राज्य के सरकारी अस्पतालों को तुरंत सुधारने की जरूरत

19 फरवरी 2015
संपादकीय
छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली तक के अखबारों में लगातार खबरें छप रही हैं कि स्वाइन फ्लू के इलाज की दवाओं की किल्लत है, और उसके बचाव के टीके इलाज में लगे हुए डॉक्टरों तक को नसीब नहीं हो रहे हैं। दूसरी तरफ दवा निर्माताओं का कहना है कि सरकारी नियमों की वजह से दवाओं की कमी हो रही है। छत्तीसगढ़ में सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों को भी ये दवाएं नहीं मिल पा रही हैं। इससे अलग कई मौकों पर ऐसी खबरें छपती रहती हैं कि छत्तीसगढ़ के अस्पतालों में कभी एचआईवी के शिकार लोगों को वक्त पर दवा नहीं मिल रही है, तो कभी कुत्तों के काटने से जख्मी होकर पहुंचे लोगों को एंटी-रैबीज दवा नहीं मिल पा रही है। जिंदगी बचाने के लिए जो सबसे जरूरी चीज है, वह एक तो मिल नहीं पा रही, और जैसा कि छत्तीसगढ़ में नसबंदी-मौतों के वक्त सामने आया था, दवाएं ऐसी कंपनियों से आ रही थीं, जो बार-बार ब्लैकलिस्ट होते रहती हैं, और खुद सरकार नसबंदी-मौतों के लिए अपनी ही खरीदी हुई, छत्तीसगढ़ में ही बनी हुई दवा को जहरीला साबित करने में लगी हुई थी। 
अब यह देखें कि छत्तीसगढ़ में बनने वाली दवा के लिए सरकार के ही कई विभाग जिम्मेदार हैं, छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पतालों के लिए दवा खरीदी के लिए सरकार जिम्मेदार है, दवा ठीक है या नहीं, इसकी रिपोर्ट अगर दवा खप जाने के बाद तक नहीं आती है, तो इसके लिए भी सरकार जिम्मेदार है। और सरकारी अस्पतालों में संक्रामक रोगों से लेकर रैबीज तक के लिए अगर दवाएं वक्त पर नहीं हैं, तो उनके लिए भी सरकार ही जिम्मेदार है। इस राज्य के सरकारी अस्पतालों में हाल कुछ ऐसा दिखता है कि वहां इलाज नहीं हो रहा, सड़क किनारे का कोई फुटपाथ बन रहा है, जहां पर कि रेत-सीमेंट चार दिन बाद भी पहुंचे तो भी फर्क नहीं पड़ता। सरकारी अस्पतालों की ऐसी बदहाली का नतीजा रहता है कि लोग निजी अस्पतालों की तरफ जाने को बेबस होते हैं, और उसके लिए कर्ज भी लेने को तैयार रहते हैं। कल की ही खबर है कि प्रदेश के स्वास्थ्य सचिव ने यह पाया कि एक जिले में सरकार की एक अस्पताल-योजना के पैसों का इस्तेमाल ही नहीं हो पाया, और इन पैसों को अब लंबे वक्त बाद दूसरे जिले को दिया जा रहा है।
दरअसल इलाज के काम को सरकार किसी भी दूसरे सरकारी कामकाज की तरह ले रही है। यह प्रदेश खुद सरकार के रिकॉर्ड के मुताबिक आधी आबादी गरीबों वाला है। ऐसे में सरकार चाहे इलाज के लिए लोगों को बीमा कार्ड दे, उससे सरकारी अस्पतालों की जरूरत और जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती। जब राजधानी के मेडिकल कॉलेज से जुड़े हुए प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल की बदहाली की खबरों के बिना एक दिन नहीं गुजरता, तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि गांव-जंगल तक फैले हुए सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में क्या हाल होगा। प्रदेश की जनता यह पा रही है कि सरकार का स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह और बुरी तरह बेकाबू है, और यह नौबत एक विभाग से ऊपर की कार्रवाई जैसी है। राज्य सरकार को तुरंत इस नौबत को सुधारना चाहिए। 

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