छत्तीसगढ़ के नगरों ने भाजपा के लिए बजाई खतरे की घंटी

4 जनवरी 2015
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के नगरीय चुनाव के नतीजे प्रदेश में पिछले ग्यारह बरसों से सत्तारूढ़ भाजपा के लिए एक सदमा लेकर आए हैं, और भाजपा के जो शुभचिंतक हैं वे इसे पार्टी और सरकार के लिए आंख खोलने वाले भी मानेंगे। नतीजों के आंकड़े तो आते जा रहे हैं, लेकिन सदमा पूरी तरह से आ चुका है। और चूंकि प्रदेश में व्यापक रूप से भाजपा को झटका लगा है, इसलिए यह मानना ठीक नहीं होगा कि सिर्फ स्थानीय स्तर पर पिछले बार के भाजपा के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के खिलाफ यह नाराजगी या जनादेश है। यह स्थानीय से अधिक, राज्यस्तर का जनादेश है, और उसे उसी तरह लेना भी चाहिए। यह सत्तारूढ़ भाजपा के लिए संभलने का एक अच्छा मौका भी हो सकता है, क्योंकि अगले कुछ हफ्तों में पंचायत के चुनाव तो निपट जाएंगे, उसके बाद चार बरस बिना चुनाव के रहेंगे। अगले विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा को आज यह याद रख लेना चाहिए कि पिछले चुनाव में वह कांगे्रस से कुल पौन फीसदी आगे थी, और आज म्युनिसिपल चुनावों में वह कई फीसदी पीछे हो गई है। 
इस चुनाव में भाजपा ने अपने पार्षदों और अध्यक्षों-महापौरों को बड़ी संख्या में बदल दिया था, और उसे उम्मीद थी कि पांच बरस में जनता की जो नाराजगी स्थानीय निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से होती है, वह जीत में आड़े नहीं आएगी, लेकिन वैसा हो नहीं पाया। नए-नए उम्मीदवार भी हारे, भाजपा के जानकार लोगों में पहले से यह चर्चा भी थी कि कई जगहों पर पार्टी ने कमजोर संभावनाओं वाले लोगों को उम्मीदवार बनाया था। अभी हम उतनी बारीकी में जाना नहीं चाहते, लेकिन राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी को आज मोटेतौर पर कई बातों को समझना चाहिए। ऐसे कौन से मुद्दे रहे, राज्यस्तर पर जनता की नाराजगी की कौन सी बातें रहीं, जिन्होंने भाजपा के हाथ से इतने म्युनिसिपल छीन लिए?
हमारे पाठकों को याद होगा कि पिछले महीनों में हम लगातार स्थानीय मुद्दों को लेकर राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी को आगाह करते आ रहे थे कि जिस तरह शहर घूरे में तब्दील हो चुके थे, वह भाजपा को नगरीय चुनाव में भारी पड़ेगा। और हमारा यह भी मानना है कि जब प्रदेश की राजधानी में गंदगी से लोग दहशत में थे, और अफसर कुछ भी नहीं कर पा रहे थे, तो इस शहर में भाजपा के महापौर प्रत्याशी की हार में यह मुद्दा अपने-आपमें काफी था। लेकिन यह पूरा नहीं था, राज्य सरकार अपने इस तीसरे कार्यकाल में राशन कार्डों को लेकर बहुत बुरी तरह से नाराज जनता को झेल रही थी, जिस तरह से बिलासपुर में नसबंदी मौतें हुईं, उससे पूरे प्रदेश में महिला मतदाताओं में खास नाराजगी थी, और देश के बाहर के मीडिया ने भी इसे परले दर्जे की सरकारी लापरवाही माना था। लेकिन इसके बाद राज्य सरकार का जो रूख था, वह अपने बचाव का था, इन मौतों के मुजरिमों को सजा देने का सरकार का इरादा नहीं दिखा, और हमारा मानना है कि पूरे प्रदेश में इसे लेकर लोगों के बीच बहुत नाराजगी थी। 
दूसरी तरफ कांगे्रस की बात करना जरूरी है जो कि प्रदेश के अपने एक सबसे बड़े नेता अजीत जोगी की खुली नाराजगी और खुली बगावत को झेलते हुए भी चुनाव मैदान में बड़े सीमित साधनों के साथ थी। राज्य में ग्यारह बरसों से विपक्ष में रहना आसान नहीं होता, और पूरे देश में कांगे्रस पार्टी की जो बदहाली और फटेहाली है, उसके बोझ को राज्य में ढोना भी छत्तीसगढ़ कांगे्रस के लिए आसान बात नहीं थी। जिस कांगे्रस का देश भर मखौल बन रहा है, उसे वार्ड-वार्ड और शहर-कस्बे तक जिताना एक आसान बात नहीं थी। अपनी पार्टी के नेताओं से नुकसान झेलते हुए छत्तीसगढ़ कांगे्रस ने जिस अंदाज और जिस तेवर में ये चुनाव जीते हैं, वह एक बड़ी शानदार कामयाबी है। हमारे पाठकों को यह भी याद होगा कि कुछ हफ्ते पहले ही हमने इसी जगह छत्तीसगढ़ में कांगे्रस की विपक्षी भूमिका को लेकर लिखा था कि इस प्रदेश में संगठन जिस जिम्मेदारी और सक्रियता से काम कर रहा है, उसे देखकर कांगे्रस के राष्ट्रीय संगठन को भी विपक्ष की भूमिका सीखनी चाहिए। 
हमने इस जगह-जगह बार-बार राज्य सरकार के लिए सलाह लिखी थी, और कांगे्रस पार्टी के विपक्षी तेवरों की तारीफ की थी। अभी पूरे प्रदेश में जो नतीजे आए हैं वे इन्हीं दो बातों के मिले-जुले सुबूत हैं। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अपनी अच्छी छवि और लोकप्रियता के साथ इस चुनाव में पूरे प्रदेश को मथ डाला था। शायद ही कोई शहर ऐसा था जहां उन्होंने रोड-शो न किया हो। भाजपा के इस स्टार प्रचारक की इतनी कोशिशों के बाद भी ऐसे चुनावी नतीजे आए हैं, और अगर इतनी कोशिश न हुई होती, तो पता नहीं क्या हुआ होता। यह मौका भाजपा को कांगे्रस दोनों के लिए आत्ममंथन का है। दोनों को भविष्य की अपनी संभावनाओं को देखना चाहिए, और लोकतंत्र में अपनी भूमिका को जिम्मेदारी के साथ निभाना चाहिए। विधानसभा और लोकसभा में अपनी जीत के बाद भाजपा अभी शहरों को खो बैठी है, और पंचायतों का मोर्चा खुला ही हुआ है। ऐसे में यह प्रदेश अगले चार-पांच बरस एक कड़े चुनावी मुकाबले की तैयारी का प्रदेश रहेगा, और कांगे्रस के प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल और विधानसभा में कांगे्रस के नेता टी.एस. सिंहदेव इसी सक्रियता से काम करते रहे, तो वे प्रदेश भाजपा सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती रहेंगे। यह छत्तीसगढ़ में लोकतंत्र के लिए एक बहुत अच्छी बात है कि यहां एक जागरूक विपक्ष है, जो कि आज देश के स्तर पर नहीं रह गया है। और यह बात भाजपा के लिए खतरे की एक बड़ी तेज घंटी भी है।

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