मुजरिम की सोच का गंभीर अध्ययन समाज के हित में

4 मार्च 2015
संपादकीय
देश के सबसे चर्चित निर्भया बलात्कार के आरोपी का एक इंटरव्यू बीबीसी पर आया, और हमने भी इस अखबार में उसका एक हिस्सा कल छापा, इसके साथ ही भारत के मीडिया में, जनता के बीच, और आज संसद में इस पर बहस हो रही है कि एक ऐसे आरोपी का इंटरव्यू छापना सही है या नहीं? चूंकि हमने कल इसे छापने का फैसला लिया था, इसलिए आज यह जरूरी और सही होगा कि हम इस बारे में अपनी सोच भी यहां पर रखें।
बलात्कार का जुर्म इस मायने में दूसरे जुर्म से अलग नहीं होता कि उसके आरोपी, या मुजरिम साबित हो चुके किसी व्यक्ति की बात को, सोच को लोगों के सामने न रखा जाए। आज हिंदुस्तान का एक सबसे बड़ा मुजरिम करार दिया गया दाऊद इब्राहीम टेलीफोन पर हिंदुस्तानी मीडिया को इंटरव्यू देते दिखता है। दूसरे तरह के मुजरिम भी अपनी बात कहते दर्ज होते रहे हैं। देश का सबसे बड़ा मुजरिम नाथूराम गोडसे न सिर्फ अपने लंबे बयान को लेकर किताबों की शक्ल में आ चुका है, बल्कि उस पर फिल्में बन चुकी हैं, और नाटक खेले जाते हैं। कुल मिलाकर मतलब यह है कि भारत और दुनिया का इतिहास मुजरिमों को उनकी सोच सामने रखने का मौका देते आया है, कभी मुजरिम साबित होने से पहले, कभी सजा काटते हुए, और कभी रिहाई के बाद।
अब ऐसे में बलात्कार के एक आरोपी की सोच अगर एक गंभीर इंटरव्यू में सामने आती है, तो इससे इस जुर्म और इसके मुजरिम के बारे में एक सामाजिक अध्ययन में मदद भी मिलती है। आज जिस इंटरव्यू को लेकर बवाल मचा हुआ है, और जिसके खिलाफ दिल्ली पुलिस ने भी खालिस बेवकूफी में एक रिपोर्ट खुद ही दर्ज की है, वह इंटरव्यू बलात्कारी की सोच को बताता है, और इसके सामने आने से समाज के भीतर बाकी के संभावित बलात्कारियों की सोच का अंदाज लगाया जा सकता है और समाज अपने-आपको सुधार सकता है।
दरअसल भारत के लोग एक बड़े पाखंड में जीने के आदी हो गए हैं। वे लगातार यह सोचते हैं कि बलात्कार की चर्चा भी न करके समाज को बलात्कार से बचाया जा सकता है, कन्या भू्रण हत्या की बात भी नहीं होनी चाहिए, और बच्चों का यौन शोषण तो मानो भारत में हो ही नहीं सकता। इसके साथ-साथ सेक्स से, वयस्क मुद्दों से जुड़े हुए जितने भी मामले रहते हैं उनको लेकर भी भारत के लोगों का नजरिया रेत में सिर घुसाकर आंधी से बचने का रहते आया है। खुद की आंखें बंद कर लो, तो फिर आसपास कोई बुरी बात बचती ही नहीं है। यह समाज भारत के कॉलेज में जाने वाले बच्चों को भी उनकी देह के बारे में, सेक्स के बारे में कुछ भी बताने के खिलाफ है। इसलिए यह समाज यह भी सोचता है कि मुजरिम की मानसिकता की चर्चा सिर्फ टीवी सीरियलों में होनी चाहिए, एक वक्त की अपराध-कथाओं की पत्रिकाओं में होनी चाहिए, लेकिन असल जिंदगी में गंभीर चर्चा कभी नहीं होनी चाहिए।
इस इंटरव्यू का किरण बेदी ने स्वागत किया है, और सुप्रीम कोर्ट के कुछ दिग्गज वकीलों ने भी इसे समाज के लिए जरूरी बताया है। लेकिन कई सामाजिक कार्यकर्ता इसके खिलाफ उतर आए हैं, जो कि अमूमन उदारवादी रहते हैं। इसलिए इस मुद्दे पर हम अपनी सोच यहां रख रहे हैं कि मुजरिम की सोच का एक गंभीर अध्ययन समाज के हित में है।

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