पड़ोस की मौतों को अनदेखा करने वालों के लिए दो बातें

संपादकीय
23 जनवरी 2015
पिछले कुछ महीनों में ताकतवर लोगों के मामलों पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कई तरह के रूख दिखाए। एक तरफ तो सहारा कम्पनी के मालिक को जमानत के लिए हजारों करोड़ की शर्त रखी, और उसका इंतजाम न होने पर महीनों से सुब्रत राय जेल में है। दूसरी तरफ एक अभूतपूर्व इंतजाम की इजाजत देते हुए भारत की सर्वोच्च अदालत ने एक किस्म से जेल में सुब्रत राय को एक दफ्तर चलाने का इंतजाम दिया ताकि वे अपनी जायदाद बेचकर जमानत की रकम जुटा सकें। दूसरी तरफ सजा के खिलाफ सलमान खान जैसे अरबपति-अभिनेता का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। और आज सुप्रीम कोर्ट सहित दिल्ली की अदालतें बंद हैं क्योंकि अमरीकी राष्ट्रपति के लिए दिल्ली शहर सुरक्षा तैयारी कर रहा है। कुछ और मामले भी बड़े लोगों के ऐसे रहे जिन पर अदालती रूख लोगों को समझ नहीं आया। महाराष्ट्र की एक छोटी अदालत ने जिस तरह पुलिस और सरकार की सिफारिश पर बार-बार संजय दत्त को जेल से घर जाने की छूट दी, वह भी आम लोगों को हक्का-बक्का करने वाली थी। 
लोकतंत्र के भीतर आम और खास का फर्क बहुत ही जाहिर रहता है। ताकतवर लोगों के लिए तरह-तरह की छूट के इंतजाम हो जाते हैं, और गरीब अपनी सजा पूरी हो जाने के बाद भी जेल से रिहा नहीं हो पाते। सड़क किनारे से गरीबों की गुमटियां हटा दी जाती हैं, और ताकतवर लोग वक्त पूरा होने के बाद भी बरसों तक सरकारी बंगलों पर काबिज रहते हैं। आम और खास के ऐसे फर्क के खिलाफ ही भारत में कई राज्यों में नक्सल हिंसा को जगह मिली, और आज छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र सरहद पर जब नक्सली अमरीकी राष्ट्रपति के भारत आगमन के खिलाफ गाडिय़ां जला रहे हैं, तो वे आर्थिक असमानता पर टिके हुए समाज की हिंसा का मुद्दा ही उठा रहे हैं, जो कि देश के भीतर भी है, और दुनिया के देशों के बीच भी है। 
ऐसे माहौल में कुछ दिनों में जब अमरीकी राष्ट्रपति भारतीय रेडियो पर बोलने वाले हैं, और भारतीय प्रधानमंत्री ने जनता से सवाल मांगे हैं कि वह ओबामा से क्या पूछना चाहती है, तो देश के लोगों को इस मौके का इस्तेमाल करके दुनिया के इस सबसे बड़े दादा से सवाल पूछने चाहिए। भारत की सरकार को अपनी आर्थिक नीतियों के चलते हुए, और फौजी जरूरतों को देखते हुए इस बात को एक बड़ी कामयाबी मान रही है कि भारतीय इतिहास में पहली बार गणतंत्र दिवस पर बराक ओबामा भारत आ रहे हैं। लेकिन जब वे भारत की जनता के पूछे गए सवालों को देखने वाले हैं, तो भारत के जागरूक लोगों को ट्विटर और दूसरे तरीके से अमरीकी राष्ट्रपति से वे तमाम सवाल करने चाहिए जो कि अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, और दूसरे देशों की कब्रों से नहीं उठ सकते। पिछले एक दशक में अमरीकी हमलों ने बिना कोई फर्क किए हुए जिस तरह से बेकसूर आम जनता को हवाई हमलों में थोक में मारा है, उन्हें लेकर दुनिया के इस सबसे ताकतवर आदमी से सवाल करने चाहिए। 
आज का वक्त ऐसा है कि लोग बिना वजह कोई सवाल भी नहीं करना चाहते। लोग कड़वी बातें कहना भी नहीं चाहते। लेकिन हमारा मानना है कि सरकारें तो हो सकता है कि अमरीकापरस्त हो जाएं, लेकिन जनता के बीच तो ऐसा तबका है ही जो कि अमरीकी हिंसा और उसके साम्राज्यवादी विस्तार के खिलाफ है। अमरीकी राष्ट्रपति के आने का विरोध करने, और मुद्दे उठाने का जिम्मा अकेले नक्सलियों पर छोड़ देने से यह भारतीय लोकतंत्र की नाकामयाबी होगी। आज भी इस देश में और इंटरनेट पर ऐसे बहुत से जनमंच खुले हुए हैं जहां पर लोग बराक ओबामा के लिए सवाल उछाल सकते हैं, उठा सकते हैं, और उन सबको अमरीकी सरकार की ताकत भी मिटा नहीं सकती। आज अगर हिन्दुस्तानी यह सोचकर अमरीकी सरकार के जुर्मों को अनदेखा करेंगे कि ये हमले हिन्दुस्तानियों पर नहीं हो रहे, तो ऐसे हमले भारत से बहुत दूर भी नहीं हैं। अमरीका से अगर भारत का जागरूक तबका भी सवाल नहीं करेगा, तो यह इस देश की राजनीतिक चेतना की बेइज्जती होगी। 
हम सुप्रीम कोर्ट में बड़े लोगों के साथ हो रहे अलग किस्म के बर्ताव से लेकर दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह के साथ हो रहे अलग किस्म के रियायती बर्ताव को एक साथ मिलाकर इसलिए लिख रहे हैं कि दुनिया में ताकतवर और कमजोर लोगों के बीच एक बहुत बड़ा फासला बन चुका है, और इसके खिलाफ आवाज उठाने की जरूरत है। अपने आरामदेह घरों में चैन से बैठे हुए लोग पड़ोस की मौतों को अनदेखा करते हुए, अपने लिए मौत को न्यौता ही देते हैं। 

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