जब दिल्ली से नफरत का लावा फैलाने की कोशिश होती है, तब हौसला बंधाने वाली मिसालें

संपादकीय
1 फरवरी 2015
चारों तरफ बुरी खबरों के बीच कुछ अच्छी खबरें आती हैं, तो दिल को भरोसा होता है कि दुनिया खत्म होने नहीं जा रही है। अब यह मीडिया की मेहरबानी है कि बुरी खबरों को भली जगह मिलती है, और भली खबरों को कोई कोना मिलता है, तो मिल जाता है, वरना वह भी नहीं। अब ऐसी दो-चार खबरों को देखें जो कल और आज में ही सामने आई हैं। राजस्थान की एक खबर है कि वहां सरपंच का चुनाव लडऩे के लिए आस्ट्रेलिया में काम कर रहा एक प्रवासी भारतीय नौकरी छोड़कर वापिस आया है। लोगों को याद होगा कि इसी राजस्थान में एक महिला सरपंच छवि राजावत भी ऐसी है, जिसने मैनेजमेंट की बड़ी नौकरी छोड़कर सरपंच का चुनाव लड़ा और जीतकर वह गांव में काम कर रही है, और वह पहली एमपीए सरपंच है।
लेकिन ऐसी निजी पसंद से परे सामाजिक योगदान और दरियादिली की कुछ खबरें देखें, तो कल ही महाराष्ट्र के उल्हासनगर से खबर आई है कि वहां के मुस्लिम समाज ने एक हिन्दू जमीन-कारोबारी का आभार माना है क्योंकि दशकों से वहां का मुस्लिम समाज कब्रिस्तान की जमीन के लिए तरस रहा था, और हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी राज्य सरकार और म्युनिसिपल जमीन दे नहीं पा रहे थे, ऐसे में इस हिन्दू-कारोबारी ने मुस्लिम कब्रिस्तान के लिए अपनी खुद की दस करोड़ दाम वाली दो एकड़ जमीन दी है। एक दूसरी खबर महाराष्ट्र से ही यह आई है कि सूखे के शिकार वहां के बीड़-इलाके में एक मुस्लिम परिवार ऐसा है जो डेढ़-दो सौ गायों और उनके बच्चों के लिए चारे और पानी का इंतजाम कर रहा है। एक खबर गुजरात से आई है कि वहां किस तरह एक मुस्लिम व्यापारी छह सौ आदिवासी लड़कियों को पढ़ाई-लिखाई के लिए गोद लेकर उनका खर्च उठा रहा है। गुजरात के ही कच्छ में अमरीका से आकर एक स्पेनी महिला ने एक ऐसी बच्ची को गोद लिया है जिसे कोई मरघट के बाहर फेंक गया था, और कीड़े-मकोड़ों ने उस नवजात बच्ची की नाक काट ली थी। अब यह महिला इस बच्ची को कानूनी रूप से गोद लेकर अमरीका जा रही है जहां उसकी एक और दत्तक पुत्री के साथ यह बच्ची भी बड़ी होगी। उसकी पहली बेटी भी पांच बरस पहले हैदराबाद से गोद ली गई थी, और इन बच्चियों को बड़ा करते हुए यह महिला हिन्दुस्तानी त्यौहार मनाती है, और हिन्दी सीख रही है। एक तरफ तो अपनी खुद की बच्ची को लोग मरघट के बाहर फेंक गए, और दूसरी तरफ एक विदेशी महिला आकर उनको ले जा रही है, उसकी नाक की प्लास्टिक सर्जरी करवाकर उसे भारतीय संस्कृति के साथ ही बड़ा करने के लिए। अभी एक-दो हफ्ते पहले ही एक ऐसी खबर आई थी कि एक मुस्लिम परिवार ने पाल-पोसकर बड़ी की गई अपनी हिन्दू दत्तक पुत्री का कन्यादान किया और हिन्दू रीति-रिवाजों से ही उसकी शादी भी की। 
ऐसी मिसालों के जिक्र के बाद यहां पर हमारे लिखने के लिए अधिक कुछ बचता नहीं है। ये तमाम ऐसे लोग हैं जिनको न मंच मिलता है, न माला, न माईक, और न ही महत्व। लेकिन अपनी जिंदगी का एक मकसद मानकर ये लोग दूसरों के काम आते हैं, और इनके नेक काम ही इस महान देश में साम्प्रदायिक नफरत फैलाने वालों के मुंह पर जूता हैं। ऐसी मिसालों को महत्व के साथ दूर-दूर तक पहुंचाने की जरूरत इसलिए है कि बुरी बातें सिर चढ़कर बोलती हैं, तो लगता है कि चारों तरफ बुरा ही बुरा हो रहा है। भारत में तो जगह-जगह अलग-अलग धर्मों के लोग, अलग-अलग जातियों के लोग एक-दूसरे के लिए, एक-दूसरे की बिरादरी के लिए, एक-दूसरे के धर्म स्थानों के लिए सेवा करते हुए पूरी जिंदगी ही गुजार देते हैं। हर बरस कई ऐसी सच्ची कहानियां सामने आती हैं कि किस तरह एक मुस्लिम अकेले ही एक मंदिर की देखरेख कर रहा है, और किस तरह कहीं और एक हिन्दू परिवार किसी दरगाह की सफाई और चौकीदारी करने में लगा रहता है। ये लोग राजनीति से परे, राजधानियों से परे, चुनाव की हिंसा से परे, और समुदायों को बांटने साजिश से परे के आम लोग हैं, और ऐसी सच्ची कहानियां हर उस मौके पर याद रखने की जरूरत है जब दिल्ली से पूरे देश में नफरत का लावा फैलाने की कोशिश होती है। 

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