कश्मीर, सबसे बड़ी फजीहत केंद्र सरकार और भाजपा की

9 मार्च 2015
संपादकीय
जम्मू-कश्मीर का मामला आसान नहीं है। आज वहां के पीडीपी के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद एक अलगाववादी नेता को जेल से छोड़ते हैं, और संसद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यह कहते हैं कि उनका यह फैसला न तो केंद्र सरकार को मालूम था, और न ही जम्मू-कश्मीर में सरकार में भागीदार भाजपा को। इससे परे भी मुख्यमंत्री बनते ही मुफ्ती ने अमनचैन से चुनाव निपटने के लिए अलगाववादियों को शुक्रिया कहा था, और आतंकियों और पाकिस्तान को भी। ये तमाम बातें आरएसएस और भाजपा की आज तक की कश्मीर-नीति के खिलाफ तो हैं ही, ये बातें देश की किसी भी और पार्टी को भी मंजूर नहीं हैं, और आज संसद में मोदी को यह कहना पड़ा कि मुफ्ती के फैसलों से न सिर्फ संसद के विपक्ष की असहमति है, बल्कि संसद में सरकार की विपक्ष के साथ-साथ इन फैसलों से असहमत है, और यह पूरे संसद और देश की नाराजगी है। 
दरअसल पूरी तरह नामुमकिन किस्म के दो लोगों के बीच की यह कश्मीरी शादी काफी गड़बड़ ही थी। हमको यह उम्मीद थी कि भाजपा और पीडीपी, दोनों ही कश्मीर के मुद्दों पर अपने कड़े रूख को कुछ-कुछ नरम करके, एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर सरकार चलाने की कोशिश करेंगे और लोकतंत्र में ऐसी अटपटी लगती कोशिशें भी होनी चाहिए। लेकिन मुफ्ती ने किसी रणनीति के तहत, या बिना उसके भी, जिस तरह के फैसले लेने शुरू किए हैं, जिस तरह की जुबान वे बोल रहे हैं, वे गठबंधन की जरूरतों के ठीक खिलाफ हैं। और भाजपा के पास इतनी जल्दी गठबंधन से बाहर आने का विकल्प भी शायद नहीं है। खुद भाजपा के लोग, और उसकी हिंदू-बुनियाद का मतदाता वर्ग भाजपा के इस गठबंधन से शुरू से ही नाखुश रहा, और लोगों को बात-बात में यह याद पड़ रहा था कि जिन मुद्दों पर लड़ते-लड़ते श्यामाप्रसाद मुखर्जी की जिंदगी कश्मीर में खत्म हुई थी, उन मुद्दों को छोड़कर भाजपा एक ऐसी पार्टी के साथ सरकार बना रही है, जो कि इन मुद्दों पर साफ-साफ, एकदम ही खिलाफ है। 
हम ऐसे राजनीतिक समझौतों को एक त्रिशंकु विधानसभा की नौबत में बहुत अनैतिक नहीं मानते, अगर वे एक घोषित साझा कार्यक्रम के आधार पर किए जाएं। लेकिन आज मुफ्ती और कश्मीर सरकार भाजपा और मोदी के काबू के बाहर दिख रहे हैं। अगर जल्द ही आम सहमति का कोई रास्ता नहीं निकला तो उसमें सबसे बड़ी फजीहत केंद्र सरकार और भाजपा की होगी। कश्मीर को लेकर पहले दिन से ही ऐसी तनातनी वहां पर एक निर्वाचित सरकार की संभावना को कमजोर कर रही है। मुफ्ती की अपनी स्थानीय मजबूरियां हो सकती हैं, या वे इस सरकार के बाद की राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए ऐसे फैसले लेते हो सकते हैं, लेकिन एक राष्ट्रीय पार्टी और केंद्र सरकार की मुखिया के रूप में भाजपा के लिए यह शर्मिंदगी की नौबत है, और भाजपा का इतिहास भी आज हैरान होकर श्रीनगर को देख रहा है। लगे हाथों एक लाईन में यहां पर यह भी याद कर लेना ठीक होगा कि महाराष्ट्र में भाजपा की दशकों पुरानी भागीदार शिवसेना भी लगातार भाजपा से असहमति का नारा लगाते हुए शतरंज की बिसात पर तिरछे-तिरछे चल रही है।

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