अरूण जेटली का बजट दो-तीन छोटी-छोटी बातें

संपादकीय
28 फरवरी 2015

केन्द्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली के बजट में आज की बातों पर जानकार लोग अधिक विश्लेषण करेंगे, लेकिन हम इसके छोटे से हिस्से पर अभी बात करना चाहते हैं, जिससे कि लोगों को न सिर्फ बड़ी तकलीफ होगी, बल्कि बड़ी चोरी भी बढ़ेगी। हर किस्म की सेवा पर लगने वाले 12.36 फीसदी सर्विस टैक्स को बढ़ाकर 14 फीसदी कर दिया गया है, और देश में छोटे-छोटे से काम पर भी यह टैक्स लगता है। आज भी भारत में जितने लोगों पर यह लागू होना चाहिए, उसमें से दस फीसदी लोग ही इसे चुकाते हैं, और बाकी लोग इसे चुरा लेते हैं। अब जो लोग ईमानदार नीयत से सर्विस टैक्स देना चाहते हैं, उनके और सर्विस टैक्स-चोरों के बीच कमाई का फर्क करीब 15 फीसदी हो जाएगा। यह नौबत लोगों को सर्विस टैक्स चोरी के लिए उकसाएगी, और लोग अपने कागजात छुपाकर इसके दायरे से बाहर रहना चाहेंगे। 
कुछ टैक्स ऐसे रहते हैं जिनमें कमाई को, काम को, कारोबार और हिसाब-किताब को छुपाने की गुंजाइश खासी रहती है। सर्विस टैक्स वैसा ही है। छोटे-छोटे से कारोबार भी इसके दायरे में आ जाते हैं, और वहां पर व्यापार को छुपाना आसान रहता है। इसलिए ईमानदारी और बेईमानी के बीच 15 फीसदी का फासला कारोबार के हिसाब से बड़ा घातक है, और उससे टैक्स चोरों को बढ़ावा मिलेगा। टैक्स पर अमल की हमारी मामूली जानकारी और मामूली समझ के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि सर्विस टैक्स की लंबी लिस्ट में जितने तरह की सेवाएं लिखी गई हैं उन सब तक पहुंच पाना सरकार के बस का वैसे भी नहीं है। इसलिए अधिक अच्छा यह होता कि सर्विस टैक्स को घटाकर लोगों को इसकी चोरी की तरफ से दूर हटाया जाता, और टैक्स देने वालों का दायरा बढ़ाया जाता। कम लोगों से अधिक वसूली की पुरानी सोच को पता नहीं अरूण जेटली ने इस बजट में क्यों लागू किया है। 
लेकिन एक दूसरी बात अमरीकी टैक्स कानून की तरह की भारत में लागू करने की बात उन्होंने की है। आयकर चोरी करने वाले, काला धन जमा करने वाले लोगों को कैद देने का एक कानून बनाने की बात बजट भाषण में की गई है, और यह एक असरदार बात हो सकती है। आयकर चोरी बहुत ही आम बात है, और देश में इसकी वजह से एक ऐसी समानांतर अर्थव्यवस्था विकसित हो चुकी है जिसके तहत और लोग भी काला धन कमाने और उसी पर अपने कारोबार को टिकाने को फायदे का पाते हैं। आज हालत यह है कि भारत में किसी जमीन या मकान-दुकान को कोई बेचना चाहे, तो एक नंबर के पैसों वाले खरीददार मिलते नहीं, या कोई एक नंबर में खरीदना चाहे तो बेचने वाले उतनी रकम एक नंबर में लेना नहीं चाहते। काले धन की अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत हो चुकी है कि कई किस्म के कारोबार इसके बिना आज चल नहीं सकते, और काले धन को सफेद करना अपने आपमें देश का एक बड़ा कारोबार बन चुका है। ऐसे में आयकर चोरी या काले धन के कारोबार पर अब दस साल तक की कैद का इंतजाम किया जा रहा है, और अमरीका में यह कामयाब भी रहा है। हम इसे ठीक मानते हैं। आज भी भारत में सर्विस टैक्स वसूलने वाले केन्द्रीय आबकारी विभाग के आबकारी शुल्क की चोरी पर कैद का इंतजाम है ही, और इसका विस्तार आयकर चोरी तक होना ठीक है। 
भारत के बहुत बड़े मध्यम और उच्च-मध्यम वर्ग को इस बजट से निराशा होगी कि आयकर छूट की सीमा नहीं बढ़ाई गई है। हम इसे बहुत अधिक जरूरी तो नहीं मानते, और टैक्स के लायक कमाई वाले लोगों को इतना टैक्स देना भी चाहिए, लेकिन यहां पर एक दिक्कत आती है। सरकारी या गैरसरकारी क्षेत्र के जो आयकरदाता अपनी तनख्वाह पर आयकर देते हैं, उनके पास छुपाने, बचाने, या चोरी करने की कोई गुंजाइश नहीं होती। जबकि यह आम बात है कि उनसे कई गुना अधिक कमाई करने वाले कारोबारी अपनी कमाई का अधिकांश हिस्सा छुपाने का रास्ता निकाल लेते हैं। इस जमीनी हकीकत को देखते हुए अरूण जेटली को वेतन पर कटने वाले आयकर पर एक छूट देनी थी, इसके बिना बराबर कमाई बताने वाले वेतनभोगी और कारोबारी के बीच टैक्स का बोझ बहुत अलग-अलग स्तर का हो जाता है। बजट की बाकी बातों पर आने वाले दिनों में इसी पन्ने पर कई और बातें।

देह संबंधों के बाद शादी से मुकरना बलात्कार कैसे?

संपादकीय
27 फरवरी 2015
दो दिन पहले दिल्ली में एक नेपाली शोध छात्र की गिरफ्तारी हुई जिसके खिलाफ जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका ने बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई थी। उसने पुलिस में दर्ज शिकायत में लिखाया था कि इस छात्र से उसके देह संबंध बन गए थे, और उसने रिसर्च पूरी हो जाने के बाद शादी का वायदा किया था, लेकिन अब वह उससे मिलने से कतरा रहा है, और शादी से इंकार कर रहा है। इस बयान के साथ देश की सबसे प्रतिष्ठित एक यूनिवर्सिटी की प्राध्यापिका ने यह रिपोर्ट लिखाई। 
शिवसेना ने कुछ अरसा पहले लोगों में नाराजगी पैदा की थी उसका कहना था- छेडख़ानी और रेप का आरोप लगाकर सनसनी फैलाना अब फैशन हो गया है। एक मॉडल पुलिस में उत्तम सेवा देने वाले एक आईपीएस अफसर पर सीधे रेप का आरोप लगाती है, और वो पुलिस अधिकारी खलनायक ठहराया जाता है। महिलाएं छेडख़ानी जैसे मामलों को खतरनाक हथियार समझती हैं। इस मामले में पीडि़ता को 6 महीने बाद याद आया कि उसके साथ बलात्कार हुआ है। आखिरकार 6 महीने बाद कैसे किसी लड़की को याद आ सकता है कि उसके साथ बलात्कार हुआ है। चरित्र का हनन, बदनामी राजनीति और सरकार में बड़ा हथियार बन गए हैं। एक-दूसरे को रास्ते से हटाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। कानून महिलाओं के साथ है लेकिन इसका ये मतलब नहीं है इसका गलत इस्तेमाल किया जाए।ÓÓ
शिवसेना के उस बयान से परे भी यह बात बहुत से लोगों के मन में आती है कि महिलाओं की खास हिफाजत के लिए भारतीय हालात में उनको जो खास कानूनी हक दिए गए हैं, उनका बेजा इस्तेमाल होता है। इनमें दहेज प्रताडऩा, कामकाज की जगह पर यौन प्रताडऩा, और सेक्स-अपराध जैसे कुछ जुर्म हैं, जिनसे महिलाओं को बचाने के लिए भारतीय कानून में उनको आदमियों के मुकाबले कुछ अधिक हक दिए गए हैं। समय-समय पर ऐसे बयानों के खिलाफ हम लिखते भी रहे हैं, जिनमें कि नेता और अफसर किसी महिला द्वारा दर्ज की गई शिकायत की जांच के पहले ही उसकी नीयत पर शक खड़ा करना शुरू कर देते हैं। मुंबई का यह मामला वैसा ही था जिसमें एक मॉडल ने एक आईपीएस अफसर के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई थी।
जेएनयू में बलात्कार की शिकायत की जांच अभी शुरू हुई ही है, और इस पर कुछ भी कहना जायज नहीं है, लेकिन हम ऐसे तर्कों के बारे में बात कर रहे हैं जो कि बलात्कार की कुछ शिकायतों के साथ पुलिस में दर्ज किए जाते हैं। बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें महिलाएं कई बरस से उनके साथ किए जा रहे बलात्कार का आरोप लगाते हुए पुलिस रिपोर्ट में यह लिखाती हैं कि शादी का झांसा देकर, शादी का वायदा करके, उससे देहसंबंध बनाए गए, और फिर बाद में उसे पता लगा कि आदमी या तो शादीशुदा था, या बाद में उसकी कहीं और शादी हो रही है, या उसकी शादी की नीयत ही नहीं है।
अब हम एक ऐसी स्थिति की कल्पना करें जिसमें कि एक लड़के और एक लड़की के बीच, या एक आदमी और एक औरत के बीच दोस्ती होती है, पे्रम होता है, या बिना प्रेम के भी देहसंबंध बनते हैं, जारी रहते हैं, और फिर बाद में किसी वजह से शादी नहीं हो पाती, या दोनों में से कोई भी एक पक्ष शादी के अपने वायदे को पूरा करना मुमकिन या ठीक नहीं पाता। ऐसा कई वजहों से हो सकता है, लोगों की दोस्ती, लोगों के पे्रम, या इससे भी आगे बढ़कर लोगों के देहसंबंध बनते हैं, और टूटते हैं। किसी झांसे या धोखे की नीयत के बिना भी संबंध आते-जाते रहते हैं। दो वयस्क लोगों के बीच इनमें से किसी भी किस्म के संबंध बनना और टूटना तब तक जुर्म नहीं है, जब तक कि वह मर्जी के खिलाफ न हो। 
अब यह समझना कुछ मुश्किल पड़ता है कि किस तरह मर्जी के खिलाफ बरसों तक किसी के देहसंबंध बने रह सकते हैं। ऐसा किसी धमकी के तहत, किसी ब्लैकमेलिंग के तहत तो हो सकता है, लेकिन उसके बिना बिना विरोध, मौन सहमति से अगर यह सिलसिला जारी रहता है, तो आगे जाकर उसको जुर्म करार देना पहली नजर में सही नहीं लगता है। और दोस्ती के बाद पे्रम या बिना पे्रम, शादी का वायदा करना, देहसंबंध बनने के बिना, या बनने के बाद, उसे पूरा न करना भी किसी तरह से जुर्म नहीं लगता है। क्योंकि बिना देहसंबंध भी वायदे बनते और टूटते रहते हैं, और उनकी मजबूती की गारंटी के लिए किसी फेविकोल के मजबूत जोड़ की गुंजाइश नहीं रहती। 
अब आज इस पर लिखने का दिल इसलिए कर रहा था कि आज जिस तरह बहुत से मामलों में बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज हो रही है, लोगों को महीनों तक जमानत नहीं मिल रही है, बरसों तक फैसले नहीं हो रहे हैं, और उसके बाद या तो सजा हो रही है, या फिर बिना सजा रिहाई हो रही है, उसे देखते हुए लगता है कि क्या ऐसे कानूनी माहौल के चलते हुए लोगों के आपसी संबंधों की संभावनाओं पर एक मानसिक दबाव ऐसा पड़ेगा कि संबंध ही स्वाभाविक न रह पाएं।
यह लिखने का यह मकसद नहीं है कि बलात्कार की शिकायतों में से बहुत सी झूठी रहती हैं। हमारा तो मानना इससे उल्टा यह है कि बलात्कार की सही शिकायतों में से बहुत ही कम दर्ज हो पाती हैं, और बाकी शिकायतों का दम घुट जाता है। सामाजिक अपमान, पारिवारिक दबाव, और अदालतों का डरावना माहौल मिलाकर लोगों को बलात्कार को सबक के साथ बर्दाश्त कर लेने पर ही अधिक मजबूर करते हैं। लेकिन दूसरी तरफ जितने भी मामलों में शादी के वायदे के बाद बने देहसंबंधों के बाद शादी न होने की स्थिति में दर्ज कराई गई रिपोर्ट को बलात्कार मानना थोड़ा अटपटा लगता है, और उसके लिए कानून में एक बारीक फर्क करने की जरूरत है। 
किसी भी वयस्क लड़की या महिला को किसी वयस्क लड़के या आदमी के किए हुए वायदे पर भरोसा करके उसे अपनी देह दे देने की कोई मजबूरी नहीं रहती। ऐसा करते हुए उसकी एक सहमति रहती है, जो बाद के हालात बदलने पर भुला दी जाती है। ऐसे मामलों की खबरों को देख-सुनकर ऐसा लगता है कि आज लोगों के मन में संबंधों को लेकर एक दहशत खड़ी हुई होगी कि आज की सहमति कल कब, किस वजह से, पुलिस रिपोर्ट में बदल जाए? आज का हमारा पूरा लिखना सिर्फ ऐसे ही मामलों को लेकर है जिनमें पहले की सहमति बरसों बाद जाकर शिकायत बन जाती है। ऐसे मामले लोगों के मन में सच्चा पे्रम भी कुचलने के लिए काफी रहते होंगे, क्योंकि आज के पे्रम के तहत की गई बातें कल जाकर किस तरह कटघरे में खड़ी कर देंगी, जिसका अंदाज आज कोई नहीं लगा सकते। 
ऐसे कानून में बदलाव की जरूरत है जो कि शादी के वायदे के साथ बने देहसंबंधों को आगे शिकायत होने पर बलात्कार मानता हो। बहुत से ऐसे मामले रहते हैं जिनमें देहसंबंधों के बिना भी शादी के वायदे बनते और टूटते रहते हैं, इसी तरह इन वायदों के साथ-साथ, उनके बाद भी ऐसे संबंध बन सकते हैं, और बाद में देह से परे के कई किस्म के मुद्दों को लेकर वायदा पूरा करना पाना नामुमकिन हो सकता है, या लोगों को लग सकता है कि यह रिश्ता ठीक नहीं चलेगा। ऐसी कई नौबतों में लोग अपने वायदे से मुकरने का पूरा हक रखते हैं। एक वादाखिलाफी को बलात्कार मान लेना गड़बड़ लगता है, और इस कानून में बदलाव होना चाहिए।
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पहली बार बिना नाटकीयता वाला रेल बजट, सुधार पर जोर

संपादकीय
26 फरवरी 2015

केन्द्रीय रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने अपने पहले बजट में बिना किसी नाटकीयता के छोटी-छोटी बातें कही हैं, जो कि परंपरागत रेल बजट-घोषणाओं के मुकाबले एक बेहतर बात है। भारत के इतिहास में यह शायद पहला मौका है जब किसी रेलमंत्री ने अपने गृह राज्य के लिए अनुपातहीन अधिक रेलगाडिय़ों की घोषणा नहीं की है। कई रेलमंत्री ऐसे भी रहे जिन्होंने रेल्वे के हजारों करोड़ के संस्थान अपने राज्यों में शुरू करने की घोषणा की थी। इनके मुकाबले आज का यह बजट बिना किसी चटखारे वाला, और एक गंभीर कामकाज वाला बजट दिख रहा है जिसे पेश करते हुए सुरेश प्रभु ने यह साफ किया कि अधिक समीक्षा के बाद नई गाडिय़ों का फैसला किया जाएगा। 
न सिर्फ रेल के मामले में, बल्कि कई मंत्रालयों के काम में, राज्यों के विभागों में, जिलों के छोटे-छोटे से दफ्तरों में मुखिया के ओहदों पर बैठे हुए लोग इस अंदाज में अपनी प्राथमिकताओं की औपचारिक घोषणा करते हैं कि मानो वे एक स्वायत्तशासी आजाद टापू के जमींदार हों। बहुत से नेता और अफसर इस बात की कोशिश करते हैं कि उनके कार्यकाल के दौरान उनके नाम के साथ कोई ऐसी बड़ी बात जुड़ जाए, जो कि इतिहास में लंबे समय तक याद रखी जाए। ऐसी नाटकीयता के फेर में लोगों की अपनी जिम्मेदारियों और कामकाज की बुनियादी बातें किनारे धरी रह जाती हैं, और नारों की जुबान मेें जो बात और काम सामने रखे जा सकते हैं, उन्हीं पर ध्यान अधिक जाता है। 
आज के सुरेश प्रभु के भाषण की एक बड़ी छोटी सी बात है कि साधारण दर्जे की टिकट लोगों को पांच मिनट के भीतर मिल जाए, ऐसा इंतजाम किया जाएगा। आज हालत यह है कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी अगर कोई ईमानदार और जिम्मेदार इंसान प्लेटफॉर्म टिकट लेकर प्लेटफॉर्म पर जाना चाहते हैं, तो उनका आधा-पौन घंटा टिकट की कतार में लगता है। जिस देश में इंसानों की जिंदगी का वक्त इतना फिजूल मान लिया जाता है कि उन्हें रोज घंटों कतार में खड़ा किया जाए, वहां पर यह छोटी सी सोच एक बड़ी बात है। एक दूसरी बात यह है कि बहुत सी रेलगाडिय़ों में साधारण दर्जे के डिब्बों को बढ़ाने की बात कही गई है, और ये वही डिब्बे हैं जिनमें देश की सबसे गरीब जनता चलती है। हमारा तो यह मानना है कि बुलेट ट्रेन जैसी शाही खर्च वाली योजनाओं के बजाए देश की तकरीबन पूरी ही गरीब-आबादी को सीट पर बैठकर सफर करने की सहूलियत देना एक अधिक बड़ी बात है। 
रेल का काम इतना फैला हुआ और इतना बड़ा है, कि उसमें छोटे-छोटे सुधार की बड़ी-बड़ी गुंजाइश हमेशा ही रहती है। सफाई से लेकर हिफाजत तक, और सहूलियत से लेकर आराम तक, ऐसी कई बातें हैं जिन्हें बिना किसी घोषणा के सुधारा जाना चाहिए, और हो सकता है कि सुरेश प्रभु की नीयत ऐसी ही हो। कल ही हमने इसी जगह पर लिखा था कि किराए में मामूली बढ़ोत्तरी में कोई बुराई नहीं है, लेकिन हाल के चुनावों में भाजपा की बदहाली देखने के बाद हो सकता है कि मोदी सरकार और भाजपा फिलहाल किसी कड़े फैसले के पक्ष में न हो, लेकिन यह भी हो सकता है कि रेल विभाग के अपने संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल से आज सरकार को रेल भाड़ा बढ़ाने की जरूरत न हो। चूंकि इस बजट में नाटकीय कुछ नहीं है, इसलिए उस पर लिखने को भी अधिक बातें नहीं हैं, और सुरेश प्रभु को चाहिए कि वे उत्कृष्टता के पैमाने पर सुधार लाएं, और अधिक से अधिक जनता की सुविधा, सुरक्षा, और सहूलियत बढ़ाएं। यही रेल मंत्री की पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए कि सबसे गरीब, के सबसे करीब।

रेलभाड़ा बिल्कुल न बढ़ाना बहुत समझदारी नहीं...

25 फरवरी 2015
संपादकीय
कुछ पुरानी खबरों से परे एक नई खबर यह है कि रेल भाड़ा तीन फीसदी बढ़ सकता है। पिछले कई बरसों से लोगों को कोई बढ़ोतरी न होने की आदत पड़ी हुई है, जबकि सरकार और निजी क्षेत्र हर तरफ खर्च बढ़ते गए हैं। ऐसे में रेल टिकट को न बढ़ाने के कई नतीजे भी हो सकते हैं। एक तो यह कि विस्तार की योजनाएं, आधुनिकीकरण की योजनाएं और हिफाजत बढ़ाने की तकनीक, इन सब पर उतना काम नहीं हो पाएगा, जितना कि होना चाहिए। और भारतीय रेल इतनी बड़ी है, और उसमें किसी भी फैसले पर जमीनी अमल में इतने बरस लगते हैं कि आने वाले वक्त की जरूरतों का जिसे अंदाज न हो, वे यह नहीं समझ सकते कि विस्तार कितना और क्यों जरूरी है।
एक वक्त था जब भारत में स्कूटर को स्टार्ट करने के लिए एक तरफ झुकाकर किक मारनी पड़ती थी। वह वक्त ऐसा भी था जब रायपुर से भोपाल की एक टेलीफोन कॉल के लिए पूरे-पूरे दिन लोगों को इंतजार करना पड़ता था, और फिर टेलीफोन ऑपरेटर को रिश्वत देने से ही काम हो पाता था। वह वक्त ऐसा भी था जब एक टेलीफोन कनेक्शन के लिए लोगों को पांच-दस बरस इंतजार करना पड़ता था। ऐसी नौबत को बदलने के लिए देश के सामने यही एक रास्ता बचता था कि सरकार अपने बूते पर, या कि निजी क्षेत्र को जोड़कर उद्योगों का, और टेलीफोन जैसी सेवाओं का विस्तार करे। आज तस्वीर ऐसी बदली हुई है कि ठेला धकेलने वाले मजदूर भी जेब में मोबाइल फोन लेकर चलते हैं। 
ऐसे में भारतीय रेल को बेहतर न बनाना, देश की रेल-जरूरतों को पूरा न करना, और आने वाले दस-बीस बरस की संभावनाओं और जरूरतों को न आंकना, समझदारी नहीं होगी। ऐसे में हम एक मामूली बढ़ोतरी को सालाना बनाने के हिमायती हैं, और यह एक अलग बात है कि सरकारी की ऐसी कमाई का बहुत सावधानी और ईमानदारी से इस्तेमाल होना चाहिए। लोगों की जीवनशैली में जब हर चीज पर अधिक खर्च हो रहा है, तो रेल जैसी एक बड़ी और अपने किस्म की अकेली सुविधा पर भी खर्च बुरी बात नहीं है।
भारतीय रेल दुनिया की शायद सबसे बड़ी रेल है, और इसकी कमियों और दिक्कतों को सब लोग हर सफर में झेलते हैं। आज के रेलमंत्री सुरेश प्रभु एक बेहतर मंत्री माने जाते हैं, और मोदी सरकार एक किस्म से उनको भाजपा में आयात करके लेकर आई, और रेलवे जैसा महत्वपूर्ण विभाग दिया। उनसे देश यह भी उम्मीद करता है कि वे रेलवे की मौजूदा कमाई, और देश भर में बिखरी हुई उसकी जमीनों का एक कल्पनाशील उपयोग करके देश में रेल की तस्वीर बदलकर रख देंगे। आने वाले बजट के बाद भी भारत में इसकी जरूरत रहेगी कि लगातार रेल-ढांचे पर इतना काम हो कि लोग एक तरफ तो विश्व स्तर की सुविधा पा सकें, और दूसरी तरफ गरीबों को भी एक साफ-सुथरा सफर करने मिले। 

कांग्रेस पार्टी को जरूरत राहुल से परे सोचने की

24 फरवरी 2015
संपादकीय
कांग्रेस पार्टी एक अंधड़ से गुजरती हुई लग रही है। जिस नौजवान राहुल गांधी के हाथों में पार्टी ने अपना भविष्य दे रखा है, वे हाथ अभी जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं दिख रहे हैं। और उम्र के हिसाब से कहें, तो यह नौजवान अधेड़ हो चुका है, बचपन से इसने घर पर राजनीति और सत्ता देखी है, पिछले बरसों में सत्तारूढ़ पार्टी का हिस्सा रहा है, संसद में रहा है, सरकार के अध्यादेश फाड़कर फेंकते रहा है, लेकिन जब-जब जिम्मेदारी का कोई मौका आया, तब-तब यह मोर्चे से परे रहा है। आज राहुल गांधी के बारे में खबरें हैं कि वे पार्टी से छुट्टी लेकर आत्ममंथन करने कहीं विदेश गए हुए हैं, और संसद से सड़क तक जलते-सुलगते मुद्दे बिखरे हुए हैं। 
हम पिछले बरसों में बार-बार इस बात को लिख चुके हैं कि कांग्रेस पार्टी को अगर देश में विपक्ष भी रहना है तो उसे राहुल गांधी से परे कुछ सोचना-विचारना होगा। जिस तरह किसी खेल में, न खेलने वाले को कप्तान बनाया जाता है, उसी तरह राहुल गांधी जमीनी राजनीति और चुनावों की चुनौतियों से परे रहते हुए, जनता से कटे हुए, पार्टी के लोगों से कटे हुए, हकीकत को समझे बिना नासमझी के भाषण और बयान देते हुए भावनाओं के सैलाब पर आसमान तक पहुंचना चाहते हैं। लेकिन भावनाओं का सैलाब पल भर को ऊंचाई पर ले जाता है, और फिर नीचे लाकर कड़ी जमीन पर छोड़ देता है, जिसके लिए भी राहुल गांधी जरा भी तैयार नहीं हैं। 
कांग्रेस पार्टी को हमने पहले भी यह सुझाया था कि उसे यह तय करना है कि वह मुखिया की कुर्सी पर सोनिया परिवार के किसी को रखने को मंजिल मानती है, या फिर राजनीति में अपने अस्तित्व को बचाए रखने को? अगर यह पार्टी अपनी प्राथमिकता तय करने में आज भी गलती करेगी, तो इतिहास में वह हाशिए पर तो जा ही चुकी है, उसकी वापिसी की गुंजाइश भी कम रहेगी। इसमें हम राहुल गांधी की कोई गलती नहीं देखते। भारतीय राजनीति में वंशवाद के चलते उनको कांग्रेस पार्टी की अगुवाई से बचने की कोई पसंद दी ही नहीं गई थी, और इसमें नाकामयाब होने के बावजूद उन्हें घोड़े से उतरने नहीं दिया जा रहा था। यह सिलसिला कांग्रेस के लिए नुकसानदेह है, राहुल के लिए नुकसानदेह है, और देश के लोकतंत्र में विपक्ष की एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका के लिए भी नुकसानदेह है। 
लोगों को याद होगा कि दिल्ली में निर्भया के साथ बलात्कार के बाद जब पूरे देश में उस घटना को लेकर लोग विचलित थे, तब राहुल गांधी का पहला बयान आने में भी शायद हफ्ते-दस दिन से ज्यादा का समय लगा था। आज जब संसद का बजट सत्र शुरू है, और जब भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ पूरे देश में किसानों और गरीबों के बीच एक दहशत फैली हुई है, तो संसद में एक ऐतिहासिक जरूरत के बीच कांग्रेस पार्टी का यह भविष्य देश के बाहर सैर पर है। अब दिल्ली में चुनाव हारने के बाद से अब तक अगर राहुल गांधी चाहते, तो हफ्ते-दो हफ्ते की छुट्टी मना सकते थे। लेकिन आज संसद और सड़क दोनों के मोर्चों से गायब रहकर वे एक एनआरआई मुखिया की तरह विदेश बैठे हैं, और वहां रहकर मुखिया का कोई काम कर रहे हैं, यह भी पता नहीं है। 
कांग्रेस पार्टी को सोनिया और राहुल से परे एक लीडरशिप की जरूरत है। यह पसंद आसान नहीं होगी, और कांग्रेस के बहुत से दूसरे काबिल नेता शायद इस वजह से भी सोनिया-राहुल को ऊपर बिठाए रखना चाहते हैं, कि कोई दूसरा काबिल नेता मुखिया न बन जाए। कांग्रेस को अपने इस तंग नजरिए से परे सोचना होगा, वरना देश की जनता ने उसके प्रति अपना रूख लोकसभा के चुनाव में दिखाया था, और दिल्ली के चुनाव में जनता ने उस रूख को कुछ और आगे तक ले जाकर साबित किया है। कांग्रेस एक संभावनाओं वाली पार्टी हो सकती है, अगर वह पार्टी की तरह बर्ताव करे। अगर वह चापलूसी में लगी रही, तो आने वाले दिन उसके लिए इससे बुरे और हो भी क्या सकते हैं? 

आसमान छूती प्रतिमाओं पर गर न्यूयॉर्क जैसा हमला हुआ तो?

संपादकीय
23 फरवरी 2015

मुंबई से खबर है कि वहां समंदर में बनाए जा रहे शिवाजी-स्मारक के लिए राज्य सरकार ने जेड डबल प्लस सुरक्षा तय की है। करीब दो हजार करोड़ से बन रही 190 फीट ऊंची इस प्रतिमा को महाराष्ट्र की जनता की भावनाओं से जोड़कर देखा जा रहा है। एक तरफ गुजरात में सरदार पटेल की प्रतिमा के लिए केंद्र सरकार ने 3 हजार करोड़ से अधिक मंजूर किए हैं, दूसरी तरफ मुंबई में यह स्मारक बन रहा है। आज ही सरकार को ऐसी आशंका है कि मुंबई पर हुए आतंकी हमलों की तरह का कोई हमला इस स्मारक पर हो सकता है, और उसके लिए बहुत लंबे-चौड़े सुरक्षा इंतजाम किए जाएंगे, जिनमें रडार लगाना भी शामिल होगा।
हमने न्यूयॉर्क पर हुए आतंकी हमलों को देखा है जिनमें आत्मघाती विमान जाकर विश्व व्यापार केंद्र की इमारतों से टकराए थे, और उन इमारतों को मिट्टी में मिला दिया था। अब आतंकी हमले तो आतंकी हमले होते हैं, वे किसी नियम-कायदे के मुताबिक नहीं होते। अब अगर गुजरात या मुंबई के ऐसे स्मारकों पर ऐसा कोई हवाई हमला होता है, तो कैसी नौबत बनेगी? चौबीसों घंटे तो इमारतों की निगरानी उस तरह से नहीं हो पाएगी जिस तरह किसी परमाणु बिजलीघर की होती है, या दिल्ली में राष्ट्रपति भवन से लेकर संसद तक पर हवाई हमले की आशंका के मुताबिक तैयारी रखी जाती है। स्मारकों पर न तो ऐसा खर्च जायज होगा, और न ही स्मारकों को बनाने में लगने वाले हजारों करोड़ जायज हैं। किसी की स्मृतियों को आगे बढ़ाने की सबसे अच्छी तरकीब उनकी याद में जनता की जरूरत के ऐसे केंद्र विकसित करना हो सकता है जिससे सबसे गरीब और बेबस को इलाज या पढ़ाई मिल सके। प्रतिमाओं से किसी के नाम रौशन नहीं होते, और न ही जनता का पैसा किसी के स्मारक पर खर्च करना चाहिए। फिर यह भी है कि आज जो पार्टी सत्ता में है, वह अपने पसंद के लोगों की आसमान छूती प्रतिमाएं बना रही है, और लोकतंत्र में आती-जाती दूसरी पार्टियां आने वाले कल को अपनी पसंद की प्रतिमाएं बनाने लगेंगी। उत्तरप्रदेश में मायावती ने अपने कार्यकाल में हजारों करोड़ की जमीन पर कोई हजार करोड़ से बाबा साहब अंबेडकर, कांशीराम, बसपा के चुनाव चिन्ह हाथी, और अपनी खुद की ऐसी प्रतिमाएं बनवाईं जिनका सालाना रखरखाव ही करोड़ों का है। अब कल के दिन मोदी को अपनी खुद की ऐसी प्रतिमा बनवाने से कौन सा कानून रोक सकता है? क्या कोई यह सोच सकता है कि ऐसा कोई मौका तमिलनाडु में जयललिता के समर्थक छोड़ देंगे? और मुलायम सिंह यादव के लोग पांच सौ फीट ऊंची साइकिल पर हजार फीट के मुलायम को बिठाकर ताजमहल की टक्कर का स्मारक बनाने की कोशिश नहीं करेंगे? यह मुकाबला जनता के पैसों से चलेगा, और गुजरात और महाराष्ट्र ये दोनों राज्य बहुत बड़े आदिवासी इलाकों में भयानक कुपोषण के सरकारी रिकॉर्ड वाले हैं। ऐसे में अपनी आने वाली पीढ़ी को मरने के लिए छोड़कर गुजर चुके लोगों का सम्मान बढ़ाने के लिए प्रतिमाएं बनवाना, सम्मान बढ़ाना नहीं है।
हमने पहले भी जनता के पैसों से प्रतिमाओं के खिलाफ लिखा था, और आज भी ऐसी आसमान छूती प्रतिमाओं पर आतंकी खतरों को देखते हुए हम यह सोचते हैं कि कल के दिन अगर कोई हमला ऐसी प्रतिमाओं को नुकसान पहुंचाएगा, तो क्या सरकार फिर से उस जगह पर वैसी ही प्रतिमा बनाएगी? ऐसा सिलसिला अगर शुरू हुआ तो भारत के किसी दुश्मन के लिए यह मजे की बात रहेगी कि वह भारत की जनता के पैसों को बार-बार ऐसे ही खर्च करवाए।
 

गोपनीय जानकारी की चोरी कंपनियों के सिर्फ मुलाजिम नहीं, मालिक भी मुजरिम

संपादकीय
22 फरवरी 2015

केन्द्र सरकार के मंत्रालयों में जिस तरह से जासूसी का मामला पकड़ाया है, और बड़ी-बड़ी खरबपति कंपनियों के बड़े-बड़े अफसर उसमें शामिल मिले हैं, और उनकी गिरफ्तारी हुई है, वह बात देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए भयानक है। आंतरिक सुरक्षा सिर्फ नक्सलियों से खतरे में नहीं आती, जब इतने बड़े-बड़े आर्थिक भ्रष्टाचार, और जुर्म की तैयारी की है, और इसमें प्रधानमंत्री की पीठ पर हाथ रखने वाले उद्योगपति भी शामिल होते हैं, तो फिर यह समझ नहीं पड़ता कि सरकार की खुफिया जानकारियां देश का भला करेंगी, या फिर इन कारखानेदारों का? 
अभी जो अंदाज बैठ रहा है, उसके मुताबिक पेट्रोलियम मंत्रालय से जो फाइलें और जानकारी चोरी की गई हैं, और जिसके साथ लोग पकड़ाए हैं, वह देश की पेट्रोलियम नीति, और देश के पेट्रोलियम आयात सौदों से जुड़ी हुई हैं, और इनसे देश के करोड़ों-करोड़ के व्यापारिक सौदे जुड़े हुए हैं। अगर सरकार की ऐसी जानकारी धंधेबाजों को मिल रही है जिससे वे सरकार की आने वाली नीति और फैसलों को मालूम करके उसके हिसाब से अपने कारोबारी फैसलों को कर सकते हैं, तो इससे देश का इतना बड़ा नुकसान होता है कि जनता तक देश का फायदा नहीं पहुंच पाता। 
लेकिन एक बात जो थोड़ी सी हैरान करती है, वह यह है कि सीधे प्रधानमंत्री तक पहुंच रखने वाले कारोबारी इस देश में हमेशा से सरकार की नीतियों और सौदों को प्रभावित करते आए हैं। आज मुकेश अंबानी की कंपनी इसमें फंसी है, और इसी मुकेश अंबानी के पिता धीरूभाई अंबानी के बारे में कहा जाता था कि उन्होंने अपना पूरा साम्राज्य इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, प्रणब मुखर्जी, मुरली देवड़ा जैसे कांग्रेस नेताओं और मंत्रियों के मार्फत अपनी मर्जी के फैसले करवाकर खड़ा किया था। इन बातों की हकीकत तो जानना मुश्किल है, लेकिन यह बात भी जाहिर थी कि एनडीए की पिछली सरकार के, और उस वक्त की भाजपा के एक सबसे ताकतवर मंत्री प्रमोद महाजन के बारे में भी यही कहा जाता था कि वे देश के कारोबारियों के सबसे करीबी भाजपा नेता थे, और खुद उनके भाई ने उनकी निजी दौलत के बारे में कहा था कि वह हजार करोड़ से अधिक थी। अब अगर पल भर के लिए यह मान लें कि भाई की कही यह बात सच थी, तो प्रमोद महाजन या वैसे किसी भी दूसरे नेता को कारोबारी हजार करोड़ तो तभी देंगे, जब उनको लाखों या करोड़ों-करोड़ का मुनाफा होगा। इसके अलावा प्रमोद महाजन ने पार्टी के लिए भी पैसे जुटाए होंगे, और उस वक्त की अटल सरकार के कुछ और लोगों ने भी कारोबारियों पर मेहरबानी करके ऐसा किया होगा। 
यह बात न तो नई है, और न ही कांग्रेस और भाजपा तक सीमित है। देश में वामपंथियों को छोड़कर करीब-करीब हर पार्टी की सरकारों में कारोबारियों का ऐसा ही बोलबाला रहता है। इसलिए हमको थोड़ी सी हैरानी होती है कि आज इन कारोबारियों को मंत्रालय के स्तर पर कागजात चोरी करवाने की क्या जरूरत पड़ी थी? एक मजाक यह भी बनता है कि सरकार और कारोबार दोनों ही अपनी इमेज को सुधारने के लिए छोटे-छोटे सिरों की ऐसी कुर्बानी देकर साबित कर रहे हैं कि उनका एक-दूसरे से बहुत अधिक लेना-देना नहीं है। यह सिलसिला बहुत ही खतरनाक है अगर चोरी करवाए बिना सरकारी नीतियों की जानकारी कारोबारियों को रहती है, या फिर वे नीतियां और फैसले, बजट की जानकारी, सौदों की जानकारी, चोरी करवाने की हैसियत रखते हैं। अब जब यह मामला पकड़ में आ ही गया है, तो सवाल यह उठता है कि इन कंपनियों के बड़े अफसर सरकार से गोपनीय जानकारी की चोरी अपने घर के लिए तो करवा नहीं रहे थे, अपनी कंपनियों के लिए ही करवा रहे थे। और आज सरकार के भीतर ऐसा कानून बनने जा रहा है, या शायद बन चुका है, कि किसी कंपनी के लोग अगर रिश्वत देते पकड़ाते हैं, तो उनको सिर्फ निजी रूप से गुनहगार नहीं माना जाएगा, और कंपनियों के डायरेक्टर भी मुजरिम माने जाएंगे। जो बात रिश्वत देने पर लागू होती है, वही बात इस तरह की खुफिया जानकारी की चोरी पर भी लागू होती है। अब यह देखना है कि सुप्रीम कोर्ट इन दो बातों को जोड़कर देखता है या नहीं, और इसे लेकर कुछ जनसंगठनों को सुप्रीम कोर्ट जाना जरूर चाहिए। 

कोयले से होती कमाई साबित कर रही है मनमोहन सिंह के जुर्म

संपादकीय
21 फरवरी 2015

कोयले की नीलामी में देश को जितनी रकम मिलते दिख रही है, उससे यूपीए सरकार के वक्त के सीएजी विनोद राय का अंदाज सही साबित होते दिख रहा है। अगर देश के कोयला खदानों से जनता के खजाने में लाखों करोड़ रूपए आ रहे हैं, तो यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार और कुकर्मों को छुपाते हुए जिस मजाक के अंदाज में उसके मंत्री कपिल सिब्बल ने शून्य-नुकसान का फार्मूला सामने रखा था, उसे पत्थर पर खोदकर सिब्बल के बंगले के गेट पर लगाना चाहिए। 
अभी नीलामी बहुत बाकी है, और यह साबित होते चल रहा है कि यूपीए सरकार के समय पसंदीदा लोगों को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के स्तर पर जिस तरह से खदानों की बंदरबांट हुई थी, वह मनमोहन सिंह सहित तमाम लोगों को कटघरे में पहुंचाने के लिए काफी है। हमारे पाठकों को याद होगा कि पिछले चार बरसों में जैसे-जैसे दूरसंचार घोटाला, या कोयला घोटाला सामने आने लगे थे, और इनमें प्रधानमंत्री कार्यालय की साफ भूमिका दिख रही थी, उसके चलते हुए हमने बार-बार लिखा था कि मनमोहन सिंह को अदालती कटघरे में होना चाहिए। किसी गिरोह का सरगना सारे जुर्म देखते हुए अनदेखा करने और चुप रहने की रियायत नहीं पा सकते। मनमोहन सिंह की निजी सज्जनता को काबिलीयत गिनना बेवकूफी की बात है। सरकार के मुखिया को सज्जन तो होना ही चाहिए, उसमें चर्चा की कोई बात नहीं है, लेकिन इसके साथ-साथ मुखिया को अपने मातहत लोगों के जुर्म सामने आने पर उनके खिलाफ कार्रवाई करने का हौसला भी रहना चाहिए। इस पैमाने पर मनमोहन सिंह एक खासे बड़े मुजरिम हैं, और मोदी सरकार हो सकता है कि उनको राजनीतिक निशाना बनाकर सोनिया-परिवार की तरफ से ध्यान बंटाना न चाहे, लेकिन फिर भी अदालत खुद इस बारे में सोच सकती है, और लोगों को अदालती मामले में दखल की इजाजत लेकर यह मांग भी करनी चाहिए। 
हिन्दुस्तान का इतिहास सोने की एक ऐसी चिडिय़ा रहा है जिसमें खदानों से लेकर जनता की जमीन तक राजाओं के हाथ से निकलकर सरकार के हाथ आई थी, और वह जनता के लिए इस्तेमाल होने वाली थी। बाद के बरसों में सरकार हांक रहे लोग सोने की इस चिडिय़ा के पंख नोंच-नोंचकर अपने घर भरते गए, और कोयला खदानों को पूरी जिंदगी के लिए मिट्टी के मोल बांट देने की साजिश सोने का अंडा देने वाली मुर्गी का पेट चीर देने जैसा काम था। एक बार यह नीलामी पूरी हो जाए, उसके बाद कोयले के बचे हुए चूरे से यूपीए सरकार के जिम्मेदार लोगों का मुंह काला किया जाना चाहिए। आज अगर अदालती कड़ाई से और सरकार के रूख से यूपीए के प्रधानमंत्री से लेकर बाकी बहुत से लोग अगर जेल भी जाते हैं, तो उसे राजनीतिक-बदले का काम नहीं मानना चाहिए। सत्ता की दलाली, और जनता को, देश को लूटना बंद होना ही चाहिए। हर सरकार अगर राजनीतिक बदनामी से बचने के लिए पिछली सरकार  के जुर्मों को अनदेखा करती चलेगी, तो इस देश में कभी जनता को लूटने पर सजा ही नहीं हो पाएगी। हमारा यह मानना है कि सत्ता के मुखिया को अपने किए हुए का दाम चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए। 
मनमोहन सिंह के लिए अब भी मौका है कि खुद होकर वे देश के सामने एक ऐसा श्वेत पत्र सामने रखें, जिसमें वे अपने किए हुए हर गलत काम को कुबूल करें। अगर उनमें जरा भी सज्जनता बाकी है, या उनमें सज्जनता फिर से जिंदा हुई है, तो उन्हें अपने जीते जी देश के सामने लूट की कहानी रखनी चाहिए। बची जिंदगी में थोड़ी-बहुत इज्जत वापिस हासिल करने का उनके सामने यही एक तरीका है, कि जिस तरह ईसाई धर्म में चर्च के प्रायश्चित-स्वीकारोक्ति के कन्फेशन-चेंबर में जाकर लोग अपने पाप कुबूल करते हैं, मनमोहन सिंह को आज इस देश को ही कन्फेशन-चेंबर मानकर अपने किए हुए गलत कामों के लिए सजा या माफी, जो वे चाहें, मांगना चाहिए।

मोदी की अंगे्रजी से जिन कुलीनों को दिक्कत है...

20 फरवरी 2015
संपादकीय
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोगों को चांैकाते हुए समय-समय पर अंगे्रजी में भाषण देना शुरू किया है, और बहुत से लोग इस बात पर हक्का-बक्का हैं कि वे सामने की एक स्क्रीन पर देखते हुए भी जो अंगे्रजी बोल रहे हैं, वह देश के बहुत से नेताओं की अंगे्रजी से बेहतर है, हिन्दी से बेहतर है, और मोदी के आलोचकों की उम्मीदों से बहुत बेहतर है। अब यह चूक सिर्फ अंगे्रजी में नहीं होती बल्कि किसी भी भाषा के साथ हो सकती है कि लोग बोलते हुए कुछ उच्चारण गलत कर जाएं, किसी भाषा के कुछ शब्दों को गलत समझ लें। श्रीलंका के राष्ट्रपति आए तो उनकी पत्नी के नाम के पहले अंगे्रजी में लिखा गया मिसेज को उन्होंने एमआरएस पढ़ दिया, तो इसे लेकर हिन्दी वाले, और अंगे्रजी वाले दोनों ही उनके ऊपर चढ़ बैठे हैं। यह अपनी-अपनी सोच है। अंगे्रजी के लोगों को लगता है कि हिन्दी वाला एक नेता यह दुस्साहस कैसे कर रहा है कि वह अंगे्रजी बोल रहा है, और हिन्दी वालों को यह लग रहा है कि अपनी जुबान छोड़कर यह फिरंगी जुबान बोलना मोदी की हीनभावना से उपजा हुआ है, मोदी की कुंठा से उपजा हुआ है। हिन्दी के एक बड़े लेखक का लिखा एक बड़ा सा लेख हमारे सामने है जिसमें वे इसे मोदी की कुंठा करार दे रहे हैं।
हमारा यह मानना है कि भाषा को किसी सांस्कृतिक गौरव से जोड़कर देखना निहायत गैरजरूरी है। भाषा को बनाया गया था लोगों के बीच बातचीत के एक औजार की तरह। इसका उसी तरह इस्तेमाल भी होना चाहिए, और इसे किसी झूठे राष्ट्रीय या सांस्कृतिक गौरव से जोड़कर देखना उसी तरह का है जिस तरह एक आक्रामक राष्ट्रवाद को कुछ लोग बढ़ावा देते हैं। लेकिन यह पहलू भी आज की हमारी चर्चा का मुख्य मुद्दा नहीं है, इसलिए हम प्रसंगवश की गई इस चर्चा को यहीं छोड़कर आगे मुद्दे की बात पर आना चाहते हैं।
भारत में कई तरह के नेता हुए हैं। ममता बैनर्जी की अंगे्रजी और हिन्दी कुछ भी आम लोग नहीं समझ पाते। कमोबेश ऐसा ही हाल प्रणब मुखर्जी का रहता है। सोनिया गांधी ने बड़ी कोशिश करके हिन्दी के लिखे हुए भाषणों को पढऩा सीखा है, और देश की एक बड़ी आबादी से सीधे बात कर सकती हैं। लेकिन देवगौड़ा जैसे प्रधानमंत्री भी हुए जो कि हिन्दी नहीं बोल पाते थे। चिदंबरम जैसे दक्षिण के बहुत से ऐसे नेता हैं जो पूरी जिंदगी दिल्ली की राजनीति करते हुए भी हिन्दी नहीं सीख पाए। छत्तीसगढ़ में ही विद्याचरण शुक्ल और श्यामाचरण शुक्ल यहीं पैदा हुए और यहीं पंचतत्व में विलीन हुए, लेकिन पौन सदी की अपनी जिंदगी में वे छत्तीसगढ़ी नहीं सीख पाए। ऐसे में अगर नरेन्द्र मोदी अंगे्रजी सीखने की कोशिश करते हैं, तो यह उनके लिए या देश के लिए शर्मिंदगी की बात नहीं है, यह गौरव की बात है कि देश के सबसे बड़े ओहदे पर पहुंचने के बाद भी किसी में कुछ सीखने की हसरत बाकी है। प्रधानमंत्री का कौन सा ऐसा काम है जो कि वे अपनी जुबान में नहीं कर सकते थे। लेकिन इसके बावजूद अगर वे एक नई जुबान में अपना अभ्यास बढ़ा रहे हैं तो हम इसमें मखौल का कोई सामान नहीं देखते। हो सकता है कि देश के कई नेताओं को दून स्कूल जैसे महंगे संस्थानों में अंगे्रजों जैसी अंगे्रजी सीखने का मौका मिला हो। लेकिन दूसरी तरफ चाय बेचने वाले बच्चे को अगर बूढ़ा होकर आज अगर यह मौका मिल रहा है, तो यह कुछ उसी तरह का है कि बुढ़ापे में आकर कोई स्कूल जाने की हिम्मत करे।
किसी की ऐसी कोशिश का मखौल उड़ाना हमारे हिसाब से एक बहुत ही शहरी और शिक्षित, संपन्न और कुलीन तबके का अहंकार है, जो कि यह मानकर चलता है कि अंगे्रजी महज उसकी खानदानी विरासत रहनी चाहिए, और किसी निचले तबके से आए हुए के कानों में अगर अंगे्रजी के शब्द घुस भी जाएं तो उसके कानों में पिघला सीसा उंड़ेल देना चाहिए। हम मोदी की कोशिश की तारीफ करते हैं। हिंदुस्तान की तकरीबन पूरी आबादी ऐसी ही है जिसे कि किसी न किसी दूसरी या तीसरी भाषा को सीखने की कोशिश करनी चाहिए। आज जब इस देश के बड़े-बड़े राष्ट्रीय नेता किसी भी भाषा में अक्ल की कोई भी बात नहीं कर पा रहे हैं, तब अगर प्रधानमंत्री अंगे्रजी सीख रहे हैं, या उसे बेहतर बना रहे हैं, तो यह बात देश की जनता के लिए एक बड़ी पे्ररणा हो सकती है। भाषा के घमंडियों को अपनी आभिजात्य सोच अपने तक सीमित रखनी चाहिए, वंचित तबका इसी तरह धीरे-धीरे, मौका मिलने पर सीख पाता है, उसका हौसला अगर बढ़ाने की सोच न हो, तो कम से कम उसके हौसले को पस्त करने की कोशिश न करें।

राज्य के सरकारी अस्पतालों को तुरंत सुधारने की जरूरत

19 फरवरी 2015
संपादकीय
छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली तक के अखबारों में लगातार खबरें छप रही हैं कि स्वाइन फ्लू के इलाज की दवाओं की किल्लत है, और उसके बचाव के टीके इलाज में लगे हुए डॉक्टरों तक को नसीब नहीं हो रहे हैं। दूसरी तरफ दवा निर्माताओं का कहना है कि सरकारी नियमों की वजह से दवाओं की कमी हो रही है। छत्तीसगढ़ में सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों को भी ये दवाएं नहीं मिल पा रही हैं। इससे अलग कई मौकों पर ऐसी खबरें छपती रहती हैं कि छत्तीसगढ़ के अस्पतालों में कभी एचआईवी के शिकार लोगों को वक्त पर दवा नहीं मिल रही है, तो कभी कुत्तों के काटने से जख्मी होकर पहुंचे लोगों को एंटी-रैबीज दवा नहीं मिल पा रही है। जिंदगी बचाने के लिए जो सबसे जरूरी चीज है, वह एक तो मिल नहीं पा रही, और जैसा कि छत्तीसगढ़ में नसबंदी-मौतों के वक्त सामने आया था, दवाएं ऐसी कंपनियों से आ रही थीं, जो बार-बार ब्लैकलिस्ट होते रहती हैं, और खुद सरकार नसबंदी-मौतों के लिए अपनी ही खरीदी हुई, छत्तीसगढ़ में ही बनी हुई दवा को जहरीला साबित करने में लगी हुई थी। 
अब यह देखें कि छत्तीसगढ़ में बनने वाली दवा के लिए सरकार के ही कई विभाग जिम्मेदार हैं, छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पतालों के लिए दवा खरीदी के लिए सरकार जिम्मेदार है, दवा ठीक है या नहीं, इसकी रिपोर्ट अगर दवा खप जाने के बाद तक नहीं आती है, तो इसके लिए भी सरकार जिम्मेदार है। और सरकारी अस्पतालों में संक्रामक रोगों से लेकर रैबीज तक के लिए अगर दवाएं वक्त पर नहीं हैं, तो उनके लिए भी सरकार ही जिम्मेदार है। इस राज्य के सरकारी अस्पतालों में हाल कुछ ऐसा दिखता है कि वहां इलाज नहीं हो रहा, सड़क किनारे का कोई फुटपाथ बन रहा है, जहां पर कि रेत-सीमेंट चार दिन बाद भी पहुंचे तो भी फर्क नहीं पड़ता। सरकारी अस्पतालों की ऐसी बदहाली का नतीजा रहता है कि लोग निजी अस्पतालों की तरफ जाने को बेबस होते हैं, और उसके लिए कर्ज भी लेने को तैयार रहते हैं। कल की ही खबर है कि प्रदेश के स्वास्थ्य सचिव ने यह पाया कि एक जिले में सरकार की एक अस्पताल-योजना के पैसों का इस्तेमाल ही नहीं हो पाया, और इन पैसों को अब लंबे वक्त बाद दूसरे जिले को दिया जा रहा है।
दरअसल इलाज के काम को सरकार किसी भी दूसरे सरकारी कामकाज की तरह ले रही है। यह प्रदेश खुद सरकार के रिकॉर्ड के मुताबिक आधी आबादी गरीबों वाला है। ऐसे में सरकार चाहे इलाज के लिए लोगों को बीमा कार्ड दे, उससे सरकारी अस्पतालों की जरूरत और जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती। जब राजधानी के मेडिकल कॉलेज से जुड़े हुए प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल की बदहाली की खबरों के बिना एक दिन नहीं गुजरता, तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि गांव-जंगल तक फैले हुए सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में क्या हाल होगा। प्रदेश की जनता यह पा रही है कि सरकार का स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह और बुरी तरह बेकाबू है, और यह नौबत एक विभाग से ऊपर की कार्रवाई जैसी है। राज्य सरकार को तुरंत इस नौबत को सुधारना चाहिए। 

Bat ke bat, बात की बात,

18 feb 2015

Bat ke bat, बात की बात,

15 feb 2015

Bat ke bat, बात की बात,

14 feb 2015

ब्रिटेन-अमरीका से लेकर भारत तक नाबालिग मां-बाप के खतरे

संपादकीय
18 फरवरी 2015
ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने अभी रिसर्च के बाद यह नतीजा सामने रखा है कि किशोरावस्था में ही जब लड़के बाप बनने लगते हैं, तो उनसे होने वाली संतानें कितनी तरह की गंभीर बीमारियों का खतरा लेकर आती हैं। ऐसे ही नतीजे कुछ समय पहले अमरीकी वैज्ञानिकों ने सामने रखे थे। फिर कम उम्र में मां बनने वाली नाबालिग लड़कियों की सेहत पर और उनके बच्चों की सेहत पर कैसा बुरा असर पड़ता है, यह बात बरसों से भारत के वैज्ञानिक और चिकित्सक भी बताते आए हैं। एक तरफ पश्चिम के विकसित देशों में नाबालिग लड़कियां मां बन रही हैं, और भारत के सबसे पिछड़े इलाकों में, आदिवासियों के बीच और गांवों में लगातार बाल विवाह जारी हैं। बहुत से प्रदेशों में सरकारें और सामाजिक संगठन लगातार बाल विवाह रोकने के लिए कोशिश कर रहे हैं, लेकिन पुरानी सामाजिक परंपराएं समझ और अक्ल पर, वैज्ञानिक जानकारियों पर लदकर बैठ जाती हैं, और कम उम्र के बच्चों को मां-बाप बनने की तरफ धकेल दिया जाता है। 
ब्रिटेन जैसे देश एक अलग समस्या से जूझ रहे हैं, और वहां पर स्कूली बच्चे सेक्स शुरू कर देते हैं, और अनचाही संतानों और सेक्स-बीमारियों से उनको बचाने के लिए अब वहां कुछ शहरों में 13 बरस की उम्र से स्कूली छात्र-छात्राओं को मुफ्त कंडोम देना शुरू किया गया है। यह एक बहुत ही विचित्र सामाजिक विरोधाभास है कि दुनिया के सबसे आधुनिक समाज बिना शादी किशोरावस्था में मां-बाप बनते देख रहे हैं, और हिन्दुस्तान मेें सबसे कम शिक्षित, सबसे कम आधुनिक समाज मां-बाप के बनाए हुए दुल्हा-दुल्हन देख रहे हैं। इन दोनों का किसी एक तरह का कोई इलाज नहीं हो सकता, लेकिन भारत में सामाजिक स्तर पर जागरूकता के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। दसियों बरस से बाल विवाह के खिलाफ कानून लागू है, और अदालतों के कई तरह के आदेश भी हैं, लेकिन हालत सुधर नहीं रही है। 
कुछ समाजशास्त्रियों ने अपने सामाजिक अध्ययन में यह भी पाया है कि गरीब मजदूर परिवारों में जहां मां-बाप दोनों ही मजदूरी करने बाहर जाते हैं, वहां पर अकेली लड़की को घर पर छोडऩा सुरक्षित नहीं होता, और इसलिए वे लोग मजबूरी में भी लड़की को बिदा कर देना चाहते हैं। फिर कई समाजों में सामाजिक रीति-रिवाज हावी हैं, और कानून के खिलाफ जाकर, गिरफ्तारी का खतरा झेलकर भी हर बरस अक्षय तृतीया पर राजस्थान में दसियों हजार बाल विवाह एक दिन में ही हो जाते हैं। छत्तीसगढ़ में भी कवर्धा के इलाके में बैगा आदिवासियों के बीच बाल विवाह की एक मजबूत परंपरा है, और सरकार-सामाजिक कार्यकर्ता मिलकर भी तस्वीर को बदल नहीं पा रहे हैं। 
हम खालिस वैज्ञानिक नजरिए से देखते हैं तो लगता है कि जो समाज शादी के बाद या शादी के पहले कम उम्र के बच्चों को मां-बाप बनाता है, या बनते देखता है, वह समाज एक बड़े मेडिकल खतरे को बढ़ाते चलता है। पश्चिम के देश इस दिक्कत को अपने नजरिए से देखें, क्योंकि वहां पर सामाजिक समस्याएं अलग हैं। दूसरी तरफ भारत में इसे सामाजिक रीति-रिवाज से बाहर निकालकर, मां-बाप की मेडिकल-जानकारी बढ़ाकर बच्चों को बचाना चाहिए। 

ईश्वर के नाम पर जमा का इस्तेमाल जरूरतमंद के लिए

17 फरवरी 2015 
संपादकीय
भारत में किसी भी धर्म का त्यौहार हो, उससे जुड़े लोगों का उत्साह देखते ही बनता है। लोग काम छोड़कर, नियम-कायदों का सम्मान छोड़कर त्यौहार मनाने में लग जाते हैं। चारों तरफ सड़कों पर त्यौहार का कब्जा हो जाता है, और उपासना की जगहों पर खासा चढ़ावा आता है। बहुत बरसों से हमेशा यह लिखा जाता है कि ईश्वर पर चढ़ाया जाने वाला प्रसाद, उस पर चढ़ाया जाने वाला दूध, गरीब और भूखे, कुपोषण के शिकार बच्चों को क्यों नहीं दिया जाता? मंदिरों से निकलकर दूध नालियों में चले जाता है, और धार्मिक मान्यता के मुताबिक ईश्वर के ही बनाए हुए बच्चों को ऐसा दूध उनकी असल जिंदगी में नसीब नहीं होता। 
हिंदुस्तान में बहुत से धर्मों के लोगों के हाथों से पैसे धर्म के नाम पर ही निकलते हैं। मंदिरों में दान पेटियां भरती हैं, और अभी-अभी दक्षिण भारत के एक मंदिर के खजाने की जांच करने के बाद भारत के सीएजी रहे विनोद राय ने यह रिपोर्ट दी है कि इस चर्चित मंदिर से सैकड़ों किलो सोना गायब हो गया है। पद्मनाभस्वामी मंदिर से 266 किलो सोना गायब होना छोटी बात नहीं है, लेकिन यह सोना ईश्वर तो नहीं ले गया, उसके नाम पर इक_ा हुआ, और गायब कर दिया गया। अब यह सोना इतने दाम का होता है कि इससे लाखों बच्चों का खाना हो सकता है। लेकिन इसे ईश्वर के नाम पर जुटाकर उसके भक्त बने लोग खा बैठे।
ऐसा ही मठ-मंदिरों की जमीन-जायदाद का होता है, वक्फ की जमीनों का और इमारतों का होता है, चर्च की जमीनों का होता है। इसी छत्तीसगढ़ के रायपुर में जमीन माफिया ने चर्च की जमीनों को खरीद लिया, और मामला अदालत में चल रहा है। लोगों ने सैकड़ों बरस से धर्म के नाम पर दान किए थे, और उनको लोग लूट खा रहे हैं। इन सबके बीच ईश्वर एक मूक गवाह बने रहता है। कुल मिलाकर साबित यही होता है कि अगर उसके नाम पर काम करने वाले इंसान अच्छे हैं, तो दान का अच्छा इस्तेमाल हो सकता है। लेकिन हमारा अनुभव यह रहा है कि दुष्ट लोग ही समाज में दान की लूटपाट अधिक करते हैं, और भूले-भटके ही उसका इस्तेमाल जरूरतमंद गरीबों के लिए हो पाता है।
जब कभी धर्मस्थलों की कमाई पर सार्वजनिक या सरकारी नियंत्रण की बात आती है, तो उस धर्म से जुड़े हुए लोगों को विरोध में खड़ा करवा दिया जाता है और वोटों के लिए डरे हुए नेता कभी कड़वे फैसले नहीं लेते। हमारा यह भी मानना है कि जब कभी दान के इस्तेमाल पर लोगों को भरोसा होता है, तो वे खुलकर दान भी देते हैं। इसलिए सरकार के सभी धर्मों की जमीन-जायदाद, कमाई, इन सब पर जनता का नियंत्रण रखने के लिए इस पर सरकारी अधिकारी, और संबंधित धर्म के लोगों की मिलीजुली कमेटी बनानी चाहिए। कुछ-कुछ मामलों में अभी ऐसे ट्रस्ट हैं भी, लेकिन बिना किसी फर्क के, सबके साथ एक जैसा सुलूक होना चाहिए, और ईश्वर के नाम पर जमा पैसों का जरूरतमंद जनता के लिए इस्तेमाल होना चाहिए।

छत्तीसगढ़ में सरकारी भ्रष्टाचार सरकारी मंजूरी से ही जारी

संपादकीय
15 फरवरी 2015

छत्तीसगढ़ में चावल के कारोबार में सरकार का सबसे बड़ा हिस्सा रहता है। धान खरीदी से लेकर धान के परिवहन तक, और फिर उसे गोदामों में रखने से लेकर, धान की मिलिंग तक, फिर चावल के परिवहन और उसे गोदाम में रखने से लेकर राशन दुकानों तक पहुंचाने और उसे जनता को देने में हर बरस दसियों हजार करोड़ का काम होता है। इतनी बड़ी रकम छत्तीसगढ़ के किसी दूसरे काम में नहीं लगती। और यह राज्य सरकार की सबसे बड़ी सब्सिडी भी है। राज्य के भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो ने जिस अंदाज में पहले सिंचाई विभाग में रिश्वत की नगदी के साथ बहुत से अफसरों को पकड़ा, और उसके बाद अब जिस तरह नागरिक आपूर्ति निगम और खाद्य विभाग में भयानक भ्रष्टाचार, कमीशन, और ऊपर तक रिश्वत की रकम पहुंचाने के रिकॉर्ड के साथ सरकारी दफ्तर से करोड़ों रूपए नगदी की जब्ती की है, उससे लोगों की यह धारणा सही साबित होती है कि छत्तीसगढ़ सरकार में लोग भयानक भ्रष्टाचार में लगे हुए हैं। खुद सत्तारूढ़ भाजपा के नेता यह कहते नहीं थकते कि उनकी पार्टी की सरकार में किस कदर बेकाबू भ्रष्टाचार है। 
अब यह भ्रष्टाचार तो मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की सबसे पसंदीदा और प्रतिष्ठा सूचक अनाज की योजना में है। तो इससे यह जाहिर है कि बाकी विभागों में भ्रष्टाचार का क्या हाल होगा। पाठकों को याद होगा कि कुछ ही महीने पहले जब बिलासपुर में स्वास्थ्य मंत्री के अपने जिले में सरकारी नसबंदी कैम्प में डेढ़ दर्जन महिलाओं की मौत हुई, तो तब से लेकर अब तक सरकार में बैठे लोग इसी बात पर घुमा-फिराकर बचने की कोशिश कर रहे हैं कि वह कैम्प एक डॉक्टर ने नियमों से परे लगा दिया था, कभी सरकार कहती है कि सरकारी खरीद की दवा जहरीली थी, कभी कुछ और कहती है। इस तरह अलग-अलग बातों को करके मामले की गंभीरता को कम करने की कोशिश की गई, लेकिन सरकार की मासूमियत पर किसी को भरोसा न हुआ, न उसकी कोई वजह है। इसी तरह जब सिंचाई अफसरों के पास करोड़ों की नगदी बरामद हुई, तो भी लोग इतनी बड़ी रकम देखकर चौंके। लेकिन अभी नागरिक आपूर्ति निगम में जिस अफसर के पास से करीब दो करोड़ रूपए नगद बरामद किए गए, उस अफसर का पुराना रिकॉर्ड भी बड़ा शानदार है। कुछ बरस पहले उसे रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा गया था, और उसके बाद से आज तक उसके खिलाफ मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं दी गई। अगले बरस इस रंगे हुए हाथ को रंगने के दस बरस पूरे हो जाएंगे, और यह उम्मीद है कि तब तक भी सरकार इसके खिलाफ मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं देगी। रिश्वत लेते हुए पकड़ाने के बाद उसे ऐसी कुर्सी पर बिठाया गया जहां पर कि वह लाखों के बाद अब सैकड़ों करोड़ की रिश्वत जुटा सके, और उसे ऊपर बांट भी सके। 
छत्तीसगढ़ में सरकार की यह भयानक हालत है कि एक से एक परले दर्जे के भ्रष्ट अफसर कमाऊ कुर्सियों पर बैठकर राज्य सरकार के बड़े-बड़े खर्चीले फैसले करते हैं, और उनके खिलाफ मुकदमे की इजाजत की फाइलें दीमक का इंतजार करते पड़ी रहती हैं। यह नौबत बदलनी चाहिए। कुछ नमूनों को लेकर अगर कोई अदालत चले जाए तो हो सकता है कि वहां से राज्य सरकार को नोटिस भी जारी हो जाए कि दस-दस बरस तक मुकदमे की इजाजत अगर देना ही नहीं है, तो फिर भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करने वाले दफ्तरों को बंद क्यों नहीं कर दिया जाता? इस राज्य में तो वन विभाग के बड़े-बड़े घोटालाबाज अफसर वन विभाग के बाहर भी सरकार की बड़ी-बड़ी कुर्सियों को सम्हाल रहे हैं, जांच में कुसूरवार पाए जाने के बाद भी प्रमोशन पा रहे हैं, और उनके मुकदमे उनकी जिंदगी में कभी शुरू नहीं हो सकेंगे। 
यह नौबत बहुत ही शर्मनाक है, और खुद सरकार का एक कड़क अफसर भ्रष्टाचार विरोधी कुर्सी पर आने के कुछ हफ्तों के भीतर ही बड़े-बड़े संगठित भ्रष्टाचार को इस तरह से पकड़कर सामने ला रहा है, तो उससे यह जाहिर है कि भ्रष्टाचार को पकडऩे के लिए किसी परमाणु-फार्मूले की जरूरत नहीं है, सिर्फ नीयत की जरूरत है। और सिर्फ पकड़ लेने से कुछ नहीं होता, सरकार जब मुकदमे की इजाजत नहीं देती, तो उसका बड़ा सीधा मतलब होता है कि भ्रष्टाचार को जारी रखना। अब इतने बड़े-बड़े मामले पकड़ाने के बाद सरकार को अपनी नीयत साफ करनी चाहिए। 

छत्तीसगढ़ सरकार आसाराम के हुक्म पर अमल के बारे में एक बार फिर सोचे...

विशेष संपादकीय
14 फरवरी 2015
सुनील कुमार
कुछ बरस पहले राजिम कुंभ में आए हुए आसाराम ने सरकार के आसमान छूते अतिथि सत्कार के बीच मंच से ही सरकार से कहा था कि चौदह फरवरी के वेलेंटाईन-डे की जगह छत्तीसगढ़ सरकार को मातृ-पितृ दिवस मनाना चाहिए, और इस दिन राज्य के बच्चे मां-बाप की पूजा करें। उस समय आसाराम, बापू भी कहलाते थे और उनके सितारे बुलंद थे। देश भर में वे जगह-जगह राजकीय अतिथि बनाए जाते थे, और उनकी कही बात बड़े-बड़े नेता सिर-आंखों पर लेते थे। नतीजा यह हुआ कि सभी लोगों के बीच पे्रम के एक त्यौहार को बुलडोजर से कुचलते हुए इस तरह उसे नौजवानों या प्रेमी जोड़ों से परे कर दिया गया कि मानो नौजवानों के बीच पे्रम के बिना भी यह दुनिया आगे बढ़ती रहेगी। उस वक्त किसी को यह अंदाज नहीं था कि मोटे तौर पर नौजवानों के बीच मनाया जाने वाला यह पे्रम-पर्व खत्म करवाने वाले आसाराम से कुछ बरसों के भीतर ही बापू नाम का तमगा भी छिन जाएगा, और वह आदमी बलात्कार का आरोपी आसाराम होकर रह जाएगा।
अब मुद्दे की बात पर आएं, तो जो आसाराम नौजवानों के बीच पे्रम के खिलाफ जल्लाद बनकर खड़ा हो गया था, वह खुद अपने एक शिष्य परिवार की नाबालिग बच्ची के साथ बलात्कार के आरोप झेल रहा है। कहां गया मातृ-पितृ दिवस पर उनकी पूजा करने का सिद्धांत? और जिनको मां-बाप की पूजा करनी होती है, उनको इसके लिए सालाना किसी एक दिन की जरूरत नहीं पड़ती। आसाराम जब पैदा भी नहीं हुआ था उसके भी सैकड़ों-हजारों बरस पहले से भारतीय संस्कृति माता-पिता के सम्मान की नसीहत देते आई है। और आसाराम की पीढ़ी के बच्चे भी श्रवण कुमार की वह कहानी पढ़ते हुए बड़े हुए थे जिनमें अपने मां-बाप को तीर्थयात्रा करवाने के लिए एक नौजवान उन्हें कांवर पर लेकर पूरा देश घूमता है। और उस नौजवान ने तो किसी नाबालिग से बलात्कार भी नहीं किया था। और उस नौजवान के खिलाफ ऐसा कोई पुलिस केस भी नहीं था जिसके गवाह एक-एक करके कत्ल कर दिए जाएं। 
जिस आसाराम के कहे छत्तीसगढ़ में सरकार ने नौजवानों के पे्रम के प्रतीक इस दिन को पश्चिमी संस्कृति का मानते हुए इसे खत्म करने का सरकारी फैसला लिया था, वही आसाराम अपने से दो पीढ़ी छोटी बच्ची के साथ बलात्कार के मामले में कई वेलेंटाईन-डे जेल में गुजार चुका है, और इस बात की पूरी-पूरी संभावना है कि अगले कई मातृ-पितृ दिवस वह जेल में काटे। दरअसल पश्चिमी बुनियाद का होने की वजह से पे्रम के एक प्रतीक को जिस नफरत के साथ भारत की साम्प्रदायिक ताकतें देखती हैं, और मां-बाप के प्रति श्रद्धा को जिस तरह से नौजवान पे्रम का विकल्प मान लिया गया, वह बहुत तात्कालिक सोच से उपजा हुआ फैसला था। यह समाजशास्त्रीय और मानवीय नजरिए से एक बहुत ही अव्यवहारिक सोच थी, और है, कि किसी एक से पे्रम किसी दूसरे से पे्रम का विकल्प हो सकता है। कल के दिन कोई एक दूसरा आसाराम यहां आकर कहे कि भाई-बहन के पे्रम की वजह से मां-बाप की उपेक्षा होती है, इसलिए राखी और भाईदूज को खत्म करके उसे भी मातृ-पितृ दिवस बना दिया जाए, तो छत्तीसगढ़ की सरकार क्या करेगी? 
दरअसल जिंदगी में अलग-अलग रिश्तों का अलग-अलग महत्व होता है। जो लोग यह मानते हैं कि हमउम्र नौजवान लोगों के बीच पे्रम के बिना भी अगली पीढ़ी आगे बढ़ सकती है, वे लोग जीवन के पे्रम का शायद कभी अनुभव नहीं कर पाए। लेकिन ऐसे लोगों को अपने मां-बाप से भी पूछना चाहिए कि क्या उनके बीच कभी पे्रम रहा, या फिर जीवविज्ञान में लिखे गए शारीरिक-संबंधों से ही अगली पीढ़ी उपज गई? जीवन को प्रभावित करने वाले, निजी स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाले फैसले जब आसारामों के हुक्म पर सरकारें लागू कर देती हैं, तो जीवन में पे्रम की कमी नफरत और हिंसा को जगह दे देती हैं। पे्रमी जोड़े कहीं आत्महत्या करने लगते हैं, तो चारों तरफ वे कुंठा में जीने का मजबूर भी रहते हैं। वेलेंटाईन-डे पर बाग-बगीचों में साम्प्रदायिक और हिंसक मवालियों पर रोक लगनी चाहिए, लेकिन इस वक्त छत्तीसगढ़ के बाग-बगीचों में हथियारबंद पुलिस पे्रम जोड़ों को इस तरह से रोक रही है कि मानो वे बगीचे में बैठकर पे्रम की ऐसी साजिश रच लेंगे कि जिससे भारतीय संस्कृति को धमाके के साथ उड़ा दिया जाएगा। 
छत्तीसगढ़ सरकार को कम से कम यह भी सोचना था कि यह देश कृष्ण की रासलीला का देश है, और गोपियों से उनके पे्रम का देश भी है। संस्कृत से लेकर इस देश की लोकभाषाओं तक कृष्ण के पे्रम का वर्णन एक समंदर जितना है। इस देश में कामशास्त्र गढ़ा गया था जो कि दुनिया के इतिहास में सेक्स का और पे्रम का सबसे बड़ा गं्रथ माना जाता है। इस देश का कालिदास से लेकर अब तक का साहित्य, लोकसाहित्य, सब कुछ इस देश में पे्रम और श्रृंगार से भरे हुए हैं। इस देश में खजुराहो की दीवारों पर पे्रम और सेक्स को इस तरह उकेरा गया है कि जिसे देखने पूरी दुनिया से लोग आते हैं। और वहीं की बात क्यों कहें, छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के बगल में देवबलौदा का छोटा सा मंदिर है जहां पर सैकड़ों बरस पहले सेक्स की प्रतिमाएं गढ़ी गई थीं। उस वक्त आज के ये हिंसक-साम्प्रदायिक संगठन अगर होते, तो दीवारों पर पत्थरों में उकेरे गए पे्रम जोड़ों को अपनी लाठियों से नहीं पीट पाते, उनको पीटने के लिए हथौड़े और घन लगते। आज जब ऐसे हिंसक संगठन पे्रमी जोड़ों को यह हिंसक और आपराधिक धमकी देते हैं कि वेलेंटाईन-डे पर वे साथ दिखे, तो उनकी जबरिया शादी करा दी जाएगी, तो सरकारी चुप्पी ऐसी हिंसा को बढ़ावा ही देती है। इस तरह की हिंसक और साम्प्रदायिक बातें लोगों के मन में एक हिकारत पैदा करती हैं, और दिल्ली के चुनावों में भाजपा को जिन बातों का खामियाजा भुगतना पड़ा, उनमें से इस किस्म की साम्प्रदायिक-हिंसा की बातें भी रहीं। नौजवान पीढ़ी की स्वाभाविक शारीरिक-भावनात्मक जरूरतों को कुचलने का दाम हर जगह चुकाना पड़ेगा।
सरकार को तंगनजरिए से आनन-फानन लिया गया यह फैसला खुद होकर खारिज करना चाहिए। और अब तो आसाराम ने भी यह साबित कर दिया है कि अपने से दो पीढ़ी छोटी नाबालिग लड़की की देह से कितना पे्रम किया जाता है। धर्म और आध्यात्म के ऐसे लबादे ओढ़कर जो लोग बच्चियों से बलात्कार करते हैं, उनको कौन सा नैतिक हक है कि वे बालिग जोड़ों को भी एक प्राकृतिक और स्वाभाविक पे्रम से रोकें? और सरकार को भी ऐसे पाखंडी के हुक्म को मौके पर ही मानकर एक सरकारी फैसला नहीं लेना चाहिए था। हमने इस फैसले के तुरंत बाद ही यही बात लिखी थी, और उस वक्त तो आसाराम, बापू भी था।

बुनियादी मुद्दों से कतराते और बेमतलब बातों में उलझाते लोग

संपादकीय
13 फरवरी 2015
सार्वजनिक जीवन में रोज ऐसी कई खबरें आती हैं जिनको लेकर उनसे जुड़े हुए लोग यह सवाल उठाते हैं कि इनके पीछे नीयत क्या है? किसी नेता या अफसर का स्टिंग ऑपरेशन होता है, और उसमें वे रिश्वत लेते या कोई गलत बात करते पकड़ाते हैं, तो सवाल उठने पर उनका जवाब होता है कि इसे ठीक चुनाव के पहले क्यों उठाया गया, इसे उनके प्रमोशन के वक्त पर क्यों उठाया गया? कारोबार पर सरकारी कार्रवाई होती है, तो भी बहुत से लोग उसके पीछे की वजहों को गिनाने लगते हैं कि यह कार्रवाई राजनीतिक बदले की भावना से की गई। जब लोग दूसरों पर हमला बोलते हैं, दूसरों पर आरोप लगाते हैं, या कीचड़ उछालते हैं, तो उनका तर्क होता है कि इन बातों में दम है। और हमले के शिकार लोग नीयत और वक्त का सवाल जवाब की तरह सामने रखते हैं। 
हमारा यह मानना है कि जवाबदेही की सार्वजनिक जगहों पर जो लोग रहते हैं, उन्हें सुबूतों से ऊपर जाकर नीयत के सवाल खड़े नहीं करने चाहिए। रोज टीवी पर बहुत से लोगों की प्रतिक्रिया देखने मिलती है, जिनमें वे सवालों के जवाब देने से बचते हुए कभी जनता की अदालत में जाने की बात करते हैं, कभी कानून की अदालत में जाने की, और कभी विरोधी की नीयत पर सवाल उठाते हैं। लेकिन मुद्दे की जो बुनियादी बात रहती है, उसका सीधा-सीधा और ठोस जवाब देने से कतराते हैं, और मीडिया भी पता नहीं क्यों अक्सर उस कोने तक उनको घेर नहीं पाता। जबकि होना यह चाहिए कि बात ठोस मुद्दे की हो। जो मामला बहस या विवाद का केन्द्र है, उस पर चुप रहकर किनारे-किनारे की बातों के पीछे छुपकर निकलने की सहूलियत सार्वजनिक जीवन के लोगों को नहीं मिलनी चाहिए। इसी कॉलम में हम कुछ बार एक लाईन लिख चुके हैं कि तू इधर-उधर की बात न कर, ये बता कि काफिला क्यों लुटा...। 
पिछले दिनों छत्तीसगढ़ की एक कन्या छात्रावास में लड़कियों के साथ बदसलूकी का एक मामला सामने आया, जिस पर जिम्मेदारी साबित होने पर लंबी कैद हो सकती है। इस बारे में जब जिम्मेदार बड़े ओहदों वाले लोगों से पूछा गया, तो उनका जवाब काफी दूर तक इस पर टिका रहा कि ऐसे आरोप लगाने वाले लोगों की नीयत क्या है, वहां आसपास किस तरह का टकराव चलते रहता है, कैसी राजनीतिक-कीचड़बाजी वहां पर आम है। लेकिन छात्राओं के साथ ऐसा हुआ है या नहीं, उस पर जवाब के लिए घेरते-घेरते कुछ मिनट लग गए। यह रूख भारत में बड़ा आम है, और मीडिया के अच्छे-खासे, अपने आपको तेज-तर्रार साबित करने की कोशिश करने वाले लोग भी केक के ऊपर की खासी मोटी रंगीन सजावट में उलझकर रह जाते हैं, और इस सतह को पार करके तह तक नहीं पहुंच पाते। 
हमारा मानना है कि सार्वजनिक जीवन की तमाम जवाबदेही की जगहों को बहुत साफ-साफ जवाब देने के लिए घेरना ही चाहिए। और यह काम जरूरी नहीं है कि अकेले मीडिया करे, आज तो सोशल मीडिया आम लोगों के हाथ है, और वहां पर लोगों को घेरा ही जा सकता है। खासकर ऐसे लोगों को जो कि जनता के पैसों पर तनख्वाह पाते हैं, या कि राजनीतिक-सामाजिक संगठनों के हैं, जो कि सरकार से टैक्स रियायत पाते हैं। किसी की नीयत या नीयत के इस्तेमाल का मौका, कभी भी असल मुद्दे से अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो सकता। इसलिए बेमतलब बातों को रोकते हुए लोगों को सीधे मुद्दे के सवाल करने चाहिए। 

Bat ke bat, बात की बात

11 feb 2015

Bat ke bat, बात की बात,

10 feb 2015

जमीनों का जबरिया अधिग्रहण हिंसा का कारण न बन जाए...

संपादकीय
12 फरवरी 2015

झारखंड के नक्सलियों ने केन्द्र सरकार के भूमि अधिग्रहण कानून के खिलाफ पटरियां उड़ाई हैं, और दूसरी तरफ गांधीवादी नेता अन्ना हजारे ने इसके खिलाफ आंदोलन की घोषणा की है। देश के बहुत से सामाजिक संगठन वैसे भी इसके खिलाफ चल रहे हैं, और कारखानेदारों, नेताओं, और बड़े अफसरों का एक तबका ही किसानों और आदिवासियों की जमीनों को हर हाल में लेकर खदानों और कारखानों के लिए देने का हिमायती है, और इससे देश के कई और हिस्सों में एक सामाजिक-आर्थिक तनाव खड़ा हो सकता है। आज भी जिस नक्सल खतरे को देश का सबसे बड़ा आंतरिक खतरा बतलाया जाता है, वह नक्सल आंदोलन आर्थिक-सामाजिक शोषण के अंतहीन सिलसिले के एक हिंसक जवाब की शक्ल में खड़ा हुआ, और आज आधा दर्जन राज्यों पर छा गया है। अभी जिन इलाकों में कारखानों के लिए और खदानों के लिए जमीन को जबर्दस्ती लिया जाएगा, उनमें अधिकतर जमीनें आदिवासियों और गरीब किसानों की होंगी, जिनका अपनी जमीन से बेदखल होने का मतलब एक किस्म से जिंदगी से बेदखल होना ही हो जाएगा। जमीन के भाव को बाजार भाव से कुछ अधिक रखकर लेने को सरकार काफी मान लेती है। लेकिन यह पैसा एक बार आता है, और फिर न जाने किस-किस किस्म के गैरउत्पादक पारिवारिक और सामाजिक कामों में खत्म हो जाता है। अपनी जमीन खोए हुए किसान अधिकतर तो फटेहाल हो जाते हैं, और यह बेदखली उसके लिए जानलेवा होती है।
बाजार भाव का कोई पैमाना किसी की जमीन को जबर्दस्ती लेने के लिए काफी नहीं होना चाहिए। सरकार को, केन्द्र सरकार को, और राज्य सरकारों को भी कारखानों के लिए जमीनों की शिनाख्त करते हुए वहां पड़ी हुई बंजर जमीन को देखना चाहिए कि उन पर किस तरह से औद्योगिक केन्द्रों की, और उद्योगों की योजनाएं बन सकती हैं। दूसरी बात यह कि किसान के लिए जमीन लेने पर एक पर्याप्त पेंशन का इंतजाम भी होना चाहिए जो कि उसकी मौत तक जारी रहे। इस तरह की बहुत सी सामाजिक सुरक्षाओं को जमीन के अनिवार्य अधिग्रहण के साथ अनिवार्य रूप से जोडऩा चाहिए, वरना ऐसे इलाकों में हिंसा भड़केगी। 
जमीनों को जबरिया लेने का मामला भारत में वामपंथी पार्टियों से लेकर नक्सलियों तक, और तरह-तरह की विचारधारा वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं तक, हर किसी की फिक्र का सामान है। पिछली यूपीए सरकार ने जो कानून बनाया था, उसे पूंजीनिवेश में अड़ंगा मानते हुए मोदी सरकार ने बड़ी तेजी से बदला है, और उसे जमीन मालिक के हक के खिलाफ बनाया है, और कारखानेदारों के लिए आसान बनाया है। सामाजिक आंदोलनकारियों को इस कानून और इस फेरबदल की खामियां तलाश कर अदालत की मदद भी लेनी चाहिए, ताकि भूस्वामी के अधिकार सुरक्षित रह सकें। लोगों की जमीन, और सरकार के कब्जे वाली खदानें पूरी जिंदगी के लिए जब किसी कारोबारी को दी जाती हैं, तो उससे कितनी वसूली होनी चाहिए, यह मामला बारीकी से तय करने का है।

केजरीवाल और मोदी दोनों को सबक लेने की जरूरत

संपादकीय
11 फरवरी 2015

दिल्ली में नतीजे निकलने के अगले दिन, आज सुबह अरविंद केजरीवाल ने केन्द्रीय शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू से मुलाकात की, और कल सुबह वे इस वक्त तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिल चुके रहेंगे। दिल्ली राज्य, भारत के संवैधानिक ढांचे में एक पूर्ण राज्य नहीं है, और वहां की पुलिस सहित कुछ दूसरे मामलों में केन्द्र सरकार का दखल रहता है, इसलिए चुनाव हारने के बाद भाजपा के कुछ समर्थक यह भी कह रहे हैं कि केजरीवाल की जीत एक बड़ी म्युनिसिपल में जीत जैसी है। यह एक अलग बात है कि इसी बड़ी म्युनिसिपल में जीत के लिए मोदी ने अपने आपको झोंक दिया था। खैर, चुनाव कल निपट चुके हैं, नतीजे आ चुके हैं, आम आदमी पार्टी की सरकार बनने जा रही है, और तीन दिन बाद जिस वक्त बाकी देश में प्रेम के खिलाफ धर्मान्ध और साम्प्रदायिक ताकतें हिंसा कर रही होंगी, उस वक्त दिल्ली में केजरीवाल शपथ ले रहे होंगे। 
हमने छत्तीसगढ़ के म्युनिसिपल चुनावों को लेकर भी बार-बार यह बात लिखी थी कि चुनाव के बाद अब पार्षदों, महापौरों, और म्युनिसिपलों की बाकी कमेटियों में चुने गए लोगों, सभापति, इन सबको चुनाव के पहले की कटुता को छोड़कर, पार्टियों की राजनीति को छोड़कर, मिलकर जनहित में काम करना चाहिए। यह बात स्थानीय संस्थाओं से परे राज्यों पर भी लागू होती है, और पूरे देश पर भी। हमने यह देखा है कि गैरजरूरी टकराव से किस तरह केन्द्र-राज्य के संबंध खराब होते हैं, और उनका नुकसान राज्य पर अधिक दिखता है, होता पूरे देश को है। इससे देश की लोकतांत्रिक   हवा भी गंदी होती है, और ऐसी मिसालें कायम होती हैं जिनसे कि आगे भी गंदगी बढ़ते चलती है, और जनकल्याण पिछड़ते चलता है। इसलिए हम उसी नसीहत को आज दिल्ली के संदर्भ में फिर दुहराना चाहते हैं। आज दिल्ली विधानसभा में केजरीवाल और उनकी पार्टी की स्थिति लोकसभा में मोदी की स्थिति के मुकाबले भी सौ गुना अधिक ताकतवर है। ऐसा हैरतअंगेज जनसमर्थन किसी को भी बददिमाग कर सकता है। और इसी से बचने की जरूरत है। बहुत से लोगों का यह भी मानना है कि जिस तरह भाजपा के भीतर नरेन्द्र मोदी, और संसद के भीतर भाजपा-एनडीए की ताकत रही, उसी से देश में एक ऐसी बददिमागी पनपी जिसने कि हिंसा और साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया, और उसका नतीजा दिल्ली चुनाव में भाजपा की ऐसी हार की शक्ल में सामने आया। इसलिए आज दिल्ली विधानसभा और सरकार में लोकतांत्रिक-तानाशाह किस्म की ताकत पा चुके अरविंद केजरीवाल को चुनावी और आंदोलनकारी तेवरों से बाहर आना पड़ेगा और सरकार चलाने के एक गंभीर अंदाज में काम करना पड़ेगा, वरना किसी भी किस्म की बददिमागी अगले चुनाव में भारी पड़ेगी। 
देश के संघीय ढांचे में केन्द्र-राज्य संबंध किसी-किसी वक्त बहुत कड़वे भी हुए हैं। जैसे आज भी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से शिष्टाचार के नाते भी नहीं मिली हैं। जबकि सीपीएम के त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार भी जाकर प्रधानमंत्री से मिले हैं। चुनाव के वक्त की कड़वाहट को छोड़कर लोगों को देश और प्रदेश के हित में काम करना चाहिए। अरविंद केजरीवाल के संदर्भ में ही हम इन बातों को आज यहां लिख रहे हैं और उनको अब अधिक बोलना बंद करके ऐसे काम करना चाहिए जो बोलें। दिल्ली का विकास अकेले केजरीवाल की फिक्र नहीं है, वह केन्द्र सरकार की भी फिक्र है। और दुनिया के सामने भारत की यह राजधानी एक मिसाल के तौर पर हमेशा ही सामने रहती है। इसलिए इस मिसाल को एक अच्छी और बेहतर मिसाल बनाने का काम मोदी और केजरीवाल सरकारों को मिलकर करना चाहिए। देश की जनता ने यह वोट काम के लिए दिया है, टकराव के लिए नहीं। इसलिए जहां तक किसी टकराव की जरूरत खड़ी न हो, महज राजनीति के लिए टकराव से बचना चाहिए। केजरीवाल दिल्ली विधानसभा के चुनाव में इसके ऊपर और कहीं भी नहीं जा सकते। लेकिन अगले चुनाव के पहले वे अपने काम से इस राज्य के पूरे इतिहास के ऊपर जा सकते हैं। इतिहास गढऩे के लिए नहीं, जनता के भले के लिए उनको ऐसा जरूर करना चाहिए। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐसे मौके गिने-चुने ही आते हैं, और गिने-चुने ही मिलते हैं। कुछ महीने पहले मोदी को ऐसा मौका मिला था, लेकिन अपने बेकाबू और हिंसक-साम्प्रदायिक साथियों की हरकतों को अनदेखा करके उन्होंने उस मौके को खो दिया, और वे देश के प्रधानमंत्री बनने के बजाय आक्रामक हिन्दू ताकतों के प्रधानमंत्री साबित किए जा रहे हैं। दिल्ली के इस चुनाव से केजरीवाल और मोदी दोनों को सबक लेने की जरूरत है। एक को पिछले कुछ महीनों के लिए, और दूसरे को अगले पांच बरस के लिए।

दिल्ली में भाजपा की जमानत जब्त होने पर कुछ बातें...

10 फरवरी 2015
संपादकीय

यूं तो पूरा देश आज अरविन्द केजरीवाल की जीत की उम्मीद में तैयार बैठा था, और भाजपा के लोगों को भी ऐसी नौबत का अहसास था। लेकिन यह अंदाज किसी को नहीं था, चुनावी सर्वे करने वालों को भी नहीं था कि हाल ही मोदी की थमाई झाड़ू को लेकर दिल्ली की जनता भाजपा को बुहारकर फेंक देगी। कांगे्रस तो वैसे भी चुनाव से बाहर थी, लेकिन दिल्ली में आज नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, और भाजपा की जमानत ही जब्त हो गई। कुछ ही महीने पहले जिस दिल्ली में लोकसभा चुनाव में भाजपा को सात की सात सीटें मिली थीं, आज वहां विधानसभा की सत्तर सीटों में भी भाजपा को सात सीटें नहीं मिली हैं, और अभी तक के आंकड़े भाजपा को कुल तीन सीटें देते दिख रहे हैं। दूसरी तरफ कांगे्रस दिल्ली विधानसभा में अब सिर्फ दर्शकदीर्घा में बैठ सकती है, अगर उसके किसी नेता ने इतना साहस बचा हो तो। 
अब हम पहली नजर में उन वजहों को देखें जो कि भाजपा की ऐसी बुरी हार या कि केजरीवाल की, उनकी आम आदमी पार्टी की ऐसी अविश्वसनीय जीत के लिए जिम्मेदार हैं। दरअसल लोकतंत्र में जब चुनावों में दो पार्टियां आमने-सामने होती हैं, तो चुनावी नतीजे ऊपर की इन दो बातों में से किसी एक पर टिके हुए नहीं रहते, और दोनों ही बातों का मिला-जुला असर होता है। फिर भी हम यह देखें कि दिल्ली विधानसभा में एक बरस पहले मुख्यमंत्री बनकर आए, और 49 दिन में सरकार छोड़कर चले गए अल्पमत वाले केजरीवाल के पास इस एक बरस में ऐसा कोई करिश्मा करने की ताकत नहीं थी कि दिल्ली में इतिहास की सबसे बड़ी जीत उन्हें मिले। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के संपूर्ण एकाधिकार के तहत न सिर्फ दिल्ली के इस चुनाव में जो फैसले लिए, बल्कि पूरे देश में जिस तरह के तनाव के लिए भाजपा आज जिम्मेदार है, उसका भी नतीजा आज सुबह से चल रही वोटों की गिनती में सामने आया है। 
जिस तरह आखिरी हफ्तों में दिल्ली के भले या बुरे जैसे भी हों, पुराने भाजपा नेताओं को मानो राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान के तहत झाड़ू से घूरे पर डाल दिया गया, और जिस तरह राजनीति से बाहर की किरण बेदी को लाकर सीधे मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाया गया, उसी दिन से भाजपा की जीत खतरे में पड़ गई थी। लेकिन बात यहीं तक सीमित नहीं थी। दिल्ली में कई जातियों और धर्मों के लोग बसते हैं, इन तमाम लोगों ने भाजपा के मंत्रियों, सांसदों, नेताओं, और दूसरे हिंदू संगठनों की भयानक हिंसक, साम्प्रदायिक, अवैज्ञानिक, और पाखंडी बातें पिछले आधे-एक बरस में सुनी हैं, उनसे मोदी-सरकार और उनकी पार्टी का भारी नुकसान हुआ है। दिल्ली में दसियों लाख नौजवान भी रहते, पढ़ते, और काम करते हैं। इस पीढ़ी के मन में पे्रम भी बसता है, और जिस तरह अचानक इस देश में लव जिहाद नाम का एक नारा गढ़कर धर्म, जाति, और पे्रम के खिलाफ हिंसा फैलाई गई, उससे नौजवान पीढ़ी के मन में हिकारत पैदा होना जायज और जरूरी था, और आज के नतीजों ने भाजपा की जो जमानत जब्त हुई है, उसके पीछे ऊपर की ये दोनों बातें भी हैं।
एक तीसरी बात जो कि छोटी सी है, लेकिन जिसकी चर्चा खूब हुई, और नुकसान का कुछ हिस्सा इस वजह से भी हुआ, वह नरेन्द्र मोदी का एक कोट था, जिस पर उनका नाम बुना गया था, जिसके बारे में चर्चा थी कि उसका कपड़ा दस लाख का होगा, और जिसके बारे में मोदी की तरफ से कोई सफाई नहीं आई थी, उससे भी मोदी की सादगी, किफायत, और ईमानदारी की तस्वीर को नुकसान पहुंचा। पूरी दुनिया ने उनके अपने नाम वाले कपड़े पहनने को आत्ममुग्ध होना बताया, और ऐन चुनाव प्रचार के बीच अमरीकी राष्ट्रपति के दिल्ली के लंबे कार्यक्रम से जो फायदा मोदी की पार्टी को होना था, उसे एक कोट ने ढांककर रख दिया। सार्वजनिक जीवन में उठने वाले ऐसे सवालों पर जननेता के पास चुप्पी का कोई विकल्प नहीं होता है, लेकिन मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद से अब तक अपने पूरे दायरे की हिंसक बातों सहित दूसरे असुविधाजनक सवालों पर चुप्पी का सिलसिला जारी रखा है, और हमारा मानना है कि चुनावों के मौकों पर लोग ऐसी चुप्पी के अपने-अपने मतलब निकालते हैं। 
दिल्ली में भाजपा की हार बहुत ही बड़ी है, और इसके पीछे हम इन वजहों में से किसी एक को अकेले जिम्मेदार नहीं मानते। जिस तरह यूपीए की गलतियों और गलत कामों की वजह से मोदी और एनडीए को एक शून्य में धमाके के साथ दाखिल होने का मौका मिला था, कुछ वैसा ही शून्य दिल्ली में मोदी, भाजपा, और आसपास के लोगों के अहंकार की वजह से, हिंसक बातों की वजह से, साम्प्रदायिकता की वजह से बन गया था। और इस शून्य में अरविन्द केजरीवाल ठीक उसी तरह दाखिल हुए और समा गए, जिस तरह यूपीए राज के बाद मोदी लोकसभा में समा गए। 
हमारा ऐसा मानना है कि भाजपा के लिए इससे अच्छी कोई बात नहीं हो सकती थी कि उसके अपार बहुमत वाले राष्ट्रीय शासन के चलते हुए, पहले बरस में ही उसे ऐसी ठोकर लगी है जिसकी मलहम-पट्टी आज आसान है। आज का मौका मोदी और भाजपा के आत्मविश्लेषण और आत्ममंथन का है, और इसमें अगर देश में भड़काई जा रही साम्प्रदायिक हिंसा, नफरत और पाखंड के बारे में सोचा जाएगा, उसे रोका जाएगा, तो भाजपा अगले आम चुनाव के पहले उबर भी सकती है। अगर इस पार्टी के लोगों ने अपने तौर-तरीके बदले और सहयोगी संगठनों को लोकतंत्र और इंसानियत की हत्या करने, और गोडसे को महिमामंडित करने से रोका, तो अगली लोकसभा में भाजपा की संभावना बच भी सकती है। ऐसा न करने पर चुप्पी और सोची-समझी अनदेखी से देश भर में भाजपा को इसी तरह का नुकसान हो सकता है क्योंकि कई जगहों पर स्थानीय और भरोसेमंद विकल्प सामने आ सकते हैं। दो बरस पहले तक किसने सोचा था कि अपने से बड़े आकार के कपड़े पहनने वाला अरविन्द केजरीवाल नाम का एक छोटा सा घोड़ा अश्वमेध यज्ञ के विशाल घोड़े को इतनी बुरी तरह पीछे छोड़ेगा।
अब आखिर में उस कांगे्रस पार्टी की बात की जाए जो कि अभी साल भर पहले तक दिल्ली में पन्द्रह बरस से काबिज थी। यह पार्टी जिस हद तक खत्म हो चुकी है, उसे देखते हुए उसकी चर्चा पर फिलहाल जगह बर्बाद करने की जरूरत नहीं है। बाद में फिर कभी यह पार्टी प्रासंगिक होगी, तो फिर उस बारे में बात करेंगे।

छत्तीसगढ़ के बाद ओडिशा में भी छात्राएं मां बनीं

9 फरवरी 2015
संपादकीय

छत्तीसगढ़ के सरगुजा के बाद ओडिशा के दो सरकारी छात्रावासों में स्कूली बच्चियों ने बच्चों को जन्म दिया। वहां की राज्य सरकार भी छत्तीसगढ़ की सरकार की तरह स्कूल और छात्रावास के प्रभारी अधिकारियों पर कार्रवाई कर रही है। लेकिन यह सोचें कि इन लड़कियों के मामले मां बनने की हद तक नहीं बढ़े होते, तो क्या हुआ होता? या तो स्कूल और हॉस्टल में इनका शोषण हुआ होगा, या फिर कम उम्र की इन नाबालिग बच्चियों का स्कूल के बाहर शोषण हुआ होगा या उनके किसी से संबंध बने होंगे। इन तमाम ही मामलों में एक बात साफ है कि स्कूलों और हॉस्टलों में बच्चों की जागरूकता का कोई ठिकाना नहीं है, और न ही समाज में उनको कोई हिफाजत हासिल है। इस मुद्दे पर हमने कुछ दिन पहले ही इसी जगह पर खुलासे से लिखा था, लेकिन आज फिर इस बात को इसलिए दुहरा रहे हैं क्योंकि जरूरत एक अधिक जागरूकता और अधिक असरदार कार्रवाई की है। 
आज देश को अंधेरे में डुबाकर रखने के काम में जुटे हुए दकियानूसी लोग हैं, जो कि लड़कियों को किसी भी तरह की जागरूकता से, बराबरी के हक से, हिफाजत से दूर रखना चाहते हैं। यह समाज जब कोई खबर बलात्कार तक पहुंचती है, या फिर किसी कम उम्र की गैरशादीशुदा लड़की के मां बनने तक पहुंचती है, तब उस पर कार्रवाई करता है, या चाहता है। सरकार का हाल भी कमोबेश ऐसा ही है। एक तरफ तो प्रधानमंत्री घूम-घूमकर लड़कियों को बचाने की बात करते हैं, दूसरी तरफ देश भर में पांच बरस से भी कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार शुरू हो जाता है। इसके साथ-साथ सत्ता से जुड़े हुए अगर बलात्कारी हैं, तो उनको बचाने का काम भी शुरू हो जाता है। आज भी केन्द्र सरकार में एक मंत्री ऐसा है जिस पर बलात्कार का आरोप है, और ऐसा ही हाल कई दूसरे प्रदेशों के मंत्रिमंडलों में भी होगा। और दूसरी तरफ महिलाओं और बच्चों को बचाने के लिए संविधान के तहत जो राष्ट्रीय और प्रादेशिक आयोग बनाए जाते हैं, उनमें सत्ता से जुड़े नेता-अफसर ही मनोनीत होते हैं, जो कि अपने को कुर्सी पर बिठाने वाले लोगों के लिए किसी तरह की दिक्कत खड़ी करना नहीं चाहते। ऐसे में गिने-चुने मामले ही किसी धमाके के पहले कोई ध्यान खींच पाते हैं। समाज में और स्कूल-हॉस्टल में लड़कियां अगर गर्भवती न हो जाएं, अगर उनके साथ बलात्कार के बाद उनकी हत्या न हो जाए, तो उनके मामले न सुर्खियों में आते, और न चर्चा में आते। 
हमारा यह मानना है कि सरकारें तो धमाकों के बाद ही कुछ सुन पाती हैं। भगत सिंह के वक्त की अंग्रेज सरकार से लेकर आज की निर्वाचित और लोकतांत्रिक होने का दावा करने वाली सरकारों तक हाल इसी तरह का है। इसलिए समाज को अधिक सक्रिय होना पड़ेगा, और ऐसे हर मामले को सड़कों तक लाना पड़ेगा, सरकार और सत्ता को, ताकतवर तबकों को घेरना पड़ेगा, मीडिया का इस्तेमाल करना पड़ेगा, अदालतों तक जनहित याचिका लेकर जाना पड़ेगा, तब जाकर शायद सरकारें कार्रवाई करने को मजबूर होंगी। ये वही राज्य हैं, छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड, जहां से बंधुआ मजदूर बनाकर बच्चे और औरत-मर्द बाहर ले जाए जाते हैं, मानव तस्करी होती है, लोगों को देह के धंधे के लिए मजबूर किया जाता है। ऐसे तमाम मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक आज चौकन्ना होकर देख रहा है, और राज्यों के सबसे बड़े अफसरों को उसने सीधे जवाबदेह ठहराया है। इसलिए इस लोकतंत्र में यह नहीं कहा जा सकता कि अदालतें भी नहीं सुनती हैं। आवाज उठाने की जरूरत है, लोगों को खुद उठने की जरूरत है, और आज अंग्रेज सरकारें नहीं हैं कि हथगोले फेंकने पड़ें, लोगों को मौजूद लोकतांत्रिक औजार उठाकर ऐसे जुर्म से निपटना चाहिए। 

Bat ke bat, बात की बात,

8 feb 2015

मांझी और बेदी के बीच एक सी कौन सी बात है?

संपादकीय
8 फरवरी 2015
बिहार में जनता दल यूनाइटेड के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के तेवर इस कदर बागी हैं, कि भाजपा को दिल्ली से कई गुना अधिक उम्मीद पटना में दिख रही है। कुछ महीने पहले नरेन्द्र मोदी की राष्ट्रीय जीत के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी की दुर्गति की जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद छोड़ा था, और उन्होंने या पार्टी ने मांझी को मुख्यमंत्री बनाया था, जो कि वहां की महादलित जाति के हैं, और इससे जदयू ने एक राजनीतिक संदेश भी दिया था। लेकिन जाति की राजनीति में दिया गया यह संदेश इस तरह उल्टा पड़ेगा यह अंदाज किसी को नहीं था, उस भाजपा को भी नहीं जो कि नीतीश से तलाक के बाद मांझी के बयानों पर भी भारी हमलावर तेवर रखती थी। आज वही भाजपा मांझी पर डोरे डालकर नीतीश को नीचा दिखाने के लिए पटना से लेकर दिल्ली तक एक पैर पर खड़ी है, क्योंकि  एनडीए के भीतर मोदी को नीचा दिखाने का काम, या उनके खिलाफ खड़े होने का काम अकेले नीतीश कुमार ने किया था। तो अब कर्ज को सूद सहित चुकाने का वक्त आ गया है। 
राजनीति के बारे में गाली-गलौज की जुबान में कहा जाता है कि यह बहुत कुत्ती चीज होती है। इंसान अपने घटिया कामों के लिए जानवरों की मिसाल ढूंढते हैं, और ऐसी कहावतें या मुहावरे गढ़ते हैं जो उन जानवरों पर तो लागू होते ही नहीं हैं। ऐसी राजनीति के बारे में थोड़ी सी बेहतर जुबान में कहा जाता है कि इसमें बड़े अजीब-अजीब हमबिस्तर होते रहते हैं। बरसों तक बिहार में नीतीश की पार्टी जदयू का भाजपा के साथ शादीशुदा रिश्ता रहा, और वह इतना मजबूत था कि 2002 के गुजरात के दंगे भी उस रिश्ते पर खरोंच नहीं डाल पाए। अब पिछले बरस के आम चुनावों के पहले नीतीश कुमार की धर्मनिरपेक्षता की नींद टूटी, और वे मोदी की राष्ट्रीय लीडरशिप की संभावनाओं के खिलाफ खड़े हुए, और एनडीए से बाहर आए। अब यह बात सिद्धांतों की कसौटी पर कुछ अजीब रंग छोड़ती है कि 2002 से 2013 तक नीतीश को गुजरात दंगों में मोदी की भूमिका बुरी नहीं लगी, लेकिन उसके बाद गुजरात के दो-दो चुनाव जीत चुके मोदी देश की लीडरशिप के लायक नीतीश को नहीं लगे। 
खैर, आज का मुद्दा भाजपा के साथ जदयू के रिश्तों की नहीं है, बल्कि जदयू के घर के भीतर का है। बिहार की जातिवादी राजनीति में एक महादलित को मुख्यमंत्री के पद से हटाना अगर जदयू के लिए मुमकिन भी है, तो भी वह कुछ महंगा जुआ होगा। और जदयू की हालत उस अजगर सरीखी हो गई है जो कि इतना बड़ा जानवर निगल चुका है कि वह न पूरी तरह निगल पा रहा है, और न ही उगल पा रहा है। हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने मांझी की कही हुई बेदिमाग की बातों को लेकर एक से अधिक बार इसी जगह पर लिखा था कि ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाना न सिर्फ जदयू के लिए नुकसानदेह है, बल्कि इससे महादलित तबके की साख पर भी आंच आती है कि ऐसे तबके से ऐसे ही लोग आते हैं। एक तो दलितों को लेकर समाज के बाकी तबकों में बहुत बुरा पूर्वाग्रह बैठा हुआ है और उस पर जब मांझी जैसी खतरनाक बात बोलने वाले लोग आ जाते हैं, तो फिर वह पूर्वाग्रह सिर चढ़कर बोलने लगता है। लोगों को याद होगा कि जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष, और देश के सबसे समझदार नेताओं में से एक शरद यादव ने भी अपनी ही पार्टी के इस महादलित मुख्यमंत्री के खिलाफ नाराजगी में कुछ शब्द जातिगत आलोचना के कहे थे जिसे लेकर उनके खिलाफ पुलिस और शायद अदालत में भी शिकायत की गई है। 
किसी पार्टी के भीतर जब संगठन एक-दो लोगों की जेब में ही होता है, तो इस तरह की चूक होती है। जदयू में शरद यादव और नीतीश कुमार के बाद कोई तीसरा नेता सुनाई नहीं पड़ता है, और इसलिए एक ऐसे मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया गया था, जिसने हर किस्म की गैरजिम्मेदारी के सार्वजनिक बयान दिए थे। तकरीबन कुछ ऐसी ही हालत दिल्ली में भाजपा के मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी को चुनने के मामले में हुई। आज वहां पर किरण बेदी की वजह से भाजपा की संभावनाओं को नुकसान के आसार लोगों को दिख रहे हैं। और किरण बेदी को भी भाजपा के भीतर एक-दो लोगों ने ही अचानक लाकर, दिल्ली के बड़े-बड़े पार्टी नेताओं के ऊपर उम्मीदवार बना दिया था। जब फैसला लेने का तरीका एक-दो लोगों तक ही सीमित रहता है, तो मांझी या बेदी जैसी गलतियां होती हैं। आजकल में जदयू के मामले पटना राजभवन से लेकर दिल्ली में प्रधानमंत्री के कमरे तक कोई मोड़ ले सकते हैं, लेकिन हम आज की बात को यहीं पर छोड़ रहे हैं कि फैसले लेने का तरीका अधिक लोकतांत्रिक और अधिक व्यापक बुनियाद पर टिका हुआ होना चाहिए। 

सरकार और समाज मिलकर बीमार-गरीब के लिए कुछ करें

संपादकीय
7 फरवरी 2015
छत्तीसगढ़ में ऐसे बच्चों के ऑपरेशन हुए हैं, जिनके होंठ कटे हुए थे, या जिनके तालू में जन्म से ही खामी थी। ऐसे बच्चे स्कूल से लेकर मोहल्ले तक एक सामाजिक तनाव झेलते हैं, और इससे उनके व्यक्तित्व का विकास बहुत बुरी तरह प्रभावित होता है। छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि यहां रोटरी क्लब के बैनर तले व्हील चेयर पर चलने वाले डॉ. शरद दीक्षित बरसों तक यहां आकर इलाज करते थे और उन्होंने हजारों बच्चों को मुस्कुराहट लौटाई थी। अब सरकार ने इस तरह के कटे होंठ वाले बच्चों के अलावा दूसरे कई किस्म के ऐसे बच्चों के ऑपरेशन करवाए हैं, जिनको ऑपरेशन की जरूरत थी। और इनमें एक ऐसी बच्ची भी है जिसने अपनी तकलीफ से परेशान होकर कुछ अरसा पहले सरकार से इच्छा मृत्यु की इजाजत मांगी थी, ऐसी स्कूली बच्ची को आज मंच पर ऑपरेशन के बाद देखकर आंखें भर आती हैं। 
लोकतंत्र और जनकल्याणकारी सरकार का कोई मतलब नहीं है, अगर छोटे-छोटे बच्चों को सर्जरी की जरूरत हो, और परिवार, समाज, या सरकार से यह काम न हो पाए। तकलीफ के साथ जीने वाले और बड़े होने वाले बच्चे समाज के उस तरह काम भी नहीं आ पाते, जिस तरह सेहतमंद, खुश, और आत्मविश्वास से भरे हुए बच्चे आ सकते हैं। पिछले बरसों में हमने छत्तीसगढ़ में कुछ सामाजिक संगठनों के भी बड़े-बड़े कार्यक्रम देखे हैं जिनमें कहीं बच्चों के ऑपरेशन हुए, तो कहीं शारीरिक विकलांगता से तकलीफ पा रहे हर उम्र के लोगों के ऑपरेशन हुए। सरकार से अधिक ताकत ऐसे मामलों में समाज की होती है, और समाज के भीतर दान की भावना को बढ़ाने और उसके इस्तेमाल को संगठित करने की जरूरत रहती है। अगर दान का उपयोग करने वाले लोग भरोसेमंद हों, तो लोग दान देने भी लगते हैं। बड़े-बड़े समाजसेवी संस्थान लोगों के दान से खड़े होते हैं, अगर उनके पीछे के लोगों पर समाज का भरोसा होता है। इसलिए छत्तीसगढ़ में अलग-अलग समाज के लोगों को चाहें तो अलग-अलग, और चाहें तो एक साथ मिलकर कुछ बड़े काम करने चाहिए। और इनमें सबसे बड़ा काम गरीब-जरूरतमंद के इलाज का ही हो सकता है। 
हमने कुछ बरस पहले भी इसी जगह पर लिखा था कि कुछ धर्मों या जातियों के लोग ऐसे हैं जो कि छत्तीसगढ़ में उद्योग-व्यापार में खासे कामयाब हुए हैं। ऐसे लोगों को अपनी आस्था के किसी प्रतीक के नाम पर बड़े अस्पताल बनाने की कोशिश करनी चाहिए, ताकि वे मेडिकल पढ़ाई से भी जोड़े जा सकें, और वहां पर गरीबों का मुफ्त या सस्ता इलाज भी हो सके। हम यहां पर रायपुर के एक उद्योगपति सुभाष अग्रवाल के नाम सहित जिक्र करना चाहेंगे जिन्होंने मेडिकल जांच का एक बड़ा केन्द्र अपने ही पैसों से शुरू किया है, और अपने से अधिक आर्थिक ताकत रखने वाले लोगों के सामने एक चुनौती पेश की है। ऐसे बहुत से लोग हैं जो अपने साम्राज्य को बढ़ाने के बजाय अकेले ही इलाज या जांच के कोई केन्द्र बना सकते हैं, और किसी समाज के लोग मिलकर तो बहुत बड़े केन्द्र खड़े कर सकते हैं। 
छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था में अग्रवाल समाज, जैन समाज, सिक्ख समाज, और सिंधी समाज के व्यापारी-उद्योगपति सबसे आगे हैं। और इनमें से हर किसी की धार्मिक आस्था के प्रतीक भी हैं। उनके नाम पर इन समाजों के लोग बड़ी आसानी से सैकड़ों करोड़ के अलग-अलग अस्पताल-मेडिकल कॉलेज शुरू कर सकते हैं, और इनमें अलग-अलग खूबियां भी विकसित की जा सकती हैं। राज्य के मुख्यमंत्री भी इन समाजों के लोगों के साथ अलग-अलग बैठकर उनका उत्साह बढ़ा सकते हैं, और राज्य सरकार की तरफ से समाजसेवा के ऐसे काम के लिए जमीन भी मुफ्त में दे सकते हैं। सरकार और समाज को मिलकर हर गरीब के चेहरे पर मुस्कुराहट लाने की कोशिश करनी चाहिए, उसी में सत्ता की ताकत का सम्मान है, और उसी में आर्थिक संपन्नता का भी सम्मान है। 

भारत की साम्प्रदायिकता पर ओबामा के कहे का मतलब

संपादकीय
6 फरवरी 2015
अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत में भी अपने एक भाषण में धार्मिक विविधता जैसी एक बात कही थी। लेकिन अमरीका लौटने के बाद एक हफ्ते के भीतर उन्होंने भारत में साम्प्रदायिक तनाव को लेकर दो अलग-अलग मौकों पर दो बातें खुद होकर कही हैं, और इनमें से एक बात तो उन्होंने दलाई लामा की मौजूदगी में कही है। उन्होंने यह भी कहा कि गांधी आज होते तो भारत की धार्मिक असहिष्णुता को देखकर उन्हें सदमा लगता। इन बातों का एक अलग मतलब और महत्व है। भारत में पिछले कुछ महीनों में जिस तरह से मुस्लिम अल्पसंख्यकों के खिलाफ एक माहौल खड़ा किया जा रहा है, मुस्लिम और ईसाई धर्म से लोगों को हिन्दू बनाने का अभियान चलाया जा रहा है, उसे पूरी दुनिया गौर से देख रही है। दुनिया के अधिकतर देशों में मुस्लिम और ईसाई लोग बसे हैं, और करीब-करीब हर देश के राजकाज में इन दो धर्मों के लोग भी सबसे बड़ी संख्या में शामिल है। ऐसे में बराक ओबामा भारत आकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पीठ थपथपाकर जब लौटते हैं, तो अपने खुद के देश और बाकी दुनिया के बीच उन्हें इन निगाहों का सामना भी करना पड़ता है कि भारत में आक्रामक हो रही साम्प्रदायिकता के बारे में उनकी क्या सोच है? भारत के इस तनाव को अनदेखा करके अमरीकी राष्ट्रपति आसानी से नहीं रह सकते, इसलिए उन्हें अपनी सोच को, या कम से कम अपने बयान को, बिना किसी मौके की जरूरत के खुद होकर कहना पड़ा। 
इस बात से वह ताजा इतिहास भी याद पड़ता है जब गुजरात दंगों को लेकर मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को लंबे समय तक अमरीकी वीजा नहीं मिल पाया। और यह फैसला अमरीकी सरकार का नहीं था, अमरीका में धार्मिक स्वतंत्रता के लिए जो एक संवैधानिक आयोग बना हुआ है, उसने गुजरात में धार्मिक स्वतंत्रता न होने का तर्क देकर मोदी के वीजा का विरोध किया था। अब प्रधानमंत्री बनने के बाद इस हैसियत से नरेन्द्र मोदी अमरीका का वीजा बिना किसी अड़चन के पाकर वहां हो आए हैं, लेकिन अमरीका में धार्मिक स्वतंत्रता और बराबरी एक बड़ा मुद्दा है। इसके पहले कि बराक ओबामा को वहां आलोचना झेलनी पड़ती, उन्होंने हफ्ते भर में दो बयान देकर अपनी सरकार, अपने देश, और अपनी सोच सामने रख दी है। 
इधर भारत में भी बिना किसी ठोस हवाले के अचानक ऐसी खबरें आने लगती हैं कि भाजपा के सांसद साक्षी महाराज जैसे लोगों पर पार्टी कार्रवाई करने जा रही है। जिस हमलावर और हिंसक तेवर के साथ साक्षी महाराज जैसे लोग घोर साम्प्रदायिक नफरत की बातें करते हैं, उन पर आधा-आधा साल गुजर जाने पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई, और राजनीति के कई जानकारों का यह भी मानना है कि कश्मीर में भाजपा का खाता न खुलने के पीछे चुनाव के ठीक पहले उसके ऐसे नेताओं द्वारा मुस्लिमों के खिलाफ हिंसक-साम्प्रदायिक बयान देना रहा, जिनकी वजह से घाटी में भाजपा की संभावनाएं खराब हुईं। हम ओबामा की कही बातों से आज शुरुआत इसलिए कर रहे हैं कि खुद प्रधानमंत्री मोदी अमरीका को और बराक ओबामा को अपना दोस्त कहते हुए अमरीका से बहुत सी उम्मीदें कर रहे हैं, और दुनिया भर से वे भारत में पूंजीनिवेश की उम्मीद भी कर रहे हैं। उनकी अपनी पार्टी और उनके सहयोगी संगठनों के लोग जिस तरह से एक निहायत गैरजरूरी धर्मान्धता और कट्टरता के साथ हिंसा फैला रहे हैं, उनसे मोदी के ही सरकारी सपने चूर-चूर हो रहे हैं। देश का विकास और साम्प्रदायिकता इनमें से किसी एक चीज को ही चुनना होगा। यहां पर हम याद दिलाना चाहेंगे कि मोदी के एक सबसे वरिष्ठ मंत्री अरूण जेटली ने पिछले दिनों मीडिया से बातचीत में यह मंजूर किया कि गैरजरूरी साम्प्रदायिकता की वजह से सरकार के अच्छे काम खबरों से दूर हैं, और फिजूल की बातें खबरों में जगह पा रही हैं। हिन्दुस्तानी मीडिया के कहे हुए उस पर अमल करना मोदी को ठीक लगे या न लगे, उन्हें बराक ओबामा की कही हुई बात पर तो गौर करना चाहिए, और यह सोचना चाहिए कि कब तक वे विकास की अपनी सोच को साम्प्रदायिकता की वजह से खबरों में पिछड़ते हुए देखना चाहेंगे? 

सरकार के मुखिया के लड़ाकू तेवर से नसीहत

संपादकीय
5 फरवरी 2015

जॉर्डन के शासक किंग अब्दुल्ला की एक तस्वीर कुछ मिनट पहले ही इंटरनेट पर आई है जिसमें वे अपनी वायुसेना के पायलट की पोशाक पहने हुए दिख रहे हैं, और यह घोषणा की गई है कि आतंकियों पर आज होने वाले हवाई हमले में वे अपने लड़ाकू विमान में सहायक पायलट बनकर जा रहे हैं। लोगों को याद होगा कि दो दिन पहले इस्लामी आतंकियों ने जॉर्डन के उस फौजी पायलट को जिंदा जला दिया था, जिसे कि कुछ दिन पहले उन्होंने पकड़ा था। इसका वीडियो सामने आते ही जॉर्डन की सरकार का विचलित होना जायज था, और बाकी दुनिया भी इसे देखकर सहम गई थी। खासकर मुस्लिम देशों में यह सोच शुरू हो गई है कि इस्लाम के नाम पर जिस दर्जे की दहशतगर्दी की जा रही है उससे इस्लाम का कितना नुकसान हो रहा है, दुनिया भर में मुस्लिमों की कैसी तस्वीर बन रही है। मुस्लिम देश कई वजहों से एक-दूसरे के खिलाफ भी रहते हैं, लेकिन आज आतंक के चलते वे सब फिक्रमंद हैं कि बेकाबू आतंक कहां जाकर, कितना नुकसान करके थमेगा। 
लेकिन आज हम यहां यह चर्चा करना चाहते हैं कि जॉर्डन के शासक का यह फौजी अंदाज क्या कहता है। यह एक अलग बात है कि किसी देश के शासक को खुद लड़ाकू विमान में इस तरह जाना चाहिए, या नहीं। लेकिन यह बात अपनी जगह सही है कि जब देश पूरे का पूरा हिल गया है, विचलित है, तो देश के प्रमुख को कुछ तो ऐसा करना चाहिए जिससे कि जनता का भरोसा बचा रह सके। अब उसका एक तरीका हवाई हमले में शामिल होना है, लेकिन जॉर्डन से परे दुनिया में अधिक विकसित लोकतंत्र वाले जो देश हैं, वहां भी इस बात की जरूरत रहती है कि देश या प्रदेश के नेता मुसीबत के मौके पर, नाजुक मुद्दों पर कुछ बोलें, और देश की जनता का भरोसा कायम रखें। कुछ महीने पहले की बात है कि अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इबोला की शिकार होकर ठीक हुई एक नर्स को गले लगाकर उस तस्वीर को फैलने दिया था ताकि लोगों का भरोसा इलाज पर कायम हो सके। माइक्रोसॉफ्ट कंपनी के मालिक बिल गेट्स ने अभी पखाने के पानी को साफ करके पीने लायक बनाने वाली एक मशीन को बढ़ावा देने के लिए उससे निकले हुए पानी को खुद पीकर दिखाया और वे तस्वीरें भी चारों तरफ फैलीं। 
हम भारत के संदर्भ में अगर बात करें तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक बहुत से ऐसे नेता हैं जो कि नाजुक मुद्दों पर बोलने से बचते हैं। अब जैसे भाजपा और उसके साथी संगठनों के लोग देश में जिस तरह घोर साम्प्रदायिक और हिंसक बातें कर रहे हैं, उनके खिलाफ अगर प्रधानमंत्री खुद कुछ नहीं कहते, तो इससे देश के लोगों का भरोसा हिलता है। दूसरी तरफ आज पूरे देश में साम्प्रदायिक संगठनों ने भारतीय संस्कृति को बचाने के नाम पर आने वाले वेलेंटाइन डे पर नौजवान पीढ़ी को हिंसक धमकियां देना शुरू कर दिया है, लेकिन इस बारे में कोई सरकार, कोई राजनीतिक दल कुछ नहीं कह रहे हैं। चुप्पी का मतलब मौन सहमति भी होता है, और जिन लोगों पर देश-प्रदेश में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी होती है, उनकी चुप्पी का मतलब हिंसक-आतंकियों को बढ़ावा देना भी होता है। हम किसी एक पार्टी या एक प्रदेश की बात नहीं करते, अलग-अलग बहुत सी पार्टियों के राज में, बहुत से प्रदेशों में नफरत को जब बढ़ावा दिया जाता है, तब भी नेता चुप रहते हैं, और जब प्रेम पर हमला किया जाता है, तब भी नेता चुप रहते हैं। ऐसे में हमको लगता है कि वायुसेना के लड़ाकू विमान में सहायक पायलट बनकर जाने जैसा दुस्साहस भारत जैसे लोकतंत्र में गैरजरूरी है, लेकिन वैचारिक-आतंकियों पर संवैधानिक और प्रशासनिक कार्रवाई करने के लिए एक साहस जरूरी है। आने वाला हफ्ता देश भर में साम्प्रदायिक संगठनों के जुबानी और लाठियों के हमले देखने जा रहा है, और ऐसे में प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्रियों तक जो लोग भी इसको अनदेखा करेंगे, वे बिना कहे हुए भी ऐसी हिंसा को बढ़ावा देने के जिम्मेदार दर्ज होंगे।