धरती के दूसरे तरफ बची एक नन्हीं जिंदगी से सबक

संपादकीय
12 मार्च 2015
अमरीका की एक खबर से हिन्दुस्तान का कुछ अधिक लेना-देना नहीं है, लेकिन फिर भी वह खबर दिल को छू लेती है, दहला देती है, और जिन लोगों की ईश्वर पर आस्था है, वे ईश्वर को करिश्मे की वाहवाही का हकदार मानते हुए कह रहे हैं कि जाको राखे साईयां, मार सके न कोय। एक कार नदी में गिरी, उसे चलाती हुई महिला डूबकर मर गई, लेकिन उसके साथ उसकी डेढ़ बरस की बच्ची भी थी, जो कि कार के सीट बेल्ट से बंधी हुई थी, और उल्टी हो चुकी कार में बेल्ट से टंगे हुए वह बर्फीली नदी में भी 14 घंटे जिंदा रही। अब वह अस्पताल से भी बाहर आ चुकी है। दुनिया के ठीक दूसरी तरफ के हिस्से की इस छोटी सी घटना को लेकर आज हम यहां इसलिए लिख रहे हैं क्योंकि इस नन्हीं बच्ची की जिंदगी और मौत के बीच का फासला सिर्फ कार का एक सीट बेल्ट रहा। जिस तरह हिन्दुस्तान में यह माना जाता है कि सीट बेल्ट कार के मुसाफिरों के लिए नहीं, पुलिस के नियम के लिए होता है, वैसा ही अगर अमरीका में हुआ होता, तो मां के साथ-साथ इस बच्ची की भी लाश मिली होती। 
छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश में दुपहिया चलाने वाले लोग वहां पर बहुत अधिक मारे जाते हैं, जहां पर हेलमेट के नियम को सख्ती से लागू नहीं किया जाता। कार चलाने वाले लोगों में भी जो लोग सीट बेल्ट नहीं लगाते हैं, किसी बड़ी टक्कर या हादसे में उनके बचने की गुंजाइश कम रहती है। वैसे तो अपनी खुद की हिफाजत करना हर किसी की अपनी जिम्मेदारी होती है, लेकिन हिन्दुस्तान में आम सोच यह है कि जब तक कोई रोकने वाला न हो, किसी नियम को मानने की जरूरत नहीं होती। शहर के बीच हो, या गांव-जंगल में, रेल्वे क्रासिंग पर दो मिनट का इंतजार करने के बजाय गेट के नीचे से दुपहिया घसीटकर लोग खतरा झेलकर पटरी पार करते हैं, और हर बरस ऐसे सैकड़ों लोग मारे जाते हैं। हम बार-बार ऐसे खतरे की तरफ से लोगों को आगाह करते हैं, और उन्हें हेलमेट लगाने, सीट बेल्ट लगाने की नसीहत देते हैं। 
दरअसल जो लोग किसी एक नियम को मानते हैं, वे लोग बाकी नियमों को मानने के बारे में भी सोचते हैं। और जो लोग किसी एक नियम को तोड़ते हैं, वे लोग बाकी नियमों को भी तोडऩे वाले साबित होते हैं। यह राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि देश में लागू ट्रैफिक नियमों को कड़ाई से लागू करे, क्योंकि जो लोग बिना हेलमेट दुपहिया दौड़ाते हैं, वे नियम तोड़कर अधिक रफ्तार से भी दौड़ाते हैं, और कभी वे तीन लोग बैठकर चलते हैं, तो कभी प्रेशर हॉर्न बजाते हुए चलते हैं। नियमों के लिए हिकारत छोटी-छोटी पैकिंग में नहीं आती, बल्कि बड़े, फेमिली साईज के पैक में आती है। इसलिए सरकार को, समाज को, और मां-बाप को कड़ाई से जिंदगी बचाने का काम करना चाहिए, गैरजिम्मेदार ड्राईवरों की जिंदगी भी, और सड़कों पर बाकी लोगों की जिंदगी भी। छत्तीसगढ़ में पिछले बरसों में हम देखते हैं हर कुछ महीनों में सरकार मानो नींद से जागकर हेलमेट लागू करती है, और फिर मामला ठंडा पड़ जाता है। हर बरस इस छोटे से राज्य में सैकड़ों लोग सड़कों पर दुपहिया-दुर्घटना में बिना हेलमेट मरते हैं, और दसियों हजार लोग जिंदगी भर के लिए तकलीफ वाले जख्म पाते हैं। यह मामला हमारी समझ से पूरी तरह बाहर है कि गैरजिम्मेदार लोगों के साथ रियायत करने से सरकार का क्या फायदा होता है? और इतनी मामूली सी कड़ाई की जिम्मेदारी से भी सरकार क्यों कतराती है? 
अमरीका के जिस हादसे में बची जिंदगी से हमने बात शुरू की है, वैसी एक मामूली और आसान सावधानी अगर यहां पर लोग बरतने लगें, तो हर बरस हजारों छत्तिसगढिय़ा बचेंगे, और अभी जो हजारों लोग हर बरस मर रहे हैं, उनको बढिय़ा तो कहा नहीं जा सकता। 

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