामला राजनीतिक रूप से नाजुक है, और इससे करोड़ों लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं। लेकिन ऐसे मामले केन्द्र और राज्य सरकारों के सामने कई बार आते हैं जिनमें जनता के पैसों से किसी एक धरोहर या विरासत को बचाने की मांग आती है, किसी सरकारी जमीन या इमारत को किसी स्मारक के लिए देने की मांग सामने आती है। और बहुत से ऐसे मौके रहते हैं जब सरकारी पैसे से किसी स्मारक को बनाया जाता है। लोगों को उत्तरप्रदेश का मामला अब तक सुप्रीम कोर्ट में चलते दिख रहा है जिसमें मायावती के मुख्यमंत्री रहते हुए सैकड़ों करोड़ की लागत से हजारों करोड़ दाम की सरकारी जमीन पर मायावती के नेता कांशीराम, आंबेडकर, खुद मायावती, और उनकी पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी की प्रतिमाएं बनाई गई थीं। उत्तरप्रदेश की राजधानी में इन प्रतिमाओं को खेत में धान की तरह रोप दिया गया था, और जनता का पैसा ऐसे राजनीतिक महिमामंडन पर खर्च करने पर सुप्रीम कोर्ट आज सुनवाई कर रहा है। दूसरी तरफ गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी ने सरदार पटेल की प्रतिमा बनाने की जो घोषणा की थी, वह शुरू तो हुई थी देश भर से हर किसान से कुछ लोहे का दान लेकर बनाने की, लेकिन अब सरकारी बजट में उसके लिए तीन हजार करोड़ रूपए रखे गए हैं। 
लोगों को यह भी याद होगा कि कुछ महीने पहले भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री अजीत सिंह अपने पिता चौधरी चरण सिंह के वक्त से अपने कब्जे में चले आ रहे एक विशाल बंगले को अपने पिता के स्मारक के लिए लेना चाहते थे, और उसके लिए उन्होंने जमीन-आसमान एक कर दिया था, और अपने प्रभाव क्षेत्र की जनता को सड़कों पर भी झोंक दिया था। ऐसी ही मांग लाल बहादुर शास्त्री के परिवार ने की थी, और कुछ और नेताओं के लिए भी ऐसे स्मारक मांगे गए थे, और शायद बाबू जगजीवन राम की याद में उनकी लोकसभा अध्यक्ष-बेटी मीरा कुमार को यूपीए सरकार ने जाते-जाते एक बंगला, स्मारक के लिए दे भी दिया था। अभी-अभी आई संजय बारू की लिखी हुई मनमोहन सिंह पर किताब में इस बात का लंबा-चौड़ा जिक्र है कि नरसिंह राव के गुजरने के बाद किस तरह सोनिया गांधी की ओर से यह कोशिश हुई कि उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में न हो, और शव को हैदराबाद ले जाया जाए। ऐसा इसलिए कि दिल्ली में ऐसा होने पर एक और समाधि स्थल बनाया जाता, और कांग्रेस के आपसी टकराव की वजह से सोनिया ऐसा नहीं चाहती थीं। लोगों को यह भी याद होगा कि संजय गांधी के किसी भी संवैधानिक पद पर न रहते हुए भी उनकी विमान-हादसे में मौत के बाद उनके लिए वैसी ही समाधि बनाई गई, जैसी कि गांधी, नेहरू की बनाई गई थी। यह सब कुछ जनता के पैसों से, और जनता की जमीन पर हुआ था, और संजय गांधी का तो देश के लिए कोई योगदान भी नहीं था। 
हम किसी भी धार्मिक व्यक्ति, राजनेता, सामाजिक नेता, या किसी और प्रमुख व्यक्ति के लिए जनता के पैसों से किसी भी तरह के स्मारक के खिलाफ हैं। जिनका विवादों से परे देश के लिए योगदान रहा, वह पूरी पीढ़ी ही अब खत्म हो चुकी है। अब किसी के लिए भी जनता पर बोझ नहीं डालना चाहिए। ऐसा न होने पर इस गरीब देश की कुपोषण की शिकार जनता का पेट काट-काटकर स्मारक खड़े करना जारी रहेगा, जिनका कि कोई सामाजिक योगदान नहीं रहता। आंबेडकर का योगदान इस देश के लिए बहुत रहा, उनके लिए देश भर में जगह-जगह सरकारी और गैरसरकारी स्मारक बहुत से बने हुए हैं। उनके लिए लंदन में पहले तो चालीस करोड़ से एक मकान खरीदना, और फिर वहां कोई संस्था चलाने के लिए और सरकारी खर्च करना ठीक नहीं होगा। कल के दिन गांधी के रहने वाली कुछ इमारतें सामने आएंगी, कहीं दक्षिण अफ्रीका का कोई आश्रम सामने आ जाएगा, कहीं कोई सरदार पटेल की प्रतिमा से दोगुना ऊंची प्रतिमा किसी और नेता की बनाने की बात करने लगेगा, और यह सिलसिला देखादेखी में और बढ़ते चले जाएगा। इसलिए जनता के पैसों पर स्मारक बनाना एक खतरनाक शुरूआत होती है, जो कि बढ़ते ही चलती है। किसी के नाम पर कुछ बनाना भी हो, तो ऐसे अस्पताल, ऐसे स्कूल-कॉलेज, बाग-बगीचे, बनाने चाहिए, जहां पर उनके नाम का सम्मान तो हो, लेकिन सरकारी लागत का उत्पादक उपयोग भी हो।

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