मोदी की अंगे्रजी से जिन कुलीनों को दिक्कत है...

20 फरवरी 2015
संपादकीय
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोगों को चांैकाते हुए समय-समय पर अंगे्रजी में भाषण देना शुरू किया है, और बहुत से लोग इस बात पर हक्का-बक्का हैं कि वे सामने की एक स्क्रीन पर देखते हुए भी जो अंगे्रजी बोल रहे हैं, वह देश के बहुत से नेताओं की अंगे्रजी से बेहतर है, हिन्दी से बेहतर है, और मोदी के आलोचकों की उम्मीदों से बहुत बेहतर है। अब यह चूक सिर्फ अंगे्रजी में नहीं होती बल्कि किसी भी भाषा के साथ हो सकती है कि लोग बोलते हुए कुछ उच्चारण गलत कर जाएं, किसी भाषा के कुछ शब्दों को गलत समझ लें। श्रीलंका के राष्ट्रपति आए तो उनकी पत्नी के नाम के पहले अंगे्रजी में लिखा गया मिसेज को उन्होंने एमआरएस पढ़ दिया, तो इसे लेकर हिन्दी वाले, और अंगे्रजी वाले दोनों ही उनके ऊपर चढ़ बैठे हैं। यह अपनी-अपनी सोच है। अंगे्रजी के लोगों को लगता है कि हिन्दी वाला एक नेता यह दुस्साहस कैसे कर रहा है कि वह अंगे्रजी बोल रहा है, और हिन्दी वालों को यह लग रहा है कि अपनी जुबान छोड़कर यह फिरंगी जुबान बोलना मोदी की हीनभावना से उपजा हुआ है, मोदी की कुंठा से उपजा हुआ है। हिन्दी के एक बड़े लेखक का लिखा एक बड़ा सा लेख हमारे सामने है जिसमें वे इसे मोदी की कुंठा करार दे रहे हैं।
हमारा यह मानना है कि भाषा को किसी सांस्कृतिक गौरव से जोड़कर देखना निहायत गैरजरूरी है। भाषा को बनाया गया था लोगों के बीच बातचीत के एक औजार की तरह। इसका उसी तरह इस्तेमाल भी होना चाहिए, और इसे किसी झूठे राष्ट्रीय या सांस्कृतिक गौरव से जोड़कर देखना उसी तरह का है जिस तरह एक आक्रामक राष्ट्रवाद को कुछ लोग बढ़ावा देते हैं। लेकिन यह पहलू भी आज की हमारी चर्चा का मुख्य मुद्दा नहीं है, इसलिए हम प्रसंगवश की गई इस चर्चा को यहीं छोड़कर आगे मुद्दे की बात पर आना चाहते हैं।
भारत में कई तरह के नेता हुए हैं। ममता बैनर्जी की अंगे्रजी और हिन्दी कुछ भी आम लोग नहीं समझ पाते। कमोबेश ऐसा ही हाल प्रणब मुखर्जी का रहता है। सोनिया गांधी ने बड़ी कोशिश करके हिन्दी के लिखे हुए भाषणों को पढऩा सीखा है, और देश की एक बड़ी आबादी से सीधे बात कर सकती हैं। लेकिन देवगौड़ा जैसे प्रधानमंत्री भी हुए जो कि हिन्दी नहीं बोल पाते थे। चिदंबरम जैसे दक्षिण के बहुत से ऐसे नेता हैं जो पूरी जिंदगी दिल्ली की राजनीति करते हुए भी हिन्दी नहीं सीख पाए। छत्तीसगढ़ में ही विद्याचरण शुक्ल और श्यामाचरण शुक्ल यहीं पैदा हुए और यहीं पंचतत्व में विलीन हुए, लेकिन पौन सदी की अपनी जिंदगी में वे छत्तीसगढ़ी नहीं सीख पाए। ऐसे में अगर नरेन्द्र मोदी अंगे्रजी सीखने की कोशिश करते हैं, तो यह उनके लिए या देश के लिए शर्मिंदगी की बात नहीं है, यह गौरव की बात है कि देश के सबसे बड़े ओहदे पर पहुंचने के बाद भी किसी में कुछ सीखने की हसरत बाकी है। प्रधानमंत्री का कौन सा ऐसा काम है जो कि वे अपनी जुबान में नहीं कर सकते थे। लेकिन इसके बावजूद अगर वे एक नई जुबान में अपना अभ्यास बढ़ा रहे हैं तो हम इसमें मखौल का कोई सामान नहीं देखते। हो सकता है कि देश के कई नेताओं को दून स्कूल जैसे महंगे संस्थानों में अंगे्रजों जैसी अंगे्रजी सीखने का मौका मिला हो। लेकिन दूसरी तरफ चाय बेचने वाले बच्चे को अगर बूढ़ा होकर आज अगर यह मौका मिल रहा है, तो यह कुछ उसी तरह का है कि बुढ़ापे में आकर कोई स्कूल जाने की हिम्मत करे।
किसी की ऐसी कोशिश का मखौल उड़ाना हमारे हिसाब से एक बहुत ही शहरी और शिक्षित, संपन्न और कुलीन तबके का अहंकार है, जो कि यह मानकर चलता है कि अंगे्रजी महज उसकी खानदानी विरासत रहनी चाहिए, और किसी निचले तबके से आए हुए के कानों में अगर अंगे्रजी के शब्द घुस भी जाएं तो उसके कानों में पिघला सीसा उंड़ेल देना चाहिए। हम मोदी की कोशिश की तारीफ करते हैं। हिंदुस्तान की तकरीबन पूरी आबादी ऐसी ही है जिसे कि किसी न किसी दूसरी या तीसरी भाषा को सीखने की कोशिश करनी चाहिए। आज जब इस देश के बड़े-बड़े राष्ट्रीय नेता किसी भी भाषा में अक्ल की कोई भी बात नहीं कर पा रहे हैं, तब अगर प्रधानमंत्री अंगे्रजी सीख रहे हैं, या उसे बेहतर बना रहे हैं, तो यह बात देश की जनता के लिए एक बड़ी पे्ररणा हो सकती है। भाषा के घमंडियों को अपनी आभिजात्य सोच अपने तक सीमित रखनी चाहिए, वंचित तबका इसी तरह धीरे-धीरे, मौका मिलने पर सीख पाता है, उसका हौसला अगर बढ़ाने की सोच न हो, तो कम से कम उसके हौसले को पस्त करने की कोशिश न करें।

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