खेत से लेकर इंसानी सेहत तक जहर के बाजार का हमला...

संपादकीय
20 मार्च 2015

बाजार की एक खबर है कि हिन्दुस्तान का कीटनाशक कारोबार इस बरस 12 से 15 फीसदी बढ़कर 33 हजार करोड़ रूपए तक पहुंच जाएगा। आज इसका घरेलू बाजार 15 हजार करोड़ रूपए है, और निर्यात 12 हजार करोड़ रूपए। एक कारोबारी को तो ये आंकड़े सुहा सकते हैं, लेकिन अगर हम धरती की बात करें, तो इतना जहर आखिर जाता कहां है? खेती हो या बागवानी, कीट पतंगों को मारने के लिए हो, या फिर किसानों की खुदकुशी के लिए, जमीन में जाकर, पानी में मिलकर, या हवा में घुलकर यह सारा जहर इंसानों को ही धीरे-धीरे खत्म कर रहा है। और नए किस्म की खेती रासायनिक खाद से लेकर कीटनाशक तक पर निर्भर रहती है, और अनाज की उपज बढ़ाने के देश के आंकड़ों को पूरा करने के लिए सरकार और बाजार मिलकर लगातार रासायनिक खाद और बाकी जहर को बढ़ावा देते हैं। और ये आंकड़े तो भारत में बनने वाले जहर के हैं, भारत के कारोबारियों का कहना है कि सरकार जहर के आयात को इतना बढ़ावा दे रही है, बहुराष्ट्रीय कंपनियों को इतने फायदे दे रही है कि भारत का कीटनाशक उपयोग खतरे में आ गया है। अब मतलब यह है कि भारत के जहर से परे दूसरे देशों का जहर भी जमीन और पानी से होकर हिन्दुस्तान पीढिय़ों के बदन में रोज घुस रहा है। नौबत इतनी खराब है कि बहुत से वैज्ञानिक परीक्षणों में बच्चों को दूध पिलाने वाली माताओं के दूध में कीटनाशक-जहर साबित हुआ है। 
दरअसल खेती के कीड़े हों या घर के भीतर के मच्छर हों, लोग उनसे छुटकारा पाते हुए इस बात का अंदाज नहीं लगाते कि कुदरत और खुद की सेहत पर इसका क्या असर पड़ रहा है। इश्तहारों का बाजार देखें तो टीवी पर मच्छर और मक्खी, तिलचट्टे और दूसरे कीड़ों की दहशत बुरी तरह फैलाकर लोगों के सामने उनसे छुटकारा पाने का आसान और अकेला विकल्प रासायनिक जहर की शक्ल में रखा जाता है। इनमें से नुकसानदेह कीड़े-मकोड़ों से बचने का आसान और बिना नुकसान वाला रास्ता घरों को नहीं सुझाया जाता, और बिना जहर खेती के कीड़ों से निपटने का रास्ता किसानों को नहीं सुझाया जाता। उद्योग के आंकड़े अलग चलते हैं, और खेती की उपज के आंकड़े अलग। और इन दोनों को एक-दूसरे के फिक्र नहीं होती, और इन दो पाटों के बीच में प्रकृति और पर्यावरण पिसते चले जा रहे हैं। 
चूंकि कई किस्म के जहर लोगों की जिंदगी को इतनी तेज रफ्तार से तबाह नहीं करते कि वे सिर चढ़कर बोलें, इसलिए लोग उनसे खतरा मानकर ही नहीं चलते। मौत से पहले भी जहर का नुकसान समाते चल रहा है, और इससे उबरने की कोई राह नहीं दिखती है। जागरूक लोगों को वैज्ञानिक तथ्यों और तर्कों के साथ जनता को सावधानी सिखाने की जरूरत है, क्योंकि सरकार तो आंकड़ों को कामयाबी मानकर चलती हैं, और उसकी आक्रामकता को बाजार दाम देकर खरीदता भी है। लेकिन जनता को खुद को इन खतरों के बारे में बात करनी चाहिए, और जिंदगी में रसायनों का इस्तेमाल कम से कम करना चाहिए। 

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