संचार और सोशल मीडिया स्कूल-कॉलेज में सिखाएं

संपादकीय
14 जनवरी 2015
भारत में प्रधानमंत्री के स्तर से लेकर गांव-देहात अनपढ़ लोगों तक सोशल मीडिया की चर्चा है। केन्द्र सरकार के मंत्रियों, और विभागों को लगातार कहा जा रहा है कि वे ट्विटर और फेसबुक जैसी लोकप्रिय सामाजिक वेबसाइटों के माध्यम से सरकार की नीतियों, कार्यक्रमों, और उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाएं। छत्तीसगढ़ में भी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की तरफ से रोजाना ट्विटर पर कुछ न कुछ पोस्ट किया जाता है। भारत के दसियों करोड़ लोग इंटरनेट पर सोशल वेबसाइटों से जुड़े हुए हैं, और उनके बीच आपस में भी बहुत से मुद्दों पर बातचीत होती है। दूसरी तरफ अब करीब-करीब हर हिन्दुस्तानी हाथ तक मोबाइल फोन पहुंचने को हैं, और उन पर वॉट्सऐप जैसी मुफ्त की सेवा पर लोग बहुत से वीडियो, तस्वीरें और संदेश एक-दूसरे को भेजते हैं। आपसी संबंधों का, संपर्क का, और प्रचार का यह एक बिल्कुल नया माध्यम है, जो कि पिछले कुछ बरसों में भारत की जिंदगी का एक बड़ा सक्रिय हिस्सा बन गया है। लेकिन आम लोगों को न तो इसकी संभावनाओं का ठीक से अंदाज है, और न ही इसके खतरों का। 
इंटरनेट और टेलीफोन से आज लोग काम का सच और बेकाम का झूठ बात की बात में चारों तरफ फैला सकते हैं, और आज अगर कोई गणेश के दूध पीने की अफवाह फैलाए, तो वह जंगल की आग की तरह फैल सकती है। ऐसे में स्कूल-कॉलेज जैसी संगठित जगहों पर किशोर और नौजवान पीढ़ी के सक्रिय लड़के-लड़कियों को सोशल मीडिया के बारे में सिखाने की एक बड़ी संभावना है, और जरूरत भी है। आज हिन्दुस्तान के बहुत से अधेड़ लोग भी अपने छोटे बच्चों से फोन और इंटरनेट की तकनीक सीखते या समझते हैं, और फिर खुद उनका खुलकर इस्तेमाल भी करते हैं। लोगों के बीच हंसी-मजाक से लेकर अश्लील और फूहड़ लतीफों और तस्वीरों तक, सेक्स की वीडियो क्लिप तक इतने किस्म की बातें की आवाजाही होती है, कि जिसकी कल्पना भी कुछ बरस पहले किसी ने नहीं की थी। कुल मिलाकर यह एक ऐसा औजार भारतीय समाज में इस्तेमाल होने लगा है, जिसे कोई बिना धार का औजार समझ रहे हैं, तो कोई इसे जानलेवा हथियार समझ रहे हैं। जरूरत इनके बीच इस बात की है कि लोगों को इस नई तकनीक और जीवन शैली से परिचित कराया जाए, और उनको इसकी सकारात्मक संभावनाओं के बारे में बताया जाए। 
जैसा कि जिंदगी के हर दायरे में होता है, सनसनीखेज और बुरी बातें तेजी से फैलती हैं। एक पुरानी कहावत है कि जब तक भला अपने जूते बांधता है, तब तक बुरा गांव का चक्कर लगाकर आ जाता है। ऐसे समाज में, और ऐसे मानवीय स्वभाव के बीच जरूरत है सोशल मीडिया की संभावनाओं से लोगों को रूबरू कराने की। लोग इसका इस्तेमाल तो कर रहे हैं, लेकिन न तो इस नए औजार के लिए जरूरी जिम्मेदारी की समझ अधिक लोगों में है, और न ही इसके उत्पादक उपयोग की। कई किस्म के झूठ, गढ़ी गई तस्वीरें, अपमान और आपत्ति की बातें लोग एक-दूसरे को इतनी रफ्तार से आगे बढ़ा देते हैं, कि कुछ मिनटों में ही यह बात खो जाती है कि गलत बात भेजना किसने शुरू किया। कम्प्यूटर और फोन की तकनीक कॉपी और पेस्ट की ऐसी सहूलियत देती है कि लोग बिना किसी स्रोत का जिक्र किए, अपने ही अकाउंट से भली-बुरी सभी किस्म की बातें आगे बढ़ाते हैं। 
ऐसे में आज जरूरत है कि स्कूल और कॉलेज में आधुनिक संचार तकनीक और सोशल मीडिया की संभावनाओं और खतरों पर कुछ घंटों की एक ट्रेनिंग अनिवार्य की जाए। और फिर वहां से निकलकर बच्चे अपने घरों में मां-बाप को भी यह बात बता और सिखा सकते हैं। संचार तकनीक और सोशल मीडिया को अनदेखा करने से इसके खतरे तो कम नहीं हो सकते, इसकी संभावनाएं जरूर धरी रह जाएंगी। इसलिए इस हकीकत की मौजूदगी को मानना जरूरी है, और उसे सीखना जरूरी है। यह समाज के बहुत अच्छे काम भी आ सकती है, इसको महज बुरा कहना एक लापरवाही होगी।

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