छत्तीसगढ़ में सरकारी भ्रष्टाचार सरकारी मंजूरी से ही जारी

संपादकीय
15 फरवरी 2015

छत्तीसगढ़ में चावल के कारोबार में सरकार का सबसे बड़ा हिस्सा रहता है। धान खरीदी से लेकर धान के परिवहन तक, और फिर उसे गोदामों में रखने से लेकर, धान की मिलिंग तक, फिर चावल के परिवहन और उसे गोदाम में रखने से लेकर राशन दुकानों तक पहुंचाने और उसे जनता को देने में हर बरस दसियों हजार करोड़ का काम होता है। इतनी बड़ी रकम छत्तीसगढ़ के किसी दूसरे काम में नहीं लगती। और यह राज्य सरकार की सबसे बड़ी सब्सिडी भी है। राज्य के भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो ने जिस अंदाज में पहले सिंचाई विभाग में रिश्वत की नगदी के साथ बहुत से अफसरों को पकड़ा, और उसके बाद अब जिस तरह नागरिक आपूर्ति निगम और खाद्य विभाग में भयानक भ्रष्टाचार, कमीशन, और ऊपर तक रिश्वत की रकम पहुंचाने के रिकॉर्ड के साथ सरकारी दफ्तर से करोड़ों रूपए नगदी की जब्ती की है, उससे लोगों की यह धारणा सही साबित होती है कि छत्तीसगढ़ सरकार में लोग भयानक भ्रष्टाचार में लगे हुए हैं। खुद सत्तारूढ़ भाजपा के नेता यह कहते नहीं थकते कि उनकी पार्टी की सरकार में किस कदर बेकाबू भ्रष्टाचार है। 
अब यह भ्रष्टाचार तो मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की सबसे पसंदीदा और प्रतिष्ठा सूचक अनाज की योजना में है। तो इससे यह जाहिर है कि बाकी विभागों में भ्रष्टाचार का क्या हाल होगा। पाठकों को याद होगा कि कुछ ही महीने पहले जब बिलासपुर में स्वास्थ्य मंत्री के अपने जिले में सरकारी नसबंदी कैम्प में डेढ़ दर्जन महिलाओं की मौत हुई, तो तब से लेकर अब तक सरकार में बैठे लोग इसी बात पर घुमा-फिराकर बचने की कोशिश कर रहे हैं कि वह कैम्प एक डॉक्टर ने नियमों से परे लगा दिया था, कभी सरकार कहती है कि सरकारी खरीद की दवा जहरीली थी, कभी कुछ और कहती है। इस तरह अलग-अलग बातों को करके मामले की गंभीरता को कम करने की कोशिश की गई, लेकिन सरकार की मासूमियत पर किसी को भरोसा न हुआ, न उसकी कोई वजह है। इसी तरह जब सिंचाई अफसरों के पास करोड़ों की नगदी बरामद हुई, तो भी लोग इतनी बड़ी रकम देखकर चौंके। लेकिन अभी नागरिक आपूर्ति निगम में जिस अफसर के पास से करीब दो करोड़ रूपए नगद बरामद किए गए, उस अफसर का पुराना रिकॉर्ड भी बड़ा शानदार है। कुछ बरस पहले उसे रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा गया था, और उसके बाद से आज तक उसके खिलाफ मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं दी गई। अगले बरस इस रंगे हुए हाथ को रंगने के दस बरस पूरे हो जाएंगे, और यह उम्मीद है कि तब तक भी सरकार इसके खिलाफ मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं देगी। रिश्वत लेते हुए पकड़ाने के बाद उसे ऐसी कुर्सी पर बिठाया गया जहां पर कि वह लाखों के बाद अब सैकड़ों करोड़ की रिश्वत जुटा सके, और उसे ऊपर बांट भी सके। 
छत्तीसगढ़ में सरकार की यह भयानक हालत है कि एक से एक परले दर्जे के भ्रष्ट अफसर कमाऊ कुर्सियों पर बैठकर राज्य सरकार के बड़े-बड़े खर्चीले फैसले करते हैं, और उनके खिलाफ मुकदमे की इजाजत की फाइलें दीमक का इंतजार करते पड़ी रहती हैं। यह नौबत बदलनी चाहिए। कुछ नमूनों को लेकर अगर कोई अदालत चले जाए तो हो सकता है कि वहां से राज्य सरकार को नोटिस भी जारी हो जाए कि दस-दस बरस तक मुकदमे की इजाजत अगर देना ही नहीं है, तो फिर भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करने वाले दफ्तरों को बंद क्यों नहीं कर दिया जाता? इस राज्य में तो वन विभाग के बड़े-बड़े घोटालाबाज अफसर वन विभाग के बाहर भी सरकार की बड़ी-बड़ी कुर्सियों को सम्हाल रहे हैं, जांच में कुसूरवार पाए जाने के बाद भी प्रमोशन पा रहे हैं, और उनके मुकदमे उनकी जिंदगी में कभी शुरू नहीं हो सकेंगे। 
यह नौबत बहुत ही शर्मनाक है, और खुद सरकार का एक कड़क अफसर भ्रष्टाचार विरोधी कुर्सी पर आने के कुछ हफ्तों के भीतर ही बड़े-बड़े संगठित भ्रष्टाचार को इस तरह से पकड़कर सामने ला रहा है, तो उससे यह जाहिर है कि भ्रष्टाचार को पकडऩे के लिए किसी परमाणु-फार्मूले की जरूरत नहीं है, सिर्फ नीयत की जरूरत है। और सिर्फ पकड़ लेने से कुछ नहीं होता, सरकार जब मुकदमे की इजाजत नहीं देती, तो उसका बड़ा सीधा मतलब होता है कि भ्रष्टाचार को जारी रखना। अब इतने बड़े-बड़े मामले पकड़ाने के बाद सरकार को अपनी नीयत साफ करनी चाहिए। 

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