लोकतांत्रिक और इंसाफपसंद सोच खोने के नुकसान

संपादकीय
15 मार्च 2015
पश्चिम बंगाल में एक चर्च की 72 बरस की नन के साथ सामूहिक बलात्कार के बारे में क्या कहा जाए! तीन-चार ही दिन हुए हैं कि गुजरात के अहमदाबाद में छह बरस की एक बच्ची के साथ बलात्कार करने के बाद उसके बदन में लोहा घुसाकर उसे मार डाला गया था। और इन दो राज्यों से परे भी देश भर में कमोबेश यही हाल चल रहा है, और छत्तीसगढ़ तो बलात्कार के आंकड़ों में आबादी के अनुपात में कुछ अधिक ही दिल दहलाने वाला है। एक तरफ बंगाल की मुख्यमंत्री ने इस जुर्म के पीछे उस मानसिकता को जिम्मेदार ठहराया है जो देश में साम्प्रदायिकता फैला रही है, और अल्पसंख्यकों के खिलाफ बहुसंख्यकों को भड़का रही है। दूसरी तरफ भाजपा ने उसे राज्य सरकार की नाकामयाबी कहा है, और याद दिलाया है कि ममता बैनर्जी ने मुख्यमंत्री बनते ही एक बलात्कार को जांच के पहले ही फर्जी करार दे दिया था।
हम इन दोनों ही बातों को इस घटना से परे, इस जुर्म की जिम्मेदारी से परे, पूरे देश का माहौल खराब करने वाली मानते हैं, और देश में इंसाफ की सोच को खत्म करने वाला मानते हैं। जब धर्म के आधार पर हिंसक सोच को बढ़ाते हुए किसी एक धर्म या कई धर्मों पर हमले किए जाते हैं, तो धार्मिक-हिंसा से परे भी समाज में धार्मिक-सहनशीलता घटती चलती है। आज भारत में वही हो रहा है। धर्मान्धता बढ़ रही है, साम्प्रदायिकता बढ़ रही है, समुदायों के बीच फासले बढ़ाए जा रहे हैं, और किसी एक धर्म का दबदबा कायम करने की कोशिश चल रही है। नतीजा यह हो रहा है कि जैसे-जैसे बहुसंख्यक हिन्दुओं को भड़काया जा रहा है, उसके मुकाबले अल्पसंख्यक प्रतिक्रिया भी हो रही है। कहां तो इस देश को इक्कीसवीं सदी के और आगे तक ले जाने की बातें हो रही हैं, और कहां इसे लोकतंत्र के पहले की सदियों में ले जाया जा रहा है। 
हम बार-बार इस बात को लिखते हैं कि जब देश में कानून का सम्मान कम होता है, जैसे-जैसे वैज्ञानिक सोच घटती है, वैसे-वैसे तरह-तरह की हिंसा बढ़ती है। ऐसी बढ़ती हुई हिंसा के तने और जड़ सीधे-सीधे दिखते नहीं हैं, लेकिन हवा में जो जहर घुलता है, उसका असर हर तबके के दिल-दिमाग तक पहुंचता है, और अदालत का इंतजार करने के बजाय लोग जेल तोड़कर आरोपी को निकालकर सड़कों पर मार डालते हैं, और शिवसेना जैसे राजनीतिक दल खुलकर ऐसी हिंसा को सही ठहराते हैं। कानून को हाथ में लेकर इस तरह की हिंसा को जायज ठहराना उन्हीं लोगों को सुहाता है जो कि अपने-अपने दायरों में सुरक्षित बैठे रहते हैं।
हम इंसाफ की सोच को खत्म होने के खतरे हिन्दुस्तान के बगल के पाकिस्तान में रोजाना ही देख रहे हैं जहां पर लोकतंत्र और आबादी उन दोनों के बीच पहले खत्म होने का मानो एक मुकाबला चल रहा हो। भारत में भी कई लोग हिंसा के बल पर इसे एक धर्मराज्य बनाने पर आमादा हैं, और अगले चार बरस प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने यह जिद ही सबसे बड़ा राष्ट्रीय खतरा है। इससे उबरे बिना इस देश की तरक्की नहीं हो सकती। आज इस देश का एक तबका बलात्कार पर बनी हुई एक फिल्म को रोक देना बदनामी का इलाज मान रहा है। आज किसी देश की यह ताकत नहीं है कि वह किसी फिल्म या खबर को रोककर अपनी बदनामी को रोक ले। आज दुनिया में सूचना और सोच के लिए सरहदें खत्म हो चुकी हैं। वे हिन्दुस्तानी गैरजिम्मेदार हैं जो कि किसी डॉक्यूमेंट्री फिल्म को बनाने वाली की चमड़ी के रंग को देखकर फिल्म को भारत की बदनामी करार दे रहे हैं। जिम्मेदारी की बात तो यह होती कि ऐसी फिल्म देखकर भारत के लोग पहले अपने बारे में सोचते, फिर फिल्म बनाने वाली के बारे में सोचते, और फिर उन्हें जो माकूल जवाब सूझता, वह जवाब भी लिखते। लेकिन आईने को तोड़कर यह देश अपनी खामियों को गैरमौजूद मान ले रहा है, यह अपने आप में एक परले दर्जे की अलोकतांत्रिक सोच है, इससे बदनामी नहीं थमती, बलात्कार थमने की एक संभावना जरूर थमती है। 
कुल मिलाकर भारत लोकतांत्रिक और इंसाफपसंद सोच खोने के नुकसान झेल रहा है। 

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