फ्रांस के हमले को देखकर भारत को सबक लेना चाहिए

8 जनवरी 2015
संपादकीय
फ्रांस की एक व्यंग्य पत्रिका शर्ली एब्डो पर कल इस्लामी आतंकियों ने हमला किया और दर्जन भर लोगों को मार डाला। इसमें पत्रिका के संपादक सहित फ्रांस के चार सबसे बड़े कार्टूनिस्ट भी थे जो कि फ्रेंच समाज को रोजाना झकझोरने का काम करते थे। यह पत्रिका अपने बुलंद हौसले के लिए जानी जाती थी, और धार्मिक पाखंड और कट्टरता जैसे कई मुद्दों के खिलाफ यह लगातार लिखती थी और कार्टून छापती थी। दो-तीन बरस पहले भी पैगम्बर मोहम्मद के कुछ कार्टून छापने के बाद इस पत्रिका पर पेट्रोल बम से हमला किया गया था, और इस पर मजहबी आतंक का खतरा माना जाता था। ऐसे में जब इसकी एक बैठक में ये तमाम कार्टूनिस्ट एक साथ इक_ा थे, तब एक फौजी तैयारी के साथ ठीक उसी बैठक पर हमला किया गया, और यह नारा भी लगाया गया कि इसके कार्टून ने आईएसआईएस के आतंकी मुखिया की बेइज्जती की थी, और उसका बदला लिया जा रहा है। एक हमलावर पकड़ा गया है और दो की शिनाख्त के बाद उनकी तलाश चल रही है। इसके पीछे किसी शक से परे सीधे-सीधे इस्लामी आतंकियों का हाथ है, और यह आतंकियों के कब्जे के देशों से परे का अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अपने किस्म का सबसे बड़ा हमला है। 
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर हमने कई बार यहां लिखा है। दुनिया के अलग-अलग देशों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैमाने अलग-अलग हैं। उन देशों की स्थितियां अलग हैं, वहां की संस्कृति अलग है, और वहां लोकतंत्र की परिपक्वता, कानून के राज का असर भी अलग-अलग हैं। अमरीका में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कुछ अलग किस्म की है, वहां पहले से मुनादी करके एक ईसाई चर्च का पादरी कुरान के पन्ने भी जला सकता है। भारत इन मामलों में एक मिले-जुले दर्जे का देश है, यहां पर कई मामलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, और कई मामलों में लोगों का बर्दाश्त बिल्कुल भी नहीं है, और अपने आपको घायल बताकर कुछ लोग, कुछ तबके, कुछ धर्म और कुछ जातियां दूसरों पर हमला करने को भारतीय कानून के तहत उनको दिया गया हक मानती हैं। भारत में धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाना एक ऐसा लचर कानून है जिसके तहत कोई भी रिपोर्ट लिखा सकते हैं, और एक थानेदार उस पर गिरफ्तारी कर सकता है। ऐसा जगह-जगह होता भी है। फिर कई मौकों पर राजनीतिक दल अतिसक्रिय होकर कुछ मुद्दों को उठाते हैं, और आग लगाना शुरू कर देते हैं। 
कल भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फ्रांस में हुए इस हमले पर अफसोस जाहिर किया है, लेकिन उन्हीं की पार्टी के लोग, उन्हीं के गठबंधन के लोग, उन्हीं के सहयोगी संगठन लगातार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले करते आए हैं। जिस देश में देवी-देवताओं की नग्न प्रतिमाओं का हजारों बरस का इतिहास रहा है, वहां पर ऐसी पेंटिंग बनाने पर मकबूल फिदा हुसैन को देश ही छोड़कर जाना पड़ा था, और फिर उन्होंने परदेस में ही आखिरी सांसें लीं। लोगों को अच्छे से याद होगा कि किस तरह पुणे के भंडारकर शोध संस्थान पर कई बरस पहले हिन्दू संगठनों ने बुरा हमला किया था, क्योंकि इस इंस्टीट्यूट में एक अमरीकी लेखक को शोध कार्य में मदद की थी, और उस लेखक की एक किताब में शिवाजी के बारे में लिखी गई बातों पर इन संगठनों को आपत्ति थी। इन्होंने वहां घुसकर सारे प्राचीन रिकॉर्ड, पांडुलिपियां, तस्वीरें, और प्राचीन वस्तुएं नष्ट कर दी थीं, और वहां भारी तबाही की थी। अभी ताजा बात अगर देखें, तो दीनानाथ बत्रा नाम के एक हिन्दूवादी शिक्षा शास्त्री ने एक अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन संस्थान को कानूनी कार्रवाई की धमकी देकर, उस पर दबाव डालकर हिन्दू धर्म पर लिखी गई एक किताब को बाजार से वापिस बुलाने पर मजबूर किया, और उसे खत्म करवा दिया। 
दूसरी तरफ हिन्दूवादियों से परे बंगाल में ममता बैनर्जी जैसे लोग हैं जो कि कार्टून बनाने वाले लोगों को जेल में डालते हैं। दो बरस पहले असीम त्रिवेदी नाम के एक कार्टूनिस्ट को एक कार्टून पर राजद्रोह के आरोप में मुम्बई में कांग्रेस की राज्य सरकार ने गिरफ्तार किया था, जिस पर बहुत से लोगों ने विरोध किया था और अदालत तक ने इसका नोटिस लिया था। अब लगे हाथों यहां पर बंगाल की वामपंथी सरकारों का भी जिक्र कर लेना ठीक होगा जिन्होंने राज्य में तस्लीमा नसरीन की किताबों पर प्रतिबंध लगाकर रखा, और तस्लीमा को वहां घुसने भी नहीं दिया। अब ममता बैनर्जी के राज में भी तस्लीमा पर यह रोक जारी है। सलमान रूश्दी की किताब पर भारत में उस समय रोक लगा दी गई थी, जब दुनिया के किसी इस्लामी या मुस्लिम देश में भी उस पर रोक नहीं लगी थी। 
आज अगर भारत के प्रधानमंत्री फ्रांस में इस हमले का विरोध करते हैं, लेकिन पिछले दस-बीस बरस में भारत के भीतर साम्प्रदायिक ताकतों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जितने हमले किए थे, उनमें से किसी पर भी वे कुछ नहीं कहते, तो यह अपने आपमें एक सैद्धांतिक विरोधाभास है, और इसका खुलासा होना चाहिए। भारत में छोटी-छोटी जगहों पर जिस तरह से साम्प्रदायिकता बढ़ाई जा रही है, उससे यह देश भी एक हिंसा की तरफ बढ़ रहा है, और हिंसा की प्रतिक्रिया में और हिंसा पैदा होना तय रहता है, इसलिए भारत को आज फ्रांस को देखकर सबक  लेना चाहिए, और किसी भी धर्म की साम्प्रदायिकता, कट्टरता को बढऩे से कड़ाई से रोकना चाहिए। हम भारत में आज फ्रांस या योरप की तरह की, या अमरीका की तरह की अभिव्यक्ति की आजादी की संभावना नहीं देखते, और न ही उस दर्जे की आजादी की आज वकालत करते, लेकिन भारत में जिस रफ्तार से साजिश के तहत बर्दाश्त को खत्म किया जा रहा है, उससे हम अभिव्यक्ति की एक अधिक आजादी की तरफ नहीं बढ़ रहे, एक अधिक हिंसा की तरफ बढ़ रहे हैं। इस देश को इस नौबत से बचना चाहिए, वरना हम आज आईएसआईएस की हिंसा का हाल देख ही रहे हैं, भारत में तो एक से अधिक धर्म हिंसा की ऐसी ऊंचाई तक पहुंच सकते हैं। 

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