गाय को कटने से बचाना है, तो उसका पेट भरने का इंतजाम करें

23 मार्च 2015
संपादकीय

पिछले कुछ महीनों में देश के कई राज्यों में गो मांस, गो-वंश के मांस, और अंग्रेजी में बीफ कहे जाने वाले शब्द के दायरे में आने वाले मांस को खाने वाले, बेचने वाले, और कसाई घरों में इन जानवरों के कटने को लेकर बहस चल रही है। कुछ राज्यों में पहले से जारी कुछ प्रतिबंधों को बढ़ाया है, कुछ राज्यों ने कोई प्रतिबंध लगाने से मना कर दिया है, और कुछ जगहों पर विचार चल रहा है। अब देश भर में इस बात को व्यापक रूप से समझने की जरूरत है कि गाय-बैल या भैंस-भैंसों के मांस को लेकर देश में कानून क्या रहना चाहिए? 
अब लगभग पूरा का पूरा उत्तर-पूर्व इन जानवरों का मांस खाने वाले लोगों का है। केरल और दक्षिण के कई राज्यों में व्यापक रूप से लोगों के खानपान में इसकी जगह है। पश्चिम बंगाल किसी भी तरह के प्रतिबंध से मुक्त हैं। यही हाल कश्मीर का है, और कुछ और राज्यों में भी नियम कम हैं, कमजोर हैं, या उन पर अमल और अधिक कमजोर है। केन्द्र में भाजपा की सरकार आने के बाद भाजपा के राज वाले प्रदेशों में इस बारे में कड़ाई बरतने की कार्रवाई चल रही है, लेकिन गोवा एक ऐसा भाजपा-राज्य है जहां के मुख्यमंत्री ने यह साफ किया है कि तकरीबन आधी आबादी अल्पसंख्यकों की है इसलिए वे बीफ पर रोक नहीं लगाएंगे। देश भर में अल्पसंख्यकों और गरीब मांसाहारियों के अलावा बहुत से दूसरे ऐसे हिन्दू हैं, जो कि गोवंश का मांस खाते हैं। और यह कोई नई संस्कृति नहीं है, भारत में महाभारत काल और उसके भी पहले के साहित्य-वर्णन को देखें, तो गाय-बैल के मांस का व्यापक इस्तेमाल लिखा हुआ है। हिन्दुओं में दलितों ने जगह-जगह इसका विरोध किया है, और दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रों-प्राध्यापकों ने मोदी सरकार आने के पहले ही हॉस्टल में लगाई गई रोक के विरोध में गोमांस-भोज किया था। ऐसा ही अभी पिछले पखवाड़े मद्रास हाईकोर्ट के अहाते में वहां के वकीलों ने किया। 
हमारा मानना है कि लोगों के खानपान पर ऐसी रोक लगाना व्यक्तिगत स्वतंत्रता के खिलाफ है। दूसरी बात यह कि बूढ़े गाय-बैलों की बात तो छोड़ ही दें, मामूली दूध देने वाली गाय भी हिन्दुस्तान के शहरों में रात-दिन घूरों पर ही दिखती हैं, और कचरा-गंदगी खा-खाकर उसकी हालत यह रहती है कि जहां ऑपरेशन हो पाता है वहां गायों के पेट से 30-40 किलो तक पॉलीथीन निकला है। गाय को बचाने की सोच अच्छी है, लेकिन गाय को कटने से बचाने के लिए आक्रामक आंदोलन करना, कानून बनाना, और दूसरी तरफ गाय को भूखे मरने देने के लिए घूरों पर छोड़ देना, यह एक विरोधाभासी सोच है। किसी एक धर्म या जाति के लोगों को दूसरों पर यह नहीं थोपना चाहिए कि वे कौन सा मांस खाएं, किस तरह का मांस खाएं। अब भारत का जैन समाज तो किसी भी तरह के मांसाहार के खिलाफ है। अब अगर उसकी धार्मिक भावनाओं को देखा जाए तो देश भर में मांस-मछली और मुर्गे पर रोक लगानी होगी। आज गाय-बैल के मांस को न खाने के पीछे हिन्दू समाज के भी एक हिस्से की भावना जुड़ी हुई है, और दूसरा हिस्सा नियमित रूप से अपने खानपान में इसका इस्तेमाल करता है। देश में धार्मिक भावनाओं के आधार पर खानपान का यह फर्क घातक साबित होगा। सरकार को इसमें दखल नहीं देना चाहिए, और देश की जो अलग-अलग संस्कृति है, उन सबको एक आजादी देने की जरूरत है। और गाय को बचाने के हिमायती लोगों को यह भी समझने की जरूरत है कि गाय कटने तभी जा सकती है जब दूध देना बंद कर चुकी गाय को खुले छोड़ दिया जाता है, भूखे मरने के लिए। अगर गाय के प्रेमी, गाय के पूजक लोग गाय के लिए मरने तक का एक इंतजाम रखेंगे, तो कोई बूढ़ी गाय को लूटकर नहीं ले जा सकते। जगह-जगह यह देखने में आता है कि गायों को बचाने के लिए हिन्दू समाज के भीतर ही दान से बने हुए जो ट्रस्ट हैं, उनके भीतर अफरा-तफरी होते रहती है। अगर गाय को मां मानने वाले लोग उसे कटने से बचाना चाहते हैं, तो उसे गाय को खिलाने का जिम्मा भी उठाना पड़ेगा। लोग उसे कटने नहीं देते, और उसका पेट भी भरने नहीं देते, ऐसे लोग पाखंडी होने के अलावा और कुछ नहीं हैं। 

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