केजरीवाल और मोदी दोनों को सबक लेने की जरूरत

संपादकीय
11 फरवरी 2015

दिल्ली में नतीजे निकलने के अगले दिन, आज सुबह अरविंद केजरीवाल ने केन्द्रीय शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू से मुलाकात की, और कल सुबह वे इस वक्त तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिल चुके रहेंगे। दिल्ली राज्य, भारत के संवैधानिक ढांचे में एक पूर्ण राज्य नहीं है, और वहां की पुलिस सहित कुछ दूसरे मामलों में केन्द्र सरकार का दखल रहता है, इसलिए चुनाव हारने के बाद भाजपा के कुछ समर्थक यह भी कह रहे हैं कि केजरीवाल की जीत एक बड़ी म्युनिसिपल में जीत जैसी है। यह एक अलग बात है कि इसी बड़ी म्युनिसिपल में जीत के लिए मोदी ने अपने आपको झोंक दिया था। खैर, चुनाव कल निपट चुके हैं, नतीजे आ चुके हैं, आम आदमी पार्टी की सरकार बनने जा रही है, और तीन दिन बाद जिस वक्त बाकी देश में प्रेम के खिलाफ धर्मान्ध और साम्प्रदायिक ताकतें हिंसा कर रही होंगी, उस वक्त दिल्ली में केजरीवाल शपथ ले रहे होंगे। 
हमने छत्तीसगढ़ के म्युनिसिपल चुनावों को लेकर भी बार-बार यह बात लिखी थी कि चुनाव के बाद अब पार्षदों, महापौरों, और म्युनिसिपलों की बाकी कमेटियों में चुने गए लोगों, सभापति, इन सबको चुनाव के पहले की कटुता को छोड़कर, पार्टियों की राजनीति को छोड़कर, मिलकर जनहित में काम करना चाहिए। यह बात स्थानीय संस्थाओं से परे राज्यों पर भी लागू होती है, और पूरे देश पर भी। हमने यह देखा है कि गैरजरूरी टकराव से किस तरह केन्द्र-राज्य के संबंध खराब होते हैं, और उनका नुकसान राज्य पर अधिक दिखता है, होता पूरे देश को है। इससे देश की लोकतांत्रिक   हवा भी गंदी होती है, और ऐसी मिसालें कायम होती हैं जिनसे कि आगे भी गंदगी बढ़ते चलती है, और जनकल्याण पिछड़ते चलता है। इसलिए हम उसी नसीहत को आज दिल्ली के संदर्भ में फिर दुहराना चाहते हैं। आज दिल्ली विधानसभा में केजरीवाल और उनकी पार्टी की स्थिति लोकसभा में मोदी की स्थिति के मुकाबले भी सौ गुना अधिक ताकतवर है। ऐसा हैरतअंगेज जनसमर्थन किसी को भी बददिमाग कर सकता है। और इसी से बचने की जरूरत है। बहुत से लोगों का यह भी मानना है कि जिस तरह भाजपा के भीतर नरेन्द्र मोदी, और संसद के भीतर भाजपा-एनडीए की ताकत रही, उसी से देश में एक ऐसी बददिमागी पनपी जिसने कि हिंसा और साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया, और उसका नतीजा दिल्ली चुनाव में भाजपा की ऐसी हार की शक्ल में सामने आया। इसलिए आज दिल्ली विधानसभा और सरकार में लोकतांत्रिक-तानाशाह किस्म की ताकत पा चुके अरविंद केजरीवाल को चुनावी और आंदोलनकारी तेवरों से बाहर आना पड़ेगा और सरकार चलाने के एक गंभीर अंदाज में काम करना पड़ेगा, वरना किसी भी किस्म की बददिमागी अगले चुनाव में भारी पड़ेगी। 
देश के संघीय ढांचे में केन्द्र-राज्य संबंध किसी-किसी वक्त बहुत कड़वे भी हुए हैं। जैसे आज भी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से शिष्टाचार के नाते भी नहीं मिली हैं। जबकि सीपीएम के त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार भी जाकर प्रधानमंत्री से मिले हैं। चुनाव के वक्त की कड़वाहट को छोड़कर लोगों को देश और प्रदेश के हित में काम करना चाहिए। अरविंद केजरीवाल के संदर्भ में ही हम इन बातों को आज यहां लिख रहे हैं और उनको अब अधिक बोलना बंद करके ऐसे काम करना चाहिए जो बोलें। दिल्ली का विकास अकेले केजरीवाल की फिक्र नहीं है, वह केन्द्र सरकार की भी फिक्र है। और दुनिया के सामने भारत की यह राजधानी एक मिसाल के तौर पर हमेशा ही सामने रहती है। इसलिए इस मिसाल को एक अच्छी और बेहतर मिसाल बनाने का काम मोदी और केजरीवाल सरकारों को मिलकर करना चाहिए। देश की जनता ने यह वोट काम के लिए दिया है, टकराव के लिए नहीं। इसलिए जहां तक किसी टकराव की जरूरत खड़ी न हो, महज राजनीति के लिए टकराव से बचना चाहिए। केजरीवाल दिल्ली विधानसभा के चुनाव में इसके ऊपर और कहीं भी नहीं जा सकते। लेकिन अगले चुनाव के पहले वे अपने काम से इस राज्य के पूरे इतिहास के ऊपर जा सकते हैं। इतिहास गढऩे के लिए नहीं, जनता के भले के लिए उनको ऐसा जरूर करना चाहिए। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐसे मौके गिने-चुने ही आते हैं, और गिने-चुने ही मिलते हैं। कुछ महीने पहले मोदी को ऐसा मौका मिला था, लेकिन अपने बेकाबू और हिंसक-साम्प्रदायिक साथियों की हरकतों को अनदेखा करके उन्होंने उस मौके को खो दिया, और वे देश के प्रधानमंत्री बनने के बजाय आक्रामक हिन्दू ताकतों के प्रधानमंत्री साबित किए जा रहे हैं। दिल्ली के इस चुनाव से केजरीवाल और मोदी दोनों को सबक लेने की जरूरत है। एक को पिछले कुछ महीनों के लिए, और दूसरे को अगले पांच बरस के लिए।

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