जिंदल-बाल्को को मिट्टी के मोल कोयला खदानें नहीं...

संपादकीय
21 मार्च 2015

केन्द्र सरकार की कोयला खदानों को देने की नई नीति और प्रक्रिया से देश को लाखों करोड़ अधिक मिलते दिख रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद इस पूरी सावधानी और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी से बचकर पता नहीं किस तरह जिंदल और बाल्को जैसे उद्योग मिट्टी के मोल कोयला खदानें पाने के करीब पहुंच गए थे। देश के नए कोयला सचिव जितनी बारीकी से रात-दिन मेहनत करके सरकार को होने जा रही कमाई पर नजर रख रहे हैं, और घंटे-घंटे में वे जिस तरह ट्वीट कर रहे हैं, उसी का नतीजा है कि आज उन्होंने छत्तीसगढ़ की उन कोयला खदानों पर लगी बोलियों को खारिज कर दिया जो कि जिंदल और बाल्को को मिलने जा रही थीं। पता नहीं कैसे इन दो उद्योगों ने इतने कम दाम पर इनको पाने का रास्ता निकाल लिया था, कि अगर सरकार चौकन्नी नहीं होती, तो देश की यह दौलत इनको मिट्टी के भाव मिल चुकी रहती। लेकिन पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कोयला मंत्री रहते हुए जिस तरह से जनता का खजाना बंदरबांट किया था, उसके बाद अब सुप्रीम कोर्ट की निगरानी की वजह से सरकार चौकस है, और देश को इतनी कमाई होते दिख रही है जितनी कि मनमोहन सिंह के वक्त के सीएजी ने भी अपने अंदाज में नहीं बताई थी। 
खैर, इस बारे में हम पहले लिख चुके हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में सरकार को यह सोचना चाहिए कि इस राज्य के सबसे बड़े उद्योग किस तरह से प्रदेश और केन्द्र सरकार के नियम-कायदों को कुचलते हुए प्रदूषण फैलाते हैं, खदानें पाते हैं, सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करते हैं, नदियों से जबर्दस्ती पानी लेते हैं, अपनी खदानों से बाहर से भी कोयला और लोहा निकाल लेते हैं, किसी नाम पर खदान लेते हैं, और किसी दूसरे उद्योग में उस कोयले का इस्तेमाल करते हैं, उसे बाजार में ब्लैक में बेच देते हैं। जब प्रदेश के सबसे ताकतवर कारोबारी इस तरह का काम करते हैं, तो राज्य सरकार भी उनसे लड़ाई एक सीमा तक लड़ पाती है, और बाल्को के मामले में प्रदेश ने देखा है कि किस तरह सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे के मामले में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार बाल्को के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट नहीं गई थी। अभी कल ही यह खबर आई है कि राज्य सरकार ने जिंदल से जो बिजली खरीदी थी उसमें से डेढ़ सौ करोड़ से अधिक का भुगतान करने से विद्युत नियामक आयोग ने इंकार कर दिया है। 
पाठकों को याद होगा कि जिंदल ने पर्यावरण मंजूरी के बिना बिजली घर बनाना चालू कर दिया था, और उस वक्त इसी अखबार में उसके बारे में छपा था। बाद में केन्द्र की मनमोहन सिंह सरकार के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने जांच करवाई और इस अखबार में छपी रिपोर्ट सही पाई गई थी, और जिंदल को दी गई मंजूरी खारिज हुई थी। लेकिन छत्तीसगढ़ में खदान और कारखाने वाले लोग इतने बड़े ताकतवर हैं कि वे तरह-तरह के आयोगों, अदालतों, और सरकारों के बीच अपनी बात को मनवाने की बहुत सी तरकीबें जानते हैं, और उनके सामने प्रदेश की आम जनता की ताकत केंचुए जितनी भी नहीं रहती। जिंदल के बारे में लोगों को याद होगा कि राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल ने यह भी पाया था कि जनसुनवाई के नाम पर प्रशासन के साथ मिलकर जिंदल ने एक पूरी तरह से बोगस कार्रवाई की थी, और उस जनसुनवाई को ट्रिब्यूनल ने खारिज कर दिया था।
लोगों को यह भी याद होगा कि किस तरह एस्सार ने बस्तर में काम करते हुए नक्सलियों को नगद मदद करने का काम किया था, और उस मामले में फंसे हुए लोगों को तरह-तरह से बचा लिया गया। अब एस्सार के एक अफसर ने दूसरी कंपनी में जाने के बाद एस्सार की अंदरुनी ई-मेल का भांडाफोड़ किया है, तो उससे पता चलता है कि राज्य के ताकतवर लोगों को छोटे-छोटे एहसानों से दबाकर यह कंपनी किस तरह अपना प्रभामंडल बनाती है, और किस नीयत से वह सरकार और मीडिया के लोगों को भ्रष्ट करती है। इस राज्य में ऐसे बड़े कारोबारों के खिलाफ छोटे-छोटे से प्रतीकात्मक जनआंदोलन कोई असर नहीं डाल पा रहे हैं, लेकिन कोयला खदानों के मामले में केन्द्र सरकार ने जिस सावधानी से जिंदल और बाल्को की बोलियों को खारिज किया है, वह तारीफ के लायक कार्रवाई है। 

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