इसरो से सीखने और नसीहत लेने की जरूरत


संपादकीय
28 मार्च 2015
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान, इसरो, को देश का प्रतिष्ठित गांधी शांति पुरस्कार दिया गया है। उसे तकनीकी उपलब्धि से देश के विकास में अभूतपूर्व और असाधारण योगदान देने के लिए यह सम्मान मिला। और आज देश का चौथा नेवीगेशन सेटेलाइट श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंन्द्र से छोड़ा जाएगा। इस मिशन की कामयाबी से भारत की उपग्रह आधारित जीपीएस प्रणाली अमरीका की जीपीएस प्रणाली की बराबरी पर पहुंच जाएगी।
 इसरो की अभी आधी-पौन सदी के भीतर की कहानी यह है कि वह जब रॉकेट रवाना करता था, तो रॉकेट के हिस्से कभी बैलगाड़ी पर, तो कभी साइकिल के कैरियर पर रखकर लांचिंग पैड तक ले जाए जाते थे। उन तस्वीरों को देखें तो लगता है कि आज अगर भारत में तमाम किस्म की गड़बडिय़ों के बावजूद यहां का अंतरिक्ष अनुसंधान और उस पर अमल इस ऊंचाई तक पहुंचे हैं, कि यहां के अंतरिक्षयान चांद और मंगल तक पहुंच गए, तो यह संस्था सचमुच ही एक असाधारण सम्मान के लायक है। जब देश नेताओं, अफसरों, कारोबारियों, और दूसरे पेशे के लोगों की वजह से दुनिया से लेकर हिन्दुस्तान के भीतर अदालतों तक शर्मिंदगी झेल रहा है, तब अगर इसरो एक ऐसा संस्थान है जो कि दुनिया के सबसे विकसित कई देशों के उपग्रह भी अंतरिक्ष में अपने रॉकेटों से पहुंचाता है, तो यह तमाम नकारात्मक माहौल के बीच देश की जनता के लिए गर्व की एक बात है, और विज्ञान-अनुसंधान के क्षेत्र में यह एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि है। 
देश पर गर्व होना भी जनता की सोच के लिए बहुत जरूरी होता है। तरह-तरह के मानवीय अपराध, तरह-तरह की अमानवीय खबरें, बड़े-बड़े ओहदों के किए हुए बड़े-बड़े जुर्म से देश में एक शर्मिंदगी का माहौल रहता है। ऐसे में नई पीढ़ी के सामने कोई प्रेरणा नहीं रह जाती है। फिर एक दूसरी बात यह कि देश में कई तबकों ने मिलाकर एक ऐसा अवैज्ञानिक वातावरण बनाकर रखा है, कि वैसे में वैज्ञानिक सफलता का सामाजिक महत्व और बढ़ जाता है। भारत के इसरो ने लगातार देश की कई तरह की सरकारों, और कई तरह के राजनीतिक दलों के राज के बीच भी लगातार सीमित बजट में असीमित काम किया है। जब देश में एक तरफ जनता का पैसा डुबाने, और सरकारी काम को अधिक से अधिक खर्च पर करने का एक किस्म से मुकाबला ही चल रहा है, तब एक संस्था अगर किफायत में बड़ा काम कर रही है, तो इससे देश की दूसरी सरकारी संस्थाओं को सीखना भी चाहिए।
हम  इसरो के संदर्भ में पहले भी लिख चुके हैं कि हिंदुस्तानियों को, जो जहां जिस काम को कर रहे हैं, उस काम में उत्कृष्टता की तरफ बढऩे की बहुत जरूरत है। जब लोगों को अपने काम में चलिटी की परवाह नहीं रह जाती, तब दुनिया में उनकी जरूरत घटती जाती है, और सामानों से लेकर सेवा तक, उससे कमाई की गुंजाइश भी खत्म होती जाती है। आज जब एक-एक सामान के अलग-अलग हिस्से दर्जन भर देशों में बनते हैं, और कोई तेरहवां देश उसकी मार्केटिंग करता है, तो ऐसे में जो देश, जहां के लोग चलिटी के लिए लापरवाह रहेंगे, वैसे देश और लोग दूसरे ग्रह तो दूर, खुद अपने शहर के बाजार में भी नहीं पहुंच पाएंगे, वहां भी दूसरे देश से आया सामान बिकेगा, दूसरे देश-प्रदेश से आए कारीगर काम करेंगे। 
सौ फीसदी हिंदुस्तानी हाथों और हुनर से काम करते इसरो की मिसाल से देश के हर किसी को कुछ न कुछ सीखने और नसीहत लेने की जरूरत है। न हिंदुस्तानी कामगार कमजोर हैं, न यहां के सामान कमजोर हैं।
दुनिया के सबसे अव्वल आधा दर्जन देशों में से भारत को एक बनाने का काम इस एक संस्थान ने किया है। लेकिन इससे सीखकर देश के हर पढऩे-लिखने वाले, हर काम करने वाले अपने-आप को बेहतर बना सकते हैं, अपने काम में सुधार ला सकते हैं, और आसमान को छू सकते हैं, उसे चीरकर दूसरे ग्रहों तक जा सकते हैं।  

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