भारत तो राष्ट्रीय शोक मना रहा है लेकिन जनता सऊदी राजा को समझे

संपादकीय
24 जनवरी 2015
सऊदी अरब के कट्टरपंथी राजा की मौत के बाद पूरी दुनिया में सरकारों की तरफ से जैसी फर्जी जुबान में इस दकियानूसी आदमी को श्रद्धांजलि दी जा रही है, वह देखने लायक है। यूरोप और पश्चिम के वे तमाम विकसित और स्वघोषित संवेदनशील देश झंडे झुकाकर खड़े हैं जो कि भारत और बांग्लादेश में बने हुए सामानों का बहिष्कार करते हैं क्योंकि उनमें बाल मजदूरी का इस्तेमाल होता है। ऐसे देश इस बात को अनदेखा कर रहे हैं कि सऊदी अरब में इसी राजा की तानाशाही के चलते हुए महिलाओं को कार चलाने की इजाजत नहीं है, और अगर किसी महिला के साथ बलात्कार होता है, तो उसे कोड़े लगाने का इंतजाम इसी राजा ने किया था। लेकिन दुनिया का रिवाज यह है कि मरे हुए के बारे में कोई कड़वी बात बोलनी नहीं चाहिए, और दूसरी बात यह कि जिसके हाथ में दौलत की ताकत होती है, उसके सामने सब लोग झुककर खड़े रहते हैं। दुनिया में सबसे अधिक पेट्रोलियम पैदा करने वाले सऊदी अरब की दौलत के चलते संवेदनशील होने का दावा करने वाले देश भी वहां की तमाम ज्यादतियों को अनदेखा करना पसंद करते हैं। फिर यह भी है कि मध्य पूर्व के देशों के बीच में अमरीका और ब्रिटेन जैसे देशों को ईरान के मुकाबले सऊदी अरब एक ऐसा ठिकाना मिला है जो कि मुस्लिम भी है, और ईरान विरोधी भी है, और जिसे पश्चिम की यारी पसंद भी है। 
दरअसल, अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कुछ भी नैतिक नहीं होता। हर चीज तुलना की होती है कि अपने देश के अधिक फायदे का क्या है। नैतिकता के पैमाने, सिद्धांतों के पैमाने तभी तक इस्तेमाल होते हैं, जब तक वे उस देश के निजी हितों के खिलाफ नहीं जाते। एक तरफ तो तीसरी दुनिया के गरीब देशों में मजदूरी के पैमानों को लादकर विकसित देश वहां बने सामानों का बहिष्कार करवाते हैं, और अभी चार दिन पहले ही अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने वहां की संसद के सामने राष्ट्र के नाम दिए संदेश में यह खुलकर माना कि वहां प्रताडऩा के लिए कुख्यात जेल का वे क्या करने जा रहे हैं। इसलिए एक तरफ तो अपने देश के भीतर परले दर्जे की प्रताडऩा भी ठीक है, दूसरी तरफ बाकी दुनिया पर लोकतंत्र को अमरीका और उसके साथी देश हवाई जहाजों से बमों के साथ बरसाते हैं, और बेकसूर गरीब लोगों को लाखों की संख्या में मारते हैं। 
आज जिस सऊदी राजा की मौत पर भारत में झंडे आधे उतरे हुए हैं, उसी सऊदी राजा ने पड़ोस के देशों पर बरसती हुई अमरीकी मौतों पर कभी मुंह नहीं खोला था, कभी उसने फिलीस्तीन पर इजराइली हमले के खिलाफ कुछ नहीं कहा, और न कभी अमरीका को कहा कि वह इजराइल को गोद में न बिठाए। बल्कि इस राजा ने अमरीका से यह कहा था कि ईरान एक सांप है और अमरीका को हमला करके उसका सिर काट देना चाहिए। यह बात खुद अमरीकी कूटनीतिक संदेशों में थी, जिसे कि विकीपीडिया ने उजागर किया था। इस तरह एक घोर अमरीकापरस्त, गरीब मुस्लिम देशों और बाकी मुस्लिमों का विरोधी यह राजा आज पश्चिम के साथ-साथ भारत जैसे देश की श्रद्धांजलि पा रहा है, वाहवाही पा रहा है। यह तमाम तारीफ उस इंसान की नहीं है, उसकी जमीन के नीचे तेल के खजाने की है, और अमरीका की उस इलाके में फौजी जरूरत की है। 
इसलिए कभी भी सरकारों को बहुत नैतिक नहीं मानना चाहिए। भारत में भी जनता को अगर पूरी जानकारी होती तो इस राजा को कोई श्रद्धांजलि नहीं मिलती, और जनता तो जितनी थोड़ी बहुत जानकारी उसे थी उसके मुताबिक सऊदी अरब के कट्टरपंथ के खिलाफ सुनते और बोलते आई भी है। आज वहां कोई लोकतंत्र नहीं है, और न ही अमरीका को यह हड़बड़ी है कि वह सऊदी अरब पर भी लड़ाकू विमानों से लोकतंत्र बरसाए। जो राजा पहले से पश्चिम की जेब में है, उसे अमरीकी लड़ाकू विमानों का कोई खतरा भी नहीं है। दुनिया के देशों के मुखिया आते-जाते रहते हैं, लेकिन उनके इतिहास को समझने के बाद ही उनकी मौत पर गम मनाना चाहिए। भारत की सरकार इस बात को अनदेखा कर रही है कि विकीलीक्स पर आए दस्तावेज के मुताबिक इसी किंग अब्दुल्ला ने हर बरस करीब सौ मिलियन डॉलर पाकिस्तान में आतंकी ट्रेनिंग पर खर्च किए थे। दुनिया में इस राजा ने समाज के लिए कुछ अच्छा किया हो, इसकी कोई मिसालें नहीं हैं। 

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