ऐसी किफायत कुल मिलाकर जनता को बड़ी महंगी पड़ती है

संपादकीय
29 मार्च 2015
आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्राबाबू नायडू ने सभी विधायकों को आधे-आधे लाख रूपए में मोबाइल फोन देने का फैसला लिया है। इसे लेकर कुछ लोग आलोचना कर रहे हैं कि इसी राज्य में इसी मुख्यमंत्री ने अभी कुछ दिन पहले जनता से यह अपील की थी कि वे नया राज्य बनाने के लिए अपनी एक दिन की मजदूरी, या वेतन दान दें। इसके पहले भी उन्होंने लोगों से कहा था कि वे राजधानी निर्माण के लिए एक-एक ईंट दान दें। यह पहला मौका नहीं है जब इस राज्य में सरकार की तरफ से लैपटॉप या कम्प्यूटर-पैड या महंगे मोबाइल दिए गए हों, लेकिन इस सरकार से लोग किफायत की उम्मीद करते थे। सरकार के तमाम फैसले विधानसभा या लोकसभा में सभी दलों के विधायकों के सामने खुले रहते हैं और उनको मिलने वाले महंगे सामानों को लेकर उनको यह छूट भी रहती है कि वे न चाहें, तो न लें। छत्तीसगढ़ में भी बहुत बरसों से विधायकों को लैपटॉप देने की परंपरा रही है, और शायद सांसदों को भी संसद या सरकार की तरफ से मुफ्त में लैपटॉप मिलते हैं। 
अब किफायत के बड़े कट्टर हिमायती होने के बावजूद हम इस मामले में थोड़ी सी अलग सोच रखते हैं। भारत में सांसद या विधायक बनने के लिए लोगों को चाहे कुछ करना पड़ता हो, चुने जाने के बाद अपने पांच बरस के (और जम्मू-कश्मीर में छह बरस के विधायक) अपने कार्यकाल में इन निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को जितना वक्त जनता के लिए देना पड़ता है, वह उनको किसी और काम या कारोबार का वक्त नहीं दे सकता। और फिर सरकार के साथ किसी भी तरह के कामकाज वाले काम वे कर भी नहीं सकते, क्योंकि हितों के टकराव का मामला आएगा। फिर संसद या विधानसभा से जो तनख्वाह मिलती है, और जो सहूलियतें मिलती हैं, वे रोजाना सैकड़ों लोगों से मिलने, क्षेत्र का दौरा करने, सांस्कृतिक-सामाजिक शिष्टाचार के तहत उपहार देने, घर आने वाले लोगों को चाय-पानी पिलाने जैसे मामलों के लिए नाकाफी रहती है। परिवार के खर्च के लिए भी हिन्दुस्तान अपने सांसदों-विधायकों को कम तनख्वाह देता है। और संसद भवन में जो रियायती खाना सांसदों को मिलता है, उसके रेट को लेकर जैसी तस्वीर सांसदों की बनी हुई है, उनकी बाकी जिंदगी ईमानदारी की तनख्वाह से चलना मुश्किल रहता है। 
अब एक आम सोच यह भी बनी हुई है कि सांसद और विधायक भ्रष्ट होते हैं। दरअसल जनता राजनीति में, संसद और विधानसभा में, सरकार में, या बहुत से दूसरे दायरों में भी अधिकतर लोगों को भ्रष्ट मानकर चलती है, और हो सकता है कि यह सच भी हो। लेकिन इससे बड़ा सच यह है कि इनमें से हर दायरों में कुछ लोग, हो सकता है कि सीमित संख्या में, ईमानदार रहते हैं। अब उनके पांच बरसों के गुजर-बसर, और परिवार-पेशे को अगर देखें, तो भारत के सांसदों और विधायकों को मौजूदा वेतन से अधिक मिलना चाहिए। अंग्रेजी की एक पुरानी कहावत है कि आप जब मूंगफली देते हैं, तो आपको बंदर ही मिलते हैं। हिन्दी की एक कहावत है कि सस्ता रोए बार-बार, महंगा रोए एक बार। हमारे हिसाब से सांसदों और विधायकों को इतना वेतन मिलना चाहिए कि अच्छे खासे कमाऊ कारोबार या रोजगार में लगे हुए लोग भी उसे छोड़कर संसद-विधानसभा में आने की सोचें। अब हम छत्तीसगढ़ की ही बात करें, तो जिन विधायकों के जिम्मे राज्य के 64 हजार करोड़ के बजट पर निगरानी रखने का जिम्मा रहता है, उन 91 विधायकों में से हर एक पर औसत 700 करोड़ रूपए का जिम्मा बनता है। राज्य के इतने बड़े खर्च पर नजर रखने, उस बारे में सवाल उठाने, उसमें किफायत बरतने के लिए अगर विधायक को कम्प्यूटर-फोन, अच्छी तनख्वाह, अच्छे सहयोगी-कर्मचारी मिलते हैं, तो उसमें क्या बुराई है? खासकर ऐसे देश-प्रदेश में जहां पर कि सरकारी खर्च भी बहुत बड़े-बड़े भ्रष्टाचार में आधी सदी पुरानी परंपरा चली आ रही है, वहां पर अगर निर्वाचित प्रतिनिधियों को ईमानदार और असरदार बनाए रखना है, तो जनता को उन पर खर्च भी करना चाहिए, और हम बाकी चीजों की महंगाई पर रोना रोने वाले देश में सस्ते से सस्ता नेता पाने की सोच को सही नहीं मानते। ऐसी किफायत कुल मिलाकर बड़ी महंगी पड़ती है। 

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