छत्तीसगढ़ के बाद ओडिशा में भी छात्राएं मां बनीं

9 फरवरी 2015
संपादकीय

छत्तीसगढ़ के सरगुजा के बाद ओडिशा के दो सरकारी छात्रावासों में स्कूली बच्चियों ने बच्चों को जन्म दिया। वहां की राज्य सरकार भी छत्तीसगढ़ की सरकार की तरह स्कूल और छात्रावास के प्रभारी अधिकारियों पर कार्रवाई कर रही है। लेकिन यह सोचें कि इन लड़कियों के मामले मां बनने की हद तक नहीं बढ़े होते, तो क्या हुआ होता? या तो स्कूल और हॉस्टल में इनका शोषण हुआ होगा, या फिर कम उम्र की इन नाबालिग बच्चियों का स्कूल के बाहर शोषण हुआ होगा या उनके किसी से संबंध बने होंगे। इन तमाम ही मामलों में एक बात साफ है कि स्कूलों और हॉस्टलों में बच्चों की जागरूकता का कोई ठिकाना नहीं है, और न ही समाज में उनको कोई हिफाजत हासिल है। इस मुद्दे पर हमने कुछ दिन पहले ही इसी जगह पर खुलासे से लिखा था, लेकिन आज फिर इस बात को इसलिए दुहरा रहे हैं क्योंकि जरूरत एक अधिक जागरूकता और अधिक असरदार कार्रवाई की है। 
आज देश को अंधेरे में डुबाकर रखने के काम में जुटे हुए दकियानूसी लोग हैं, जो कि लड़कियों को किसी भी तरह की जागरूकता से, बराबरी के हक से, हिफाजत से दूर रखना चाहते हैं। यह समाज जब कोई खबर बलात्कार तक पहुंचती है, या फिर किसी कम उम्र की गैरशादीशुदा लड़की के मां बनने तक पहुंचती है, तब उस पर कार्रवाई करता है, या चाहता है। सरकार का हाल भी कमोबेश ऐसा ही है। एक तरफ तो प्रधानमंत्री घूम-घूमकर लड़कियों को बचाने की बात करते हैं, दूसरी तरफ देश भर में पांच बरस से भी कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार शुरू हो जाता है। इसके साथ-साथ सत्ता से जुड़े हुए अगर बलात्कारी हैं, तो उनको बचाने का काम भी शुरू हो जाता है। आज भी केन्द्र सरकार में एक मंत्री ऐसा है जिस पर बलात्कार का आरोप है, और ऐसा ही हाल कई दूसरे प्रदेशों के मंत्रिमंडलों में भी होगा। और दूसरी तरफ महिलाओं और बच्चों को बचाने के लिए संविधान के तहत जो राष्ट्रीय और प्रादेशिक आयोग बनाए जाते हैं, उनमें सत्ता से जुड़े नेता-अफसर ही मनोनीत होते हैं, जो कि अपने को कुर्सी पर बिठाने वाले लोगों के लिए किसी तरह की दिक्कत खड़ी करना नहीं चाहते। ऐसे में गिने-चुने मामले ही किसी धमाके के पहले कोई ध्यान खींच पाते हैं। समाज में और स्कूल-हॉस्टल में लड़कियां अगर गर्भवती न हो जाएं, अगर उनके साथ बलात्कार के बाद उनकी हत्या न हो जाए, तो उनके मामले न सुर्खियों में आते, और न चर्चा में आते। 
हमारा यह मानना है कि सरकारें तो धमाकों के बाद ही कुछ सुन पाती हैं। भगत सिंह के वक्त की अंग्रेज सरकार से लेकर आज की निर्वाचित और लोकतांत्रिक होने का दावा करने वाली सरकारों तक हाल इसी तरह का है। इसलिए समाज को अधिक सक्रिय होना पड़ेगा, और ऐसे हर मामले को सड़कों तक लाना पड़ेगा, सरकार और सत्ता को, ताकतवर तबकों को घेरना पड़ेगा, मीडिया का इस्तेमाल करना पड़ेगा, अदालतों तक जनहित याचिका लेकर जाना पड़ेगा, तब जाकर शायद सरकारें कार्रवाई करने को मजबूर होंगी। ये वही राज्य हैं, छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड, जहां से बंधुआ मजदूर बनाकर बच्चे और औरत-मर्द बाहर ले जाए जाते हैं, मानव तस्करी होती है, लोगों को देह के धंधे के लिए मजबूर किया जाता है। ऐसे तमाम मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक आज चौकन्ना होकर देख रहा है, और राज्यों के सबसे बड़े अफसरों को उसने सीधे जवाबदेह ठहराया है। इसलिए इस लोकतंत्र में यह नहीं कहा जा सकता कि अदालतें भी नहीं सुनती हैं। आवाज उठाने की जरूरत है, लोगों को खुद उठने की जरूरत है, और आज अंग्रेज सरकारें नहीं हैं कि हथगोले फेंकने पड़ें, लोगों को मौजूद लोकतांत्रिक औजार उठाकर ऐसे जुर्म से निपटना चाहिए। 

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