कोयले से होती कमाई साबित कर रही है मनमोहन सिंह के जुर्म

संपादकीय
21 फरवरी 2015

कोयले की नीलामी में देश को जितनी रकम मिलते दिख रही है, उससे यूपीए सरकार के वक्त के सीएजी विनोद राय का अंदाज सही साबित होते दिख रहा है। अगर देश के कोयला खदानों से जनता के खजाने में लाखों करोड़ रूपए आ रहे हैं, तो यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार और कुकर्मों को छुपाते हुए जिस मजाक के अंदाज में उसके मंत्री कपिल सिब्बल ने शून्य-नुकसान का फार्मूला सामने रखा था, उसे पत्थर पर खोदकर सिब्बल के बंगले के गेट पर लगाना चाहिए। 
अभी नीलामी बहुत बाकी है, और यह साबित होते चल रहा है कि यूपीए सरकार के समय पसंदीदा लोगों को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के स्तर पर जिस तरह से खदानों की बंदरबांट हुई थी, वह मनमोहन सिंह सहित तमाम लोगों को कटघरे में पहुंचाने के लिए काफी है। हमारे पाठकों को याद होगा कि पिछले चार बरसों में जैसे-जैसे दूरसंचार घोटाला, या कोयला घोटाला सामने आने लगे थे, और इनमें प्रधानमंत्री कार्यालय की साफ भूमिका दिख रही थी, उसके चलते हुए हमने बार-बार लिखा था कि मनमोहन सिंह को अदालती कटघरे में होना चाहिए। किसी गिरोह का सरगना सारे जुर्म देखते हुए अनदेखा करने और चुप रहने की रियायत नहीं पा सकते। मनमोहन सिंह की निजी सज्जनता को काबिलीयत गिनना बेवकूफी की बात है। सरकार के मुखिया को सज्जन तो होना ही चाहिए, उसमें चर्चा की कोई बात नहीं है, लेकिन इसके साथ-साथ मुखिया को अपने मातहत लोगों के जुर्म सामने आने पर उनके खिलाफ कार्रवाई करने का हौसला भी रहना चाहिए। इस पैमाने पर मनमोहन सिंह एक खासे बड़े मुजरिम हैं, और मोदी सरकार हो सकता है कि उनको राजनीतिक निशाना बनाकर सोनिया-परिवार की तरफ से ध्यान बंटाना न चाहे, लेकिन फिर भी अदालत खुद इस बारे में सोच सकती है, और लोगों को अदालती मामले में दखल की इजाजत लेकर यह मांग भी करनी चाहिए। 
हिन्दुस्तान का इतिहास सोने की एक ऐसी चिडिय़ा रहा है जिसमें खदानों से लेकर जनता की जमीन तक राजाओं के हाथ से निकलकर सरकार के हाथ आई थी, और वह जनता के लिए इस्तेमाल होने वाली थी। बाद के बरसों में सरकार हांक रहे लोग सोने की इस चिडिय़ा के पंख नोंच-नोंचकर अपने घर भरते गए, और कोयला खदानों को पूरी जिंदगी के लिए मिट्टी के मोल बांट देने की साजिश सोने का अंडा देने वाली मुर्गी का पेट चीर देने जैसा काम था। एक बार यह नीलामी पूरी हो जाए, उसके बाद कोयले के बचे हुए चूरे से यूपीए सरकार के जिम्मेदार लोगों का मुंह काला किया जाना चाहिए। आज अगर अदालती कड़ाई से और सरकार के रूख से यूपीए के प्रधानमंत्री से लेकर बाकी बहुत से लोग अगर जेल भी जाते हैं, तो उसे राजनीतिक-बदले का काम नहीं मानना चाहिए। सत्ता की दलाली, और जनता को, देश को लूटना बंद होना ही चाहिए। हर सरकार अगर राजनीतिक बदनामी से बचने के लिए पिछली सरकार  के जुर्मों को अनदेखा करती चलेगी, तो इस देश में कभी जनता को लूटने पर सजा ही नहीं हो पाएगी। हमारा यह मानना है कि सत्ता के मुखिया को अपने किए हुए का दाम चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए। 
मनमोहन सिंह के लिए अब भी मौका है कि खुद होकर वे देश के सामने एक ऐसा श्वेत पत्र सामने रखें, जिसमें वे अपने किए हुए हर गलत काम को कुबूल करें। अगर उनमें जरा भी सज्जनता बाकी है, या उनमें सज्जनता फिर से जिंदा हुई है, तो उन्हें अपने जीते जी देश के सामने लूट की कहानी रखनी चाहिए। बची जिंदगी में थोड़ी-बहुत इज्जत वापिस हासिल करने का उनके सामने यही एक तरीका है, कि जिस तरह ईसाई धर्म में चर्च के प्रायश्चित-स्वीकारोक्ति के कन्फेशन-चेंबर में जाकर लोग अपने पाप कुबूल करते हैं, मनमोहन सिंह को आज इस देश को ही कन्फेशन-चेंबर मानकर अपने किए हुए गलत कामों के लिए सजा या माफी, जो वे चाहें, मांगना चाहिए।

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