लालबत्ती तले खास, और सड़कों पर कुचलकर आम से गुठली बनते लोग

3 मार्च 2015
संपादकीय
हरियाणा के भाजपा-मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के काफिले की एक गाड़ी से कुचलकर एक नौजवान मारा गया और एक पुलिस वाला जख्मी हो गया। उनको छोड़कर काफिला अपने रास्ते चले गया। कल जब यह खबर खड़ी हो रही थी, तब मुंबई के अखबारों की सुबह की वह खबर बासी हो रही थी कि किस तरह महाराष्ट्र के भाजपा-मुख्यमंत्री ने इस बात के लिए माफी मांगी कि उनके काफिले और उनके कार्यक्रम के लिए ट्रैफिक को घंटों रोका गया, और पुलिस ने लोगों से बदसलूकी की। तीसरी खबर दो दिन पहले की है कि किस तरह हैदराबाद में तेलंगाना के नए मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने अपने एक कैम्प ऑफिस के पीछे कई एकड़ के ऑफिसर्स क्लब को खत्म करने का फैसला लिया है क्योंकि वास्तुशास्त्र के मुताबिक सीएम के दफ्तर के पीछे स्वीमिंग पूल का रहना ठीक नहीं माना जा रहा है। और इसके एवज में राज्य सरकार अफसरों के क्लब के लिए हैदराबाद जैसे महंगे शहर में कई एकड़ जमीन दे रही है, और करोड़ों रुपये भी दे रही है।
अब हम फिर से हरियाणा से बात आगे बढ़ाएं, तो खट्टर उस आरएसएस से आए हुए व्यक्ति हैं जो कि सादगी का दावा करता है। अब वहां से आया हुआ आदमी भी चीखते हुए सायरनों वाले काफिलों का मोह इतनी जल्दी विकसित कर लेता है, तो फिर और नेताओं को कहा ही क्या जा सकता है। दूसरी तरफ जब देवेन्द्र फडणवीस महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने, तो उनकी स्कूटर चलाती तस्वीर चारों तरफ आई, और महाराष्ट्र का मीडिया इन विशेषणों से लबालब था कि किस तरह वे सादगी की मिसाल हैं। अब महाराष्ट्र में उनके लिए इस तरह मुंबई की ट्रैफिक को घंटों रोका गया, और लोगों से बदसलूकी की गई। दूसरी तरफ कल ही एक टीवी चैनल पर कर्नाटक के कांगे्रस-मुख्यमंत्री को दिखाया जा रहा था कि किस तरह उनके लिए ट्रैफिक को रोकने का जब सवाल उठाया गया, तो उन्होंने टीवी रिपोर्टर का मखौल उड़ाया, उनके साथ के लोग जोर-जोर से हंसने लगे, और मुख्यमंत्री ने कहा कि उनके काफिले ऐसे ही चलते रहेंगे, लोगों को आदत डाल लेनी चाहिए।
छत्तीसगढ़ में भी हम यही बात देखते हैं कि किस तरह तमाम बड़े सत्तारूढ़ लोगों के काफिले ट्रैफिक को रोककर, लालबत्ती को पार करके, लोगों को लाठियों से किनारे धकेलकर आम जनता के बुनियादी हकों को कुचलते हुए आगे बढ़ते हैं। जो लोग जिन शहरों में पैदा हुए, सड़कों पर खेले, आज वे ही लोग अपने ही लोगों को लाठियों से धकेलकर इस अंदाज में आगे बढ़ते हैं, मानो यह सत्ता हमेशा की हो। छत्तीसगढ़ में भी मंत्रियों के काफिलों से हादसे हो चुके हैं, और जिंदगियां जा चुकी हैं।
एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कल संसद की कैंटीन में जाकर वहां सबके बीच बैठकर थाली का खाना खाते हैं, तो उनकी सादगी पर देश का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया टूट पड़ता है। दूसरी तरफ जनता की जिंदगी को कुचलते हुए जब ऐसे सत्तारूढ़ लोगों के काफिले आगे बढ़ते हैं, तो इंसानियत और लोकतंत्र दोनों फुटपाथ के किनारे नालियों में जा गिरते हैं। चुनाव के पहले जो नेता आम आदमी शब्द की रट लगाते थकते नहीं, वे चुनाव निपटते ही खास आदमी बन जाते हैं, और सत्ता से परे की बाकी सारी जनता आम से भी नीचे की महज गुठली बनकर रह जाती है जिसे वीआईपी या वीवीआईपी कहे जाने वाले लोगों के काफिले कुचलकर आगे बढ़ सकते हैं, सड़कों पर अपने लिए ट्रैफिक रोककर अस्पताल जाते मरीजों को दम तोडऩे के लिए बेबस कर सकते हैं।

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