दिल्ली में भाजपा की जमानत जब्त होने पर कुछ बातें...

10 फरवरी 2015
संपादकीय

यूं तो पूरा देश आज अरविन्द केजरीवाल की जीत की उम्मीद में तैयार बैठा था, और भाजपा के लोगों को भी ऐसी नौबत का अहसास था। लेकिन यह अंदाज किसी को नहीं था, चुनावी सर्वे करने वालों को भी नहीं था कि हाल ही मोदी की थमाई झाड़ू को लेकर दिल्ली की जनता भाजपा को बुहारकर फेंक देगी। कांगे्रस तो वैसे भी चुनाव से बाहर थी, लेकिन दिल्ली में आज नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, और भाजपा की जमानत ही जब्त हो गई। कुछ ही महीने पहले जिस दिल्ली में लोकसभा चुनाव में भाजपा को सात की सात सीटें मिली थीं, आज वहां विधानसभा की सत्तर सीटों में भी भाजपा को सात सीटें नहीं मिली हैं, और अभी तक के आंकड़े भाजपा को कुल तीन सीटें देते दिख रहे हैं। दूसरी तरफ कांगे्रस दिल्ली विधानसभा में अब सिर्फ दर्शकदीर्घा में बैठ सकती है, अगर उसके किसी नेता ने इतना साहस बचा हो तो। 
अब हम पहली नजर में उन वजहों को देखें जो कि भाजपा की ऐसी बुरी हार या कि केजरीवाल की, उनकी आम आदमी पार्टी की ऐसी अविश्वसनीय जीत के लिए जिम्मेदार हैं। दरअसल लोकतंत्र में जब चुनावों में दो पार्टियां आमने-सामने होती हैं, तो चुनावी नतीजे ऊपर की इन दो बातों में से किसी एक पर टिके हुए नहीं रहते, और दोनों ही बातों का मिला-जुला असर होता है। फिर भी हम यह देखें कि दिल्ली विधानसभा में एक बरस पहले मुख्यमंत्री बनकर आए, और 49 दिन में सरकार छोड़कर चले गए अल्पमत वाले केजरीवाल के पास इस एक बरस में ऐसा कोई करिश्मा करने की ताकत नहीं थी कि दिल्ली में इतिहास की सबसे बड़ी जीत उन्हें मिले। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के संपूर्ण एकाधिकार के तहत न सिर्फ दिल्ली के इस चुनाव में जो फैसले लिए, बल्कि पूरे देश में जिस तरह के तनाव के लिए भाजपा आज जिम्मेदार है, उसका भी नतीजा आज सुबह से चल रही वोटों की गिनती में सामने आया है। 
जिस तरह आखिरी हफ्तों में दिल्ली के भले या बुरे जैसे भी हों, पुराने भाजपा नेताओं को मानो राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान के तहत झाड़ू से घूरे पर डाल दिया गया, और जिस तरह राजनीति से बाहर की किरण बेदी को लाकर सीधे मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाया गया, उसी दिन से भाजपा की जीत खतरे में पड़ गई थी। लेकिन बात यहीं तक सीमित नहीं थी। दिल्ली में कई जातियों और धर्मों के लोग बसते हैं, इन तमाम लोगों ने भाजपा के मंत्रियों, सांसदों, नेताओं, और दूसरे हिंदू संगठनों की भयानक हिंसक, साम्प्रदायिक, अवैज्ञानिक, और पाखंडी बातें पिछले आधे-एक बरस में सुनी हैं, उनसे मोदी-सरकार और उनकी पार्टी का भारी नुकसान हुआ है। दिल्ली में दसियों लाख नौजवान भी रहते, पढ़ते, और काम करते हैं। इस पीढ़ी के मन में पे्रम भी बसता है, और जिस तरह अचानक इस देश में लव जिहाद नाम का एक नारा गढ़कर धर्म, जाति, और पे्रम के खिलाफ हिंसा फैलाई गई, उससे नौजवान पीढ़ी के मन में हिकारत पैदा होना जायज और जरूरी था, और आज के नतीजों ने भाजपा की जो जमानत जब्त हुई है, उसके पीछे ऊपर की ये दोनों बातें भी हैं।
एक तीसरी बात जो कि छोटी सी है, लेकिन जिसकी चर्चा खूब हुई, और नुकसान का कुछ हिस्सा इस वजह से भी हुआ, वह नरेन्द्र मोदी का एक कोट था, जिस पर उनका नाम बुना गया था, जिसके बारे में चर्चा थी कि उसका कपड़ा दस लाख का होगा, और जिसके बारे में मोदी की तरफ से कोई सफाई नहीं आई थी, उससे भी मोदी की सादगी, किफायत, और ईमानदारी की तस्वीर को नुकसान पहुंचा। पूरी दुनिया ने उनके अपने नाम वाले कपड़े पहनने को आत्ममुग्ध होना बताया, और ऐन चुनाव प्रचार के बीच अमरीकी राष्ट्रपति के दिल्ली के लंबे कार्यक्रम से जो फायदा मोदी की पार्टी को होना था, उसे एक कोट ने ढांककर रख दिया। सार्वजनिक जीवन में उठने वाले ऐसे सवालों पर जननेता के पास चुप्पी का कोई विकल्प नहीं होता है, लेकिन मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद से अब तक अपने पूरे दायरे की हिंसक बातों सहित दूसरे असुविधाजनक सवालों पर चुप्पी का सिलसिला जारी रखा है, और हमारा मानना है कि चुनावों के मौकों पर लोग ऐसी चुप्पी के अपने-अपने मतलब निकालते हैं। 
दिल्ली में भाजपा की हार बहुत ही बड़ी है, और इसके पीछे हम इन वजहों में से किसी एक को अकेले जिम्मेदार नहीं मानते। जिस तरह यूपीए की गलतियों और गलत कामों की वजह से मोदी और एनडीए को एक शून्य में धमाके के साथ दाखिल होने का मौका मिला था, कुछ वैसा ही शून्य दिल्ली में मोदी, भाजपा, और आसपास के लोगों के अहंकार की वजह से, हिंसक बातों की वजह से, साम्प्रदायिकता की वजह से बन गया था। और इस शून्य में अरविन्द केजरीवाल ठीक उसी तरह दाखिल हुए और समा गए, जिस तरह यूपीए राज के बाद मोदी लोकसभा में समा गए। 
हमारा ऐसा मानना है कि भाजपा के लिए इससे अच्छी कोई बात नहीं हो सकती थी कि उसके अपार बहुमत वाले राष्ट्रीय शासन के चलते हुए, पहले बरस में ही उसे ऐसी ठोकर लगी है जिसकी मलहम-पट्टी आज आसान है। आज का मौका मोदी और भाजपा के आत्मविश्लेषण और आत्ममंथन का है, और इसमें अगर देश में भड़काई जा रही साम्प्रदायिक हिंसा, नफरत और पाखंड के बारे में सोचा जाएगा, उसे रोका जाएगा, तो भाजपा अगले आम चुनाव के पहले उबर भी सकती है। अगर इस पार्टी के लोगों ने अपने तौर-तरीके बदले और सहयोगी संगठनों को लोकतंत्र और इंसानियत की हत्या करने, और गोडसे को महिमामंडित करने से रोका, तो अगली लोकसभा में भाजपा की संभावना बच भी सकती है। ऐसा न करने पर चुप्पी और सोची-समझी अनदेखी से देश भर में भाजपा को इसी तरह का नुकसान हो सकता है क्योंकि कई जगहों पर स्थानीय और भरोसेमंद विकल्प सामने आ सकते हैं। दो बरस पहले तक किसने सोचा था कि अपने से बड़े आकार के कपड़े पहनने वाला अरविन्द केजरीवाल नाम का एक छोटा सा घोड़ा अश्वमेध यज्ञ के विशाल घोड़े को इतनी बुरी तरह पीछे छोड़ेगा।
अब आखिर में उस कांगे्रस पार्टी की बात की जाए जो कि अभी साल भर पहले तक दिल्ली में पन्द्रह बरस से काबिज थी। यह पार्टी जिस हद तक खत्म हो चुकी है, उसे देखते हुए उसकी चर्चा पर फिलहाल जगह बर्बाद करने की जरूरत नहीं है। बाद में फिर कभी यह पार्टी प्रासंगिक होगी, तो फिर उस बारे में बात करेंगे।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें