ऐसी किफायत कुल मिलाकर जनता को बड़ी महंगी पड़ती है

संपादकीय
29 मार्च 2015
आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्राबाबू नायडू ने सभी विधायकों को आधे-आधे लाख रूपए में मोबाइल फोन देने का फैसला लिया है। इसे लेकर कुछ लोग आलोचना कर रहे हैं कि इसी राज्य में इसी मुख्यमंत्री ने अभी कुछ दिन पहले जनता से यह अपील की थी कि वे नया राज्य बनाने के लिए अपनी एक दिन की मजदूरी, या वेतन दान दें। इसके पहले भी उन्होंने लोगों से कहा था कि वे राजधानी निर्माण के लिए एक-एक ईंट दान दें। यह पहला मौका नहीं है जब इस राज्य में सरकार की तरफ से लैपटॉप या कम्प्यूटर-पैड या महंगे मोबाइल दिए गए हों, लेकिन इस सरकार से लोग किफायत की उम्मीद करते थे। सरकार के तमाम फैसले विधानसभा या लोकसभा में सभी दलों के विधायकों के सामने खुले रहते हैं और उनको मिलने वाले महंगे सामानों को लेकर उनको यह छूट भी रहती है कि वे न चाहें, तो न लें। छत्तीसगढ़ में भी बहुत बरसों से विधायकों को लैपटॉप देने की परंपरा रही है, और शायद सांसदों को भी संसद या सरकार की तरफ से मुफ्त में लैपटॉप मिलते हैं। 
अब किफायत के बड़े कट्टर हिमायती होने के बावजूद हम इस मामले में थोड़ी सी अलग सोच रखते हैं। भारत में सांसद या विधायक बनने के लिए लोगों को चाहे कुछ करना पड़ता हो, चुने जाने के बाद अपने पांच बरस के (और जम्मू-कश्मीर में छह बरस के विधायक) अपने कार्यकाल में इन निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को जितना वक्त जनता के लिए देना पड़ता है, वह उनको किसी और काम या कारोबार का वक्त नहीं दे सकता। और फिर सरकार के साथ किसी भी तरह के कामकाज वाले काम वे कर भी नहीं सकते, क्योंकि हितों के टकराव का मामला आएगा। फिर संसद या विधानसभा से जो तनख्वाह मिलती है, और जो सहूलियतें मिलती हैं, वे रोजाना सैकड़ों लोगों से मिलने, क्षेत्र का दौरा करने, सांस्कृतिक-सामाजिक शिष्टाचार के तहत उपहार देने, घर आने वाले लोगों को चाय-पानी पिलाने जैसे मामलों के लिए नाकाफी रहती है। परिवार के खर्च के लिए भी हिन्दुस्तान अपने सांसदों-विधायकों को कम तनख्वाह देता है। और संसद भवन में जो रियायती खाना सांसदों को मिलता है, उसके रेट को लेकर जैसी तस्वीर सांसदों की बनी हुई है, उनकी बाकी जिंदगी ईमानदारी की तनख्वाह से चलना मुश्किल रहता है। 
अब एक आम सोच यह भी बनी हुई है कि सांसद और विधायक भ्रष्ट होते हैं। दरअसल जनता राजनीति में, संसद और विधानसभा में, सरकार में, या बहुत से दूसरे दायरों में भी अधिकतर लोगों को भ्रष्ट मानकर चलती है, और हो सकता है कि यह सच भी हो। लेकिन इससे बड़ा सच यह है कि इनमें से हर दायरों में कुछ लोग, हो सकता है कि सीमित संख्या में, ईमानदार रहते हैं। अब उनके पांच बरसों के गुजर-बसर, और परिवार-पेशे को अगर देखें, तो भारत के सांसदों और विधायकों को मौजूदा वेतन से अधिक मिलना चाहिए। अंग्रेजी की एक पुरानी कहावत है कि आप जब मूंगफली देते हैं, तो आपको बंदर ही मिलते हैं। हिन्दी की एक कहावत है कि सस्ता रोए बार-बार, महंगा रोए एक बार। हमारे हिसाब से सांसदों और विधायकों को इतना वेतन मिलना चाहिए कि अच्छे खासे कमाऊ कारोबार या रोजगार में लगे हुए लोग भी उसे छोड़कर संसद-विधानसभा में आने की सोचें। अब हम छत्तीसगढ़ की ही बात करें, तो जिन विधायकों के जिम्मे राज्य के 64 हजार करोड़ के बजट पर निगरानी रखने का जिम्मा रहता है, उन 91 विधायकों में से हर एक पर औसत 700 करोड़ रूपए का जिम्मा बनता है। राज्य के इतने बड़े खर्च पर नजर रखने, उस बारे में सवाल उठाने, उसमें किफायत बरतने के लिए अगर विधायक को कम्प्यूटर-फोन, अच्छी तनख्वाह, अच्छे सहयोगी-कर्मचारी मिलते हैं, तो उसमें क्या बुराई है? खासकर ऐसे देश-प्रदेश में जहां पर कि सरकारी खर्च भी बहुत बड़े-बड़े भ्रष्टाचार में आधी सदी पुरानी परंपरा चली आ रही है, वहां पर अगर निर्वाचित प्रतिनिधियों को ईमानदार और असरदार बनाए रखना है, तो जनता को उन पर खर्च भी करना चाहिए, और हम बाकी चीजों की महंगाई पर रोना रोने वाले देश में सस्ते से सस्ता नेता पाने की सोच को सही नहीं मानते। ऐसी किफायत कुल मिलाकर बड़ी महंगी पड़ती है। 

इसरो से सीखने और नसीहत लेने की जरूरत


संपादकीय
28 मार्च 2015
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान, इसरो, को देश का प्रतिष्ठित गांधी शांति पुरस्कार दिया गया है। उसे तकनीकी उपलब्धि से देश के विकास में अभूतपूर्व और असाधारण योगदान देने के लिए यह सम्मान मिला। और आज देश का चौथा नेवीगेशन सेटेलाइट श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंन्द्र से छोड़ा जाएगा। इस मिशन की कामयाबी से भारत की उपग्रह आधारित जीपीएस प्रणाली अमरीका की जीपीएस प्रणाली की बराबरी पर पहुंच जाएगी।
 इसरो की अभी आधी-पौन सदी के भीतर की कहानी यह है कि वह जब रॉकेट रवाना करता था, तो रॉकेट के हिस्से कभी बैलगाड़ी पर, तो कभी साइकिल के कैरियर पर रखकर लांचिंग पैड तक ले जाए जाते थे। उन तस्वीरों को देखें तो लगता है कि आज अगर भारत में तमाम किस्म की गड़बडिय़ों के बावजूद यहां का अंतरिक्ष अनुसंधान और उस पर अमल इस ऊंचाई तक पहुंचे हैं, कि यहां के अंतरिक्षयान चांद और मंगल तक पहुंच गए, तो यह संस्था सचमुच ही एक असाधारण सम्मान के लायक है। जब देश नेताओं, अफसरों, कारोबारियों, और दूसरे पेशे के लोगों की वजह से दुनिया से लेकर हिन्दुस्तान के भीतर अदालतों तक शर्मिंदगी झेल रहा है, तब अगर इसरो एक ऐसा संस्थान है जो कि दुनिया के सबसे विकसित कई देशों के उपग्रह भी अंतरिक्ष में अपने रॉकेटों से पहुंचाता है, तो यह तमाम नकारात्मक माहौल के बीच देश की जनता के लिए गर्व की एक बात है, और विज्ञान-अनुसंधान के क्षेत्र में यह एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि है। 
देश पर गर्व होना भी जनता की सोच के लिए बहुत जरूरी होता है। तरह-तरह के मानवीय अपराध, तरह-तरह की अमानवीय खबरें, बड़े-बड़े ओहदों के किए हुए बड़े-बड़े जुर्म से देश में एक शर्मिंदगी का माहौल रहता है। ऐसे में नई पीढ़ी के सामने कोई प्रेरणा नहीं रह जाती है। फिर एक दूसरी बात यह कि देश में कई तबकों ने मिलाकर एक ऐसा अवैज्ञानिक वातावरण बनाकर रखा है, कि वैसे में वैज्ञानिक सफलता का सामाजिक महत्व और बढ़ जाता है। भारत के इसरो ने लगातार देश की कई तरह की सरकारों, और कई तरह के राजनीतिक दलों के राज के बीच भी लगातार सीमित बजट में असीमित काम किया है। जब देश में एक तरफ जनता का पैसा डुबाने, और सरकारी काम को अधिक से अधिक खर्च पर करने का एक किस्म से मुकाबला ही चल रहा है, तब एक संस्था अगर किफायत में बड़ा काम कर रही है, तो इससे देश की दूसरी सरकारी संस्थाओं को सीखना भी चाहिए।
हम  इसरो के संदर्भ में पहले भी लिख चुके हैं कि हिंदुस्तानियों को, जो जहां जिस काम को कर रहे हैं, उस काम में उत्कृष्टता की तरफ बढऩे की बहुत जरूरत है। जब लोगों को अपने काम में चलिटी की परवाह नहीं रह जाती, तब दुनिया में उनकी जरूरत घटती जाती है, और सामानों से लेकर सेवा तक, उससे कमाई की गुंजाइश भी खत्म होती जाती है। आज जब एक-एक सामान के अलग-अलग हिस्से दर्जन भर देशों में बनते हैं, और कोई तेरहवां देश उसकी मार्केटिंग करता है, तो ऐसे में जो देश, जहां के लोग चलिटी के लिए लापरवाह रहेंगे, वैसे देश और लोग दूसरे ग्रह तो दूर, खुद अपने शहर के बाजार में भी नहीं पहुंच पाएंगे, वहां भी दूसरे देश से आया सामान बिकेगा, दूसरे देश-प्रदेश से आए कारीगर काम करेंगे। 
सौ फीसदी हिंदुस्तानी हाथों और हुनर से काम करते इसरो की मिसाल से देश के हर किसी को कुछ न कुछ सीखने और नसीहत लेने की जरूरत है। न हिंदुस्तानी कामगार कमजोर हैं, न यहां के सामान कमजोर हैं।
दुनिया के सबसे अव्वल आधा दर्जन देशों में से भारत को एक बनाने का काम इस एक संस्थान ने किया है। लेकिन इससे सीखकर देश के हर पढऩे-लिखने वाले, हर काम करने वाले अपने-आप को बेहतर बना सकते हैं, अपने काम में सुधार ला सकते हैं, और आसमान को छू सकते हैं, उसे चीरकर दूसरे ग्रहों तक जा सकते हैं।  

दो अलग-अलग आत्महत्याएं और उनसे निकलती नसीहतें

संपादकीय
27 मार्च 2015
एक जर्मन मुसाफिर विमान के फ्रांस की पहाडिय़ों पर गिरने और डेढ़ सौ लोगों की मौत के बाद अब यह बात सामने आ रही है कि विमान के जूनियर पायलट ने जान बूझकर, सोच-समझकर इस विमान को गिराया। किसी काम से सीनियर पायलट कॉकपिट से बाहर गया था, और जब वह भीतर आने लगा, तो जूनियर पायलट ने दरवाजा नहीं खोला, और विमान को रफ्तार से नीचे लाकर पहाड़ी से टकरा दिया। अभी इसके पीछे कोई आतंकी मकसद नहीं दिख रहा है, इसलिए यह माना जा रहा है कि पायलट ने एक किस्म से आत्महत्या की है। लेकिन कुछ दूसरे लोग यह भी मान रहे हैं कि डेढ़ सौ लोगों को लेकर मरना आत्महत्या नहीं होती। यह नौजवान पायलट अपनी किशोरावस्था से ही पायलट बनना चाहता था, और वह इस तरह की खुदकुशी क्यों करेगा, यह भी अभी लोगों को समझ नहीं पड़ रहा है। लेकिन यूरोप से दूर भारत के कर्नाटक में एक आईएएस अफसर ने आत्महत्या की, और पहली नजर में ऐसा लग रहा था कि उसने सरकार के, राजनीति के ताकतवर और भ्रष्ट लोगों से थककर आत्महत्या की है। लेकिन कुछ दिनों के भीतर जो दूसरी बातें सामने आ रही हैं, उनके मुताबिक इस आत्महत्या के पीछे इस अफसर की एक दूसरी साथी अफसर से एकतरफा मोहब्बत भी हो सकती है, क्योंकि उसने इस किस्म के बहुत से संदेश आत्महत्या के ठीक पहले भेजे थे। 
इन दो मामलों को देखकर ऐसा लगता है कि जो लोग जाहिर तौर पर पेशे में बड़े कामयाब हैं, वे भी इस तरह खुदकुशी कर सकते हैं। अब इससे दो-तीन अलग-अलग बातें उठती हैं। जिस जर्मनी के लोग विमान में मरने वालों में सबसे बड़ी संख्या में थे, वहां की राष्ट्र प्रमुख ने कहा है कि सोच-समझकर किसी पायलट का ऐसा करना अकल्पनीय है। और दुनिया में हवाई सफर करने वाले अधिकतर लोगों की रूह यह सोचकर कांप रही होगी कि उनके विमान के पायलट ने अगर इस तरह की आत्मघाती हरकत तय की, तो मुसाफिरों का क्या होगा। अमरीका और यूरोप के मुकाबले भारत में ऐसे हादसों या ऐसी हरकतों की गुंजाइश थोड़ी सी कम इसलिए है कि यहां के उड़ानों के कानून में यह शर्त है कि अगर किसी एक पायलट को किसी वजह से कॉकपिट छोडऩी पड़े, तो भी विमान के किसी और कर्मचारी को उतनी देर के लिए कॉकपिट में जाकर बैठना होगा। हैरानी की बात है कि दुनिया की बड़ी-बड़ी और महंगी एयरलाइंस में ऐसा नहीं था। 
लेकिन हम फिर खुदकुशी की बात पर आते हैं। और जिस बात को हम छेडऩे जा रहे हैं, उससे दुनिया का निजी जिंदगी का, और कारोबारी जिंदगी का भी, कामधाम पूरी तरह सदमे का शिकार होकर ठप्प हो सकता है। लोग एक-दूसरे से किसी भी किस्म के राज को साझा करने के पहले क्या हर बार यह तौलेंगे कि ऐसे राज को लेकर, कागजों पर या फोन पर, या ई-मेल बॉक्स में, या फिर कर्नाटक के आईएएस की तरह वॉट्सऐप जैसे मैसेंजर पर संदेश छोड़कर अगर कोई खुदकुशी कर ले, तो जिन दूसरे लोगों के राज ऐसे हाल में पुलिस के हाथ लगेंगे, उनका क्या होगा? यह सोचना भयानक है कि लोग एक-दूसरे से इस डर के मारे कोई निजी बात ही न करें।  और इसी तरह कारोबार में भी अगर लोग इस तरह अचानक खुदकुशी कर बैठें, तो आसपास के उनसे जुड़े हुए धंधों के लोगों का क्या होगा?
खुदकुशी कोई नई बात नहीं है, रिश्तों में भी और कारोबार में भी खुदकुशी होती रहती है। लेकिन ऐसी नौबत को ध्यान में रखते हुए लोगों को किस तरह की सावधानी बरतनी चाहिए, यह हर किसी को ध्यान से सोचना चाहिए, और इसीलिए आज हम मामूली सी लगती इस नौबत को लेकर एक गंभीर चर्चा छेड़ रहे हैं। लोगों को दूसरों के साथ निजी जिंदगी के राज बांटते हुए यह सोचना चाहिए कि कल को वे नहीं रहे, तो इनमें से कौन से राज बाद में दूसरों के हाथ पड़ सकते हैं? कोई राज को दिल में दफन किए हुए चल बसे, तब भी ठीक है, लेकिन अगर कोई फोन या कम्प्यूटर पर ऐसे राज छोड़ जाए, तो पीछे की कई दूसरी जिंदगियां भी तबाह हो सकती हैं। और लोग जब किसी को राजदार बनाते हैं, तो आमतौर पर यह मानकर चलते हैं कि उनको उन लोगों पर अपने आपसे भी अधिक भरोसा है। लेकिन जब अनचाहे भी कड़वाहट होती है, या बिना कड़वाहट कोई खुदकुशी करते हैं, तो उसके बाद बिखरने वाले राज बड़े नुकसानदेह हो सकते हैं। 
हम इसी किस्म के नुकसान की चर्चा एक दूसरे संदर्भ में कर चुके हैं, कि लोगों को दूसरों के साथ कोई तस्वीर या कोई वीडियो फिल्म यह सोचकर ही बांटनी चाहिए कि वह आगे अगर न भी जाए, तो किसी कम्प्यूटर, ई-मेल बॉक्स, सोशल मीडिया के चैट बॉक्स, या फिर मोबाइल फोन पर तो भेजने वाले के नाम के साथ-साथ पड़े ही रह सकते हैं। और ऐसे किसी उपकरण के गुम जाने पर, या किसी अकाउंट का पासवर्ड किसी और के हाथ लग जाने पर पता नहीं कितने लोगों के तौलिए खिंच जाएंगे। इसलिए विमान के पायलट के आत्मघाती कदम को रोकना तो किसी के लिए मुमकिन नहीं है, निजी बातों को लेकर सावधानी सबके बस में है। और खुदकुशी से परे भी किसी हादसे में, या एक कुदरती मौत से भी लोग मर सकते हैं, और उनके सामानों में दर्ज आपके राज सबके सामने खुल सकते हैं। 

एक मुद्दे पर सदन का पूरा सत्र कुर्बान कर देना ठीक नहीं...

संपादकीय
26 मार्च 2015

छत्तीसगढ़ विधानसभा काम का ठिकाना नहीं रह गया। यह पूरा सत्र नान-घोटाले को कुर्बान हो गया। विपक्षी कांग्रेस सड़क से लेकर सदन तक लगातार बहुत आक्रामक और सक्रिय है, और उसके हाथ में नान घोटाले का एक बड़ा और मजबूत मुद्दा भी है। लेकिन इसी एक मुद्दे को लेकर पूरे के पूरे विधानसभा-सत्र को समर्पित कर देना कांग्रेस की एक रणनीतिक और राजनीतिक चूक है। संसद हो या विधानसभा, विपक्ष के पास सरकार को घेरने के लिए इससे बड़ा मंच और कुछ नहीं हो सकता। और छत्तीसगढ़ में सरकार के नान-घोटाले से परे भी बहुत से विभागों से जुड़े मामले, हर जिले के मामले, हर किस्म के मामले घेरेबंदी के लिए पिछले विधानसभा सत्र के बाद से अब तक सामने आ चुके हैं। लेकिन उनमें से सिर्फ एक मामले को उठाकर कांग्रेस विधायक दल ने, और कांग्रेस पार्टी ने बाकी तमाम मुद्दों पर सरकार की घेरेबंदी का मौका खो दिया है। 
आज इस बात पर हम कुछ नया नहीं लिख पाते, अगर दो दिन पहले ही एक कानून के एक हिस्से के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का एक महत्वपूर्ण फैसला नहीं आया होता। सदन के समय की बर्बादी के खिलाफ हम हमेशा लिखते आए हैं, फिर चाहे किसी पार्टी की सरकार हो, या कोई पार्टी विपक्ष में हो। पिछले दस-पन्द्रह बरस में संसद और छत्तीसगढ़ विधानसभा में कांग्रेस और भाजपा की भूमिकाएं उलट-पुलट होते रही हैं, लेकिन जब भी सदन को रोका गया तब हमने यही बात लिखी कि प्रदेश की जनता के हक को, और विपक्ष की जिम्मेदारी को इतने लंबे वक्त तक, पूरे-पूरे सत्र तक अनदेखा करना लोकतंत्र का नुकसान है। अब हम यह मुद्दा उठाएं कि सुप्रीम कोर्ट ने आईटी एक्ट की जिस धारा को खारिज किया है, और जिसे असंवैधानिक करार दिया है, वह पूरा का पूरा कानून संसद में यूपीए सरकार ने रखा था, और विपक्षी भाजपा-एनडीए ने उसे समर्थन दिया था। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि पिछले कुछ बरसों में आईटी एक्ट के तहत सरकारों की बदले की कार्रवाई के वक्त पर इसी जगह लिखते हुए हमने यह बात लिखी थी कि जब संसद में यह एक बहुत ही क्रूर और अलोकतांत्रिक कानून बनाया गया, तब संसद के सदस्यों को इसकी गंभीरता समझ नहीं आई। दरअसल जब-जब किसी कानून की बारीकियों पर विचार-विमर्श और बहस का मौका सदन के बहिष्कार में खो दिया जाता है, तो फिर हड़बड़ी में औपचारिकता निभाते हुए बिना किसी चर्चा के कई कानून पास हो जाते हैं। 
लोकतंत्र में असहमति और विरोध इनकी इतनी निरंतरता ठीक नहीं है कि संसदीय कामकाज की अनदेखी हो जाए। चाहे संसद में राहुल गांधी पर वेंकैया नायडू की टिप्पणी को लेकर बहिष्कार हो, या छत्तीसगढ़ में नान-घोटाले को लेकर कांग्रेस बहिष्कार करे, कोई भी नौबत सदन के बहिष्कार के लिए बार-बार और लंबे समय तक इस्तेमाल नहीं करनी चाहिए। आज छत्तीसगढ़ विधानसभा का बजट सत्र खत्म होने के करीब है, और इस पूरे सत्र में बहुत सारे मुद्दों पर गंभीर चर्चा नहीं हो पाई। आंदोलन करने के लिए सड़क से लेकर राजभवन तक, और मीडिया से लेकर अदालत तक बहुत सी जगहें हैं जहां पर राजनीतिक दल उचित तरीके से मुद्दे को उठा सकते हैं। आज इस सत्र के खत्म होने के समय ऐसा लगता है कि लोकतंत्र की उत्पादक क्षमता और संभावना को कांग्रेस ने खो दिया है। और सरकार के लिए इससे अधिक सहूलियत की कोई बात नहीं हो सकती कि एक अकेले मुद्दे को लेकर विपक्ष उसे कई हफ्तों तक घेरता रहे, और बाकी मुद्दे धरे रह जाएं। हम पहले भी यह सुझा चुके हैं कि संसद या विधानसभा के भीतर जब तगड़ा विरोध दर्ज करना हो, तो विपक्ष को इतने मुद्दों को उठाकर सरकार को घेरना चाहिए और सदन के कामकाज को ओवरटाईम तक ले जाना चाहिए। हम इस सत्र में पिछले महीनों में हुए बहुत से मामलों को उठते हुए नहीं देख पाए, और संसदीय समय का एक बेहतर उपयोग होना चाहिए, वरना जनता और किस जगह अपने मुद्दों पर बात होते देख सकेगी? 

गरीबों पर ताकतवर सरकारी अमले की लूट पर साधारण से अधिक सजा का कानून हो

संपादकीय
25 मार्च 2015

महाराष्ट्र की एक सरकारी खबर है कि वहां भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो (एसीबी) ने पिछले बरस में जिन सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों को रिश्वत लेते गिरफ्तार किया है, उनमें ऐसे लोग भी हैं जो बलात्कार की शिकार महिला को सरकारी मुआवजे का चेक देने के पहले चालीस फीसदी रकम रिश्वत में ले रहे थे। ऐसे भी हैं जो कि कर्ज से दबे किसानों की आत्महत्या के बाद उनके परिवार को मिलने वाली मदद जारी करने के लिए रिश्वत ले रहे थे। बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें गरीबी के रेखा के नीचे के एकदम ही भूखे और बेघर लोगों से, रोजी पर काम करने वाले मजदूरों से रिश्वत ली जा रही है। इसके साथ हम छत्तीसगढ़ के नागरिक आपूर्ति निगम में पकड़ाए भ्रष्टाचार को जोड़कर देखें, तो वैसे तो यह भ्रष्टाचार सीधे-सीधे गरीब के पेट में हाथ डालकर रिश्वत निकालने का नहीं है, लेकिन एक दूसरे हिसाब से यह गरीब के हक पर उसी तरह का डाका है, और इसमें लोगों ने करोड़ों रूपए बनाए हैं। छत्तीसगढ़ के नान-घोटाले में यह रिश्वत इसलिए दी जाती थी कि गरीबों को पीडीएस में मिलने वाले चावल में कितनी अधिक कनकी मिलाई जाए। लोग करोड़ों रूपए इसी बात का पा रहे थे कि छत्तीसगढ़ का विख्यात रियायती-चावल किस तरह कनकी में बदलकर गरीबों को दिया जाए, और रियायत की वजह से वे चुप रहकर जो मिल रहा है उसे ले लें। 
पाठकों को याद होगा कि हम पिछले बरसों में कई बार इस मुद्दे पर लिखते आए हैं कि जब ताकतवर तबका गरीबों और कमजोरों के खिलाफ कोई जुर्म करता है, तो उस पर सजा अधिक होनी चाहिए। कुछ हफ्ते पहले यूरोप के एक देश से खबर आई थी कि वहां पर एक बहुत महंगी गाड़ी के ट्रैफिक चालान पर लाखों रूपए का जुर्माना हुआ, क्योंकि उस देश में जुर्माने की रकम गाड़ी की कीमत के अनुपात में कम या अधिक होते चलती है। हम लंबे समय से इस बात की वकालत करते आ रहे हैं कि ताकतवर तबकों पर इसलिए भी अधिक जुर्माने और अधिक कैद का इंतजाम होना चाहिए क्योंकि वे अदालती कार्रवाई से बच निकलने की तमाम तिकड़में खरीदने की ताकत रखते हैं। दूसरी तरफ जब गरीबों के हक लूटे जाते हैं, तो न तो उनकी आवाज में अधिक दम रहता है, और न ही वे सरकार और अदालत में ताकतवरों के खिलाफ लड़ाई लड़ पाते हैं। तूफान के खिलाफ एक छोटे से दिए की लौ की तरह की यह लड़ाई बड़ी गैरबराबरी की रहती है, और ऐसे ही मुद्दों को लेकर सबसे अधिक लुटे हुए लोगों के बीच नक्सलवाद पनपा था, जो कि आज बढ़ते-बढ़ते देश का सबसे बड़ा आंतरिक खतरा बना हुआ है। 
छत्तीसगढ़ में भ्रष्ट सरकारी अमले की दौलत राजसात करने का कानून बना है, लेकिन सरकार इसका इस्तेमाल चुन-चुनकर करेगी, या एक नजर से सबको देखते हुए सबके खिलाफ इसका इस्तेमाल करेगी यह आने वाला वक्त बताएगा। हम अपनी तरफ से केन्द्र और राज्य सरकारों को यह सुझाव देते हैं कि जिसके अधिकार क्षेत्र में जिस जुर्माने और सजा को बढ़ाने का काम आता हो, उसे गरीबों के खिलाफ होने वाले जुर्म के लिए एक बहुत कड़ी सजा का इंतजाम करना चाहिए। एक ताकतवर जब दूसरे ताकतवर के खिलाफ जुर्म करे, तो उससे ऐसी बुरी नौबत नहीं आती, जैसी कि रिश्वत देने की नौबत आने पर गरीब की आती है। देश में बिल्कुल साफ-साफ दो अलग-अलग किस्म के कानूनों की जरूरत है, और ताकतवर और कमजोर के बीच फासले के पैमाने तय होने चाहिए, और ऐसे पैमानों पर जुर्माने और सजा का अनुपात सीधे-सीधे बढ़ जाने का इंतजाम रहना चाहिए। 
हम चीन में सरकारी और अदालती व्यवस्था के प्रशंसक नहीं हैं। लेकिन वहां भ्रष्ट लोगों को जिस तरह तेज रफ्तार जांच के बाद मौत की सजा तक दी जाती है, उसकी कुछ बातों से भारत को कुछ सीखने की जरूरत है। यहां पर भ्रष्ट लोग रंगे हाथों पकड़ाने के बाद नौकरी पूरी होने तक और अधिक ताकतवर कुर्सियों पर बिठा दिए जाते हैं, और उससे सरकार की सोच भी पता लगती है। छत्तीसगढ़ को एक कड़ी और ईमानदार नीयत से भ्रष्टाचार विरोध पर अमल करना होगा, वरना नक्सल हिंसा खत्म नहीं हो सकेगी। 

सोशल मीडिया पर आजादी को लेकर सुप्रीम कोर्ट का तगड़ा आदेश, और खतरे भी

24 मार्च 2015
संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला आज देश में बहुत बड़ी आबादी के लिए एक राहत लेकर आया है। सोशल मीडिया पर ताकतवर लोगों के बारे में, या किसी समुदाय के बारे में जरा सी बात लिखने पर देश भर में अलग-अलग पार्टियों के राज में भी लोगों की गिरफ्तारियां हो रही थीं। खासकर सत्ता पर बैठे हुए नेताओं पर जरा सा कार्टून बनाकर पोस्ट करने, एक लाईन लिखने, या आगे बढ़ाने पर थानेदार के स्तर पर ही गिरफ्तारी हो रही थीं। अब सुप्रीम कोर्ट ने आईटी एक्ट की एक धारा को असंवैधानिक करार देते हुए खारिज कर दिया है। इसी धारा के तहत पुलिस को यह असीमित अधिकार मिल गया था कि वह किसी को भी गिरफ्तार कर पा रही थी। अदालत ने कानून के इस हिस्से को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बुनियादी अधिकार के खिलाफ बताते हुए कहा कि किसी एक व्यक्ति के लिए जो बात अपमानजनक हो सकती है, वह दूसरे के लिए नहीं भी हो सकती। अदालत ने केंद्र सरकार के इस आश्वासन पर भी सोचने से भी इंकार कर दिया कि इस कानून का बेजा इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। अदालत के आज के आदेश के बाद सोशल मीडिया की पोस्ट को लेकर कोई शिकायत होने पर आईजी से नीचे के दर्जे के किसी पुलिस अफसर को गिरफ्तारी-आदेश देने का अधिकार नहीं रह गया है।
हम लगातार इसी सोच को लिखते आए हैं, और बार-बार हमने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत की है। लेकिन अदालत की बात के साथ-साथ हम यह भी लिखते आए हैं कि लोगों को भी इस आजादी का इस्तेमाल करते हुए खुद होकर एक जिम्मेदारी समझना चाहिए, ताकि देश की पुलिस और अदालतें सोशल मीडिया की जरा-जरा सी बहसों में न फंसें। भारत में एक दिक्कत इस आईटी कानून के साथ-साथ और भी है जिसका शिकार प्रिंट मीडिया भी रहते आए है, और मीडिया के बाहर की अभिव्यक्ति भी उसके घेरे में फंसते आई है। इस देश में धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने का आरोप किसी को भी सीधे गिरफ्तारी तक पहुंचा देता है। कुछ मामलों में यह सचमुच जुर्म के दर्जे की चोट होती है, लेकिन बहुत से मामलों में ऐसे विचार न हिंसक होते हैं, न आपत्तिजनक होते हैं, फिर भी धार्मिक समुदाय या सत्ता के दबाव में थाने के स्तर पर ही लोगों की गिरफ्तारी हो जाती है, और यह नौबत सुप्रीम कोर्ट के आज के इस आदेश से बदलेगी या नहीं, यह खुलासा अभी नहीं हुआ है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जो विचार इस आदेश में सामने आए हैं वे विचार सोशल मीडिया से परे भी पुराने और परंपरागत आम मीडिया पर भी, आम मीडिया के भी, अभिव्यक्ति के अधिकार को एक अधिक हिफाजत देंगे। हमारा यह मानना है कि विचारों से संबंधित मामले चाहे वे धार्मिक ही क्यों न हों, उन पर पहली पुलिस रिपोर्ट के आधार पर थाने के स्तर पर ही कोई गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। पुलिस का आईजी स्तर का अफसर आज के संचार-युग में महज एक फोन कॉल की दूरी पर रहता है, और हर किस्म की अभिव्यक्ति के मामले इसी वरिष्ठ स्तर पर विचार किए जाने चाहिए। 
लेकिन हम बार-बार एक दूसरी बात भी लिखते आए हैं कि सूचना तकनीक, कम्प्यूटर, इंटरनेट, और सोशल मीडिया ने मिलकर आम जनता को एक ऐसी असीमित तकनीकी-आजादी दे दी है, कि उसका बहुत खुलकर बहुत ही हिंसक, साम्प्रदायिक, और आतंकी इस्तेमाल भी हो रहा है। किसी भी राज्य सरकार या केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट के आज के आदेश के बाद भी, इसके दबाव में आए बिना अपनी कड़ी कार्रवाई की जिम्मेदारी पूरी करनी होगी, और इसके लिए हो सकता है कि हर प्रदेश में साइबर-जुर्म के लिए आईजी स्तर का एक जानकार व्यक्ति कानूनी सलाहकार के साथ तैनात किया जाए जो कि ऐसे मामलों पर सुप्रीम कोर्ट की भावना और उसके आदेश को देखते हुए देश-प्रदेश में अमनचैन के लिए जरूरी कार्रवाई करे। 

गाय को कटने से बचाना है, तो उसका पेट भरने का इंतजाम करें

23 मार्च 2015
संपादकीय

पिछले कुछ महीनों में देश के कई राज्यों में गो मांस, गो-वंश के मांस, और अंग्रेजी में बीफ कहे जाने वाले शब्द के दायरे में आने वाले मांस को खाने वाले, बेचने वाले, और कसाई घरों में इन जानवरों के कटने को लेकर बहस चल रही है। कुछ राज्यों में पहले से जारी कुछ प्रतिबंधों को बढ़ाया है, कुछ राज्यों ने कोई प्रतिबंध लगाने से मना कर दिया है, और कुछ जगहों पर विचार चल रहा है। अब देश भर में इस बात को व्यापक रूप से समझने की जरूरत है कि गाय-बैल या भैंस-भैंसों के मांस को लेकर देश में कानून क्या रहना चाहिए? 
अब लगभग पूरा का पूरा उत्तर-पूर्व इन जानवरों का मांस खाने वाले लोगों का है। केरल और दक्षिण के कई राज्यों में व्यापक रूप से लोगों के खानपान में इसकी जगह है। पश्चिम बंगाल किसी भी तरह के प्रतिबंध से मुक्त हैं। यही हाल कश्मीर का है, और कुछ और राज्यों में भी नियम कम हैं, कमजोर हैं, या उन पर अमल और अधिक कमजोर है। केन्द्र में भाजपा की सरकार आने के बाद भाजपा के राज वाले प्रदेशों में इस बारे में कड़ाई बरतने की कार्रवाई चल रही है, लेकिन गोवा एक ऐसा भाजपा-राज्य है जहां के मुख्यमंत्री ने यह साफ किया है कि तकरीबन आधी आबादी अल्पसंख्यकों की है इसलिए वे बीफ पर रोक नहीं लगाएंगे। देश भर में अल्पसंख्यकों और गरीब मांसाहारियों के अलावा बहुत से दूसरे ऐसे हिन्दू हैं, जो कि गोवंश का मांस खाते हैं। और यह कोई नई संस्कृति नहीं है, भारत में महाभारत काल और उसके भी पहले के साहित्य-वर्णन को देखें, तो गाय-बैल के मांस का व्यापक इस्तेमाल लिखा हुआ है। हिन्दुओं में दलितों ने जगह-जगह इसका विरोध किया है, और दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रों-प्राध्यापकों ने मोदी सरकार आने के पहले ही हॉस्टल में लगाई गई रोक के विरोध में गोमांस-भोज किया था। ऐसा ही अभी पिछले पखवाड़े मद्रास हाईकोर्ट के अहाते में वहां के वकीलों ने किया। 
हमारा मानना है कि लोगों के खानपान पर ऐसी रोक लगाना व्यक्तिगत स्वतंत्रता के खिलाफ है। दूसरी बात यह कि बूढ़े गाय-बैलों की बात तो छोड़ ही दें, मामूली दूध देने वाली गाय भी हिन्दुस्तान के शहरों में रात-दिन घूरों पर ही दिखती हैं, और कचरा-गंदगी खा-खाकर उसकी हालत यह रहती है कि जहां ऑपरेशन हो पाता है वहां गायों के पेट से 30-40 किलो तक पॉलीथीन निकला है। गाय को बचाने की सोच अच्छी है, लेकिन गाय को कटने से बचाने के लिए आक्रामक आंदोलन करना, कानून बनाना, और दूसरी तरफ गाय को भूखे मरने देने के लिए घूरों पर छोड़ देना, यह एक विरोधाभासी सोच है। किसी एक धर्म या जाति के लोगों को दूसरों पर यह नहीं थोपना चाहिए कि वे कौन सा मांस खाएं, किस तरह का मांस खाएं। अब भारत का जैन समाज तो किसी भी तरह के मांसाहार के खिलाफ है। अब अगर उसकी धार्मिक भावनाओं को देखा जाए तो देश भर में मांस-मछली और मुर्गे पर रोक लगानी होगी। आज गाय-बैल के मांस को न खाने के पीछे हिन्दू समाज के भी एक हिस्से की भावना जुड़ी हुई है, और दूसरा हिस्सा नियमित रूप से अपने खानपान में इसका इस्तेमाल करता है। देश में धार्मिक भावनाओं के आधार पर खानपान का यह फर्क घातक साबित होगा। सरकार को इसमें दखल नहीं देना चाहिए, और देश की जो अलग-अलग संस्कृति है, उन सबको एक आजादी देने की जरूरत है। और गाय को बचाने के हिमायती लोगों को यह भी समझने की जरूरत है कि गाय कटने तभी जा सकती है जब दूध देना बंद कर चुकी गाय को खुले छोड़ दिया जाता है, भूखे मरने के लिए। अगर गाय के प्रेमी, गाय के पूजक लोग गाय के लिए मरने तक का एक इंतजाम रखेंगे, तो कोई बूढ़ी गाय को लूटकर नहीं ले जा सकते। जगह-जगह यह देखने में आता है कि गायों को बचाने के लिए हिन्दू समाज के भीतर ही दान से बने हुए जो ट्रस्ट हैं, उनके भीतर अफरा-तफरी होते रहती है। अगर गाय को मां मानने वाले लोग उसे कटने से बचाना चाहते हैं, तो उसे गाय को खिलाने का जिम्मा भी उठाना पड़ेगा। लोग उसे कटने नहीं देते, और उसका पेट भी भरने नहीं देते, ऐसे लोग पाखंडी होने के अलावा और कुछ नहीं हैं। 

बिहार, उप्र, और ओडिशा नकल के अलग-अलग रंग

संपादकीय
22 मार्च 2015
बिहार की स्कूली परीक्षाओं में नकल की तस्वीरें गजब की हैं। कई मंजिला इमारतों की खिड़कियों पर चढ़-चढ़कर परीक्षार्थियों के घरवाले चिट पकड़ा रहे हैं। और यह हाल कई स्कूलों का तस्वीरों और वीडियो में आया है। कुछ लोग बिहार में इसे बेहतर हालत बता रहे हैं, क्योंकि कुछ बरस पहले तक घरवाले परीक्षा हॉल के भीतर पहुंचकर नकल करवाते थे। फिर मानो यह खबर काफी नहीं थी तो कल उत्तरप्रदेश की खबर आई है कि वहां एक कॉलेज में नकल रोकने पर प्राध्यापक को समाजवादी पार्टी के एक छात्र नेता ने पीटा। और आज ओडिशा की एक खबर है कि एक कॉलेज में नकल रोकने पर परीक्षार्थियों ने प्राचार्य को एक कमरे में बंद कर दिया। खुद छत्तीसगढ़ में जांजगीर-चाम्पा जिले में इसी तरह की नकल होती थी, और इस बार माध्यमिक शिक्षा मंडल ने वेब कैमरे लगवाकर इंटरनेट से निगरानी करना तय किया था। 
बिहार में मुख्यमंत्री सहित कुछ दूसरे लोगों ने इन तस्वीरों को बिहार की हकीकत मानने से इंकार कर दिया है और कहा है कि बिहार में अधिक संख्या अच्छे परीक्षार्थियों की है, जो नकल नहीं करते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि जिस किसी राज्य में लोग नकल से पास होते हैं, या कि मध्यप्रदेश जैसे राज्य में जहां पर कि व्यापम के तहत हुए भारी संगठित और सत्तारूढ़ भ्रष्टाचार के रास्ते से हजारों छात्र-छात्राओं ने मेडिकल कॉलेज जैसे दाखिले पाए, सरकारी नौकरियां पाईं, वहां पर जो काबिल, मेहनती, और प्रतिभाशाली छात्र-छात्राएं होते हैं, उनका भरोसा व्यवस्था और लोकतंत्र पर से उठ जाता है। दूसरी तरफ इन इम्तिहानों के बाद के कॉलेज या नौकरी पर जिन लोगों को जगह मिलती है, वे काबिल नहीं होते, और ऐसे में वह प्रदेश, वह विभाग, या वह कॉलेज प्रतिभाओं को पाने से रह जाते हैं। 
आज हम उन प्रदेशों को देखें जहां पर कि नकल की ऐसी संगठित और सालाना वारदातें नहीं होती हैं, तो वैसे प्रदेश तरक्की करके आगे बढ़ रहे हैं। दक्षिण भारत के राज्यों को देखें, या महाराष्ट्र जैसे राज्य को देखें, तो वहां पर ऐसी संगठित नकल नहीं दिखती। और ऐसे राज्यों के लोग देश भर में भी बेहतर जगहों पर अधिक कामयाबी के साथ पहुंचते हैं, और देश के बाहर भी जाकर काम कर पाते हैं। जब पूरी दुनिया के कामकाजी लोगों के बीच मुकाबले होते हैं, तो वहां पर घरवाले जाकर नकल के पन्ने नहीं थमा सकते। इसलिए जिस किसी राज्य में यह नौबत है, उन्हें बहुत कड़ाई से इसे रोकना चाहिए। मध्यप्रदेश में व्यापम घोटाले के चलते मंत्री और अफसर, दलाल और राज्यपाल-परिवार जिस तरह से कानूनी शिकंजे में आ चुके हैं, वह एक अच्छी नौबत है। समाज में अगर लोगों को बराबरी के मौकों का उनका हक नहीं मिलेगा, तो चाहे वे जंगलों में पनपने वाले नक्सली न बन सकें, वे शहरों में रहते हुए भी समाज विरोधी और मुजरिम तो बन ही सकते हैं। 
जब लोगों को नकल करने से ही अच्छे नंबर मिल जाते हैं, पीएचडी मिल जाती है, नौकरी मिल जाती है, तो वे आगे गलत काम करते हुए अपने बच्चों के लिए भी नकल करवाने की ताकत जुटाकर रखते हैं। जिस तरह फूल के बीज से फूल उगते हैं, और कांटे के पौधे के बीज से कांटे उगते हैं, समाज में भी मुजरिमों के पैसों से उनकी अगली पीढ़ी के मुजरिम होने का खतरा अधिक रहता है। इसलिए सरकारों को बहुत ही कड़ाई से नकल जैसे जुर्म रोकने चाहिए, ताकि आम लोगों के मन में पढ़ाई और इम्तिहान के लिए, नौकरियों के मुकाबलों के लिए कुछ भरोसा बचा रहे। 

जिंदल-बाल्को को मिट्टी के मोल कोयला खदानें नहीं...

संपादकीय
21 मार्च 2015

केन्द्र सरकार की कोयला खदानों को देने की नई नीति और प्रक्रिया से देश को लाखों करोड़ अधिक मिलते दिख रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद इस पूरी सावधानी और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी से बचकर पता नहीं किस तरह जिंदल और बाल्को जैसे उद्योग मिट्टी के मोल कोयला खदानें पाने के करीब पहुंच गए थे। देश के नए कोयला सचिव जितनी बारीकी से रात-दिन मेहनत करके सरकार को होने जा रही कमाई पर नजर रख रहे हैं, और घंटे-घंटे में वे जिस तरह ट्वीट कर रहे हैं, उसी का नतीजा है कि आज उन्होंने छत्तीसगढ़ की उन कोयला खदानों पर लगी बोलियों को खारिज कर दिया जो कि जिंदल और बाल्को को मिलने जा रही थीं। पता नहीं कैसे इन दो उद्योगों ने इतने कम दाम पर इनको पाने का रास्ता निकाल लिया था, कि अगर सरकार चौकन्नी नहीं होती, तो देश की यह दौलत इनको मिट्टी के भाव मिल चुकी रहती। लेकिन पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कोयला मंत्री रहते हुए जिस तरह से जनता का खजाना बंदरबांट किया था, उसके बाद अब सुप्रीम कोर्ट की निगरानी की वजह से सरकार चौकस है, और देश को इतनी कमाई होते दिख रही है जितनी कि मनमोहन सिंह के वक्त के सीएजी ने भी अपने अंदाज में नहीं बताई थी। 
खैर, इस बारे में हम पहले लिख चुके हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में सरकार को यह सोचना चाहिए कि इस राज्य के सबसे बड़े उद्योग किस तरह से प्रदेश और केन्द्र सरकार के नियम-कायदों को कुचलते हुए प्रदूषण फैलाते हैं, खदानें पाते हैं, सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करते हैं, नदियों से जबर्दस्ती पानी लेते हैं, अपनी खदानों से बाहर से भी कोयला और लोहा निकाल लेते हैं, किसी नाम पर खदान लेते हैं, और किसी दूसरे उद्योग में उस कोयले का इस्तेमाल करते हैं, उसे बाजार में ब्लैक में बेच देते हैं। जब प्रदेश के सबसे ताकतवर कारोबारी इस तरह का काम करते हैं, तो राज्य सरकार भी उनसे लड़ाई एक सीमा तक लड़ पाती है, और बाल्को के मामले में प्रदेश ने देखा है कि किस तरह सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे के मामले में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार बाल्को के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट नहीं गई थी। अभी कल ही यह खबर आई है कि राज्य सरकार ने जिंदल से जो बिजली खरीदी थी उसमें से डेढ़ सौ करोड़ से अधिक का भुगतान करने से विद्युत नियामक आयोग ने इंकार कर दिया है। 
पाठकों को याद होगा कि जिंदल ने पर्यावरण मंजूरी के बिना बिजली घर बनाना चालू कर दिया था, और उस वक्त इसी अखबार में उसके बारे में छपा था। बाद में केन्द्र की मनमोहन सिंह सरकार के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने जांच करवाई और इस अखबार में छपी रिपोर्ट सही पाई गई थी, और जिंदल को दी गई मंजूरी खारिज हुई थी। लेकिन छत्तीसगढ़ में खदान और कारखाने वाले लोग इतने बड़े ताकतवर हैं कि वे तरह-तरह के आयोगों, अदालतों, और सरकारों के बीच अपनी बात को मनवाने की बहुत सी तरकीबें जानते हैं, और उनके सामने प्रदेश की आम जनता की ताकत केंचुए जितनी भी नहीं रहती। जिंदल के बारे में लोगों को याद होगा कि राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल ने यह भी पाया था कि जनसुनवाई के नाम पर प्रशासन के साथ मिलकर जिंदल ने एक पूरी तरह से बोगस कार्रवाई की थी, और उस जनसुनवाई को ट्रिब्यूनल ने खारिज कर दिया था।
लोगों को यह भी याद होगा कि किस तरह एस्सार ने बस्तर में काम करते हुए नक्सलियों को नगद मदद करने का काम किया था, और उस मामले में फंसे हुए लोगों को तरह-तरह से बचा लिया गया। अब एस्सार के एक अफसर ने दूसरी कंपनी में जाने के बाद एस्सार की अंदरुनी ई-मेल का भांडाफोड़ किया है, तो उससे पता चलता है कि राज्य के ताकतवर लोगों को छोटे-छोटे एहसानों से दबाकर यह कंपनी किस तरह अपना प्रभामंडल बनाती है, और किस नीयत से वह सरकार और मीडिया के लोगों को भ्रष्ट करती है। इस राज्य में ऐसे बड़े कारोबारों के खिलाफ छोटे-छोटे से प्रतीकात्मक जनआंदोलन कोई असर नहीं डाल पा रहे हैं, लेकिन कोयला खदानों के मामले में केन्द्र सरकार ने जिस सावधानी से जिंदल और बाल्को की बोलियों को खारिज किया है, वह तारीफ के लायक कार्रवाई है। 

खेत से लेकर इंसानी सेहत तक जहर के बाजार का हमला...

संपादकीय
20 मार्च 2015

बाजार की एक खबर है कि हिन्दुस्तान का कीटनाशक कारोबार इस बरस 12 से 15 फीसदी बढ़कर 33 हजार करोड़ रूपए तक पहुंच जाएगा। आज इसका घरेलू बाजार 15 हजार करोड़ रूपए है, और निर्यात 12 हजार करोड़ रूपए। एक कारोबारी को तो ये आंकड़े सुहा सकते हैं, लेकिन अगर हम धरती की बात करें, तो इतना जहर आखिर जाता कहां है? खेती हो या बागवानी, कीट पतंगों को मारने के लिए हो, या फिर किसानों की खुदकुशी के लिए, जमीन में जाकर, पानी में मिलकर, या हवा में घुलकर यह सारा जहर इंसानों को ही धीरे-धीरे खत्म कर रहा है। और नए किस्म की खेती रासायनिक खाद से लेकर कीटनाशक तक पर निर्भर रहती है, और अनाज की उपज बढ़ाने के देश के आंकड़ों को पूरा करने के लिए सरकार और बाजार मिलकर लगातार रासायनिक खाद और बाकी जहर को बढ़ावा देते हैं। और ये आंकड़े तो भारत में बनने वाले जहर के हैं, भारत के कारोबारियों का कहना है कि सरकार जहर के आयात को इतना बढ़ावा दे रही है, बहुराष्ट्रीय कंपनियों को इतने फायदे दे रही है कि भारत का कीटनाशक उपयोग खतरे में आ गया है। अब मतलब यह है कि भारत के जहर से परे दूसरे देशों का जहर भी जमीन और पानी से होकर हिन्दुस्तान पीढिय़ों के बदन में रोज घुस रहा है। नौबत इतनी खराब है कि बहुत से वैज्ञानिक परीक्षणों में बच्चों को दूध पिलाने वाली माताओं के दूध में कीटनाशक-जहर साबित हुआ है। 
दरअसल खेती के कीड़े हों या घर के भीतर के मच्छर हों, लोग उनसे छुटकारा पाते हुए इस बात का अंदाज नहीं लगाते कि कुदरत और खुद की सेहत पर इसका क्या असर पड़ रहा है। इश्तहारों का बाजार देखें तो टीवी पर मच्छर और मक्खी, तिलचट्टे और दूसरे कीड़ों की दहशत बुरी तरह फैलाकर लोगों के सामने उनसे छुटकारा पाने का आसान और अकेला विकल्प रासायनिक जहर की शक्ल में रखा जाता है। इनमें से नुकसानदेह कीड़े-मकोड़ों से बचने का आसान और बिना नुकसान वाला रास्ता घरों को नहीं सुझाया जाता, और बिना जहर खेती के कीड़ों से निपटने का रास्ता किसानों को नहीं सुझाया जाता। उद्योग के आंकड़े अलग चलते हैं, और खेती की उपज के आंकड़े अलग। और इन दोनों को एक-दूसरे के फिक्र नहीं होती, और इन दो पाटों के बीच में प्रकृति और पर्यावरण पिसते चले जा रहे हैं। 
चूंकि कई किस्म के जहर लोगों की जिंदगी को इतनी तेज रफ्तार से तबाह नहीं करते कि वे सिर चढ़कर बोलें, इसलिए लोग उनसे खतरा मानकर ही नहीं चलते। मौत से पहले भी जहर का नुकसान समाते चल रहा है, और इससे उबरने की कोई राह नहीं दिखती है। जागरूक लोगों को वैज्ञानिक तथ्यों और तर्कों के साथ जनता को सावधानी सिखाने की जरूरत है, क्योंकि सरकार तो आंकड़ों को कामयाबी मानकर चलती हैं, और उसकी आक्रामकता को बाजार दाम देकर खरीदता भी है। लेकिन जनता को खुद को इन खतरों के बारे में बात करनी चाहिए, और जिंदगी में रसायनों का इस्तेमाल कम से कम करना चाहिए। 

अफसर की ऐसी मौत की सीबीआई जांच जरूरी

19 मार्च 2015
संपादकीय
कर्नाटक में एक लोकप्रिय और धाकड़ आईएएस अफसर की जिस तरह मौत हुई है, उससे देश भर के वे तमाम लोग भी हिल गए हैं, जिन्होंने कभी कर्नाटक देखा भी नहीं है। हर बरस कुछ ऐसे ताकतवर लोग भी कैद जाते दिखते हैं जिन्होंने भारत के बड़ी-बड़ी सरकारी सेवाओं के लोगों की हत्या की। अभी-अभी इंडियन ऑयल के एक अधिकारी मंजूनाथ को उत्तरप्रदेश में मारने वाले लोगों को ऊंची अदालती से भी सजा मिली है। इस अफसर ने पेट्रोलियम मिलावट करने वालों को पकड़ा था। कर्नाटक के इस अधिकारी के बारे में खबरें हैं कि उसने रेत माफिया पकड़ा था, जमीन माफिया पर कार्रवाई की थी, और अब बिल्डर माफिया पर कार्रवाई के करीब था। ऐसे अधिकारी के आत्महत्या की बात लोगों को गले नहीं उतर रही है, और इसके परिवार का यह कहना है कि उसे कर्नाटक का एक सत्तारूढ़ कांगे्रस विधायक धमकी देते आ रहा था। परिवार ने उसका नाम भी बताया है, और मुख्यमंत्री दफ्तर के बाहर धरना देते हुए यह चेतावनी दी है कि अगर इस मौत की सीबीआई जांच नहीं करवाई जाती है, तो परिवार वहीं आत्मदाह कर लेगा। 
अच्छे अफसरों का ऐसा अंत देश के लिए बहुत ही बुरा है। कई राज्यों में ऐसी नौबत आती है, और हमारा यह मानना है कि जब कभी सत्तारूढ़ दल पर, या मरने वाले अफसर से बड़े अफसरों पर कोई सीधे आरोप रहते हैं, तो मामले को राज्य के बाहर ही राष्ट्रीय जांच एजेंसी सीबीआई को सौंप देना चाहिए। इससे एक तो सत्ता पर बैठे लोग जांच को प्रभावित करने के आरोपों से बचते हैं, और दूसरी तरफ जांच निष्पक्ष होने की एक संभावना बनती है। आज ताकतवर लोग जब किसी जुर्म के पीछे रहते हैं, तो उसमें ईमानदार जांच और असरदार अदालती कार्रवाई, किसी की भी गुंजाइश नहीं रहती है। और यह बात सिर्फ कर्नाटक के इस मामले पर लागू नहीं होती है, देश भर में ऐसी एक परंपरा कायम होनी चाहिए।
अच्छे अधिकारियों को काम करने का मौका जिस राज्य में नहीं मिलता, उस राज्य में तबाही आती है। जनता की दौलत लूटी जाती है। कर्नाटक में इस नौजवान आईएएस की मौत पर वह जिला बंद रहा जहां वह कलेक्टर रह चुका था। और भी बहुत से लोगों का यह मानना है कि उसने इतने बड़े-बड़े लोगों पर हाथ डाल दिया था, और इतनी बेबाकी से कार्रवाई कर रहा था, कि उसे ताकतवर लोगों से धमकी मिलने में हैरानी की बात नहीं है। कर्नाटक कांगे्रस के पास बचे इक्का-दुक्का राज्यों में से है, और पिछले बरसों में वहां भाजपा और कांगे्रस की सरकारों के भ्रष्टाचार सामने आते रहे हैं, मंत्री, अफसर सभी किस्म के लोग जेल जाते रहे हैं, और सुप्रीम कोर्ट तक मामले चले हैं। ऐसे राज्य में भी अगर लोग सबक नहीं ले रहे हैं, तो उस राज्य के मामले सीबीआई जांच के लायक हैं, और बिना देर किए कर्नाटक सरकार को यह अनुरोध केंद्र सरकार को भेज देना चाहिए।

जमीन-कानून से परे भी विपक्ष के एक होने की ऐतिहासिक जरूरत

18 मार्च 2015
संपादकीय
मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ जिस तरह से कल विपक्ष की चौदह पार्टियां एक साथ सड़क पर आईं, उससे भारतीय लोकतंत्र में कमजोर पड़ चुके विपक्ष के लिए भी एक संभावना दिखती है। पिछले आम चुनाव में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा को जो ऐतिहासिक बहुमत मिला है, उसके चलते देश में विपक्ष पूरी तरह ध्वस्त दिख रहा है, और राज्यों में भी जगह-जगह उसका हौसला पस्त है। संसद में ऐसी बुरी हालत बहुत कम होती है कि लोकसभा में विपक्ष का दर्जा पाने लायक भी कोई विपक्षी पार्टी न बचे। लेकिन एक लोकतंत्र की मजबूती मजबूत सरकार से न साबित होती, न चलती, उसके लिए एक मजबूत विपक्ष जरूरी होता है। इसलिए हम विपक्ष की एकता की आज यहां चर्चा करना चाहते हैं कि अतिमजबूत सरकार के मुकाबले कम से कम मामूली विपक्ष तो रहे।
कल का मुद्दा न सिर्फ गैरएनडीए पार्टियों के लिए महत्वपूर्ण था, बल्कि भाजपा की सबसे पुरानी भागीदार, शिवसेना भी भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ है, और उसका भाजपा के साथ दूसरे मुद्दों पर भी टकराव कुछ ऐसा चल रहा है कि आज जब हम इस पर लिख रहे हैं, महाराष्ट्र में सत्ता में भागीदार शिवसेना राज्य सरकार के खिलाफ भी मुंबई बंद करवा रही है। ऐसे में विपक्ष के सामने कुछ दूसरे मुद्दों को लेकर भी एक बड़ी संभावना खड़ी होती है, जिनमें से कुछ मुद्दों पर हो सकता है कि एनडीए के घटक दल भी साथ आने, या भाजपा से असहमत होने को मजबूर होते हों। 
हमारे हिसाब से आज देश में सबसे भयानक मुद्दा भड़काई जा रही साम्प्रदायिकता है, और चाहे प्रधानमंत्री कार्यालय में दो राज्यों से साम्प्रदायिक कही जा रही घटनाओं पर रिपोर्ट ही क्यों न मांग ली हो, हकीकत यह है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से अब तक भाजपा के कुछ भगवा सांसद, और आक्रामक हिंदू संगठन देश में एक अभूतपूर्व हिंसक साम्प्रदायिकता और नफरत फैलाने में लगे हुए हैं, और एक कड़क प्रशासक की साख वाले नरेन्द्र मोदी बहुत रहस्यमय अंदाज में इस मोर्चे पर एकदम ही नरम और चुपचाप हैं। यह नौबत भारत के विपक्षी दलों को इस एक मुद्दे पर पूरी तरह से एक साथ आने की सबसे बड़ी वजह है, और इसका इस्तेमाल अब तक होते तो नहीं दिखा है। आज जरूरत यह है कि ऊपर की चर्चा के दो मुद्दों से परे भी और जो मुद्दे व्यापक और आम सहमति के हैं, उनके ऊपर विपक्ष को एक मोर्चा बनाना चाहिए जो कि न्यूनतम साझा सहमति का एक घोषणापत्र बनाए और केंद्र-राज्यों में एक साथ संघर्ष करे। पिछले आम चुनाव की बुलडोजर जैसी ताकत ने मोदी सरकार और उनके सहयोगी, समर्थक, और प्रशंसकों को कई किस्म की धर्मांध, कट्टर, और हिंसक साम्प्रदायिकता सुझाई है। ऐसे तमाम खतरों को लेकर विपक्ष को एक होने की जरूरत है।

जो लोग मीडिया को देश की नब्ज मानते हैं, वे धोखे में...

17 मार्च 2015
संपादकीय

दिल्ली का मीडिया कल से जिस तरह इलाज से लौटते अरविन्द केजरीवाल को दिखाने के लिए बावला हो गया है, उससे यह सवाल उठता है कि क्या अपने-आपको राष्ट्रीय मीडिया कहने वाला यह राजधानी-केंद्रित तबका बाकी देश को भी देख पाता है, या फिर काम की सहूलियत ने उसकी दूरदृष्टि खत्म कर दी है? टीवी चैनलों के और अखबारों के भी कैमरे ताकतवर होते गए हैं, उनके लेंस दूर-दूर तक देख पाते हैं, लेकिन देश के बाकी तबकों को देखने की नजर राजधानी के मीडिया में देश में भी घटती चली गई है, और शायद प्रदेश की राजधानियों में भी। 
आज जो लोग मीडिया की खबरों को देखकर यह समझते हैं कि देश की नब्ज पर उनका हाथ है, और वे देश के हाल से वाकिफ हैं, उनको राजधानियों और महानगरों में केंद्रित एक बहुत छोटे से हिंदुस्तान को देखना ही नसीब होता है, और खासकर टीवी चैनलों के दर्शकों को तो महज वही देखने मिलता है जो कि बहुत कम शब्दों में बताया जा सकता है, जिसके साथ जाने के लिए सनसनीखेज तस्वीरें हैं, और जो बांधकर रख सकता है। इसी तरह की एक बड़ी खाई देश के उत्तर और दक्षिण में हो गई है, मीडिया की बदौलत। हम दक्षिण का मीडिया तो अधिक नहीं देख पाते, लेकिन उत्तर के मीडिया के लिए दक्षिण तब तक परदेश सरीखा है, जब तक वहां कोई बड़ी घटना न हो जाए। और उत्तर-पूर्व तो मानो चीनी मीडिया के भरोसे छोड़ दिया गया है। राष्ट्रीय होने का दावा करने वाले मीडिया में उत्तर भारत की एक-एक आगजनी, हर मौत, हर छोटी-बड़ी घटना राष्ट्रीय चैनलों के प्राइम टाईम पर भी आ जाती हैं, और बाकी देश की बड़ी घटनाएं भी धरी रह जाती हैं। दूसरी तरफ देश के अधिकतर गंभीर मुद्दे भारत के लगभग गैरगंभीर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से परे रहते हैं, और कई बार तो दूरदर्शन देखने पर ऐसा पता लगता है कि मानो वह किसी और हिंदुस्तान की खबरें दिखा रहा है जिनका कि देश के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से कोई लेना-देना नहीं है।
कुल मिलाकर गलाकाट बाजारू मुकाबले में जुटे हुए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को अगर कोई भारतीय समाज और देश की एक तस्वीर मानते हों, तो वे बड़े धोखे में हैं। इस नौबत पर कोई चर्चा भी नहीं होती, और लोग शायद सबसे अधिक सनसनीखेज को देखने के इस तरह, और इस कदर आदी भी हो गए हैं कि बाजारू मीडिया के वे एक वफादार ग्राहक रहे गए हैं, और देश की व्यापक सच्चाई के आईने की उनको मानो जरूरत भी नहीं रह गई है।

बिना बात बतंगड़ बनाकर संसद में कांग्रेस बुरी फंसी

संपादकीय
16 मार्च 2015

कोई राजनीतिक दल देश और प्रदेश में कितने अलग-अलग किस्म का बर्ताव कर सकता है, यह देखना हो तो कांग्रेस को देश की राजधानी में, और छत्तीसगढ़ की राजधानी में देखना चाहिए। यह बात हम पिछले कुछ महीनों में तीसरी-चौथी बार लिख रहे हैं कि इस राज्य में विपक्षी दल के रूप में कांग्रेस पार्टी लगातार वजनदार मुद्दों को उठाकर लगातार सड़कों पर है, और सरकार को घेरे हुए है। आज भी जनता की भारी दिक्कतों के दाम पर कांग्रेस रायपुर में विधानसभा घेरने का आंदोलन कर रही है और उसके हाथ में धान खरीदी में सरकार की वादाखिलाफी का आरोप है, और प्रदेश में इन दिनों खबरों में बने हुए नागरिक आपूर्ति निगम घोटाले का मुद्दा है। ये दोनों ही बातें दमदार हैं, और सरकार के लिए परेशानी का सबब है। दूसरी तरफ पिछले तीन दिनों से एक अखबारी खबर के आधार पर कांग्रेस ने दिल्ली में इस बात को एक मुद्दा बनाया कि राहुल गांधी के घर पर पुलिस कुछ जानकारी लेने पहुंची थी। इसे जासूसी और निगरानी का घटिया गुजरात-मॉडल करार देते हुए कांग्रेस प्रवक्ता ने मोदी सरकार पर बहुत से भारी-भरकम आरोप लगाए थे, और सीधे प्रधानमंत्री-गृहमंत्री से जवाब मांगा था। आज संसद में मोदी सरकार की तरफ से बताया गया कि ऐसी पूछताछ और जानकारी का यह सिलसिला 1980 के दशक से कांग्रेस का शुरू किया हुआ है, और यूपीए सरकार के पिछले दस बरसों में लगातार सभी पार्टियों के प्रमुख नेताओं के बारे में यह जानकारी ली गई। लगातार बिस्तर पर बने हुए भाजपा के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर, प्रणब मुखर्जी तक हर किसी के बारे में ऐसी जानकारी पुलिस ने जाकर ली। संसद में सरकार ने मजबूती के साथ इन आरोपों को चूर-चूर कर दिया, और कांग्रेस की एक बुरी फजीहत हुई है। दूसरी तरफ यह भी है कि गोवा में गांधी जयंती पर छुट्टी हटाने के सरकारी आदेश को लेकर चर्चा करने के बजाय संसद में कांग्रेस ने राहुल गांधी के बारे में नियमित और साधारण पूछताछ को मुद्दा बनाया, तो उससे यह भी जाहिर होता है कि कांग्रेस के लिए कौन सा गांधी अधिक मायने रखता है। 
कांग्रेस पार्टी की राष्ट्रीय लीडरशिप एकदम बिखर चुकी दिख रही है। सोनिया गांधी की चुप्पी, और राहुल गांधी की गैरमौजूदगी के बीच संसद में अल्पसंख्यक हो चुकी कांग्रेस आज लोकसभा में विपक्ष भी नहीं बची है, और संसद के बाहर भी वह मुद्दों के बिना खाली हाथ बयान जारी करते दिख रही है। हमने पहले भी यह बात लिखी थी कि कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन को छत्तीसगढ़ कांग्रेस से यह सीखना चाहिए कि विपक्ष का काम कैसे किया जाता है। कांग्रेस को किसी मुद्दे को संसद के बाहर और संसद के भीतर बहुत बड़े-बड़े विशेषणों के साथ उठाने के पहले उसे ठोक-बजा लेना चाहिए। नेताओं की सुरक्षा के लिए पुलिस के नियमित कामकाज का इस्तेमाल राजनीतिक कीचड़बाजी के लिए करके कांग्रेस ने अपना दीवालियापन ही उजागर किया है। 

लोकतांत्रिक और इंसाफपसंद सोच खोने के नुकसान

संपादकीय
15 मार्च 2015
पश्चिम बंगाल में एक चर्च की 72 बरस की नन के साथ सामूहिक बलात्कार के बारे में क्या कहा जाए! तीन-चार ही दिन हुए हैं कि गुजरात के अहमदाबाद में छह बरस की एक बच्ची के साथ बलात्कार करने के बाद उसके बदन में लोहा घुसाकर उसे मार डाला गया था। और इन दो राज्यों से परे भी देश भर में कमोबेश यही हाल चल रहा है, और छत्तीसगढ़ तो बलात्कार के आंकड़ों में आबादी के अनुपात में कुछ अधिक ही दिल दहलाने वाला है। एक तरफ बंगाल की मुख्यमंत्री ने इस जुर्म के पीछे उस मानसिकता को जिम्मेदार ठहराया है जो देश में साम्प्रदायिकता फैला रही है, और अल्पसंख्यकों के खिलाफ बहुसंख्यकों को भड़का रही है। दूसरी तरफ भाजपा ने उसे राज्य सरकार की नाकामयाबी कहा है, और याद दिलाया है कि ममता बैनर्जी ने मुख्यमंत्री बनते ही एक बलात्कार को जांच के पहले ही फर्जी करार दे दिया था।
हम इन दोनों ही बातों को इस घटना से परे, इस जुर्म की जिम्मेदारी से परे, पूरे देश का माहौल खराब करने वाली मानते हैं, और देश में इंसाफ की सोच को खत्म करने वाला मानते हैं। जब धर्म के आधार पर हिंसक सोच को बढ़ाते हुए किसी एक धर्म या कई धर्मों पर हमले किए जाते हैं, तो धार्मिक-हिंसा से परे भी समाज में धार्मिक-सहनशीलता घटती चलती है। आज भारत में वही हो रहा है। धर्मान्धता बढ़ रही है, साम्प्रदायिकता बढ़ रही है, समुदायों के बीच फासले बढ़ाए जा रहे हैं, और किसी एक धर्म का दबदबा कायम करने की कोशिश चल रही है। नतीजा यह हो रहा है कि जैसे-जैसे बहुसंख्यक हिन्दुओं को भड़काया जा रहा है, उसके मुकाबले अल्पसंख्यक प्रतिक्रिया भी हो रही है। कहां तो इस देश को इक्कीसवीं सदी के और आगे तक ले जाने की बातें हो रही हैं, और कहां इसे लोकतंत्र के पहले की सदियों में ले जाया जा रहा है। 
हम बार-बार इस बात को लिखते हैं कि जब देश में कानून का सम्मान कम होता है, जैसे-जैसे वैज्ञानिक सोच घटती है, वैसे-वैसे तरह-तरह की हिंसा बढ़ती है। ऐसी बढ़ती हुई हिंसा के तने और जड़ सीधे-सीधे दिखते नहीं हैं, लेकिन हवा में जो जहर घुलता है, उसका असर हर तबके के दिल-दिमाग तक पहुंचता है, और अदालत का इंतजार करने के बजाय लोग जेल तोड़कर आरोपी को निकालकर सड़कों पर मार डालते हैं, और शिवसेना जैसे राजनीतिक दल खुलकर ऐसी हिंसा को सही ठहराते हैं। कानून को हाथ में लेकर इस तरह की हिंसा को जायज ठहराना उन्हीं लोगों को सुहाता है जो कि अपने-अपने दायरों में सुरक्षित बैठे रहते हैं।
हम इंसाफ की सोच को खत्म होने के खतरे हिन्दुस्तान के बगल के पाकिस्तान में रोजाना ही देख रहे हैं जहां पर लोकतंत्र और आबादी उन दोनों के बीच पहले खत्म होने का मानो एक मुकाबला चल रहा हो। भारत में भी कई लोग हिंसा के बल पर इसे एक धर्मराज्य बनाने पर आमादा हैं, और अगले चार बरस प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने यह जिद ही सबसे बड़ा राष्ट्रीय खतरा है। इससे उबरे बिना इस देश की तरक्की नहीं हो सकती। आज इस देश का एक तबका बलात्कार पर बनी हुई एक फिल्म को रोक देना बदनामी का इलाज मान रहा है। आज किसी देश की यह ताकत नहीं है कि वह किसी फिल्म या खबर को रोककर अपनी बदनामी को रोक ले। आज दुनिया में सूचना और सोच के लिए सरहदें खत्म हो चुकी हैं। वे हिन्दुस्तानी गैरजिम्मेदार हैं जो कि किसी डॉक्यूमेंट्री फिल्म को बनाने वाली की चमड़ी के रंग को देखकर फिल्म को भारत की बदनामी करार दे रहे हैं। जिम्मेदारी की बात तो यह होती कि ऐसी फिल्म देखकर भारत के लोग पहले अपने बारे में सोचते, फिर फिल्म बनाने वाली के बारे में सोचते, और फिर उन्हें जो माकूल जवाब सूझता, वह जवाब भी लिखते। लेकिन आईने को तोड़कर यह देश अपनी खामियों को गैरमौजूद मान ले रहा है, यह अपने आप में एक परले दर्जे की अलोकतांत्रिक सोच है, इससे बदनामी नहीं थमती, बलात्कार थमने की एक संभावना जरूर थमती है। 
कुल मिलाकर भारत लोकतांत्रिक और इंसाफपसंद सोच खोने के नुकसान झेल रहा है। 

राहुल को लेकर सवाल ही सवाल, जवाब एक नहीं

14 मार्च 2015
संपादकीय
दिल्ली में एक अखबार की खबर के आधार पर कांगे्रस के प्रवक्ता को खासे अरसे बाद मीडिया में कुछ बोलने का मौका मिला। खबर यह है कि दिल्ली पुलिस ने राहुल गांधी के घर जाकर कुछ पूछताछ की, और यह बहुत मजेदार जानकारी इस खबर में है कि पुलिस ने राहुल गांधी का हुलिया भी पूछा। इसे लेकर सुबह से टीवी चैनलों ने सनसनी शुरू की, और कांगे्रस को मोदी सरकार के तहत आने वाली दिल्ली पुलिस की इस कथित कार्रवाई को लेकर हंगामा खड़ा करने का एक मौका मिला। अभी तक यह साफ नहीं है कि इस खबर में सच कितना है और गलत कितना, लेकिन यह बात अपने-आपमें अटपटी है कि पिछले कुछ हफ्तों से कांगे्रस पार्टी के नेताओं को भी यह पता नहीं है कि राहुल गांधी हैं कहां?
वैसे तो सार्वजनिक जीवन में भी हर किसी को एक निजी जिंदगी का हक रहता है, और राहुल गांधी के छुट्टी पर जाने को लेकर कोई सवाल खड़े नहीं हो सकते, लेकिन देश का एक बड़ा नेता, एक बड़ी पार्टी का अगला अध्यक्ष समझे जाने वाला यह अधेड़ सांसद कहां है, इस बात को लेकर इतनी लुकाछिपी लोकतंत्र में ठीक नहीं है। अगर सुरक्षा कारणों से राहुल गांधी का पता बताना ठीक नहीं है, तो भी इतनी पारदर्शिता तो लोकतंत्र में होनी चाहिए कि राहुल क्या करने गए हैं, कब तक लौटेंगे, और इस बात को जाहिर क्यों नहीं किया जा रहा है? 
जिस तरह सोनिया गांधी की बीमारी के वक्त भी कांगे्रस पार्टी और अस्पताल के डॉक्टरों ने उनकी सेहत और इलाज के बारे में लोगों को कुछ जानकारी दी थी। पूरी दुनिया में यह माना जाता है कि सार्वजनिक जीवन के लोग अपनी कुछ बातों के लिए समाज के प्रति जवाबदेह होते हैं, और इसीलिए तमाम चर्चित लोगों की सेहत को लेकर स्वास्थ्य बुलेटिन जारी होते हैं। वरना उनके निजी इलाज की सार्वजनिक जानकारी की जरूरत ही क्या है? पश्चिम के देशों में लोग अपने पे्रम-प्रसंग, सगाई या शादी, या तलाक की जानकारी भी सार्वजनिक रूप से देते हैं। लोगों को याद होगा कि ब्रिटेन के शाही घराने में प्रिंस चाल्र्स और लेडी डायना के तलाक की औपचारिक शाही घोषणा की गई थी। सार्वजनिक जीवन का यह एक दाम चुकाना पड़ता है। 
भारत में कांगे्रस पार्टी एक निहायत गैरजरूरी रहस्य बनाकर चल रही है कि राहुल गांधी कहां हैं, क्या कर रहे हैं, कब लौटेंगे, और क्या करेंगे। उसे ऐसा करने का पूरा हक तो है, लेकिन अगर इस पार्टी को जनता के बीच जिंदा रहना है, तो इसे जनता की भावनाओं और जनता की जिज्ञासाओं का सम्मान भी करना चाहिए। यह पार्टी वैसे भी पिछले बरसों के अपने अहंकार के चलते हुए लोकतंत्र के हाशिए पर जा चुकी है, और आज भी वह इसे अगर एक घरेलू कारोबार की तरह चलाना चाहती है, तो उसमें जनता को कोई तकलीफ तो है नहीं। जहां तक दिल्ली पुलिस की पूछताछ का सवाल है, तो यह खबर हमें बहुत भरोसेमंद नहीं लग रही है, और राहुल गांधी की सुरक्षा के लिए तैनात दर्जनों सुरक्षा कर्मचारियों को यह बेहतर पता होगा कि वे कहां हैं।

बजट के मौके पर बजट से परे की कुछ सावधानी

संपादकीय
13 मार्च 2015
छत्तीसगढ़ सरकार का बजट इस वक्त पेश हो रहा है, और वित्तमंत्री के रूप में  मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह एक बार फिर विधानसभा के सामने प्रदेश के अगले बरस की एक संभावित तस्वीर पेश कर रहे हैं। एक वक्त प्रदेश में वित्त मंत्री के काम को पूर्णकालिक से भी अधिक माना जाता था, लेकिन पिछले कई बरसों से रमन सिंह अपने कुछ और विभागों के साथ-साथ वित्त मंत्री का काम भी बखूबी कर रहे हैं, और इस बार का बजट सभी चुनाव निपट जाने के बाद का बजट है, फिर भी वह करीब-करीब हर विभाग में विस्तार और विकास का है, और राज्य भर में हर किस्म के बहुत से नए कामों का इसमें जिक्र है। ये लाईनें लिखते हुए अभी बजट आ ही रहा है इसलिए उसकी बारीकियों पर आज हम नहीं जा रहे, लेकिन पहली नजर में जो बातें दिख रही हैं, उनसे लगता है कि देश में कम ही राज्यों में ऐसी आर्थिक सम्पन्नता और उदारता के बजट आएंगे। 
इस बजट के साथ-साथ आज हवा में यह बात भी तैर रही है कि राज्य में सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार पकड़ाते भी जा रहा है, और कम भी नहीं हो रहा है। ऐसे में सरकार का बजट चाहे जितना हो, उसमें भ्रष्टाचार और चोरी-डकैती में कितना बड़ा हिस्सा चले जाएगा, इसका अंदाज लगाना हमारे लिए मुश्किल है, लेकिन सरकार के अलग-अलग विभागों में जो लोग काम करते हैं, उनके लिए यह अंदाज आसान भी है। हम पहले भी बजट के मौके पर इस जरूरत को गिना चुके हैं कि सरकार अपनी संपन्नता की वजह से आज अधिक किफायत की बात नहीं करती है, और कोयला-सम्पन्न राज्य होने की वजह से अगले तीस बरस तक इस राज्य में कमाई बरसनी है, लेकिन उसके साथ-साथ हम इस बात को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं कि सरकार अपने कामकाज में ईमानदारी लाने की कोशिश करे, भ्रष्टाचार को रोकने की कोशिश करे। ऐसा न होने पर बजट जितना बढ़ते चले जाएगा, भ्रष्ट लोग उतने ही अधिक संपन्न और ताकतवर होते चले जाएंगे। 
न सिर्फ इस राज्य में, बल्कि बाकी देश में भी भ्रष्टाचार एक बहुत ही मजबूत खतरा बन गया है, और इसे दूर करने की जरूरत है। हमने दूसरे कई राज्यों में मुख्यमंत्रियों को जेल जाते देखा है, और कई राज्यों में बड़े-बड़े अफसर जेल में हैं, फरार हैं। छत्तीसगढ़ को यह तसल्ली हो सकती है कि यहां का भ्रष्टाचार इतना अधिक नहीं है, और ऐसी कोई नौबत यहां पर नहीं आई है, लेकिन फिर भी सरकार के भीतर के लोग ही इस बात की गारंटी लेते हैं कि राज्य सरकार के कामकाज में, केन्द्र सरकार की योजनाओं पर इस राज्य में अमल में परले दर्जे का भ्रष्टाचार है। पिछले महीनों में एक-एक अफसर के यहां छापे में जिस तरह से करोड़ों की नगदी बरामद हुई है, उससे यह साफ है कि सरकार के बजट का कितना बड़ा हिस्सा नेता-अफसर-ठेकेदार की जेब में जा रहा है। राज्य सरकार को एक ऐसा खुफिया निगरानी तंत्र बनाना चाहिए जो कि अफसरों के करोड़पति और अरबपति होने के पहले ही भ्रष्टाचार को रोक सके। जब पंछी खेत चर जाए, उसके बाद उसके पीछे दौडऩे से कुछ हासिल नहीं होता। सरकार को भ्रष्टाचार विरोधी मशीनरी को मजबूत करना चाहिए, और उसका विस्तार करना चाहिए। दूसरी तरफ सरकार के कामकाज के भीतर काम करने के तरीकों को ऐसा पारदर्शी बनाना चाहिए कि संगठित बड़ा भ्रष्टाचार टूट सके। जैसे-जैसे भ्रष्ट लोग मजबूत होते जाते हैं, वैसे-वैसे वे लोग राजनीतिक ताकत भी खरीदने लगते हैं। इस पूरे सिलसिले को थामने की जरूरत है। 
छत्तीसगढ़ सरकार ने कल एक अच्छा काम यह किया है कि भ्रष्ट अफसरों की दौलत को जब्त करने के लिए एक अलग कानून बनाया है, और उसके लिए अलग अदालती कार्रवाई भी तय की है। कानून तो बहुत से अच्छे होते हैं, लेकिन उन पर अमल की नीयत जब तक न हो, तब तक वे कानून न सिर्फ बेअसर हो जाते हैं, बल्कि लोग उनके खिलाफ एक दुस्साहस भी विकसित कर लेते हैं। राज्य सरकार को बहुत तेजी से उसके पास बरसों से पड़े हुए भ्रष्टाचार के मामलों को हर किस्म की अदालती कार्रवाई की मंजूरी देनी चाहिए, और संपत्ति जब्त करने की कार्रवाई भी तेजी से करनी चाहिए। इसमें देर होने से सारी जमीन-जायदाद लोग दूसरों के नाम पर कर देते हैं और जनता के खजाने में कुछ लौट नहीं सकता। राज्य सरकार को इस नए कानून के साथ-साथ पहले से मौजूद कानूनों का इस्तेमाल तेजी से और बड़े पैमाने पर करना चाहिए, उसके बिना इस बढ़े हुए बजट से भ्रष्ट लोगों की कमाई और बढ़ जाएगी।

धरती के दूसरे तरफ बची एक नन्हीं जिंदगी से सबक

संपादकीय
12 मार्च 2015
अमरीका की एक खबर से हिन्दुस्तान का कुछ अधिक लेना-देना नहीं है, लेकिन फिर भी वह खबर दिल को छू लेती है, दहला देती है, और जिन लोगों की ईश्वर पर आस्था है, वे ईश्वर को करिश्मे की वाहवाही का हकदार मानते हुए कह रहे हैं कि जाको राखे साईयां, मार सके न कोय। एक कार नदी में गिरी, उसे चलाती हुई महिला डूबकर मर गई, लेकिन उसके साथ उसकी डेढ़ बरस की बच्ची भी थी, जो कि कार के सीट बेल्ट से बंधी हुई थी, और उल्टी हो चुकी कार में बेल्ट से टंगे हुए वह बर्फीली नदी में भी 14 घंटे जिंदा रही। अब वह अस्पताल से भी बाहर आ चुकी है। दुनिया के ठीक दूसरी तरफ के हिस्से की इस छोटी सी घटना को लेकर आज हम यहां इसलिए लिख रहे हैं क्योंकि इस नन्हीं बच्ची की जिंदगी और मौत के बीच का फासला सिर्फ कार का एक सीट बेल्ट रहा। जिस तरह हिन्दुस्तान में यह माना जाता है कि सीट बेल्ट कार के मुसाफिरों के लिए नहीं, पुलिस के नियम के लिए होता है, वैसा ही अगर अमरीका में हुआ होता, तो मां के साथ-साथ इस बच्ची की भी लाश मिली होती। 
छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश में दुपहिया चलाने वाले लोग वहां पर बहुत अधिक मारे जाते हैं, जहां पर हेलमेट के नियम को सख्ती से लागू नहीं किया जाता। कार चलाने वाले लोगों में भी जो लोग सीट बेल्ट नहीं लगाते हैं, किसी बड़ी टक्कर या हादसे में उनके बचने की गुंजाइश कम रहती है। वैसे तो अपनी खुद की हिफाजत करना हर किसी की अपनी जिम्मेदारी होती है, लेकिन हिन्दुस्तान में आम सोच यह है कि जब तक कोई रोकने वाला न हो, किसी नियम को मानने की जरूरत नहीं होती। शहर के बीच हो, या गांव-जंगल में, रेल्वे क्रासिंग पर दो मिनट का इंतजार करने के बजाय गेट के नीचे से दुपहिया घसीटकर लोग खतरा झेलकर पटरी पार करते हैं, और हर बरस ऐसे सैकड़ों लोग मारे जाते हैं। हम बार-बार ऐसे खतरे की तरफ से लोगों को आगाह करते हैं, और उन्हें हेलमेट लगाने, सीट बेल्ट लगाने की नसीहत देते हैं। 
दरअसल जो लोग किसी एक नियम को मानते हैं, वे लोग बाकी नियमों को मानने के बारे में भी सोचते हैं। और जो लोग किसी एक नियम को तोड़ते हैं, वे लोग बाकी नियमों को भी तोडऩे वाले साबित होते हैं। यह राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि देश में लागू ट्रैफिक नियमों को कड़ाई से लागू करे, क्योंकि जो लोग बिना हेलमेट दुपहिया दौड़ाते हैं, वे नियम तोड़कर अधिक रफ्तार से भी दौड़ाते हैं, और कभी वे तीन लोग बैठकर चलते हैं, तो कभी प्रेशर हॉर्न बजाते हुए चलते हैं। नियमों के लिए हिकारत छोटी-छोटी पैकिंग में नहीं आती, बल्कि बड़े, फेमिली साईज के पैक में आती है। इसलिए सरकार को, समाज को, और मां-बाप को कड़ाई से जिंदगी बचाने का काम करना चाहिए, गैरजिम्मेदार ड्राईवरों की जिंदगी भी, और सड़कों पर बाकी लोगों की जिंदगी भी। छत्तीसगढ़ में पिछले बरसों में हम देखते हैं हर कुछ महीनों में सरकार मानो नींद से जागकर हेलमेट लागू करती है, और फिर मामला ठंडा पड़ जाता है। हर बरस इस छोटे से राज्य में सैकड़ों लोग सड़कों पर दुपहिया-दुर्घटना में बिना हेलमेट मरते हैं, और दसियों हजार लोग जिंदगी भर के लिए तकलीफ वाले जख्म पाते हैं। यह मामला हमारी समझ से पूरी तरह बाहर है कि गैरजिम्मेदार लोगों के साथ रियायत करने से सरकार का क्या फायदा होता है? और इतनी मामूली सी कड़ाई की जिम्मेदारी से भी सरकार क्यों कतराती है? 
अमरीका के जिस हादसे में बची जिंदगी से हमने बात शुरू की है, वैसी एक मामूली और आसान सावधानी अगर यहां पर लोग बरतने लगें, तो हर बरस हजारों छत्तिसगढिय़ा बचेंगे, और अभी जो हजारों लोग हर बरस मर रहे हैं, उनको बढिय़ा तो कहा नहीं जा सकता। 

हम बरसों से मनमोहन को कटघरे भेजने कह रहे थे

संपादकीय
11 मार्च 2015

कोयला घोटाले को लेकर आखिरकार भूतपूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अदालत से समन मिल गया है। एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री का कटघरे में पहुंचना छोटी बात नहीं होती, लेकिन हमारे पाठकों को याद होगा कि पिछले तीन-चार बरस में, जब से दूरसंचार घोटाला और कोयला घोटाला आना शुरू ही हुए थे, तभी से हमने लगातार यह लिखना शुरू किया था कि ऐसे मंत्रिमंडल के मुखिया की हैसियत से मनमोहन सिंह की जिम्मेदारी बनती है, और अदालती कटघरे के रास्ते उनके जेल जाने की नौबत आ सकती है। उन पर मुकदमा चलाने की सलाह हम तब से देते आ रहे हैं जब भाजपा ने भी यह मांग नहीं की थी, और हकीकत तो यह है कि भाजपा आज भी मनमोहन सिंह के बजाय सोनिया गांधी को निशाना बनाना बेहतर समझेगी, और इसीलिए मनमोहन सिंह पर सीधे-सीधे हमले से यह पार्टी कतराती रही है। 
मनमोहन सिंह का अदालत जाना एक ऐसे वक्त हो रहा है जब देश में कोयला खदानों की नीलामी चल रही है तब पिछले सीएजी विनोद राय की एक बात याद पड़ती है कि कोयला खदान के आबंटन में गड़बड़ी करने से देश के खज़ाने को 1.86 लाख करोड़ का नुकसान हुआ था। लोगों को अच्छी तरह याद होगा कि इस अनुमानित नुकसान को लेकर उस वक्त यूपीए सरकार के एक ताकतवर मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के बड़े वकील कपिल सिब्बल ने एक प्रेस कांफ्रेंस में इस अनुमान का मखौल उड़ाया था और कहा था कि सरकार को कोयला खदानों के आबंटन से शून्य नुकसान हुआ है। अब विनोद राय के अनुमान को आज की हकीकत पार कर लेंगे। आज अभी तक 204 कोल ब्लॉक में से कुल 32 की नीलामी हुई है, और केन्द्र सरकार को दो लाख करोड़ से अधिक की कमाई हो चुकी है। यह बात अपने आप में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके मंत्रिमंडल को जेल भेजने के लिए काफी है कि देश की दौलत को कारखानेदारों के साथ सरकार इस तरह बंदरबांट कर रही थी, कि मानो वह कांग्रेस पार्टी का अपना खजाना हो। आज इस बात को कौन मासूम मानेगा कि सरकार को और देश को इतना लंबा चूना लगाने वाली कांग्रेस-यूपीए सरकार को इसमें से कुछ नहीं मिला था। 
हमारा पहले भी यह मानना था, और आज भी यह मानना है कि किसी पार्टी या सरकार का मुखिया अपने मातहत भ्रष्टाचार, बेईमानी, या जुर्म देखते हुए अगर चुप है, तो वह उसमें भागीदार है। हम यह बात आज हिंसक और साम्प्रदायिक बातें कहने वाले नेताओं के मुखिया लोगों के बारे में भी लिखते हैं, और कल भी यूपीए सरकार के मुखिया के बारे में लिखते थे। निजी शराफत सार्वजनिक जीवन और सरकारी कामकाज में कोई मायने नहीं रखती। शरीफ तो हर किसी को होना ही चाहिए, शराफत किसी की खूबी नहीं कही जा सकती। इसलिए मनमोहन सिंह अपनी खुद की सादी दाल-रोटी की थाली दिखाकर कोई रियायत नहीं पा सकते। यह पहले दिन से जाहिर था कि दूरसंचार घोटाला और कोयला घोटाला इन दोनों को पूरी तरह से समझते हुए मनमोहन सिंह इन अपराधों को अनदेखा कर रहे थे। वे राहुल गांधी की तरह के एक अनुभवहीन अधेड़-नौजवान नहीं थे। वे देश के वित्तमंत्री रहे हुए एक बहुत ही तजुर्बेकार नेता थे, जिनको सरकार चलाने का लंबा अनुभव था। प्रधानमंत्री की हैसियत से भी उन्होंने पहले पांच साल बिना ऐसे अपराधों के निकाले थे। इसलिए उनके दूसरे कार्यकाल का हर जुर्म उनकी समझ के भीतर का था। कुछ लोगों को यह तकलीफ हो सकती है कि राजनीति और भ्रष्ट सरकारी कामकाज के चलते एक शरीफ प्रोफेसर जेल जा सकता है। लेकिन जब हम इस गरीब देश के करोड़ों बच्चों को कुपोषण का शिकार देखते हैं, और जब यह देखते हैं कि मनमोहन सिंह जैसा प्रधानमंत्री देश के बिड़लाओं पर मेहरबान होते हुए जनता की दौलत को उनके हवाले कर देता है, तो हम इसके लिए सजा से कम कुछ नहीं सोचते। 

हासिल से हिकारत, और हसरतों का पीछा

10 मार्च 2015
संपादकीय
दुनिया की एक सबसे चर्चित कंपनी एप्पल ने कल एक ऐसी हाथ घड़ी निकाली है जो कि सेहत का ख्याल रखेगी, लोगों को उठने-बैठने, चलने-फिरने की याद दिलाएगी, और भी वे तमाम काम करेगी जो कि एक फोन या कम्प्यूटर करते हैं। इसके साथ ही इसने अपने एक सबसे पतले लैपटॉप का उससे भी पतला एक नया मॉडल पेश किया है। और भी ढेरों कंपनियां रोजाना अपने सामानों में नई खूबियां जोड़कर सामने रखती हैं, और जिनके पास इन्हीं कंपनियों के इन्हीं सामानों के जरा से पुराने मॉडल रहते हैं, वे बेचैनी और हीनभावना के शिकार हो जाते हैं।
बाजार हसरतों पर चलता है। जिन लोगों को नए सामानों का शौक होता है, वे तमाम लोग किसी सामान को पा लेने के बाद उससे और अधिक खुशी नहीं पाते हैं, वे इसके बाद आए अगले सामान को देख-देखकर बेचैनी अधिक पाते हैं। उनके पास क्या है, इसकी अहमियत बड़ी जल्दी काफूर हो जाती है, और उनके पास क्या नहीं है, जो कि बाजार में है, या कि दूसरों के पास है वह बेचैनी की वजह बन जाता है। लोग जब तक पिछले सामान की खूबियों को समझ भी नहीं पाते, इस्तेमाल करना तो दूर है, तब तक वे दूसरी खूबियों के मोह में पड़ जाते हैं। 
यह बहुत मामूली सी बात हम महत्वपूर्ण मुद्दों के इस कॉलम में इसलिए लिख रहे हैं कि समाज का सबसे बड़ा मध्यमवर्गीय हिस्सा इसी बेचैनी का शिकार रहता है, और उसे इस अंतहीन मोह से अपने-आपको बचाना चाहिए। न तो हर दिन बाजार में आए सबसे नए मॉडल के बिना किसी का काम रूकता है, और न ही आज अपने पास का सामान इतना बेकार हो जाता है कि उससे काम न चल सके। लोग खर्च तो अपनी सीमा तक ही कर पाते हैं, या उससे कुछ बाहर निकलकर भी फिजूलखर्ची करते हैं, लेकिन मन में लगातार बना हुआ असंतोष, लगातार हीनभावना, और लगातार हसरत लोगों का सुख छीन लेते हैं। इसके बारे में एक बार हमने इसी पेज पर कहीं लिखा था कि हासिल से हिकारत, और हसरत का पीछा...।
समाज में बाजार की जिस रणनीति को और जिंदगी के जिस तौर-तरीके को उपभोक्तावाद कहा जाता है, उसकी वजह से मध्यमवर्ग पर  महंगाई की मार और बुरी हो जाती है। जगह-जगह से खबर मिलती है कि मनचाहा मोबाइल न मिलने पर किसी लड़के-लड़की ने खुदकुशी कर ली, या कई मामलों में यह भी सुनाई पड़ता है कि इस किस्म के महंगे शौक के लिए नौजवान पीढ़ी देह बेचने को भी तैयार रहती है। ऐसे में मन की तसल्ली एक बड़ी बात है। न्यूनतम जरूरतें जरूर पूरी हो जाएं, लेकिन शौक तो किसी को इतने ही करने चाहिए जितने की फिजूलखर्ची की औकात हो। इसके बिना लोगों को अपने पास की चीजों से खुशी पाने की कोशिश करनी चाहिए। हमेशा ही नई खरीददारी में समझदारी नहीं होती।

कश्मीर, सबसे बड़ी फजीहत केंद्र सरकार और भाजपा की

9 मार्च 2015
संपादकीय
जम्मू-कश्मीर का मामला आसान नहीं है। आज वहां के पीडीपी के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद एक अलगाववादी नेता को जेल से छोड़ते हैं, और संसद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यह कहते हैं कि उनका यह फैसला न तो केंद्र सरकार को मालूम था, और न ही जम्मू-कश्मीर में सरकार में भागीदार भाजपा को। इससे परे भी मुख्यमंत्री बनते ही मुफ्ती ने अमनचैन से चुनाव निपटने के लिए अलगाववादियों को शुक्रिया कहा था, और आतंकियों और पाकिस्तान को भी। ये तमाम बातें आरएसएस और भाजपा की आज तक की कश्मीर-नीति के खिलाफ तो हैं ही, ये बातें देश की किसी भी और पार्टी को भी मंजूर नहीं हैं, और आज संसद में मोदी को यह कहना पड़ा कि मुफ्ती के फैसलों से न सिर्फ संसद के विपक्ष की असहमति है, बल्कि संसद में सरकार की विपक्ष के साथ-साथ इन फैसलों से असहमत है, और यह पूरे संसद और देश की नाराजगी है। 
दरअसल पूरी तरह नामुमकिन किस्म के दो लोगों के बीच की यह कश्मीरी शादी काफी गड़बड़ ही थी। हमको यह उम्मीद थी कि भाजपा और पीडीपी, दोनों ही कश्मीर के मुद्दों पर अपने कड़े रूख को कुछ-कुछ नरम करके, एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर सरकार चलाने की कोशिश करेंगे और लोकतंत्र में ऐसी अटपटी लगती कोशिशें भी होनी चाहिए। लेकिन मुफ्ती ने किसी रणनीति के तहत, या बिना उसके भी, जिस तरह के फैसले लेने शुरू किए हैं, जिस तरह की जुबान वे बोल रहे हैं, वे गठबंधन की जरूरतों के ठीक खिलाफ हैं। और भाजपा के पास इतनी जल्दी गठबंधन से बाहर आने का विकल्प भी शायद नहीं है। खुद भाजपा के लोग, और उसकी हिंदू-बुनियाद का मतदाता वर्ग भाजपा के इस गठबंधन से शुरू से ही नाखुश रहा, और लोगों को बात-बात में यह याद पड़ रहा था कि जिन मुद्दों पर लड़ते-लड़ते श्यामाप्रसाद मुखर्जी की जिंदगी कश्मीर में खत्म हुई थी, उन मुद्दों को छोड़कर भाजपा एक ऐसी पार्टी के साथ सरकार बना रही है, जो कि इन मुद्दों पर साफ-साफ, एकदम ही खिलाफ है। 
हम ऐसे राजनीतिक समझौतों को एक त्रिशंकु विधानसभा की नौबत में बहुत अनैतिक नहीं मानते, अगर वे एक घोषित साझा कार्यक्रम के आधार पर किए जाएं। लेकिन आज मुफ्ती और कश्मीर सरकार भाजपा और मोदी के काबू के बाहर दिख रहे हैं। अगर जल्द ही आम सहमति का कोई रास्ता नहीं निकला तो उसमें सबसे बड़ी फजीहत केंद्र सरकार और भाजपा की होगी। कश्मीर को लेकर पहले दिन से ही ऐसी तनातनी वहां पर एक निर्वाचित सरकार की संभावना को कमजोर कर रही है। मुफ्ती की अपनी स्थानीय मजबूरियां हो सकती हैं, या वे इस सरकार के बाद की राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए ऐसे फैसले लेते हो सकते हैं, लेकिन एक राष्ट्रीय पार्टी और केंद्र सरकार की मुखिया के रूप में भाजपा के लिए यह शर्मिंदगी की नौबत है, और भाजपा का इतिहास भी आज हैरान होकर श्रीनगर को देख रहा है। लगे हाथों एक लाईन में यहां पर यह भी याद कर लेना ठीक होगा कि महाराष्ट्र में भाजपा की दशकों पुरानी भागीदार शिवसेना भी लगातार भाजपा से असहमति का नारा लगाते हुए शतरंज की बिसात पर तिरछे-तिरछे चल रही है।

बेमिसाल विनोद मेहता

8 मार्च 2015
संपादकीय
देश के सबसे चर्चित और दमदार पत्रकारों में से एक विनोद मेहता के गुजर जाने पर हम अपनी सोच के खिलाफ जाकर भी इस कॉलम में संस्मरण-श्रद्धांजलि लिख रहे हैं। जिन लोगों के पीछे रह गए लोग, संगठन, या सरकार मीडिया को प्रभावित कर सके, उन लोगों के बारे में ईमानदारी से लिखना कुछ दिक्कत की बात हो सकती है, लेकिन विनोद मेहता के ऐसे कोई नामलेवा नहीं रह गए हैं, जो कि मीडिया को श्रद्धांजलि-लेखन के लिए कह सकें। इस अखबारनवीस का अपना शानदार काम ही आज देश भर में मीडिया के अधिकतर लोगों को उदास कर गया, कि अब वह आगे नहीं बढ़ेगा।
पिछले चार दशक में विनोद मेहता ने एक वयस्क अंग्रेजी पत्रिका डेबनॉयर से लेकर आज की एक कामयाब अंग्रेजी-हिन्दी पत्रिका आउटलुक तक कितने ही अखबार शुरू किए, जो कि एक-एक कर या तो बंद हो गए, या विनोद मेहता वहां से हट गए। लेकिन यह एक संपादक ऐसा रहा जिसने पत्रकारिता की असाधारण उत्कृष्टता के साथ-साथ असाधारण कामयाबी हासिल की, और जिसका लिखा हुआ कुछ भी बिना चर्चा के नहीं रहा। बहुत से लोग अभी सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं कि अपने किस्म का एक हौसलेमंद अखबारनवीस अब नहीं रहा, और उसके साथ ही वैसी पीढ़ी भी खत्म हो गई। हम पीढ़ी की बात पर जाना तो नहीं चाहते, लेकिन विनोद मेहता ने भारत की अंग्रेजी पत्रकारिता में जितने शानदार अखबार निकाले, उनका संपादन किया, वैसा कोई भी और नहीं कर पाया। उनके काम का कोई भी हिस्सा औसत या सतही दर्जे का नहीं रहा, और उन्होंने अनगिनत पत्रकारों को रूबरू काम सिखाया, और अपने काम की मिसाल से भी लोगों को बेहतर काम करने के लिए उकसाया।
उनके काम की जिन दो-तीन बातों की वजह से हम यहां आज लिखने पर बेबस हैं, उनमें से एक, एक अनोखी मौलिकता। उन्होंने जो नए अखबार शुरू किए, वे एक भीड़भरे अखबारी-बाजार में ताजगी की एक ऐसी लहर लेकर आए कि लोग उनके अखबार दो-चार दिन बाद भी पहुंचने पर बेसब्री से इंतजार करते हुए उनको पढ़ते थे। दूसरी बात उत्कृष्टता की, अपने किसी भी काम में उन्होंने पत्रकारिता के पेशे के सर्वोच्च पैमानों से नीचे कुछ नहीं किया। समाचार और विचार के बीच का फासला उन्होंने बड़ी गंभीरता से और हमेशा ही कायम रखा। अपने खुले हुए विचारों की वजह से उनकी पसंद और उनकी नापसंद बड़ी साफ रहती थी। और इतनी साफगोई बाजार में कम ही चलती है, नतीजा यह रहा कि एक-एक कर वे अपने शुरू किए हुए अखबारों से बाहर भी होते रहे, और फिर नए सिरे से, राख से उठकर वे खड़े हुए, और उन्होंने पहले से बेहतर अखबार निकाला। मुंबई में जिस वक्त उन्होंने इँडिपेंडेंट का संपादन किया, उस वक्त उस बाजार में उसी प्रकाशन समूह का टाईम्स ऑफ इंडिया पहाड़ जितना ऊंचा और बड़ा था। लेकिन इस नए अखबार की क्वालिटी ने पाठकों के एक तबके को अपने से बांध लिया था। एक खबर को लेकर महाराष्ट्र की क्षेत्रीय भावना इतनी बुरी तरह घायल हुई थी, कि वह उस अखबार और विनोद मेहता की उस कुर्सी दोनों का अंत साबित हुई। लेकिन फिर उन्होंने एक दूसरा शानदार अखबार इंडियन पोस्ट तैयार किया, और फिर वहां से हटने के बाद दिल्ली पहुंचकर पायोनियर नाम का एक बहुत अच्छा अखबार खड़ा किया। वे लगातार सिर्फ पत्रकार बने रहे, और प्रकाशन-कारोबारी नहीं रहे, इसके बावजूद वे एक के बाद एक अच्छा प्रकाशन तैयार करते रहे, और वहां से हटने पर, उसके बंद होने पर, उन्होंने अपनी लकीर को और आगे बढ़ाया।
विनोद मेहता ने पत्रकारिता में शानदार काम के लिए बेमिसाल बातें छोड़ी हैं, और जिन लोगों को इस पेशे में अपने काम को बेहतर करना है, उनके लिए इस देश में विनोद मेहता से ज्यादा अच्छी कोई मिसाल हमको नहीं दिखती है। आज जितने पत्रकार उनके गुजरने पर लिख रहे हैं, उनमें दर्जनों ऐसे हैं जिन्होंने विनोद मेहता के साथ काम किया था, और अपनी आज की काबिलीयत के लिए वे उन्हें याद कर रहे हैं। न सिर्फ इस पेशे में, बल्कि किसी भी पेशे में लोगों को मौलिक, उत्कृष्ट, और हिम्मती होने की इसी तरह जरूरत है, ताकि लोग उनसे सीख सकें, उन्हें याद रख सकें।

बात की बात,


8 March, 2015

हिन्दुस्तान में नफरत को लग रहा है कि उसके अच्छे दिन आ गए

7 मार्च 2015
संपादकीय
नगालैंड के दीमापुर में बलात्कार के एक आरोपी को सैकड़ों स्थानीय लोगों ने जेल पर हमला करके वहां से निकाल लिया और सड़कों पर पीट-पीटकर मारकर एक टॉवर पर टांग दिया। इस आरोपी पर बांग्लादेशी होने का आरोप है, और ऐसा माना जा रहा है कि स्थानीय समुदायों की बांग्लादेश से आकर बसे लोगों से जो तनातनी चलती है, उसी का नतीजा इस हत्या की शक्ल में सामने आया। इसके बाद गैरस्थानीय लोगों के छोटे-छोटे कारोबार भी हमले और आगजनी की शिकार हुई। केन्द्र सरकार ने असम और नगालैंड की सरहद पर सेना को तैयार रखा है कि जरूरत पडऩे पर वह तुरंत दखल दे सके। इससे बिल्कुल अलग एक दूसरी खबर यह है कि उत्तर भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकसभा सीट वाराणसी में छेडख़ानी के आरोप पर एक अधेड़ आदमी को सड़क पर ही पीट-पीटकर मार डाला गया। इसी वाराणसी की एक तस्वीर कल से सोशल मीडिया पर छाई हुई है कि वहां डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद घाट पर अंग्रेजी में छपा एक बैनर टांगा गया है, जिस पर विदेशी सैलानियों के लिए चेतावनी है- यह त्यौहार लड़कियों के लिए खतरनाक है, और इस दिन सारे मर्द नशे में पूरी तरह धुत्त रहेंगे। इसीलिए सारी भारतीय महिलाएं इस दिन घर पर ही रहती हैं। सुरक्षा कारणों से पर्यटकों को सलाह है कि अपने होटल या गेस्ट हाउस में इस त्यौहार को किसी भारतीय परिवार के साथ ही मनाएं। आखिर में लिखा है कि इस दिन किसी को भी गले न लगाएं, क्योंकि किसी पर किसी का बस नहीं चलता, खतरा न उठाएं।
भीड़ जाकर जेल से किसी आरोपी को छुड़ाकर लाए, वहां मौजूद पुलिस हाथ बांधे खड़ी रहे, कफ्र्यू लगा रहे, और आरोपी को सड़कों पर पीट-पीटकर मार डाला जाए, यह कानून के राज का उस जगह पर खात्मा है। और देश भर में जगह-जगह लोग न सिर्फ बलात्कार के आरोपियों के खिलाफ, छेडख़ानी के आरोपियों के खिलाफ, बल्कि कई तरह के दूसरे बेकसूर तबकों के खिलाफ भी कानून हाथ में ले रहे हैं। और इसकी जड़ को समझना जरूरी है, इस पेड़ पर जो कांटे हैं, उनको सीधे खत्म नहीं किया जा सकता, इसकी जड़ को जानना ही होगा। और हम इसी जगह पहले कई बार लगातार यह लिख चुके हैं कि जब देश की सोच से इंसाफ खत्म होने लगता है, तब बेइंसाफी कई अलग-अलग शक्लों में सामने आती है। और आज तो भारत में सोच को कातिल बनाने की जैसी खुली कोशिश हो रही है, वह सदमा देने वाली है।
आज कहीं कोई मुस्लिम नेता किसी का सिर काटने के लिए एक ईनाम की मुनादी करता है, तो दर्जनों हिन्दू नेता, साध्वी और संत, प्रचारक और संगठनों के पदाधिकारी, इनकी बातों की हिंसा देखते नहीं बनती। अभी सोशल मीडिया पर लगातार एक वीडियो फैल रहा है जिसमें योगी आदित्यनाथ के संगठन के एक कार्यक्रम में बैनर लगे मंच पर यह योगी बैठा हुआ है, भगवा साड़ी में कोई एक साध्वी भी बैठी हुई है, और इस संगठन का एक नेता माईक पर मुस्लिमों के खिलाफ इतनी हैवानियत की, इतनी हिंसा की बातें कर रहा है, कि उनको सुनकर यह अंदाज लगाना नामुमकिन है कि ये बातें लोकतंत्र के भीतर कही जा सकती हैं, और प्रधानमंत्री का साथी सांसद उस मंच पर मौजूद रह सकता है। जब चारों तरफ किसी धर्म के खिलाफ, महिलाओं के खिलाफ, लड़कियों के खिलाफ, मोहब्बत के खिलाफ, प्रेम विवाह के खिलाफ, आधुनिक तौर-तरीकों के खिलाफ एक भयानक दकियानूसी हिंसा फैलाई जा रही है, जब वैज्ञानिक सोच को पूरी तरह खत्म किया जा रहा है तब सड़कों पर हत्या इसी सोच का एक विस्तार है। हम बार-बार यह लिखते आ रहे हैं कि जब लोकतंत्र और धार्मिक समानता के खिलाफ एक माहौल सोच-समझकर साजिश के तहत खड़ा किया जाता है, तो उस हिंसक सोच का असर दूर-दूर तक होता है, और लोग कानून अपने हाथ में लेने लगते हैं। जब सीधे प्रधानमंत्री के साथी ऐसी हिंसा फैलाने में लगे रहते हैं, और प्रधानमंत्री उस पर एक असाधारण चुप्पी साधे रखते हैं, तो इस चुप्पी को सहमति के सिवाय और कुछ नहीं माना जाता, और नफरत को आज यह लग रहा है कि उसके अच्छे दिन आ गए हैं।
लेकिन हिन्दुस्तान ऐसी हिंसा और ऐसी नफरत के साथ बहुत आगे नहीं बढ़ सकता। ऐसी हिंसा में मौत चाहे किसी की हो, उसके बाद खर्च तो सरकार का ही होता है। आज अगर देश भर में जगह-जगह ऐसी एक-एक हत्या से एक-एक शहर में कफ्र्यू लगते चले जाए, तो देश की कमाई के आंकड़े कहां जाएंगे? यह सिलसिला थमना चाहिए। और जब केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा और उसके सहयोगी हिन्दू संगठनों के लोग बड़े पैमाने पर इस तरह की हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं, तो इसका प्रधानमंत्री से नीचे किसी और ताकत से कम होना मुमकिन नहीं है, और आज बाकी देश में जो शहरी अराजकता फैल रही है, लोग अदालतों से परे अपने खुद के फैसलों को इंसाफ मानने लगे हैं, उसके पीछे देश में कानून का सम्मान खत्म होना है। भारत जैसे विविधता से भरे हुए देश में अगर वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक सोच इस तरह खत्म हो जाएगी, तो इस देश का ताना-बाना ही बिखर जाएगा, और धागे के टुकड़े कभी सोने की चिडिय़ा नहीं बना सकते।

आप में इतनी जल्दी तू-तड़ाक!

5 मार्च 2015
संपादकीय
आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल जिस धमाके के साथ एक नया इतिहास रचते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री बने, उसके बाद पिछले दो-चार दिनों में इस पार्टी में जिस तरह के मतभेद की खबरें सामने आईं, जितने बयान आए, और जिस तरह इस छोटी सी पार्टी के दो शुरुआती पायों को कल अलग किया गया, उससे देश में लोकतंत्र की बेहतरी की उम्मीद करने वाले लोगों को बड़ी निराशा हुई है। कांग्रेस और भाजपा जैसी दो स्थापित पार्टियों के दबदबे के मुकाबले जिस तरह दिल्ली में झाड़ू चला था, उससे लोगों को लगता था कि बाकी देश में भी जगह-जगह यह पार्टी अपनी संभावनाएं ढूंढ पाएगी और लोग इस पार्टी में अपनी हसरतों की संभावनाएं तो ढूंढ ही रहे थे। लेकिन इतनी जल्दी इसके भीतर इतने गंभीर टकराव सड़क पर आ जाएंगे, यह शायद महीने भर पहले किसी ने सोचा नहीं था। हमने खुद दिल्ली के चुनावी नतीजों के बाद इस पार्टी में देश की एक नई संभावना की शुरुआत देखी थी, और हमारी उम्मीद पर भी पानी फिरा है।
दरअसल जिस तरह अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की पैदाइश हुई थी, और जिस तरह इस पार्टी की कामयाबी एक व्यक्तिवादी आंदोलन और चुनाव प्रचार पर टिकी हुई थी, उसके चलते ऐसा एक खतरा तो बना हुआ था, लेकिन वह खतरा इतनी जल्दी आने का किसी को सूझ नहीं रहा था। दुनिया का इतिहास बताता है कि एक व्यक्ति पर चलने वाले आंदोलन आगे-पीछे उस व्यक्ति की सोच, जिद, और सनक के कैदी हो जाते हैं। भारत की आजादी की लड़ाई में गांधी का कमोबेश ऐसा ही हाल था। लेकिन वे जिस तरह पारदर्शी और ईमानदार थे, लाग-लपेट से परे थे, कुनबे के मोह से परे थे, और जिस तरह की लड़ाई का हौसला उनमें था, उन सबके चलते वे आजादी के आंदोलन से लेकर कांग्रेस पार्टी और नेहरू सरकार तक एक जनकल्याणकारी-तानाशाह की तरह चलते रहे। उनके बाद देश में समय-समय पर बहुत से छोटे-बड़े नेता ऐसे आए जिन्होंने राजनीति या सामाजिक दायरे में एक व्यक्ति-केन्द्रित संघर्ष खड़ा किया, उनमें से कुछ लोग सत्ता से परे रहे, कुछ लोग आंदोलन का मकसद पूरा होते ही आंदोलन से परे भी हो गए। लेकिन राजनीति परे होने की चीज नहीं होती है। राजनीति सरकार तक जाती ही है, और सरकार की भलाई या बुराई से प्रभावित होती ही है।
लेकिन आम आदमी पार्टी के साथ दिक्कत यह रही कि वह अपनी सरकार की गलतियों या गलत कामों के चलते हुए मतभेद और आपसी फूट का शिकार नहीं हुई, वह पार्टी के भीतर ही व्यक्तिवाद से उपजे टकराव का शिकार दिख रही है। अरविन्द केजरीवाल की जुबान जरूरत से कुछ अधिक नर्म है, उनके शब्द और विशेषण अपने आपको जरूरत से अधिक छोटा और तुच्छ साबित करते हैं। उनके ताजा संगठन-फैसलों से अब यह लगता है कि क्या उनकी सादगी एक सायास ओढ़ी हुई छद्म-सादगी है, और उनके भीतर भी वही एक ऐसा महत्वाकांक्षी तानाशाह है जो कि जरा सी भी असहमति को बर्दाश्त नहीं कर सकता? हम अभी अपने विश्लेषण को तात्कालिक और अस्थायी रख रहे हैं, क्योंकि किसी पार्टी की दो दिन के मामलों से उसके बारे में अतिसरलीकरण करके अपने निष्कर्ष नहीं निकालने चाहिए। लेकिन आज लोगों के मन में एक सवाल यह उठ रहा है कि क्या जिस तरह कांग्रेस, भाजपा, तृणमूल कांग्रेस, अन्नाद्रमुक, द्रमुक, बसपा, लालू की पार्टी, मुलायम की पार्टी, शिवसेना, एक व्यक्ति या एक कुनबे की मनमर्जी से चलने वाली पार्टियां हो गई हैं, या लंबे समय से बनी हुई हैं, वैसा ही हश्र आम आदमी पार्टी का इतनी रफ्तार से होना था? और लोगों के मन में यह सवाल भी उठता है कि क्या आम आदमी पार्टी की कामयाबी एक आदमी के कंधों पर चढ़कर आई थी, और उन्हीं कंधों पर टिके हुए सिर का एकाधिकार पार्टी पर रहेगा? योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे लोग बहुत ही कम राजनीतिक दलों को मिल सकते हैं। और ऐसे दो लोगों का अपने पेशे से परे राजनीति में आने, और इस तरह हाशिए पर जाने को देखना तकलीफदेह भी है। आगे-आगे देखें होता है क्या।

मुजरिम की सोच का गंभीर अध्ययन समाज के हित में

4 मार्च 2015
संपादकीय
देश के सबसे चर्चित निर्भया बलात्कार के आरोपी का एक इंटरव्यू बीबीसी पर आया, और हमने भी इस अखबार में उसका एक हिस्सा कल छापा, इसके साथ ही भारत के मीडिया में, जनता के बीच, और आज संसद में इस पर बहस हो रही है कि एक ऐसे आरोपी का इंटरव्यू छापना सही है या नहीं? चूंकि हमने कल इसे छापने का फैसला लिया था, इसलिए आज यह जरूरी और सही होगा कि हम इस बारे में अपनी सोच भी यहां पर रखें।
बलात्कार का जुर्म इस मायने में दूसरे जुर्म से अलग नहीं होता कि उसके आरोपी, या मुजरिम साबित हो चुके किसी व्यक्ति की बात को, सोच को लोगों के सामने न रखा जाए। आज हिंदुस्तान का एक सबसे बड़ा मुजरिम करार दिया गया दाऊद इब्राहीम टेलीफोन पर हिंदुस्तानी मीडिया को इंटरव्यू देते दिखता है। दूसरे तरह के मुजरिम भी अपनी बात कहते दर्ज होते रहे हैं। देश का सबसे बड़ा मुजरिम नाथूराम गोडसे न सिर्फ अपने लंबे बयान को लेकर किताबों की शक्ल में आ चुका है, बल्कि उस पर फिल्में बन चुकी हैं, और नाटक खेले जाते हैं। कुल मिलाकर मतलब यह है कि भारत और दुनिया का इतिहास मुजरिमों को उनकी सोच सामने रखने का मौका देते आया है, कभी मुजरिम साबित होने से पहले, कभी सजा काटते हुए, और कभी रिहाई के बाद।
अब ऐसे में बलात्कार के एक आरोपी की सोच अगर एक गंभीर इंटरव्यू में सामने आती है, तो इससे इस जुर्म और इसके मुजरिम के बारे में एक सामाजिक अध्ययन में मदद भी मिलती है। आज जिस इंटरव्यू को लेकर बवाल मचा हुआ है, और जिसके खिलाफ दिल्ली पुलिस ने भी खालिस बेवकूफी में एक रिपोर्ट खुद ही दर्ज की है, वह इंटरव्यू बलात्कारी की सोच को बताता है, और इसके सामने आने से समाज के भीतर बाकी के संभावित बलात्कारियों की सोच का अंदाज लगाया जा सकता है और समाज अपने-आपको सुधार सकता है।
दरअसल भारत के लोग एक बड़े पाखंड में जीने के आदी हो गए हैं। वे लगातार यह सोचते हैं कि बलात्कार की चर्चा भी न करके समाज को बलात्कार से बचाया जा सकता है, कन्या भू्रण हत्या की बात भी नहीं होनी चाहिए, और बच्चों का यौन शोषण तो मानो भारत में हो ही नहीं सकता। इसके साथ-साथ सेक्स से, वयस्क मुद्दों से जुड़े हुए जितने भी मामले रहते हैं उनको लेकर भी भारत के लोगों का नजरिया रेत में सिर घुसाकर आंधी से बचने का रहते आया है। खुद की आंखें बंद कर लो, तो फिर आसपास कोई बुरी बात बचती ही नहीं है। यह समाज भारत के कॉलेज में जाने वाले बच्चों को भी उनकी देह के बारे में, सेक्स के बारे में कुछ भी बताने के खिलाफ है। इसलिए यह समाज यह भी सोचता है कि मुजरिम की मानसिकता की चर्चा सिर्फ टीवी सीरियलों में होनी चाहिए, एक वक्त की अपराध-कथाओं की पत्रिकाओं में होनी चाहिए, लेकिन असल जिंदगी में गंभीर चर्चा कभी नहीं होनी चाहिए।
इस इंटरव्यू का किरण बेदी ने स्वागत किया है, और सुप्रीम कोर्ट के कुछ दिग्गज वकीलों ने भी इसे समाज के लिए जरूरी बताया है। लेकिन कई सामाजिक कार्यकर्ता इसके खिलाफ उतर आए हैं, जो कि अमूमन उदारवादी रहते हैं। इसलिए इस मुद्दे पर हम अपनी सोच यहां रख रहे हैं कि मुजरिम की सोच का एक गंभीर अध्ययन समाज के हित में है।

लालबत्ती तले खास, और सड़कों पर कुचलकर आम से गुठली बनते लोग

3 मार्च 2015
संपादकीय
हरियाणा के भाजपा-मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के काफिले की एक गाड़ी से कुचलकर एक नौजवान मारा गया और एक पुलिस वाला जख्मी हो गया। उनको छोड़कर काफिला अपने रास्ते चले गया। कल जब यह खबर खड़ी हो रही थी, तब मुंबई के अखबारों की सुबह की वह खबर बासी हो रही थी कि किस तरह महाराष्ट्र के भाजपा-मुख्यमंत्री ने इस बात के लिए माफी मांगी कि उनके काफिले और उनके कार्यक्रम के लिए ट्रैफिक को घंटों रोका गया, और पुलिस ने लोगों से बदसलूकी की। तीसरी खबर दो दिन पहले की है कि किस तरह हैदराबाद में तेलंगाना के नए मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने अपने एक कैम्प ऑफिस के पीछे कई एकड़ के ऑफिसर्स क्लब को खत्म करने का फैसला लिया है क्योंकि वास्तुशास्त्र के मुताबिक सीएम के दफ्तर के पीछे स्वीमिंग पूल का रहना ठीक नहीं माना जा रहा है। और इसके एवज में राज्य सरकार अफसरों के क्लब के लिए हैदराबाद जैसे महंगे शहर में कई एकड़ जमीन दे रही है, और करोड़ों रुपये भी दे रही है।
अब हम फिर से हरियाणा से बात आगे बढ़ाएं, तो खट्टर उस आरएसएस से आए हुए व्यक्ति हैं जो कि सादगी का दावा करता है। अब वहां से आया हुआ आदमी भी चीखते हुए सायरनों वाले काफिलों का मोह इतनी जल्दी विकसित कर लेता है, तो फिर और नेताओं को कहा ही क्या जा सकता है। दूसरी तरफ जब देवेन्द्र फडणवीस महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने, तो उनकी स्कूटर चलाती तस्वीर चारों तरफ आई, और महाराष्ट्र का मीडिया इन विशेषणों से लबालब था कि किस तरह वे सादगी की मिसाल हैं। अब महाराष्ट्र में उनके लिए इस तरह मुंबई की ट्रैफिक को घंटों रोका गया, और लोगों से बदसलूकी की गई। दूसरी तरफ कल ही एक टीवी चैनल पर कर्नाटक के कांगे्रस-मुख्यमंत्री को दिखाया जा रहा था कि किस तरह उनके लिए ट्रैफिक को रोकने का जब सवाल उठाया गया, तो उन्होंने टीवी रिपोर्टर का मखौल उड़ाया, उनके साथ के लोग जोर-जोर से हंसने लगे, और मुख्यमंत्री ने कहा कि उनके काफिले ऐसे ही चलते रहेंगे, लोगों को आदत डाल लेनी चाहिए।
छत्तीसगढ़ में भी हम यही बात देखते हैं कि किस तरह तमाम बड़े सत्तारूढ़ लोगों के काफिले ट्रैफिक को रोककर, लालबत्ती को पार करके, लोगों को लाठियों से किनारे धकेलकर आम जनता के बुनियादी हकों को कुचलते हुए आगे बढ़ते हैं। जो लोग जिन शहरों में पैदा हुए, सड़कों पर खेले, आज वे ही लोग अपने ही लोगों को लाठियों से धकेलकर इस अंदाज में आगे बढ़ते हैं, मानो यह सत्ता हमेशा की हो। छत्तीसगढ़ में भी मंत्रियों के काफिलों से हादसे हो चुके हैं, और जिंदगियां जा चुकी हैं।
एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कल संसद की कैंटीन में जाकर वहां सबके बीच बैठकर थाली का खाना खाते हैं, तो उनकी सादगी पर देश का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया टूट पड़ता है। दूसरी तरफ जनता की जिंदगी को कुचलते हुए जब ऐसे सत्तारूढ़ लोगों के काफिले आगे बढ़ते हैं, तो इंसानियत और लोकतंत्र दोनों फुटपाथ के किनारे नालियों में जा गिरते हैं। चुनाव के पहले जो नेता आम आदमी शब्द की रट लगाते थकते नहीं, वे चुनाव निपटते ही खास आदमी बन जाते हैं, और सत्ता से परे की बाकी सारी जनता आम से भी नीचे की महज गुठली बनकर रह जाती है जिसे वीआईपी या वीवीआईपी कहे जाने वाले लोगों के काफिले कुचलकर आगे बढ़ सकते हैं, सड़कों पर अपने लिए ट्रैफिक रोककर अस्पताल जाते मरीजों को दम तोडऩे के लिए बेबस कर सकते हैं।

मोदी की वजह से राजनीतिक फेरबदल

2 मार्च 2015
संपादकीय
भारत की राजनीति में चारों तरफ फैले हुए फेरबदल कुछ अधिक रफ्तार से हो रहे हैं, और इनके पीछे जो दो बातें दिखती हैं, उनमें से एक है कांगे्रस का पैदा किया हुआ एक विशाल शून्य, जिसमें आंधी की तरह मोदी का आना और समाना हुआ। और इस आंधी की वजह से बाकी पार्टियों और कई प्रदेशों में ऐसे फेरबदल हुए, जिनमें से कई उम्मीदें लोगों ने की नहीं थीं। 
अब जैसे बिहार में लालू और नीतीश का साथ आना, यह एक असंभव सी लगती बात संभव इसलिए हुई क्योंकि मोदी के सामने इन दोनों की हैसियत जमीन पर बिछे हुए साए जितनी रह गई थी, और इन दोनों का गठबंधन दो सायों के हाथ मिलाने सरीखा रहा। इसके साथ-साथ उत्तरप्रदेश और बिहार में दो परस्पर साथी और असहमत भी, लालू और मुलायम समधी बनकर जिस तरह उत्तरभारत की पिछड़े वर्ग की राजनीति में एक मिली-जुली ताकत बनने की कोशिश कर रहे हैं, उसने भी तस्वीर एकदम बदल दी है। अब अगर कांगे्रस को देखें, तो उसके तकरीबन खंडहर सरीखे रह गए घर के भीतर आज यह भी समझ नहीं पड़ रहा है कि कल इस पार्टी का मुखिया किसे रहना है, यह तो दूर की बात है कि किसके मुखिया रहने पर क्या होगा। इस पार्टी को न अपनी ऐतिहासिक चूक समझने की समझ दिख रही, न इसको आज क्या करना है यह सूझ रहा, और न ही कल किसकी अगुवाई में क्या भला या बुरा होगा, यह समझ पड़ रहा। ऐसे राजनीतिक शून्य के चलते मोदी की जगह अभी भी बनी हुई है, दिल्ली के चुनाव में भाजपा के मटियामेट हो जाने के बाद भी।
अब पल भर को खुद भाजपा की बात अगर सोचें, तो लोकसभा चुनाव में आसमान के तारों को हासिल कर लेने के एवज में पार्टी ने अपने-आपको मोदी के हवाले कर दिया, और नतीजा यह हुआ कि भाजपा के भीतर तमाम शक्तिकेंद्र खत्म होकर पार्टी पूरी तरह से एकधु्रवीय बन गई, और आज मोदी-अमित शाह से परे इस पार्टी में कुछ नहीं है। और ऐसे ही खालिस एकाधिकार के चलते इस जोड़ी ने ऐसे फैसले लिए कि जिनकी वजह से दिल्ली में यह पार्टी अभी बुलडोजर के नीचे दबे हुए बर्तन की तरह चित्त पड़ी हुई है। लेकिन फिर भी भाजपा के भीतर किसी एक व्यक्ति का इस तरह का कब्जा पहले किसी ने देखा-सुना नहीं था, और यह मोदी ही हैं जिनकी वजह से भारतीय राजनीति के भीतर, भाजपा के भीतर ऐसे दिन आए हैं। 
अब भाजपा के बाहर निकलें तो देखें कि कश्मीर में भाजपा ने वहां की क्षेत्रीय पार्टी पीडीपी के साथ मिलकर जिस तरह की गठबंधन सरकार बनाई है, उसकी नींव में श्यामाप्रसाद मुखर्जी से लेकर आज तक के जनसंघ-भाजपा के तमाम मुद्दों को फिलहाल दफन कर दिया गया है, और यह भाजपा-संघ परिवार के लिए एक बिल्कुल ही अलग किस्म की नौबत है। लेकिन इस बारे में कल ही हम इस जगह काफी लंबी-चौड़ी बातें लिख चुके हैं।
अब एक आखिरी बात, भाजपा और मोदी से जुड़े हुए संघ परिवार कहे जाने वाले एक तबके के बड़े-बड़े बड़बोले नेता लगातार देश में जिस तरह का तनाव फैलाने वाले बातें कर रहे हैं, उनको मोदी की मंजूरी है, या मोदी के बेकाबू हैं लोग, यह अभी साफ नहीं है। लेकिन इतने साम्प्रदायिक तनाव की बातें तो मोदी के विपक्ष में रहते हुए भी सामने नहीं आई थीं। अब एकाएक ऐसा तनाव बड़ा अजीब है, और देश के लिए बहुत ही बुरी नौबत ला चुका है, और भी बुरी लाने वाला है। यह नौबत मोदी के सत्ता में आने के बाद आई है, इसलिए हम इसे यहां गिना रहे हैं, और इससे खुद मोदी का चुनावी भला होगा, या चुनावी बुरा होगा यह तो हमें नहीं मालूम, लेकिन देश का बुरा शर्तिया हो रहा है। 
कुछ कतरा-कतरा बातें मोदी की वजह से भारतीय राजनीति में आज अलग-अलग जगहों पर एक साथ हो रहे फेरबदल की हैं, और जमीन के नीचे इन बातों का एक-दूसरे से जुडऩा पता नहीं भारतीय राजनीति को किस तरफ ले जाएगा।