गोपनीय जानकारी की चोरी कंपनियों के सिर्फ मुलाजिम नहीं, मालिक भी मुजरिम

संपादकीय
22 फरवरी 2015

केन्द्र सरकार के मंत्रालयों में जिस तरह से जासूसी का मामला पकड़ाया है, और बड़ी-बड़ी खरबपति कंपनियों के बड़े-बड़े अफसर उसमें शामिल मिले हैं, और उनकी गिरफ्तारी हुई है, वह बात देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए भयानक है। आंतरिक सुरक्षा सिर्फ नक्सलियों से खतरे में नहीं आती, जब इतने बड़े-बड़े आर्थिक भ्रष्टाचार, और जुर्म की तैयारी की है, और इसमें प्रधानमंत्री की पीठ पर हाथ रखने वाले उद्योगपति भी शामिल होते हैं, तो फिर यह समझ नहीं पड़ता कि सरकार की खुफिया जानकारियां देश का भला करेंगी, या फिर इन कारखानेदारों का? 
अभी जो अंदाज बैठ रहा है, उसके मुताबिक पेट्रोलियम मंत्रालय से जो फाइलें और जानकारी चोरी की गई हैं, और जिसके साथ लोग पकड़ाए हैं, वह देश की पेट्रोलियम नीति, और देश के पेट्रोलियम आयात सौदों से जुड़ी हुई हैं, और इनसे देश के करोड़ों-करोड़ के व्यापारिक सौदे जुड़े हुए हैं। अगर सरकार की ऐसी जानकारी धंधेबाजों को मिल रही है जिससे वे सरकार की आने वाली नीति और फैसलों को मालूम करके उसके हिसाब से अपने कारोबारी फैसलों को कर सकते हैं, तो इससे देश का इतना बड़ा नुकसान होता है कि जनता तक देश का फायदा नहीं पहुंच पाता। 
लेकिन एक बात जो थोड़ी सी हैरान करती है, वह यह है कि सीधे प्रधानमंत्री तक पहुंच रखने वाले कारोबारी इस देश में हमेशा से सरकार की नीतियों और सौदों को प्रभावित करते आए हैं। आज मुकेश अंबानी की कंपनी इसमें फंसी है, और इसी मुकेश अंबानी के पिता धीरूभाई अंबानी के बारे में कहा जाता था कि उन्होंने अपना पूरा साम्राज्य इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, प्रणब मुखर्जी, मुरली देवड़ा जैसे कांग्रेस नेताओं और मंत्रियों के मार्फत अपनी मर्जी के फैसले करवाकर खड़ा किया था। इन बातों की हकीकत तो जानना मुश्किल है, लेकिन यह बात भी जाहिर थी कि एनडीए की पिछली सरकार के, और उस वक्त की भाजपा के एक सबसे ताकतवर मंत्री प्रमोद महाजन के बारे में भी यही कहा जाता था कि वे देश के कारोबारियों के सबसे करीबी भाजपा नेता थे, और खुद उनके भाई ने उनकी निजी दौलत के बारे में कहा था कि वह हजार करोड़ से अधिक थी। अब अगर पल भर के लिए यह मान लें कि भाई की कही यह बात सच थी, तो प्रमोद महाजन या वैसे किसी भी दूसरे नेता को कारोबारी हजार करोड़ तो तभी देंगे, जब उनको लाखों या करोड़ों-करोड़ का मुनाफा होगा। इसके अलावा प्रमोद महाजन ने पार्टी के लिए भी पैसे जुटाए होंगे, और उस वक्त की अटल सरकार के कुछ और लोगों ने भी कारोबारियों पर मेहरबानी करके ऐसा किया होगा। 
यह बात न तो नई है, और न ही कांग्रेस और भाजपा तक सीमित है। देश में वामपंथियों को छोड़कर करीब-करीब हर पार्टी की सरकारों में कारोबारियों का ऐसा ही बोलबाला रहता है। इसलिए हमको थोड़ी सी हैरानी होती है कि आज इन कारोबारियों को मंत्रालय के स्तर पर कागजात चोरी करवाने की क्या जरूरत पड़ी थी? एक मजाक यह भी बनता है कि सरकार और कारोबार दोनों ही अपनी इमेज को सुधारने के लिए छोटे-छोटे सिरों की ऐसी कुर्बानी देकर साबित कर रहे हैं कि उनका एक-दूसरे से बहुत अधिक लेना-देना नहीं है। यह सिलसिला बहुत ही खतरनाक है अगर चोरी करवाए बिना सरकारी नीतियों की जानकारी कारोबारियों को रहती है, या फिर वे नीतियां और फैसले, बजट की जानकारी, सौदों की जानकारी, चोरी करवाने की हैसियत रखते हैं। अब जब यह मामला पकड़ में आ ही गया है, तो सवाल यह उठता है कि इन कंपनियों के बड़े अफसर सरकार से गोपनीय जानकारी की चोरी अपने घर के लिए तो करवा नहीं रहे थे, अपनी कंपनियों के लिए ही करवा रहे थे। और आज सरकार के भीतर ऐसा कानून बनने जा रहा है, या शायद बन चुका है, कि किसी कंपनी के लोग अगर रिश्वत देते पकड़ाते हैं, तो उनको सिर्फ निजी रूप से गुनहगार नहीं माना जाएगा, और कंपनियों के डायरेक्टर भी मुजरिम माने जाएंगे। जो बात रिश्वत देने पर लागू होती है, वही बात इस तरह की खुफिया जानकारी की चोरी पर भी लागू होती है। अब यह देखना है कि सुप्रीम कोर्ट इन दो बातों को जोड़कर देखता है या नहीं, और इसे लेकर कुछ जनसंगठनों को सुप्रीम कोर्ट जाना जरूर चाहिए। 

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